Saturday, August 13, 2011

मदरसों का सामाजिक परिप्रेक्ष्य


अधिकतर बच्चे सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं। बहुत बच्चे ऐसे हैं जो यतीम होते हैं। कुछ ऐसे होते हैं जिनके सरपरस्त मजदूरी कर सकने की भी स्थिति में नहीं होते हैं। कुछ ऐसे भी होते हैं जिनके समक्ष बाल्यकाल में ही पेट की आग बुझाने की चुनौती होती है। आर्थिक बदहाली का शिकार ऐसे बच्चे मीडिल क्लास की तरह सरकारी या गैर-सरकारी संसाधनों की पहुंच से कोसों दूर होते हैं। ये बच्चे सिविलाइजेशन की प्रक्रिया से भी अलग-थलग रह जाते हैं। यदि मदरसों की छत न मिले तो ये बच्चे भी कहीं कूड़ा बिनते नजर आते या जेब काटते होते या फिर कहीं बंधुवा बाल श्रमिक होते।

मदरसों को लेकर तरह-तरह भ्रान्तियां हैं। कोई मदरसों को धार्मिक शिक्षा तक सीमित समझता है तो कोई इसे सीधे आतंकवाद से जोड़कर देखता है और कोई रूढि़वाद की पनाहगाह बताता है। लेकिन मदरसों के शैक्षिक और सामाजिक चरित्र तथा भूमिका पर बातें कभी-कभार ही होती हैं। अधिकतर बातों का संदर्भ आतंकवाद की बढ़ती-घटती घटनाएं होती हैं। सत्य और तथ्य चाहे जो हो, मौजूदा दौर की सच्चाई है कि हर विस्फोट के बाद मदरसा जांच एजेंसियों के निशाने पर आ जाते हैं। मदरसा ही क्यों, माइनारिटी स्टेटस रखने वाले दूसरे शैक्षिक संस्थान भी संदेह के घेरे में रहते हैं। इस संदर्भ में यदि मदरसों का छोड़ दिया जाए तो अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और हाल में माइनारिटी स्टेटस प्राप्त करने वाले जामिया मिल्लिया इस्लामिया जैसे देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों की सेक्यूलर छवि भी धूमिल हो रही है। निश्चित तौर पर नौजवानों का एक हिस्सा आतंकवादियों के नापाक इरादों का शिकार हुआ है। लेकिन कुछ सिरफिरों के चलते पूरे समुदाय को ही शक के घेरे में लाना ठीक नहीं है। यह एजेण्डा दरअसल सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के समर्थक आरएसएस और वीएचपी जैसे हिन्दुवादी संगठनों का रहा है। किसी भी सिक्के के दो पहलू होते हैं। मदरसों में पढ़ाई जाने वाली दीनी किताबें या धार्मिक शिक्षा एक प्रबल पक्ष है, जो अक्सर मीडिया में बहस का मुद्दा होता है। लेकिन यह आधा सच है। यदि पूरी हकीकत जाननी है तो हमें मदरसों की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर भी ध्यान देना होगा।
पहली महत्वपूर्ण बात यह कि मदरसा आवासीय शिक्षण संस्थान के बेहरीन उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। शिक्षा में स्कूल का संगठन महत्वपूर्ण पक्ष होता है। मदरसों का अनुशासन और आन्तरिक संगठन अपनी जगह काबिले तारीफ है। सवाल यह है कि मदरसे मुख्य धारा से जुड़े नहीं हैं। यदि मदरसा शिक्षा बोर्ड से मान्यता प्राप्त स्कूलों (मदरसों) की बात करें तो उत्तर प्रदेश में ही 1500 से अधिक मदरसे हैं जिन्हे बोर्ड की मान्यता प्राप्त है। बोर्ड की मान्यता प्राप्त होने का मतलब है कि इतनी बड़ी तादाद में मदरसे सरकारी नीतियों और दिशा निदेशों का पालन करते हैं। रही बात अलग से मदरसा शिक्षा बोर्ड के आस्तित्व की तो संविधान की अनु॰ 30(1) के तहत भाषाई या धार्मिक अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शिक्षण संस्थान खोलने और चलाने का मूलाधिकार प्राप्त है।
दूसरी बात मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों की। मालूम हो कि अधिकतर बच्चे सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं। बहुत बच्चे ऐसे हैं जो यतीम होते हैं। कुछ ऐसे होते हैं जिनके सरपरस्त मजदूरी कर सकने की भी स्थिति में नहीं होते हैं। कुछ ऐसे भी होते हैं जिनके समक्ष बाल्यकाल में ही पेट की आग बुझाने की चुनौती होती है। आर्थिक बदहाली का शिकार ऐसे बच्चे मीडिल क्लास की तरह सरकारी या गैर-सरकारी संसाधनों की पहुंच से कोसों दूर होते हैं। ये बच्चे सिविलाइजेशन की प्रक्रिया से भी अलग-थलग रह जाते हैं। यदि मदरसों की छत न मिले तो ये बच्चे भी कहीं कूड़ा बिनते नजर आते या जेब काटते होते या फिर कहीं बंधुवा बाल श्रमिक होते। बहरहाल संघी मानसिकता के लोगों द्वारा इनकी टोपी, लुंगी और दाढ़ी को आतंकवाद के प्रतीक के रूप में प्रतिबिम्बित करने से इनके समझ राष्ट्रीय और सांस्कृतिक पहचान का संकट और पेंचीदा हो जाता है। कुछ देर के लिए मान लिया जाय कि मदरसे शिक्षा के उचित स्थान नहीं हैं तो हजारों की संख्या में गरीब बच्चों के शिक्षा की वैकल्पिक व्यवस्था क्या है? खास करके उनके लिए जिनका परिवार गरीबी रेखा से नीचे नहीं बल्कि बहुत नीचे जीवन यापन कर रहा है। एक्शन एड के एक अध्ययन में आश्चर्यचकित कर देने वाले तथ्य सामने आए हंै कि अभी भी ग्रामीण मुसलमानों में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन की औसत आय मात्र 11 रूपए है।
संघी मानसिकता के लोगों का कहना है कि मदरसे आतंकवाद की पाठशाला हैं। इस तरह के गैर-जिम्मेदाराना बयानों से एक तरफ जहां भावनात्मक स्तर पर संविधान प्रदत्त अल्पसंख्यकों की धार्मिक और शैक्षिक स्वतंत्रता की अवहेलना होती है वहीं दूसरी तरफ इन्हें रोजमर्रा जीवन में भेदभाव की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। दो बातें हैं, एक तो मदरसे आधुनिक शिक्षा से दूर हैं और दूसरे इनकी छवि संदेहास्पद है। कहना पड़ रहा है कि छवि तो हमारे प्राथमिक पाठशालाओं की भी खराब है। इतनी खराब कि खुद इन स्कूलों के प्रशिक्षित अध्यापक-अध्यापिकाओं के बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। ज्ञात हो कि निजी स्कूलों के अधिकतर अध्यापक-अध्यापिका अप्रशिक्षित होते हैं। लेकिन उनका कार्य निष्पादन प्राथमिक स्कूलों के प्रशिक्षित और अनुभवी अध्यापकों-अध्यापिकाओं से अधिक और अच्छा होता है। तो क्या इस संदर्भ में यह मान लिया जाना चाहिए कि प्राथमिक विद्यालय भी आधुनिक शिक्षा से दूर हैं। यह जानकर हैरानी होती है कि ढ़ेर सारे मदरसे प्राथमिक स्कूलों से भी आगे हैं। कम से कम मान्यता प्राप्त मदरसों में सरकारी किताबें ही पढ़ाई जाती हैं। यदि बनारस के डा॰ मोहम्मद आरिफ की बातों पर यकीन करें, जिन्होंने मदरसों पर काफी काम भी किया है तो इनके मुताबिक मदरसों में प्रदेश सरकार द्वारा मान्य वो किताबें भी पढ़ाई जा रही हैं जिनके कुछ अध्याय काफी विवादित हैं, जिसमें सास्कृतिक राष्ट्रवाद और साम्प्रदायिकता की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। इस तरह की किताबें सरस्वती शिशु मंदिर में पढ़ाई जाती हैं जो राष्ट्रीय एकता और साझी विरासत वाली संस्कृति को नुकसान पहंुचाती हैं।
जाहिर है माडर्नाइजेशन के दौर में मदरसों में वो बातें भी बताई जा रही हैं जो खुद मदरसों के बुनियादी ढ़ांचे के खिलाफ हैं। यहां कहना चाहूंगा कि ये बातें अल्पसंख्यकों को इसलिए पता नहीं चल पाती हैं क्योंकि मदरसों पर उलेमा वर्ग का अच्छा खासा प्रभाव है। उलेमा होना अपने आप में अति महत्वपूर्ण है। लेकिन यह वर्ग सरकारी-गैर सरकारी योजनाओं को अपने हिसाब से चलाना चाहता है। इस नियमन और संचालन में उलेमा वर्ग अकेले नहीं होता। मुख्यधारा का ही व्यक्ति उसे ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करता है। मुख्यधारा का व्यक्ति कोई जनप्रतिनिधि, कोई अफसर या कोई बाबू हो सकता है। मान्यता प्राप्त मदरसे मुख्य धारा से अच्छी तरह जुड़े हुए हैं लेकिन दुःख की बात है कि मदरसों के माध्यम से अल्पसंख्यकों तक पहुंचने वाली सरकारी सुविधाओं का लाभ उनतक नहीं पहुंच पाता। आम मुसलमानों को तो किसी योजना या स्कीम की जानकारी तक नहीं होती। फतेहपुर की रूबीना की बातों से पता चलता है कि स्थानीय प्रतिनिधि मुस्लिम अल्पसंख्यकों के लिए सरकारी योजनाओं की जानकारी अपने तक सीमित रखता है। बताता भी है तो समय निकल जाने के बाद। इन्टरनेट और दूसरे संचार माध्यमों तक पहुंच नहीं होने के कारण भी मुस्लिम अल्पसंख्यक कल्यारकारी योजनाओं के लाभ से वंचित रह जाते हैं। ऐसे में इन्हें मुख्य धारा में शामिल करने का एजेण्डा भी पीछे रह जाता है।
जाहिर मदरसों के बारे में हमें अपनी राय बदलने की जरूरत है। मेरा भी व्यक्तिगत अनुभव यही रहा है कि मदरसे सिर्फ धार्मिक शिक्षा प्रदान करने का केन्द्र हैं। लेकिन मुझे अपनी धारणा बदलनी पड़ी। मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों से बातचीत, खासकर उन बच्चों से जिन्हें उच्च शिक्षा का अवसर मिला, जो जामिया, जेएनयू डीयू, बीएचयू और एएमयू जैसे देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में पढ़ाई कर रहे हैं या कर चुके हैं और वो जो एक बेहतर समाज और देश के सपनों को सच कर दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, उनकी पहचान को स्वीकार करना होगा। अवसर हर व्यक्ति के लिए विकास खिड़कियां खोलता है। इस संदर्भ में मदरसों के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पक्षों से सामाजिकता का पाठ सीखा जाना चाहिए।

नई दिल्ली से प्रकाशित पाक्षिक ‘‘शिल्पकार टाइम्स’’ 1-15 अगस्त के अंक में प्रकाशित

Friday, August 12, 2011

भावना, योजना और जाति-जनगणना के बीच भ्रम की स्थिति क्यों?


" सरकार का तर्क है कि जाति आधारित जनगणना से खाद्य सुरक्षा का सही अनुमान लगाया जा सकता है। फिर एक-एक करके अन्य नीतियों के क्रियान्वयन में भी इस जनगणना की मदद ली जा सकेगी। ताकि कल्याणकारी योजनाओं का लाभ सही व्यक्ति और परिवार तक पहुंच सके। यदि इस बात पर यकीन करें तो मानना होगा कि हमारे समाज में जात-पात की समस्या समाप्त हो चुकी है। सर्व शिक्षा अभियान, मनरेगा, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, सम्पूर्ण सफाई अभियान जैसी योजनाओं की रेलमपेल में सम्मान का सवाल बहुत पीछे रह गया है।........"

जनगणना 2001 के बाद सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण (बी.पी.एल. सर्वेक्षण) का पहला दौर जुलाई महीने में शुरू हुआ। इस बार बी.पी.एल सर्वेक्षण में दो नयी बातें हो रही हैं। पहला यह कि पहली बार शहरी क्षेत्रों में भी यह सर्वे हो रहा है और दूसरी बात यह कि इस सर्वे के साथ ही जाति जनगणना भी की जा रही है। मालूम हो कि जाति जनगणना इससे पहले 1931 में की गयी थी। 80 बरस के बाद (आज़ादी के 64 बरस बाद) हो रही इस जनगणना को लेकर प्रबुद्ध वर्ग में बहस तेज हो रही है। इस बीच “आरक्षण” फिल्म के कानटेन्ट और प्रस्तुति ने भी ध्यान आकर्षित किया है। अखबार, टी.वी. से लेकर फेसबुक जैसे सोशल नेटवर्किंग साइट पर भी घमासान मचा हुआ है। कोई फिल्म पर प्रतिबंध लगाने, तो कोई रिलीज करने का पक्षधर है। कोई सस्ती लोकप्रियता की कसौटी पर परख रहा है और यह कह रहा है कि फिल्म देखने के बाद ही तय किया जाय कि वास्तव में फिल्म किसी जाति विशेष की भावनात्मक ठेस पहुंचाती है या नहीं। यूंही हो-हल्ला मचाने से प्रोड्यूसर-डाइरेक्टर का बिजनेस बढ़ेगा। बहरहाल आरक्षण का मुद्दा ही केन्द्र में है। 1931 के बाद और आजाद भारत में पहली बार हो रही जाति जनगणना जाति आधारित भेदभाव की यह व्यापक स्वीकारोक्ति है। लेकिन जाति जनगणना को लेकर कई सवाल अनुत्तरित हैं। पहला यह कि इस जनगणना से हमें क्या हासिल होने वाला है? क्या उन जातियों की पहचान और संख्या सामने आ सकेगी जिनकी अभी तक अलग से कोई सूची उपलब्ध नहीं है? क्या करोणों रूपए खर्च करने के बाद इस जनगणना से प्राप्त आंकड़े जातिगत विविधता प्रधान भारत के गरीबों और पिछड़ों के लिए नीति बनाने में सहायक होंगे? और अन्ततः क्या जात-पात की भेदभाव परक व्यवस्था कमजोर हो सकेगी? इन्हीं सवालों के चलते ‘‘समाजिक, आर्थिक व जाति जनगणना, 2011’’ की प्रक्रिया, प्रयुक्त माध्यम और परिणाम को लेकर जिज्ञासाएं भी हैं और उहापोह की स्थिति भी।
जनगणना से जुड़े सवालों में पहला सवाल यह कि जब इस वर्ष 9 से 28 फरवरी के बीच सम्पन्न जनगणना में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति की गिनती हो चुकी है तो जाति जनगणना के नाम पर उन्हीं को फिर से गिनने की आवश्यकता क्या है? 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति की आबादी क्रमशः 16.2 और 8.2 प्रतिशत थी। जाहिर है कुल आबादी में अनुसूचित जाति/जनजाति की संख्या पहले से मालूम है। जनगणना, 2011 के आंकड़ों के सामने आते ही 2001 के आंकड़े में होने वाले बदलाव भी सामने आ जाएंगे।
रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त के अनुसार जाति जनगणना में केवल चार कटेगरी होंगे, पहला “अनुसूचित जाति”, दूसरा “अनुसूचित जनजाति”, तीसरा “अन्य” और चैथा “कोई जाति नहीं”। भारत सरकार की वेवसाइट http://rural.nic.in पर यह भी लिखा है कि अनुसूचित जाति सिर्फ हिन्दू, सिक्ख और बौद्ध धर्म के अनुयायियों में होंगे। बिल्कुल ठीक लिखा है। सबकुछ संविधान के दायरे में लिखा गया है। लेकिन यह बात समझ से परे है कि इस जाति जनगणना का लाभ क्या है, जिसमें सिर्फ अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति को ही गिनना प्रमुख ध्येय है। जनगणना 2011 से यदि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की आबादी घटा दिया जाय तो अन्य जातियों और बिना जाति के लोगों की संख्या ऐसे ही सामने आ जाएगी। फिर अलग से 2000 करोण रूपए खर्च करने की जरूरत क्या है? बी.पी.एल. के साथ हो रहे इस सर्वे को इस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है जैसे अन्य पिछड़ा वर्ग, सामान्य वर्ग और मुस्लिम व इसाई दलितों का अलग जातिगत आंकड़ा प्राप्त किया जा सकेगा। और उन्हीं आंकड़ों के अनुसार मानव संसाधनों को नियोजित किया जा सकेगा।
लेकिन यह जनगणना तो छलावा प्रतीत होता है। क्योंकि इस जनगणना से पिछड़ी और सामन्य जातियों के लोगों के बीच विभाजक रेखा नहीं खींची जा सकती। जिस तरह से “अनुसूचित जाति”, “जनजाति”, “अन्य” और “बिना जाति” के लोगों के बीच खींचने की कोशिश जा रही है। यह तो यूपीएससी (संघ लोक सेवा आयोग) की परीक्षा में दिए जाने वाले विकल्पों के समान है, कि उत्तर इन्हीं चार में से कोई एक चुनना है। या फिर आजकल टी.आर.पी. मीडिया द्वारा पूछे जाने वाले प्रश्नों की तरह हैं जिनमें पहले से तय तीन-चार प्रश्नों के अलावा पांचवा या छठा का कोई विकल्प नहीं होता। किसी मायने में यह लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन भी है कि उत्तरदाता के समक्ष अपनी समस्या और समस्या के परिमाण को व्यक्त करने का कोई विकल्प ही नहीं दिया जाता है। ऐसे में उन जातियों का क्या होगा जिनका संबंध न तो सामान्य वर्ग से है और न ही अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से। मण्डल कमीशन के अनुसार इनकी आबादी 54 प्रतिशत है। आबादी का यह हिस्सा भी सामाजिक न्याय के संघर्ष में शामिल रहा है। फिर इनकी गिनती “अन्य” विकल्प के अन्तर्गत क्यों किया जा रहा है? क्या ये जातियां कर्म और जातिगत भेदभावों के कारण सामाजिक वंचनाओं का शिकार नहीं रही हैं या नहीं हैं।
चिन्ता की बात यह भी है कि मुस्लिम और ईसाई भी इस देश के नागरिक हैं। भारतीय समाज की कल्पना इन दो को छोड़कर कैसे की जा सकती है। मुस्लिम और ईसाई आबादी का एक खास हिस्सा ऐतिहासिक रूप से दलित रहा है। लेकिन यह तबका धर्म परिवर्तन के कारण अनुसूचित जाति होने के लाभ से वंचित है। जबकि धर्म परिवर्तन करके बुद्ध या सिक्ख हो जाने पर यह पाबन्दी नहीं है। सच्चर कमेटी ने भी इस बात को माना है कि 1950 के राष्ट्रपति के अध्यायदेश द्वारा अनुसूचित जाति की सीमा तय करते समय कर्म के आधार पर अछूत समझे जाने वाले सिर्फ हिन्दुओं को ही शामिल किया गया। जबकि गै़र हिन्दुओं को, जो मुस्लिम या ईसाई थे और जिनकी सामाजिक स्थिति भी हिन्दु दलित के समान थी, को छोड़ दिया गया, जो ओ.बी.सी. के अन्तर्गत अधिसूचित हैं। यदि मुस्लिम समाज की बात करें तो कम से कम हलालखोर जैसी जातियों को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल किया जाना चाहिए। लेकिन ऐसा संविधान संशोधन के बगैर संभव नहीं है। फिर सच्चर और रंगनाथ जैसी कमेटी और आयोग की अनुशंशाओं का क्या औचित्य है? 
सरकार का तर्क है कि जाति आधारित जनगणना से खाद्य सुरक्षा का सही अनुमान लगाया जा सकता है। फिर एक-एक करके अन्य नीतियों के क्रियान्वयन में भी इस जनगणना की मदद ली जा सकेगी। ताकि कल्याणकारी योजनाओं का लाभ सही व्यक्ति और परिवार तक पहुंच सके। यदि इस बात पर यकीन करें तो मानना होगा कि हमारे समाज में जात-पात की समस्या समाप्त हो चुकी है। सर्व शिक्षा अभियान, मनरेगा, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, सम्पूर्ण सफाई अभियान जैसी योजनाओं की रेलमपेल में सम्मान का सवाल बहुत पीछे रह गया है। जिस सम्मान को प्राप्त करने के लिए आरक्षण की व्यवस्था को लागू किया गया था, सम्मान की वह भावना विभिन्न लोक कल्याणकारी योजनाओं की भेंट चढ़ने वाली है। आरक्षण के समर्थकों सुनों ध्यान से तुम्हारी गिनती ओबीसी में नहीं होने वाली। तुम बहुत सशक्त हो चुके हो। अब तुम्हें अपनी जाति के सामने दिए बाॅक्स में कोड संख्या 3 भरना है। यही कोड सामान्य जाति के लोग भी भरेंगे। इस कोड का मतलब यह है कि आपकी गिनती अन्य पिछड़ों में नहीं बल्कि सामान्यों के साथ होगी। शायद सरकार इस मत से सहमत हो चुकी है कि आरक्षण का लाभ पिछड़ों को जितना मिलना था मिल चुका। लेकिन सरकार यह भूल रही है कि आरक्षण का लाभ पिछड़ों की कुछ जाति विशेष को ही मिल पाया है।
सवाल घूम फिरकर वहीं आ पहुंचता है। आरक्षण की व्यवस्था सामाजिक सम्मान की भावना से जुड़ी है। सम्मान का संबंध संसाधनों की समान रूप से उपलब्धता, पहुंच और अवसरों में समानता से है। यदि मौजूदा प्रणाली के तहत हो रही जाति जनगणना से दलितों-पिछड़ों की सामाजिक स्थिति में साकारात्मक बदलाव आने की संभावना है तब तो ऐसी जनगणना का स्वागतम् है। अन्यथा भावनाओं और योजनाओं में गड्मड् करके खिचड़ी पकाने से भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है।

Monday, May 16, 2011

भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक लड़ाई

भारत को सोने की चिडि़या कहा जाता है। चार-पाँच रूपए मूल्य की काॅपी पर तिरंगा ध्वज के साथ “मेरा भारत महान” लिखकर बच्चों को अपने देश की महानता का बोध कराया जाता है। लेकिन आज भ्रष्टाचार नामक दीमक व्यवस्था को चाट-चाट कर इतना खोखला कर दिया है कि भारत की महानता न सिर्फ धूल-धूसरित हो रही है बल्कि नागरिक समाज त्राही-त्राही कर रहा है। संविधान द्वारा स्थापित लोकतांत्रिक संस्थाएं भ्रष्टाचार के दावानल में धँू-धँू कर के जल रही हैं। भ्रष्टाचार स्वतंत्र भारत में शुरू से ही अज्ञात नहीं रहा है। आजादी के बाद भ्रष्टाचार की पहली घटना “जीप घोटाला” नेहरू के समय में ही प्रकाश में आया था। हाँ 80 और फिर 90 के दशक में इसका बेलगाम विस्तार हुआ। तब से लेकर आज तक एक से बढ़कर एक घोटालों और इनमें शामिल हाई प्रोफाइल लोगों तथा इनकी शह पर या परिस्थितिजन्य कारणों से भ्रष्टाचार की खेती करने वाले साधारण जनों के नाम सामने आ चुके हैं। लेकिन कुछ एक मामलों को छोड़ दिया जाय तो प्रायः भ्रष्टचार में लिप्त व्यक्ति कानूनी दाव-पेंचों से बच निकलते हैं। पिछले दिनों जब अन्ना हजारे जन्तर-मन्तर पर बैठे तो ऐसा लगने लगा कि जनता की आवाज को एक काॅमन प्लेटफार्म मिल गया। लेकिन जन लोकपाल पर गठित समित में नागरिक समाज के दो प्रतिनिधियों पर वंशवाद और फिर सी॰डी॰ प्रकरण के आरोपों से पूरे अभियान की किरकिरी करने की कोशिश की जा रही है।
कहना नहीं है कि लोकपाल बिल का मुख्य उद्देश्य जनतंत्र की उच्च संस्थाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार को रोकना है। हम जानते हैं कि किसी भी अपराध के लिए भारतीय संविधान में एक नहीं बल्कि कई-कई अनुच्छेद और धाराएं हैं। जिनपर प्रभावी ढ़ंग से अमल किया जाय तो भ्रष्टाचार पर लगाम कसी जा सकती है। साथ ही समाज और देश की ढे़रों समस्याओं से समय रहते निजात भी मिल जाए। लेकिन रसूख प्रिय और कबूतरबाजी में ज़ोर आज़माइश करने वाले नेताओं पर किसी भी मामले में मुकदमा चलाना और उन्हें सजा दिलवाना टेढ़ी खीर है। लोकपाल बिल सत्ता के शिखर पर बैठे ऐसे राजनेताओं और उनतक पहुंच रखने वाले लोगों के भ्रष्टाचार में लिप्त होने की जांच और दोषी पाए जाने पर उन पर मुकदमा चलाने तथा जेल भेजने का प्रावधान करता है। गौर करने की दूसरी बात यह है कि भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे पहुंचता है। मौजूदा दौर में आम लोगों की धारणा है कि व्यवस्था का हर अंग भ्रष्टाचार की जद में है। जिसे समाप्त करना मुश्किल है। यह धारणा किसी पौराणिक-धार्मिक मान्यता की तरह स्थापित चुका है। लोग यह नहीं सोचते कि भारतीय राजव्यवस्था में यह धारणा स्थापित और विकसित कैसे हुआ? ध्यान रहे कि सोशल मोबिलिटी के सिद्धांत के अनुसार सामाजिक गतिशीलता अपवर्ड यानि नीचे से ऊपर की ओर बढ़ती है। लेकिन राजकाज में प्रचलित “डाक्ट्रिन आफ इनफिल्ट्रेशन” के सिद्धांत के अनुसार शासन-प्रशासन की अच्छी-बुरी चीजें ऊपर से नीचे पहुंचती हैं। जैसे लोक कल्याणकारी योजनाएं और इन योजनाओं के साथ भ्रष्टाचार की बुराई। इस संदर्भ में देखा जाए तो सत्ता के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति ही भ्रष्टाचार के मूल स्रोत हैं। ज्यादातर मामलों में ये लोग कानून की धज्जियां उड़ाने और जनता की आँखों में धूल झोंकने में कामयाब रहते हैं। भ्रष्टाचार के कुछ एक हाई प्रोफाइल मामलों को छोड़ दिया जाए तो अधिकतर मामलों में भ्रष्टाचारी चोरी और सीनाजोरी की कहावत को चरितार्थ करते नजर आते हैं। परिस्थितियां ऐसी बन चुकी हैं कि हर व्यक्ति चाहे वो सरकारी बाबू हो या कोई आम नागरिक हेरा-फेरी के लिए विवश है। छोटे-छोटे काम के लिए लोगों को न सिर्फ सरकारी दफतरों के चक्कर लगा-लगाकर अपनी चप्पल घिसानी पड़ती है बल्कि जेब भी ढ़ीली करनी पड़ती है। दलालवाद के इस दौर में जन लोकपाल बिल के रूप में यदि उम्मीद की नई किरण देखी और दिखाई जा रही है तो इसमें बुरा क्या है?
कहना पड़ रहा है कि बुरे लोगों के लिए हर अच्छी बात बुरी होती है। बात करते हैं अन्ना, शांति और सरकार की। अन्ना हजारे की पहचान सर्व विदित है। स्वामी रामदेव का वंशवाद का आरोप क्षण भर के लिए निराशा का कारण बना। आम जनता का एक बड़ा हिस्सा उनके विश्वास में आने लगा। आए भी क्यों न! ऐसा होना स्वाभाविक है। क्योंकि वंशवाद समकालीन भारतीय राजनीति की उभयनिष्ठ पहचान के संकेतकों में एक है। लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो मीडिया में चल रहे उठा-पटक से इतर मामले की तह तक पहुंचने की कोशिश करते हैं। दूसरे ही दिन स्वामी रामदेव ने शांति भूषण और प्रशांत भूषण के पक्ष में स्पष्टीकरण दिया। इस स्पष्टीकरण को पिता-पुत्र के रूप में दो विधि विशेषज्ञों के पक्ष में दिया गया स्पष्टीकरण भी कहा जा सकता है। यह भी पूछा जा सकता है कि क्या पूरे भारत में यही दो व्यक्ति विधि की विशेषज्ञता रखते हैं? यह सवाल अपनी जगह सही भी है लेकिन हमें यह भी देखना होगा कि देश में विभिन्न मुद्दों पर चल रहे जनान्दोलनों से कौन लोग कितने समय से जुड़े रहे हैं। इस संदर्भ में विधि विशेषज्ञ की हैसियत से शांति भूषण का कैरियर अच्छा कहा जा सकता है। उन्होंने ही सन् 1977 ई॰ में बतौर विधि मंत्री लोकपाल बिल का मसौदा संसद में पेश किया था। इसके बाद भी वो लगातार एक वकील की हैसियत से भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में शामिल रहे हैं। देश के कई भ्रष्ट न्यायधीशों को बेनकाब करने में उनके प्रयास सराहनीय रहे हैं। इस कार्य में उन्हें अपने पुत्र के रूप एक बेटा नहीं बल्कि ऐसा सहयोगी मिला जिससे पिता पुत्र की निजी पहचान पीछे रह गयी। ऐसा प्रतीत होता है कि लोकपाल पर बनी समिति में नागरिक समाज के प्रतिनिधि के रूप में शांति भूषण और प्रशांत भूषण पिता-पुत्र नहीं बल्कि ऊर्जा के दो ऐसे रूप हैं जो लोकपाल के स्वरूप को तय करने के लिए जरूरी हैं।
रही बात सी॰डी॰ प्रकरण वाले राजनेता की तो ऐसे व्यक्तियों की पहचान किसी से छिपी नहीं है। ऐसे लोग किसी सर्वव्यापी वस्तु की तरह राजनीति, फिल्म और उद्योग हर जगह समान रूप से मौजूद हैं। ये लोग राजनीति के नाम पर दलालवाद का प्रतिनिधित्व करते हैं। कुछ एक मामलों में इन जैसे लोगों का बयान साबित करता है कि भ्रष्टों की सूची में इनका नाम स्वर्णाच्छरों में लिखा जाना चाहिए। ऐसे लोग जब आपस में खूब छानते रहते हैं तो एक दूसरे को बड़ा भाई बताकर शिष्टाचार दिखाते हैं। जब आपस में मतभेद होता है तो कहते नहीं थकते कि “मैं बोलूंगां तो फलां जेल के अन्दर होंगे।” तब तो बोल ही देना चाहिए। यदि किसी के बोलने से किसी भ्रष्ट या पापी को उसके किए की सजा मिल जाए तो लोकतंत्र के लिए इससे अच्छा क्या हो सकता है? लेकिन बोलेंगें नहीं, क्योंकि वो तो खुद भी उसी स्कूल के विद्यार्थी रहे हैं जहां भ्रष्टाचार और दलाली का ‘क, ख, ग, घ और ड. मिन्स कुछ नहीं’ पढ़ा और पढ़ाया जाता है। मीडिया के पास ऐसे लोगों के बयानों के तमाम फुटेज पड़े हैं। जिसे पूरा देश देखता-सुनता है लेकिन महसूस नहीं करता। यदि महसूस करता तो ऐसे बयानों का संज्ञान लिया जाता और हर बयान के अन्दर निहीत किसी गैर सामाजिक, गैर विधिक कार्य को किए जाने और उसपर परदा डालने वालों की खैरियत पूछी जाती।
बहरहाल चन्द सिरफेरे नेताओं के आरोपों के कारण किसी आंदोलन की किरकिरी नहीं होनी चाहिए। देश और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बहुत कुछ चल रहा है। इस दौर की चुनौती यह है कि एक एक तरफ जहां अवाम को काॅमन प्लेटफार्म पर लाना है वहीं भ्रष्टाचार के मुद्दा पर नेतृत्व को भी बचाना है। सबको पता है कि जनप्रतिनिधियों में सांसद निधि और वेतन-भत्ता में वृद्धि जैसे मुद्दों पर गजब की सहमति है। लेकिन जब बात जन समस्याओं और सुविधाओं की होती है, जैसे महिला आरक्षण बिल, शिक्षा पर बजट, रोजगार, बिजली, पानी और सड़क इत्यादि की, तो हर नेता अपना पल्ला झाड़ते दिखता है। राजनेता हमारा प्रतिनिधित्व करने के बजाय चन्द मुट्ठी भर संभ्रातों और पूंजीपतियों की सेवा में लगे हुए हैं। सभी जानते हैं कि भ्रष्टाचार हमारा काॅमन इश्शू है। फिर भी इस सवाल पर हम अपने आप को एक काॅमन प्लेटफार्म पर इकट्ठा नहीं कर पा रहे हैं। कुछ लोगों का मानना है इस मामले में राजनीति नहीं होनी चाहिए। कहना नहीं होगा कि यह तर्क किसी मुद्दे को डिपोलिटिसाइज और असल मुद्दे से ध्यान डाइवर्ट करने का है। जब सभी मामले राजनीति से ही तय होने हैं तो राजनीति होनी चाहिए। अच्छे और सच्चे लोगों की राजनीति। लिंग, जाति, धर्म, वंश और अवसरवाद से परे आम जनता की राजनीति। भ्रष्टाचार से त्रस्त अवाम की राजनीति न कि दलालवाद के पुरोधाओं की राजनीति।
 इतिहास हमें रास्ता भी दिखाता है। जैसे 1936 ई॰ में प्रगतिशील आंदोलन के समय विभिन्न भाषाओं के कवि एवं साहित्यकार एक प्लेटफार्म पर इकट्ठा हुए थे। मौजूदा दौर द्रुतगामी परिवर्तनों का है। यह समय संचार क्रांति द्वारा जनित बेतार माध्यमों का है। पल में राय बनती है और दूसरे पल बिगड़ती है। यह समय सजग और सचेत रहने का है। कम से कम उन चुनौतियों से जो आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था की स्वाभाविक परिणति हैं। जिससे भ्रष्टाचार को अलग करके नहीं देखा जा सकता। अन्ना को महज चार दिनों में गांधी का अवतार बनाने वाले टी॰आर॰पी॰ मीडिया के सापेक्ष वैकल्पिक मीडिया को खड़ा करने और प्रभावी बनाने की भी चुनौती है। ताकि छोटे-छोटे समूहों में बिखरे हुए जन समूहों को एक काॅमन प्लेटफार्म पर लाया जा सके। और तभी भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ी जा सकेगी।

दिल्ली से प्रकाशित पाक्षिक शिल्पकार टाइम्स के १६-३० जून, २०११ के अंक में प्रकाशित.

Wednesday, April 20, 2011

राजनीति में युवा भागीदारी

उदारीकरण ने भी युवा चेतना को नींद की गोली ही दी है। निवेश और ग्रोथ के मकड़जाल में युवाओं को ऐसा उलझाया जा रहा है कि आज का युवा सुख-समृद्धि की प्राप्ति में सामाजिक और राजनीतिक जिम्मेदारियों से विमुख होता जा रहा है। बैंक बैलेंस, चमचमाती गाड़ी और किसी बहुमंजिली इमारत में दो कमरे का घर खरीदना ही आज के युवाओं का सपना रह गया है। गांधी और पायलट परिवार के युवा एक दिन किसी दलित-पिछड़े के घर सो गए तो मीडिया में कई-कई दिनों तक चर्चा और परिचर्चा होती है। बात करते हैं उन युवाओं को जो प्रतिदिन ठण्ठ, गरमी और बारिश के झंझावत खेतों और खलिहानों में झेलते हैं, वो बड़ी मुश्किल से मीडिया की पसंद बनते हैं।

पिछले बीस वर्षों में भारतीय समाज और राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं। एक तरफ जहाँ दलित-पिछड़े, मजदूर और महिला आंदोलन तेज हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ स्फूर्त प्रभाव रखने वाले आर्थिक परिवर्तनों ने युवा पीढ़ी को नयी चुनौतियों से रूबरू भी किया है। भारत में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक बदलाव के संदर्भ में १९८० के दशक को एक विभाजक रेखा के रूप में देखा जा सकता है। क्योंकि इसी दशक में भारत में क्षेत्रीय राजनीति और पिछड़ी जातियों में पहली बार बड़े पैमाने पर उभार परिलक्षित हुआ। आर्थिक सुधारों और मण्डल-कमण्डल ने भारतीय राजनीति को नयी पहचान दी। लेकिन राजनीति के इस नए रंग-ढ़ंग ने युवाओं के सपनों को धूल-धूसरित ही किया। धन-बल और छल के स्वयं प्रभुओं के बढ़ते प्रभाव ने क्षेत्रीय ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में बेहतर विकल्प के रास्ते में बाधा उत्पन्न किया। बड़े पैमाने पर अपराधीकरण और अवसरवाद ने स्वच्छ छवि के व्यक्तियों का मनोबल तोड़ा है। शायद यह महत्वपूर्ण कारण है कि इस दौर में शिक्षित और जागरूक युवाओं में देश और समाज के लिए कुछ साकारात्मक कर गुजरने का हौसला टूटता जा रहा है।
याद रहे कि यदि बच्चे देश के भविष्य होते हैं तो युवा उस भविष्य को स्थायित्व प्रदान करने वाले ऊर्जावान स्रोत होते हैं। परतंत्र भारत की बात करें तो भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजद, राजगुरू और सुखदेव जैसों ने देश को आज़ाद कराने के लिए न सिर्फ त्याग और बलिदान का प्रतीमान स्थापित किया बल्कि लोकतंत्र के स्थायित्व के लिए एक वैचारिक विकल्प भी दिया। १९२० के जमाने में भगत सिंह ने “नौजवान सभा” की स्थापना की। इसी दौर में चन्द्रशेखर आज़ाद आर०एस०ए० से जुड़े। इस दौर में भी राजनीतिक विरोध थे, जो स्वस्थ्य लोकतंत्र का संकेतक है। कार्य पद्धति में भी अन्तर था लेकिन यह भी सत्य है कि जब लाजपत जैसों के सर पर लाठी पड़ती थी तो इसकी आवाज भगत जैसों को सुनाई देती थी। शायद राजनीति का यह साकारात्मक रूझान ही था कि गांधी और भगत में वैचारिक मतभेद के बाद भी भगत युवा राजनीति के प्रेरणा स्रोत बन गए। इस संदर्भ में १९३६ का प्रगतिशील आंदोलन और सज्जाद ज़हीर से लेकर प्रेमचन्द्र की बातें युवाओं को आज भी प्रेरित करती हैं कि “हमें हुस्न का मेयार बदलना होगा।” लेकिन दुर्भाग्य है इस देश का कि समाज के विभिन्न क्षेत्रों में युवाओं की भागीदारी बढ़ने के बाद भी राजनीति में इनकी भागीदारी दिनों-दिन कम होती जा रही है। सवाल यह है कि ऐसा क्यों हो रहा है? क्यों आज के युवा राजनीति की तरफ एक नजर देखना नहीं चाहते? कहीं ऐसा तो नहीं कि उन्हें इस बात के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से तैयार करने की कोशिश की जा रही है कि देश और राज-काज चलाने में उनकी कोई भूमिका नहीं है! यदि ऐसा है तो आने वाले समय में विकास की दशा और दिशा क्या होगी?
मौजूदा दौर में मीडिया खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया पापूलर मीडिया की भूमिका में है। संचार के इस माध्यम से बार-बार बताया जा रहा है कि देश के युवा आइकान कौन हैं? देश के युवाओं की आशा कौन है? और यह भी कि इस देश में ५५ से ६५ वर्ष वाले राजनेता महत्वहीन होते जा रहे हैं। कुछ बातें इस दृष्टि से तर्कसंगत प्रतीत होती हैं कि कुछ राजनेताओं द्वारा सुशासन के नाम पर कुशासन, भ्रष्टाचार और अपराधिक गतिविधियों में संलिप्तता के कारण राजनीति के क्षेत्र में वैचारिक शून्य पैदा हुआ है। जिसको भरने के लिए युवा पीढ़ी से उम्मीद करना सुखद अनुभव की बात है। लेकिन टी॰वी॰ सेट और अखबारों में छपने वाले कुछ चेहरों के भरोसे इस देश के नागरिकों को सुपूर्द कर देना क्या समझदारी होगी?
उदारीकरण ने भी युवा चेतना को नींद की गोली ही दी है। निवेश और ग्रोथ के मकड़जाल में युवाओं को ऐसा उलझाया जा रहा है कि आज का युवा सुख-समृद्धि की प्राप्ति में सामाजिक और राजनीतिक जिम्मेदारियों से विमुख होता जा रहा है। बैंक बैलेंस, चमचमाती गाड़ी और किसी बहुमंजिली इमारत में दो कमरे का घर खरीदना ही आज के युवाओं का सपना रह गया है। गांधी और पायलट परिवार के युवा एक दिन किसी दलित-पिछड़े के घर सो गए तो मीडिया में कई-कई दिनों तक चर्चा और परिचर्चा होती है। बात करते हैं उन युवाओं को जो प्रतिदिन ठण्ठ, गरमी और बारिश के झंझावत खेतों और खलिहानों में झेलते हैं, वो बड़ी मुश्किल से मीडिया की पसंद बनते हैं।
जो युवा समाज के पिछड़े वर्गों से हैं उनके समक्ष शिक्षा और रोजगार की समस्या है। राजनीति से मुंह मोड़ चुके बुनकर परिवार से संबंध रखने वाले मेराज अंसारी कहते हैं कि “सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में बहुत नुकसान उठाना पड़ा है, यदि आय का कोई स्थायी जरिया होता तो इस कार्य के लिए समय निकाला जा सकता है। अभी बच्चों को तालीम दिलाने में ही परेशान हूं, राजनीति का भार हमसे सहा नहीं जा रहा है।” जाहिर है पिछड़ा और अति पिछड़ा वर्ग सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक कारणों से राजनीति से कोसों दूर है। उन्हें तो दो वक्त की रोटी के लिए खून-पसीना एक करना पड़ता है। फिर किस दम पर वो राजनीति में अपनी भूमिका सुनिश्चित करें ताकि उनके अधिकारों की लड़ाई को मजबूत आधार मिल सके।
दरअसल राजनीति में युवा भागीदारी का रास्ता छात्र आंदोलनों के रास्ते होकर पहुंचता है। पिछले कुछ वर्षों से देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों में छात्र संगठनों के चुनाव पर रोक है। जाहिर है एक तो वैस ही समकालीन राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के कारण युवा राजनीति से दूर हो रहे हैं। उस पर से तुर्रा यह कि कालेज-विश्वविद्यालय जहां प्रबल संभावना होती है, वहां भी राजनीतिक गतिविधियों पर रोक है। सतही स्तर पर रोक के लिए कालेजों और विश्वविद्यालयों में अपराधिक और छेड़छाड़ की घटनाएं बतायीं जाती हैं। लेकिन ऐसी घटनाओं से निपटने का हल पूरी गतिविधि पर ही विराम लगा देना उचित नहीं। संभव है अनुभव और राजनीतिक परिपक्वता के मामले में वरिष्ठ राजनेता युवाओं से आगे हों लेकिन हमें याद रखना होगा कि भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव, अशफाक और चन्द्रशेखर आज़ाद जैसे युवा भी इसी देश में पैदा हुए जो आज भी लाखों युवाओं के आदर्श हैं। फिर सरकार को डर किस बात का है जो छात्र राजनीति के पर कुतरने की कवायद कर रही है। कहीं ऐसा तो नहीं कि नयी पीढ़ी के युवाओं को आर्थिक नीतियों के दुष्चक्र से विमुख करना असल मकसद है। ऐसा इसलिए भी संभव है क्योंकि राजनीतिक चेतना का प्रसार किसी भी व्यक्ति को देश और दुनिया के संसाधनों तथा नागरिक अधिकारों से अवगत कराता है। लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया को गति मिलती है। यदि ऐसा होता है तो लूट-खसोट और भ्रष्टाचार के खिलाफ तुफान उठेगा और बोफोर्स, तेलगी और 2जी जैसे घोटालों पर परदा डालना मुश्किल हो जाएगा। देश में विकास के नाम पर चन्द पूंजीपति घरानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लाभ के कवायद बन्द करने पड़ेंगे। एफ॰डी॰आई॰, निजीकरण और कारपोरेट मैनुफैक्चरिंग के बल पर विकास का दम भरने वाली सरकारों को शिक्षा पर बजट बढ़ाना होगा। बेरोजगारों के लिए रोजगार सृजित करने होंगे। और यह भी तय होगा कि युवा भारत की सामाजिक-आर्थिक जरूरतें क्या हैं और उनका राजनीतिक विकल्प क्या है?

दिल्ली से प्रकाशित पाक्षिक शिल्पकार टाइम्स के १६-३० अप्रैल, २०११ के अंक में प्रकाशित.

Saturday, March 19, 2011

“आधा गांव” में ‘राही’ की पहचान और ‘बुनकरों’ का संकट



पिछले 13 मार्च को राही के गांव जाने का संयोग हुआ। ‘‘आधा गांव’’ वाले राही मासूम रज़ा का गांव। ज़िला ग़ाज़ीपुर में स्थित गंगौली गांव जिससे पूरा तो नहीं लेकिन ‘‘आधा गांव’’ की हद तक राही की साहित्य जगत में एक अलग पहचान अवश्य है। ग़ाज़ीपुर के मुहम्मदाबाद और मऊ मार्ग पर स्थित इस गांव के भ्रमण की अभिलाषा बरसों से थी, जो अब जाकर पूरी हुई। राही ने अपने फिक्शन में गांव के मुहल्लों-गलियों और इन गलियों में मुहर्रम के अवसर पर निकलने वाले ताजियों का वर्णन विस्तार पूर्वक किया है। वो हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता और भारत-पाक विभाजन जैसी भौगोलिक तथा सांस्कृतिक त्रासदी के ज़ख़्मों को भी छूते हैं। ओस की बूंद, नीम का पेड़, कटरा बी आरज़ू और दिल एक सादा काग़ज़ उनकी रचनाधर्मिता के श्रेष्ठ परिचायक हैं। हम और आप अच्छी तरह से जानते हैं कि राही को अपनी माटी, अपनी भाषा और संस्कृति से जितना लगाव था उतना ही उन्हे अपने लोगों से प्यार था। आज राही के गांव जाने का आनंद वैसा ही है मुझे, जैसा ताज महल और फतेहपुर सिकरी या लोटस टेम्पुल, इण्डिया गेट या गेटवे आफ इण्डिया जाने पर होता है।
बहरहाल मैं गंगौली गांव के मुख्य द्वार पर था। गांव की पगडण्डी पर गांव से बाहर आता हुआ एक व्यक्ति मिला। कंधे पर एक लाठी और उस लाठी में लटकी हुई एक पोटली। पेशे से किसान, खेत को जा रहा था। मेरे आग्रह पर वह रूका और मुझे गांव का रास्ता बताया। इस क्रम में मैंने अपनी जिज्ञासा भी शान्त करनी चाही। मैंने पूछा राही मासूम रज़ा को जानते हैं! अंतू नाम के उस व्यक्ति ने बताया कि हाँ, जानता हूँ। मेरा अगला प्रश्न कि वो कौन थे! का जवाब मिला कि ‘‘राही मिल्की थे।’’ अंतू ने बताया कि यहाँ बुनकरी होती है लेकिन वो एक किसान है और अपने काम से पूरी तरह संतुष्ट है। मैंने इस संतुष्टि के बाबत रोटी, कपड़ा और मकान की बात जानना चाही। उसका कहना था कि मनरेगा में 10 दिन का काम मिला था। रूपए 120 की दर से मेहनताना भी मिला। लेकिन रहने के लिए घर नहीं है। टूटी-फूटी झोपड़ी में किसी तरह गुजारा हो जाता है।’’
गौर तलब है कि ईंट और कंकरीट से निर्मित भवनों से देश और समाज के विकास यात्रा का अंदाजा होता है। लेकिन हमारे आस-पास अंतू जैसे लोग भी रहते हैं जो 10 दिनों की मजदूरी में ही अपनी झोंपड़ियों में चैन की सांस लेते हैं। अंतू जैसों को तो ये भी पता नहीं है कि उनका जन प्रतिनिधि कौन है। जन प्रतिनिधि के बारे अंतू बताते हैं कि ‘‘मुझे कुछ मालूम नहीं है, जो भी पूछना है पंडित जी से पूछ लें, वही बताएंगे।’’
तो देखा आपने जिस राही ने गंगौली को अपनी रचनाओं के माध्यम से राष्ट्रीय पहचान दिलाई आज उसी गंगौली गांव में उनकी अपनी पहचान एक मिल्की की रह गयी है। याद आती हैं वो पंक्तियां जिन्हें राही ने ‘‘आधा गांव’’ की भूमिका में लिखा है- ‘‘समय के घड़े में एक पतला सा छेद है, जिससे समय पल-पल छनता रहता है। ग़ाज़ीपुर ज़िन्दगी के क़ाफिलों के रास्ते में नहीं है। जब कोई क़ाफिला इधर से होकर गुज़रता है तो यहाँ के लोग उस क़ाफिले की धूल को इत्र समझकर अपने बदन और कपड़े पर छिड़क लेते हैं और खुश हो लेते हैं।’’
उक्त पंक्तियां राही जैसा व्यक्ति ही लिख सकता था। जिस गांव की गोद में बचपन गुजरा और जिस गांव को उन्होंने अपनी यादों और रचनाओं से कभी जुदा नहीं होने दिया आज उसी गांव में राही के पहचान का संकट है। यह संकट कोई मामूली संकट नहीं है। बल्कि देश के तमाम गांवों और ग्रामीणों के पिछड़ेपन का संकेतक भी है। और यह भी पता चलता है कि व्यक्ति चाहे जितना पढ़-लिख ले, जितना धन कमा ले और ऊँचे मकान बना ले, जाति उसका पीछा नहीं छोड़ती। तभी तो आर्थिक संकटों की दलदल से निकले राही जैसे साहित्यकार और लेखक की पहचान उसके अपने गांव में मिल्की नाम की जातिसूचक सीमा में सिमट कर रह जाती है।
 गांव में जीवन और वो भी राही के गांव में जीवन की धारा पहले हथकरघों पर थिरकती उंगलियों में देखी जाती थी। 90 के दशक में बड़े पैमाने पर हथकरघों की जगह पावर लूम का प्रचलन हुआ। बिजली चालित करघों के प्रसार से विकास के नए मानक स्थापित हुए। पहले जो बुनकर खपरैल के टूटे-फूटे घरों की अंधेरी कोठरियों में घण्टों ताना-बाना बुना करते थे, पावर लूम के आने से उनके दिलों में नई उम्मीद जगी। उन्हें लगा कि अब उन्हें अंधेरे में अपनी आंख फोड़ने की ज़रूरत नहीं रह जाएगी, घर के बाकी सदस्य किसी और उत्पादक कार्य को कर सकेंगे। और उनके बेजान जिस्मों की ऊर्जा उनके लिए नवजीवन का काम करेगी। लेकिन पहले तो गांव का इलेक्ट्रीफिकेशन का मसला और फिर जब बिजली के तार गांवों की गलियों में दौड़ा दिए गए तो कनेक्शन की समस्या। यही नहीं कनेक्शन के बाद पावर सप्लाई की अनिश्चितता ने उत्पादन को ठप करने में कोई कसर नहीं छोड़ा। बुनकरों को कब सोना है और कब जागना है, इसका समय निश्चित नहीं होता। इस गाने की तर्ज तो सुना ही होगा आपने ‘‘जब सारी दुनिया सोती है/हम तारे गिनते रहते हैं’’। बात गंगौली की हो रही है लेकिन मजदूर की हैसियत रखने वाले पूरब के तमाम बुनकरों की ज़िन्दगी इस गाने की तर्ज में फिट जान पड़ता है। तर्ज देखें- जब सारी दुनिया सोती है/हम कपड़े बुनते रहते हैं’’।

ये बुनकर वही कपड़े बुनते हैं जिसे देश की जनता पहनती है और विदेशों में भी जिसकी ख्याति है। लेकिन हैण्डलूम हाउस की सीढ़ियां चढ़ने वालों और मुक्त बाज़ार व्यवस्था के पैरोकारों को बुनकरों और इस उद्योग की मूलभूत समस्याओं की फिक्र कम ही है। हथकरघा प्रदर्शनियों और स्पेशल इकाॅनामिक जोन के माध्यम से राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सांस्कृतिक पहचान को बचाने की चिंताएं जग जाहिर हैं। लेकिन इस पहचान को बनाने वाले असल करीगरों की कोई पहचान नहीं है। 13 मार्च, 2011 को तमाम अख़्बारों में यह ख़बर प्रमुखता से छपी थी कि प्रदेश के हथकरघा बुनकरों के ब्याज माफ किए जाएंगे। ये बयान पी॰डब्लू॰डी॰ मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी का है। माननीय मंत्री जी की घोषणा तो हर अखबार पाठक ने पढ़ी होगी, लेकिन जिनके बारे में लखनऊ से लेकर नई दिल्ली तक बयानों और नीतियों का दौर-दौरा होता है उनकी बातें कहीं लोकतंत्र की भीड़ में खोकर रह जाती हैं। बात करते हैं गंगौली के बुनकर 52 वर्षीय मु॰ मक़सूद की, जो पचास हजार का कर्ज़दार है। मकसूद साहब देखने में 62 वर्ष के लगते हैं। कहते हैं कि ‘‘पहले हथकरघा पर काम करते थे। प्रतिस्पर्धा बढ़ी तो एक पावरलूम लगाने के लिए सरकार 50000 रूपए से कर्ज लिया था, जिस पर 7500 रूपए की छूट मिली थी। लेकिन एक वर्ष बाद ही बीमार होने के कारण गति पकड़ने से पहले ही काम बंद हो गया। इलाज के लिए गांव देहात से लेकर शहरों की खाक छानता फिर रहा हूँ। ऐसे में किसी तरह मैं अपना और अपने परिवार का पेट पाल रहा हूँ। कर्ज अदायगी की चिंता दिन-रात सताती रहती है। आए दिन बैंक के अमीन जेल भेजने का डर दिखाते हैं। जो बन पड़ता है अमीन को दे देता हूँ लेकिन वो अपने आने-जाने का खर्च भी मांगते हैं।’’
नसीमुद्दीन साहब का बयान ऐसे बुनकरों को ढ़ाढ़स देने के लिए काफी है। ध्यान देने की बात है कि मंत्री साहब ने सिर्फ ब्याज अदायगी को माफ करने की बात कही है। अगर मु॰ मकसूद जैसे बुनकरों के ब्याज माफ भी कर दिए जाते हैं तो झोंपड़ों में रहने वाले ऐसे बुनकरों को राहत नहीं मिलने वाली। क्योंकि बुनकरों को मूलधन की अदायगी हर हाल में करनी ही होगी। यदि हमारे जन प्रतिनिधियों को बुनकरों के कल्याण की इतनी ही फिक्र है तो उन्हें बुनकरों के जमीनी मसायल पर ध्यान देना होगा। किसी समाज के चन्द तरक्की कर चुके लोगों को पुरस्कृत और सम्मानित करके आम बुनकरों के दुःख-दर्द को ठीक नहीं किया जा सकता।

Friday, January 7, 2011

किस मिट्टी के बने हैं ये...! क्या इन्हें वाकई ठण्ड नहीं लगती...!

"कड़ाके की ठण्ड ने ली 40 लोगों की जान", "ठण्ड से अब तक 137 लोगों की मौत", "शीतलहर से जन-जीवन अस्त-व्यस्त! स्कूल-कॉलेज बंद", "घने कोहरे के कारण रेलगाड़ियां विलम्ब", "कोहरे के कारण हुई दुर्घटना" वग़ैरह खबरें अक्सर ठण्ड के दिनों में अखबारों और टेलीविज़न की सुर्खियां बनती हैं। जन-जन तक पहुँच रखने वाली मीडिया की भूमिका शहरों-नगरों के फुटपाथों पर ठण्ड से ठिठुरती ज़िन्दगियों की तस्वीरों को दिखाने-छापने और हमारी संवेदना को जगाने की होती जरूर है लेकिन इस तरह की खबरें महज समाचार का हिस्सा भर रहती हैं। आए दिन हमारा सामना ऐसे लोगों से होता है जिनके कांपते जिस्म भारत के कल्याणकारी राज्य के संवैधानिक वादों को झुठलाते हैं।
ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं जो कभी हिन्दुस्तान के किसी छोटे से गाँव में, या फिर किसी छोटे से कस्बे से लेकर राजधानी तक के फुटपाथों-चैराहों पर ठण्ड से सिकुड़ते-फैलते दिखायी दे जाते हैं। क़ाबिले ज़िक्र है कि ऐसे लोग सिर्फ ठण्ड से परेशान नहीं होते बल्कि गरमी की तपिश और बारिश के छींटे भी समान रूप से इनके जिस्म व जान पर कुँहासे की तरह तुषारापात करते हैं। गरमी में ये लोग पसीना पोंछ-पोंछ कर आजीविका के लिए संघर्ष करते हैं। बारिश के दिनों में किसी शेड या छप्पर के नीचे पूरा मौसम गुजार देते हैं। ठण्ड में इनकी स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं होता। वही पुराने कपड़े और आशियाने। कभी मज़दूर के रूप में तो कभी फुटपाथों पर बुक सेलर के रूप में और कभी गली-चैराहों पर करतब दिखाने वाले मदारियों के रूप में बडे़-बूढ़ों के साथ स्कूली उम्र के बच्चों को ठण्ड से अधिक दो वक्त की रोटी की चिंता होती है।
ऐसे लोगों, खासकर बच्चों को देखकर बार-बार हैरानी होती है कि ये किस मिट़टी के बने हैं! क्या इन्हें ठण्ड वाक़ई नहीं लगती! यदि ऐसा है भी तो कैसे! इन्हें तो मिड डे मिल की खिचड़ी जैसा भी भोज्य पदार्थ नहीं मिलता। मिले भी कैसे! ये जो स्कूल नहीं जाते और दूसरी तरफ संसाधनों में बंदरबांट की भयावह स्थिति। फिर इनके शारीरिक ऊर्जा का स्रोत क्या है ? कैसे लड़ता रहता है इनका शरीर विभिन्न मौसमों के प्राकृतिक झंझावतों से ? प्रायः लोग यह समझते हैं कि ऐसे बच्चे अभावग्रस्त परिस्थितियों के अनुरूप ख़ुद को आसानी से ढ़ाल लेते हैं जिसके कारण हर मौसम की मार हंसते-हंसते झेल लेते हैं।
बहरहाल तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि ऐसे बच्चे जो मौसम के बदलाव के कारण बेवक्त ही मौत की नींद से जाते हैं, उनका न तो किसी स्वास्थ केन्द्र के माध्यम से अभिलेखीय रिकार्ड प्राप्त हो पाता है और न ही ऐसी मौतें मीडिया की सुर्खियां बन पाती हैं। वजह साफ है, दरअसल गुमनाम ज़िन्दगी जीने वाले ऐसे बच्चों और उनके बेबस व लाचार माता-पिता प्राथमिक या सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र तक पहुँचने से पहले ही न्यूमोनिया या किसी अन्य जानलेवा बीमारी के कारण दम तोड़ देते हैं। आंकड़े बताते हैं कि स्वास्थ्य सुविधाएं पहले से बेहतर हुई हैं। लेकिन सुधार अभी भी अपेक्षित है। शायद यही कारण है कि बी॰पी॰एल॰ कार्ड से वंचित निर्धन परिवार निःशुल्क स्वास्थ्य सेवा से भी वंचित हैं। ऐसे परिवारों में असमय होने वाली मौतों का कारण कोई बीमारी बतायी जाती है। लेकिन इस बिंदु पर विचार कम ही होता है कि जिस जानलेवा बीमारी से किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है, वह व्यक्ति उस बीमारी का शिकार कैसे और किन परिस्थितियों में हुआ ? सामान्यतः ठण्ड से या गरीबी से मरने वालों की गिनती बीमारी से मरने वालों में की जाती है।
ऐसे हालात में देश के संसाधनों का अति निर्धन और जरूरतमंदों तक पहुँचाना शासन-प्रसाशन के लिए बड़ी चुनौती है। जैसे-जैसे ठण्ड बढ़ती है, कम्बल बांटने की खबरें भी अखबारों में प्रमुखता से छपती हैं। लेकिन देश के हज़ारों वस्त्रहीन, भवनहीन, शिक्षाहीन, कुपोषणग्रस्त और आर्थिक तंगी में खुले छत के नीचे रहने वाले नागरिकों को चन्द कम्बलों से कड़ाके की सर्दी से बचाया नहीं जा सकता।
इसी संदर्भ में एक छोटी सी खबर मैं भी लिख रहा हूँ। "कड़ाके की ठण्ड, दिल्ली, लखनऊ, इलाहाबाद, वाराणसी और पटना जैसे शहरों में कहीं पारा 5 डिग्री तो कहीं 4 डिग्री और कहीं 3 डिग्री से भी नीचे गिर चुका है। जन-जीवन बुरी तरह से प्रभावित है। स्कूल-कॉलेज बंद करने के आदेश दिए जा चुके हैं। ज़्यादातर लोग आग-अलाव के बंदोबस्त में हैं। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी जो आग-अलाव तो दूर की बात उन्हें पहनने को गरम कपड़े तक नहीं हैं। कौन जाने इनके अंदर ठण्ड से लड़ने की ताकत कहाँ से आती है। कहीं ऐसा तो नहीं कि ठण्ड ने इन्हें कछुवा बना दिया है।"