जन्तर-मन्तर और लोकतंत्र के सुलगते सवाल
- डा॰ वसीम अख़्तर ’
चुनाव आयोग की पारदर्शिता दर असल लोकतंत्र के माथे पर लगा वो सवालिया निशान है, जो जन्तर-मन्तर से बड़ा होता जा रहा है। जेन-ज़ी के आंदोलनों ने गांव-मुहल्ले के लोगों का ध्यान मोबाइल में लूडो खेलने से हटाकर जन्तर-मन्तर की ख़बरों पर केन्द्रित कर दिया है।
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लोकतंत्र में मीडिया को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद तीसरा स्तंभ माना जाता है। इन तीनों संस्थाओं में लोकतंत्र की आत्मा बसती है। देश के प्रत्येक नागरिक की भलाई के लिए काम करना इन संस्थाओं का सर्व प्रमुख दायित्व है। इन तीनों संस्थाओं के कामकाज पर नज़र बनाए रखने का काम मीडिया करता है। मीडिया अपनी ख़बरों और रिपोर्ट के माध्यम से इन संस्थाओं के कामकाज और कार्यशैली को उजागर करता है। जिससे राज्य की नीतियों और निर्णयों की निगरानी होती रहती है। यही वजह है कि मीडिया को लोकतंत्र का चैथा स्तंभ माना जाता है। ये तय होता है कि राज्य की ओर से सरकार की नीतियां और निर्णय जनहित में हैं या नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि जाने-अनजाने सरकार के फैसले नागरिक अधिकारों और हितों को नुकसान पहुंचाने वाले हैं।
निस्संदेह सरकार की नीतियां और निर्णय आम जनता को प्रभावित करती हैं। यह भी सत्य है कि जनता जिस सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति में होती है, उसका प्रभाव राज्य की नीतियों पर होता है। कहा जा सकता है कि राज्य की ओर से सरकारें जिसके लिए काम करती हैं, वो देश के नागरिक होते हैं। नागरिक ही अपने मताधिकार के प्रयोग से अपने प्रतिनिधि यानि जन प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं। जन प्रतिनिधियों द्वारा नियमानुसार बहुमत के लोकतांत्रिक सिद्धांतों और आदर्शों के अनुसार सरकारों का गठन किया जाता है। देखा जाए तो लोकतंत्र में सरकार और नागरिक दोनों एक दूसरे के पूरक की हैसियत रखते हैं। मतदाता के रूप में नागरिक न हो तो, चुनाव संभव नहीं। चुनाव नहीं तो लोकतंत्र संभव नहीं। किसी भी देश में राज्यव्यस्था का लेाकतांत्रिक होना चुनाव की पारदर्शिता पर निर्भर होता है और पारदर्शी चुनाव होना स्वस्थ्य लोकतंत्र का परिचायक होता है। चुनाव में पारदर्शिता का दारोमदार सरकार की नियत और काम के तरीके से तय होता है। इसी सवाल को लेकर 10 अक्टूबर 2026 को दिल्ली की सड़कों पर छात्र, युवा, सामाजिक कार्यकता और बुद्धिजीवियों ने धरना-प्रदर्शन करने के लिए जन्तर-मन्तर की ओर कूच किया। लेकिन सरकार ने जन्तर-मन्तर जाने वाले सारे रास्ते बंद करवा दिए। पुलिस और आर्मी की मदद से प्रदर्शनकारियांे को हिरासत में ले लिया गया। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि सरकार की प्रतिनिधि संस्था पुलिस और आर्मी ने नागरिक समाज के प्रतिनिधि व्यक्तियों जैसे छात्रों, युवाओं, समाज सेवियों, बुद्धिजीवियों, और चुने हुए जन प्रतिनिधियों के साथ-साथ लोकतंत्र के चैथे स्तंभ यानि मीडिया के प्रतिनिधि रिपोर्टर, यूट्यूबर और इन्फ्लुएन्सर आदि को भी हिरासत में लेने का काम किया। जो किसी भी दृष्टि से उचित प्रतीत नहीं होता है। ऐसे में यह सवाल लाज़मी हो जाता है कि हम लोकतंत्र को पोषित करने वाली संस्थाओं और इनको प्रभावित करने वाले कारकों पर नए सिरे से विचार करें।
सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि मीडिया विशेषकर सोशल मीडिया के लिए काम करने वाले स्वतंत्र पत्रकारों, यूट्यूबर और इन्फ्लुएन्सर के साथ सरकार का रवैया उदार क्यों नहीं है। लेकिन यह सवाल महत्वपूर्ण होते हुए भी उस समय महत्वहीन लगता है, जब हम मीडिया की भूमिका में बदलाव का विश्लेषण करते हैं। मीडिया की भूमिका में बदलाव को जानने-समझने के लिए हमें इतिहास में थोड़ा पीछे देखना होगा। बात बीसवीं सदी के आखरी दशक की है। 1991 में नई आर्थिक नीति अपनायी गयी। इस नीति के प्रभाव स्वरूप विभिन्न क्षेत्रों में निजी निवेश को बढ़ावा मिला। निवेश आधारित अर्थव्यवस्था को पंख लग गए। उड़ान ऐसी कि चमक-धमक की परंपरा और उपभोक्तावादी संस्कृति का विस्तार होता गया। इस विस्तार की गिरफ्त से भला मीडिया कैसे अलग रह सकता था। मीडिया ने भी वही रास्ता अपना लिया, जो इसके आस्तित्व और कारोबार को बचा सके। जो रोजगार भले न दे सके, अधिक से अधिक मुनाफा अवश्य दे सके।
पिछले तीन दशको में निवेश आधारित मीडिया का विकास जग जाहिर है। मीडिया का तेवर पहले की तरह जनोन्मुखी कम निवेशोन्मुखी अधिक नज़र आता है। निवेश में सबसे बड़ी भूमिका विज्ञापनों के माध्यम से प्राप्त होने वाली आय है। जो प्रिन्ट मीडिया के मामले में कुल आय का लगभग 80 प्रतिशत से अधिक और इलेक्ट्राॅनिक मीडिया के मामले 45 प्रतिशत से अधिक है। बेशक विज्ञापनों के दम पर ही मीडिया हाउस अब तक खड़ा है। प्रिन्ट मीडिया को विज्ञापन के माध्यम से जो आय होती है उसका 80 प्रतिशत हिस्सा काॅरपोरेट से प्राप्त होता है जबकि लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा सरकारी विज्ञापनों का होता है। लेकिन इस बात से इंकार मुश्किल है कि 20 प्रतिशत विज्ञापन आय के एवज में मीडिया घरानों ने सरकारी विज्ञापनों के साथ-साथ सरकार समर्थित खबरों को प्रकाशित करने पर ध्यान केन्द्रित कर दिया है। शायद यही वजह है कि बहुत से पत्रकार ऐसे मीडिया हाउस और इनमें काम करने वाले पत्रकारों को गोदी मीडिया के नाम से संबोधित करते हैं।
योजनाओं के बारे में जागरूकता हेतु दिए जाने वाले विज्ञापन और खबरें अखबार का अधिक जगह ले लेती हैं। बाकी देश-दुनिया की खबरों के लिए जगह ही नहीं बचती। कई बार तो विज्ञापन का प्रकाशन कुछ इस अंदाज़ में होता है कि विज्ञापन, अपने आप में खबर का रूप धारण कर लेता है। ज़ाहिर है मीडिया या तो पूंजीवांदी औद्योगिक कम्पनियों के विज्ञापनों के सहारे खड़ी है या फिर सरकारी विज्ञापनों की बैसाखी लेकर प्रतिस्पर्धा की दौड़ दौड़ रही है। शायद यही वजह है कि देश-दुनिया की ख़बरों वाला मुख्य पृष्ठ अखबारों से लगभग गायब हो चुका है। इसकी जगह बड़ी-बड़ी कम्पनियों के विज्ञापनों ने ले लिया है। इस तरह प्रिन्ट मीडिया से लेकर डिजिटल-इलेक्ट्राॅनिक मीडिया, सरकार के नीति-निर्णयों और अनगिनत उपभोक्तावादी उत्पादों का प्रचारक और प्रसारक बन गया प्रतीत होता है। इस प्रक्रिया में जनता के दुःख-दर्द के लिए अखबार के पन्नों में जगह कम हो गयी है। अख़बारों के मुख्य पृष्ठ से लेकर संपादकीय, खेल, आर्थिक, स्थानीय और अन्तर्राष्ट्रीय आदि पृष्ठों की रूपरेखा बदल गयी है। आज के अखबारों में खबरें कम और विज्ञापन अधिक होते हैं। मुख्य पृष्ठ तो जैसे गायब हो गया है। कई बार तो मुख्य पृष्ठ से पहले विज्ञापनों के दो-दो पृष्ठ होने लगे हैं। मुख्य पृष्ठ का अर्थ मुख्य पृष्ठ नहीं रहा। क्योंकि अक्सर अख़बारों में मुख्य पृष्ठ पर किसी बड़ी नामी कम्पनी के किसी उत्पाद का बड़ा विज्ञापन छपा होता है। पहले वाला मुख्य पृष्ठ अपनी जगह खो चुका है। हालांकि पृष्ठ संख्या तीन या पांच पर मुख्य पृष्ठ की खबरें होती हैं, लेकिन इस पृष्ठ के आधे से अधिक हिस्से में विज्ञापन होते हैं। अचरज की बात यह है कि इतना सबकुछ होने के बाद भी अखबार छप और बिक रहे हैं। पाठक वही जनता है, जिसका मन इन अखबारों के पढ़ने से बनता और बिगड़ता है। कहा जा सकता है कि जनता का मन यानि जनमत को उपभोक्तावादी बनाने में केवल काॅरपोरेट ही नहीं सरकार भी बराबर की जिम्मेदार है। रही बात सोशल मीडिया की तो इनमें शामिल पत्रकार, यूट्यूबर और इन्फ्लुएन्सर में जो जमीनी पत्रकारिता कर रहे हैं, उनके लिए किसी घटना को रिपोर्ट करने से रोकना अज्ञात नहीं है। ऐसे में भारतीय लोकतंत्र में चुनाव और मीडिया की दुर्दशा लोकतांत्रिक संस्थाओं को संदेह के घेरे में लाने के लिए काफी है।
सोशल मीडिया के उभार ने नई उम्मीद जगाई है। लेकिन पत्रकारों को रिपोर्ट करने से रोकना उन्हें हिरासत में लेना सरकार के जनविरोधी आक्रामक रवैया का संकेतक बन गया है। खासकर तब जब लोकतंत्र के होने की पहली और आखि़री संस्थागत उम्मीद चुनाव आयोग ही सवालों के घेरे में हो। चुनाव आयोग की पारदर्शिता दर असल लोकतंत्र के माथे पर लगा वो सवालिया निशान है, जो जन्तर-मन्तर से बड़ा होता जा रहा है। जेन-ज़ी के आंदोलनों ने गांव-मुहल्ले के लोगों का ध्यान मोबाइल में लूडो खेलने से हटाकर जन्तर-मन्तर की ख़बरों पर केन्द्रित कर दिया है। हालांकि लूडो की जगह खबरों का होना उपभोक्तावाद की जगह नागरिक अधिकारों का होना समझा जा सकता है। संभव है लूडो की जगह जन्तर-मन्तर की ख़बरें राष्ट्रव्यापी रूप ले लें। प्रयागराज, लखनऊ और पटना में होने वाले प्रदर्शनों को दिल्ली के जन्तर-मन्तर पर होने वाले प्रदर्शनों से अलग करके नहीं देखा जा सकता है। बावजूद इसके कि कुछ वक्त के लिए जन्तर-मन्तर पर इण्टरनेट पर पाबंदी लगा दी गई हो। पाबंदी के बाद भी जन्तर-मन्तर का प्रदर्शन देशव्यापी जनमत का हिस्सा बनता जा रहा है। इसलिए समय रहते ज़रूरी है कि मौजूदा प्रदर्शनों और आंदोलनों के पीछे के कारणों पर सरकार नए सिरे से विचार करे। व्यवस्था की उन कमजोरियों और ख़ामियों को दूर करने की दिशा में काम करे, जिससे सरकार और लोकतांत्रिक संस्थाओं के कामकाज में पारदर्शिता बढ़े। जेन-ज़ी ही नहीं समाज के विभिन्न वर्गों का भरोसा लोकतांत्रिक संस्थाओं में मज़बूत हो। युवा यह कहते हुए जन्तर-मन्तर की ओर न बढ़ें कि “पढ़-लिख कर ही क्या कर लेंगें! जब उचित आजीविका और सम्मान परक जीवन ही नहीं होगा।” यदि प्रदर्शनकारियों के ऐसे सवालों और समस्याओं का समाधान विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका आदि संस्थाओं के पास नहीं होगा, तो ये संस्थाएं लोकतंत्र की पहचान भर बन के रह जाएंगी। लोकतंत्र के सुलगते सवाल बड़े होते जाएंगे। अच्छा होता कि संविधान द्वारा स्थापित, विकसित और पोषित संस्थाएं अपना काम करें और मीडिया व सोशल मीडिया अपना काम करें। इन दोनों के लिए ज़रूरी है कि दोनों ही अपना-अपना काम संवैधानिक दायरे में रह कर करें। ताकि मौजूदा पीढ़ी के नौजवानों का भरोसा लोकतांत्रिक संस्थाओं में बहाल हो सके।




