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Thursday, June 6, 2024

बनारस, बुनकर और बेकारी


नोट- यह लेख सितम्बर 2020 का है। किसी कारण प्रकाशित नहीं हो पाया था। कम्प्यूटर में पुरानी फाइलें देखते समय इस लेख पर आज 
दिनांक 6 जून 2024 को नज़र पड़ी। लेख का टाइटिल ‘‘अनलॉक में भी बुनकरों के पेट पर तालाबंदी जारी है’’ था। इसे ‘‘बनारस, बुनकर और बेकारी’’ टाइटिल के साथ अपने ब्लॉग पर प्रकाशित कर रहा हूं। मुमकिन है बीते हुए कल की कुछ जीवंत तस्वीरें आंखों के सामने उभर आएं और वर्तमान व भविष्य के सरोकारों की ओर ध्यान दिलाएं...

पढ़ा जाए.....

"वाराणसी माननीय प्रधानमंत्री जी का संसदीय क्षेत्र है। वो बुनकरों की समस्याओं से अवश्य अवगत होंगे। उन्हें बुनकरों के लिए काम करने वाले समाज सेवियों और संगठनों के बारे में भी जानकारी होगी ही और सरकार के काम की भी। अच्छा होता कि माननीय प्रधानमंत्री समय रहते बुनकरों की समस्याओं का संज्ञान लेते हुए अपने संसदीय क्षेत्र के मासूम बच्चों, महिलाओं, नौजवान और वृद्ध बुनकरों के लिए कुछ साकारात्मक पहल करें। वरना बनारसी साड़ियों की चमक फीकी पड़ जाएगी।"

    नलॉक की प्रक्रिया पूरे देश में चल रही है। लेकिन बनारस के बुनकरों के लिए अनलॉक की प्रक्रिया बेमानी साबित हो रही है। पिछले पांच महीनों से ताना-बाना बंद पड़ा है। यह बंदी बुनकरी से आजीविका अर्जित करने वाले बुनकर परिवारों के पेट पर तालाबंदी का सबब बन चुका है। बेकारी और भूखमरी के हालात ने बुनकरों को अवसाद ग्रस्त कर दिया है।

    पिछले दिनों वाराणसी के एक बुनकर के फांसी लगाकर आत्महत्या करने की फोटो सोशल मीडिया में खूब वायरल हुई। यह घटना शासन-प्रशासन के लिए खबरदार करने वाली थी। लेकिन एक बार फिर आत्महत्या की खबर वाली एक विडियो सोशल मीडिया में वायरल हुई है। इस विडियो में एक महिला बता रही है कि एक बुनकर दम्पत्ति ने अपने पांच बच्चों को राजघाट पुल से नदी में फेंकने के बाद खुद भी दोनों ने नदी में कूद कर आत्महत्या कर ली। 
    विडियो में महिला बता रही हैं कि बड़ी बाज़ार स्थित एक बुनकर ने अपने लूम में ही फांसी लगा कर जान दे दी। यदि सोशल मीडिया में वायरल हुई ये खबरें सच हैं तो ये किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के दिलो-दिमाग में बेचैनी पैदा करने वाली ख़बरें हैं। बनारस के बाकराबाद के बुनकर मुख्तार खां बताते हैं कि “पिछले पांच महीनों से काम बंद है। घर में खाने को नहीं है। नौजवान बुनकर गली-गली चबूतरों पर बैठकर पान की दुकान लगा रहे हैं और किसी तरह गुजारा कर रहे हैं। एक गली में लगभग 12 दुकानें लगी हुई हैं। चालीस रूपए का पान बेचते हैं। लेकिन खर्च 70 रूपए का है। बनारस के बुनकरों की स्थिति आमदनी अठन्नी और खर्च रूपैया वाली हो गयी है।” मेहनत करके परिवार का पेट पालने में मदद करने वाले बहुत से किशोर और नौजवान बुनकर मांगने-खाने में लग गए हैं।

    लल्लापुरा के ताबिश अंसारी बताते हैं कि उनके परिवार में मातमी सन्नाटा छाया हुआ है। समझ में नहीं आ रहा कि क्या किया जाए। काम धंधा बंद पड़ा है। खाने को लाले पड़े हैं। बड़े भाई इसरारूल हक़ अवसाद ग्रस्त हैं। जब दीन दयाल अस्पताल में इलाज के लिए गए, तो अस्पताल में इलाज के नाम पर यह कह कर वापस कर दिया गया कि यहां सिर्फ करोना का इलाज हो रहा है। प्राइवेट डॉक्टर से संपर्क किया, दवा भी ली, लेकिन पैसा न होने के कारण नियमित इलाज नहीं करा पा रहे हैं।” ताबिश का कहना है कि उनके भाई इसरारूल हक़ काम बंद होने की वजह से डिप्रेशन का शिकार हुए हैं। तीन लड़कियां और एक लड़के का पेट पालना और शिक्षा बड़ा मसला बन गया है। ऐसा सिर्फ इसरारूल हक और उनके परिवार के साथ नहीं हुआ है। बनारस की गलियों में थरमस में चाय बेच रहे मासूम बच्चों के घरों की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। रसूलपूरा, बाकराबाद, लल्लापुरा वगैरह जगहों पर 7-8 साल के मासूम बच्चों को चाय, पकौड़ी, पूड़ी, कचौड़ी बेचते देखा जा सकता है। हालात इतने नाजुक हैं कि बच्चों को छोटे थैले में टॉफी और बिस्कुट भी बेचना पड़ रहा है। पीढ़ियों से बुनकरी करके जीवन यापन करने वाले बुनकरों को लॉकडाउन ने कहीं का नहीं छोड़ा है। लॉकडाउन के दौरान बहुत से बुनकर महिलाओं को अपने गहने भी गिरवी रखने और बेचने पड़े हैं।

    प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी की तस्वीर किसी फिल्म या कहानी के स्क्रिप्ट का हिस्सा नहीं है, बल्कि वहां के बुनकरों की जिन्दगी की हकीकत है। इस बदहाली का कारण पूछने पर बुनकर बताते हैं कि पिछले पांच महीनों से मशीनें बंद है। बाजार बंद हैं। अब जब बुनकर फिर से काम शुरू करना चाह रहे हैं, तो बिजली की बढ़ी हुई दरें नयी मुसीबत बन गयी है। ताबिश बताते हैं कि बिजली विभाग द्वारा बुनकरों का कामर्शियल बिल जमा नहीं किया जा रहा है। मुख्तार खां बताते हैं कि नए मीटर को विभाग द्वारा बंद कर दिया जा रहा है। जाहिर है अनलॉक की प्रक्रिया में भी माननीय प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र के बुनकर हताश और निराश हैं।


    गौर तलब है कि जिन बुनकरों की कारीगरी के चलते दुनिया भर में वाराणसी की पहचान है, वही बुनकर आज शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका की विकट परिस्थितियों से घिरे हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के लाभ से दूर हो चुके बुनकरों की मज़दूरी भी औने-पौने रह गयी है। इस समय बुनकरों की मजदूरी 125 से घटकर 75-80 रह गयी है। जो सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से काफी कम है। बुनकर बताते हैं कि जब बाजार में मांग ही नहीं है, तो उनका माल कौन लेगा? जब बजार की मांग बढ़ेगी और गृहस्था (बड़े कारोबारी) को उचित मूल्य मिलेगा तब वो भी मजदूरी की बढ़ी हुई दर अदा कर सकते हैं। मामला कच्चे माल पर टैक्स का भी है। जरी, धागा, रेशम, दुकियम वगैरह पर टैक्स की दरें पहले की तरह हैं। जिससे तैयार माल की लागत बढ़ जाती है। लेकिन बाजार में लागत के अनुरूप भाव नहीं मिलता है। देखा जाए तो बुनाई का पूरा उद्योग ही खतरे में है।

    बुनकरों और बुनाई उद्योग के लिए सरकार की तरफ से योजनाओं का संचालन भी किया जा रहा है। लेकिन बुनकरों के कल्याण के रास्ते नज़र नहीं आ रहे हैं। कन्ट्रोल के राशन से घर नहीं चल सकता है। साग-सब्जी और तेल की भी जरूरत होती है। कोई बीमार पड़ जाए तो उसे डॉक्टर और दवाओं की ज़रूरत होती है। बुनकरी हर किसी के वश की बात नहीं है। ताना-बाना का चलना बुनकरों की सांसों का चलना है। जरूरी है कि सरकार इस ओर ध्यान दे और उनके काम में जो चीजें बाधक बनी हुई हैं उन्हें दूर करे। जैसे, बिजली की दर फिक्स्ड रखी जाए या सब्सिडी की व्यवस्था की जाए। बुनकरों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले कच्चे माल पर टैक्स में कमी की जाए या सब्सिडी भी दिए जाने की जरूरत है। इन उपायों के साथ-साथ बुनकरों को तत्काल आर्थिक सहायता की भी जरूरत है। जिस तरह लॉकडाउन के दौरान पंजीकृत और गैर पंजीकृत मजदूरों को एक-एक हजार रूपए की मदद प्रदेश सरकार द्वारा की गयी है। उसी तरह बुनकर बाहुल्य बस्तियों में भी कैम्प लगाकर बुनकर मज़दूरों को आर्थिक सहायता पहुंचाए जाने की जरूरत है। वरना जिन बच्चों के लिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात कही गयी है, वो बेमानी साबित होंगे। क्योंकि कोरोना से उपजी परिस्थियों के कारण अगर बुनकरों के बच्चों का बचपन गली-गली थरमस में चाय बेचने, कचौड़ी बेचने, टॉफी-बिस्कुट और फोंफी बेचने में खत्म हो जाएगा तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से ये बच्चे वंचित रह जाएंगे। कहना पड़ रहा है कि वाराणसी माननीय प्रधानमंत्री जी का संसदीय क्षेत्र है। वो बुनकरों की समस्याओं से अवश्य अवगत होंगे। उन्हें बुनकरों के लिए काम करने वाले समाज सेवियों और संगठनों के बारे में भी जानकारी होगी ही और सरकार के काम की भी। अच्छा होता कि माननीय प्रधानमंत्री समय रहते बुनकरों की समस्याओं का संज्ञान लेते हुए अपने संसदीय क्षेत्र के मासूम बच्चों, महिलाओं, नौजवान और वृद्ध बुनकरों के लिए कुछ साकारात्मक पहल करें। वरना बनारसी साड़ियों की चमक फीकी पड़ जाएगी।


Saturday, July 25, 2020

लाॅकडाउन और बुनकर मज़दूरों का अर्थशास्त्र

नोटः
यह लेख उत्तर प्रदेश के जिला गाजीपुर स्थित रसूलपुर गांव के पुराने अनुभवों और लाॅकडाउन के दौरान क्रमशः 12, 13 और 15 मई 2020 को बुनकर मजदूर मेराज अंसारी से हुई विशेष बातचीत पर आधारित है।
यह लेख एक पत्रिका में प्रकाशित होना था। लेकिन लाॅकडाउन के कारण अब तक पत्रिका प्रकाशित नहीं हो सका है। आज सुबह फेसबुक, व्हाट्सअप और ट्वीटर पर बनारस के एक बुनकर की आत्महत्या की ख़बरें प्राप्त हुईं। बुनकरों के जीवन को नज़दीक से देखना पहले से ही मन को दुःखित करता रहा है। यह लेख बुनकरों की ज़िन्दगी और कारोबार से जुड़े अब तक  के अनुभवों  के लेखकीय अभिव्यक्ति का ही हिस्सा है। पुराने प्रकाशित लेख भी आप तक पहुंचाने की कोशिश रहेगी। क्योंकि पहले से ही अपने परंपरागत व्यवसाय को बचाने और आजीविका अर्जित करने की चुनौतियों से जूझ रहे बुनकरों के लिए मौजूदा स्थिति त्रासद और भयावह है। 


“गेंहू, चावल तो राशन से मिल रहा है। लेकिन साग-सब्जी खरीदने के लिए पैसा चाहिए। तबियत खराब हो जाए, तो इलाज के लिए पैसे चाहिए। गांव में सरकारी डाॅक्टर नहीं हैं। स्वास्थ्य सुविधा के नाम पर गांव में आंगनवाड़ी कार्यकतृी हैं। उनका काम दो बूंद जिन्दगी तक सीमित है। लाॅकडाउन में यह काम भी बंद है। गांव वालों के लिए स्वास्थ्य केन्द्र का नाम बताना बड़ी चुनौती है। लाॅकडाउन में गांव वालों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं बिल्कुल ही नदारद है। गांव वालों का इलाज पहले ही प्राइवेट डाॅक्टरों के भरोसे रहा है। आपात परिस्थिति में अगर ये डाॅक्टर, गांव से हट जाएं या सुई-दवाई बंद कर दें, तो गांव वालों को प्राथमिक उपचार से वंचित होना पडे़गा।” ये कहना है भारत के एक गांव के बुनकर मज़दूर मेराज अंसारी का। मेराज अंसारी जवानी में ही वृद्ध दिखते हैं। हथकरघा का चलना ही इनके घर-परिवार का चलना है। हथकरघा का इतिहास कबीर से भी पुराना है। हथकरघा के ताने-बाने पर दुनिया के बेहतरीन कपड़े तैयार होते रहे हैं। पिछले लगभग तीन दशकों में बड़ी संख्या में पावरलूम ( बिजली चालित करघा ) ने हथकरघा का स्थान लिया है। लेकिन मेराज अंसारी जैसे बुनकर अभी भी हथकरघा ही चलाते हैं। इस काम में इनका पूरा परिवार (बच्चे, बड़े, बूढ़े और महिलाएं सभी) सहायक की तरह शामिल है। हथकरघा पर गमछा और लुंगी आदि वस्त्र की बुनाई के बाद, इसे बाज़ार तक पहुंचाना होता है। हथकरघे पर तैयार सामान को बाज़ार पहुंचाना ज़ोखि़म भरा काम होता है। लेकिन रीब को दो पैसे कमाने के लिए सिर्फ मेहनत ही नहीं, बल्कि अपने खाने-पीने की वस्तुओं और यात्रा के खर्च में भी कटौती करनी पड़ती है। तब कहीं जाकर घर-परिवार का पेट पलता है। इसलिए मेराज़ अंसारी जैसे बुनकर मज़दूरों को अपनी ज़िन्दगी दाव पर लगाने का जोखि़म उठाना पड़ता है।

क दिन की बात है। मैं अपने मित्र विजय राव के साथ मऊ की ओर जा रहा था। मेरी नज़र एक बाइक सवार पर पड़ती है। हम लोगों की रफ्तार उस बाइक सवार से कुछ अधिक होती है। हम लोगों और बाइक सवार के बीच का फासला लगातार कम होता जाता है। मैं बाइक सवार से रूकने का इशारा करता हूं। रूकने की वजह बाइक पर लदे हुए कपड़े और बाइक सवार की स्थिति होती है। बाइक सवार अपने चेहरे से हेलिमेट हटाता है। अरे! ये तो मेराज भाई हैं! मैं और विजय भाई हैरान होते हैं। हम हैरान होने के सिवा मेराज भाई के लिए कुछ कर नहीं पाते। हर मुलाक़ात की तरह, इस मुलाक़ात में भी कुछ औपचारिक बातों के साथ सिर्फ यही बता पाए, कि श्रम विभाग में मज़दूरों का पंजीकरण कहां और कैसे होता है। हथकरघा पर काम करने वाले बुनकर मज़दूरों का पंजीकरण कहां होता है। बुनकर मज़दूरों लिए सरकार की ओर से कौन सी योजनाएं चलाई जा रही हैं। प्रत्यक्ष को प्रमाण की ज़रूरत नहीं होती है। मेराज अंसारी की बाइक शायद इस लायक नहीं है, कि उससे एक जगह से दूसरी जगह जाया जा सके। मैं भूल नहीं पाता कि उन्होंने किस जतन से बाइक को रोका था। जब चलने को हुए तो संतुलन बनाने में कितनी मशक्क़त करनी पड़ी थी। यही नहीं बाइक को कुछ दूर ठेलना पड़ा था। तब मुझे इल्म हुआ कि बुनकरी सिर्फ ताने-बाने पर सूत और धागों को सुलझाने का नाम नहीं है। बल्कि बुनकर मज़दूरों को बाज़ार तक तैयार माल पहुंचाने में ज़िन्दगी दाव पर लगाने का नाम भी है। मेराज अंसारी जैसे बुनकरों की जीवन शैली को समझना बेहद ज़रूरी है। क्योंकि गांव के अर्थतंत्र को संभालने में मेराज़ अंसारी जैसे बुनकर मज़दूरों का बड़ा योगदान है। इनकी मेहनत से ही पूंजी निर्माण होता है। जब इनका कुनबा शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं से दूर रहकर काम करता है, तो गांव में पूंजी का प्रवाह बनता है। लाॅकडाउन ने मेराज़ भाई जैसे बुनकर मज़दूरों को न सिर्फ घरों और गांवों में लाॅक कर दिया है, बल्कि इनके रोज़ी-रोटी पर भी तालाबंदी कर दी है। हालांकि मेराज भाई अपनी बाइक से सामान पहुंचाने का बड़ा ख़तरा उठाते रहे हैं। लेकिन लाॅकडाउन की आपात परिस्थिति ने उससे भी बड़ा खतरा पैदा कर दिया है। यह ख़तरा है आजीविका का। जिस पर संकट के बादल मंडला रहे हैं।

सूलपुर उन गांवों में है, जहां बुनकर मज़दूरों का ताना-बाना ही ज़िन्दगी की पहली और आखि़री उम्मीद है। लाॅकडाउन में हथकरघे बंद पड़े हैं। ऐसे में मेराज अंसारी जैसे बुनकर मज़दूरों को न तो बुनकरी का काम करना पड़ रहा है और न ही हथकरघा पर तैयार सामान बाज़ार तक पहुंचाने का काम करना पड़ रहा है। लेकिन मज़दूर काम न करे, तो ज़िन्दगी बोझ बन जाती है। वो ख़तरा न उठाए तो खाने को लाले पड़ जाते हैं। अभावों का जीवन जीने वाले मज़दूर लाॅकडान का सामना जिस साहस से कर रहे हैं, वो वाकई लाजवाब है। उधर दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े-बड़े शहरों से प्रवासी मज़दूर साइकिल और पैदल ही हज़ारों मील दूर अपने घरों के लिए रवाना होने का हौसला दिखा रहे हैं, तो इधर गांवों में बहुत से मज़दूर बिना अर्थ के ही पेट के अर्थशास्त्र के साथ तालमेल बनाने का नज़ीर पेश कर रहे हैं। मज़दूरों के धैर्य, संयम और अनुशासन की इससे बड़ी परीक्षा और क्या हो सकती है?

लाॅकडाउन की अवधि में आवश्यक सेवाओं को जारी रखने की अनुमति है। हम जानते हैं कि हर सेवा के तार किसी न किसी तरह पेट से जुड़े होते हैं। खाद्यान्न आपूर्ति, साग-सब्जी, गैस सप्लाई और किराने की दुकानों को खोलने की अनुमति इसी उद्देश्य से है। लेकिन मेराज अंसारी जैसे बुनकर मज़दूरों के लिए खाद्यान्न आपूर्ति को छोड़कर अन्य सभी सेवाओं का कोई मतलब नहीं है। मेराज अंसारी बताते हैं कि बाज़ार जाने के लिए पैसे चाहिएं। जो उनके पास नहीं हैं। उन जैसे मज़दूरों के लिए बैंक का खुलना-बंद होना भी बेमानी है। उनके पास कोई बैंक बैलेन्स नहीं है और न ही किसी योजना के तहत सरकार की ओर से कोई धनराशि उनके खाते में भेजी गयी है।

गांव का अर्थशास्त्र समझने के लिए गांव के लोगों से संवाद और उनकी जीवन शैली को समझना जरूरी है। मेराज अंसारी बताते हैं कि ‘जो लोग कपड़ा बुनकर आजीविका अर्जित करते हैं, या मज़दूरी करके दो जून की रोटी जुटाते हैं, उनके हाथ खाली हैं। गेंहू और चावल तो राशन से मिल रहा है। लेकिन साग-सब्जी खरीदने के लिए पैसा चाहिए। तबियत खराब हो जाए, तो इलाज के लिए पैसे चाहिए। रोज़मर्रा ज़रूरत की वस्तुओं के लिए किराना के दुकान पर जाना हो, तो बिना पैसे कैसे जाया जाय? यह बात समझ से परे है। कोई उधार भी दे, तो कैसे दे? उधार मांगा जाए तो, किससे और कब तक?’ मेराज अंसारी जैसे मज़दूरों की बातें सुनकर अंदाज़ा होता है कि गांव के किराना वाले का अर्थतंत्र भी पूंजी के बहाव में बह जाने के कगार पर पहुंच गया है। इन दिनों गांव के लोग महामारी की आपात परिस्थिति से उपजी इन समस्याओं से जूझ रहे हैं। मज़दूर काम पर नहीं जा रहे हैं। रोज़ कमाने वाले-खाने वाले मज़दूरों के सामने जीवन और मृत्यु का संकट मंडला रहा है। राशन का अनाज बिना तेल-नमक, आलू-प्याज, दाल और मिर्च-मसाले के कैसे खाया जाता है, यह मज़दूर ही जानता है। रसूलपुर गांव के लगभग ज़्यादातर परिवारों की आजीविका मज़दूरी पर ही निर्भर है। रोज-कमाने खाने की प्रक्रिया में शामिल मज़दूरों में कोई लूम चलाता है, कोई बुनाई करता है, कोई गारा-माटी करता है, तो कोई खेत मज़दूर है। इनमें हर परिवार की महिलाएं भी काम करती है। बच्चे भी अपने घर के काम में सहायक की भूमिका निभाते हैं। यदि पूरा परिवार एक इकाई की तरह काम न करे, तो खाए बिना मरने की नौबतें पैदा हो सकती हैं। यह समय लाॅकडाउन की आपात परिस्थिति का है। मज़दूरों के हाथ-पैर बंध से गए हैं।

नरेगा मज़दूरों के लिए राहत की बात है। उनके लिए काम का आवंटन हो रहा है। उनके खाते में पैसे आना भी उनके लिए बड़ी राहत का सबब है। लेकिन बहुत से मज़दूर और उनका परिवार पात्र होते हुए भी मनरेगा जाब काॅर्ड या श्रमिक सन्निर्माण मजदूर की पहचान से वंचित है। इस वजह से ऐसे मज़दूर 1000 रूपए के मुख्यमंत्री राहत राशि से भी वंचित हैं। मेराज अंसारी की बात करें तो, ये बुनकर मज़दूर हैं। इसलिए मनरेगा और श्रमिक सन्निर्माण मज़दूर की पहचान से वंचित हैं। समाज सेवी संस्थाओं द्वारा मदद के तौर पर भोजन का पैकेट पहुंचाए जाने की खबरें टीवी स्क्रीन और अख़बारों का हिस्सा ज़रूर बन रही हैं। लेकिन रसूलपुर गांव की बात करें, तो अभी तक यह गांव ऐसी किसी मदद से अछूता है। गांव के लोग सरकार की ओर मुंह किए मदद के इंतेज़ार में हैं।

मेराज अंसारी इस बात से भी चिन्तित हैं कि मैं उनके गांव की कहानी सुधी जनों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा हूं, तो इससे गांव के लोगों के समक्ष विशेषकर मेराज अंसारी को किसी तरह की समस्या का सामना तो नहीं करना पड़ेगा। इस बात को दृष्टिगत रखते हुए यह बताना भी ज़रूरी है कि इस आलेख का उद्देश्य सामाजिक व सामुदायिक जीवन में बेहतरी के प्रयासों में सहभागी बनना है। न कि डर का मनोविज्ञान तैयार करना या किसी व्यक्ति या संस्था की कार्यशैली की बुराई करना है।



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नोटः यह लेख उत्तर प्रदेश के जिला ग़ाज़ीपुर स्थित रसूलपुर गांव के पुराने अनुभवों और लाॅकडाउन के दौरान क्रमशः 12, 13 और 15 मई 2020 को बुनकर मज़दूर मेराज अंसारी से हुई विशेष बातचीत पर आधारित है।

Monday, April 13, 2020

मुश्किल वक्त के इन साथियों को भी सलाम

ये वो लोग हैं, जो दूसरों के लिए अपने घरों से बाहर रहते हैं। हमारे-आपके बीच आते-जाते रहते हैं। लेकिन हमेशा से अदृश्य रहे हैं। ये लोग मज़दूर हैं, मजबूर हैं और शिक्षा से दूर हैं। ये वो लोग हैं जो अपनी सेवाएं उपलब्ध कराने की एवज में फोटो नहीं खिंचाते। इन लोगों के लिए भी आभार, धन्यवाद और सैल्यूट तो बनता ही है।

इन दिनों पूरा देश कोविड-19 के संक्रमण के फैलाव को रोकने के लिए लाॅकडाउन की आपात स्थिति में है। संक्रमण लगातार बढ़ रहा है। हज़ारों लोग कोरैंटीन और आइसोलेसन में हैं। बहुत से लोग ऐसे हैं, जो संक्रमित नहीं हैं। लेकिन ज़रा सी चूक इन्हें संक्रमण का शिकार बना सकती है। इनमें गरीब, मज़दूर, किसान हैं। बड़ी तादाद उन सुविधा प्रदाताओं की है, जिनका ठेला हर रोज़ हमारे घरों की दहलीज पर आ खड़ा होता है। कभी ‘सब्जी वाला, कभी साग वाला, कभी आलू, प्याज और टमाटर वाला बनकर। इनमें फल विक्रेता होते हैं। जो हमारे-आप के लिए कभी अमरूद ले आते हैं, कभी तो केला, सेव और सन्तरा। हम इन्हें चाट वाले, चाय वाले, चाउमिन वाले, चनाचूर वाले, फुल्की वाले, भुजा वाले और सोन पापड़ी वाले के रूप में भी देखते हैं। ये वही लोग हैं जो अपनी सेवाएं हम तक हर रोज़ पहुंचाते हैं। इन्हें पैदल, गली-गली घूमना पड़ता है। ताकि दो जून की रोटी का जुगाड़ हो सके। सामान्य दिनों में चिलचिलाती धूप में खीरा, तरबूज़ और कुल्फी की ठण्डक का एहसास इन्हीं लोगों की बदौलत कर पाते हैं। गर्मी के दिनों में जब लू से बचने के लिए लोग अपने-अपने घरों में पंखे, कूलर और एसी कमरों में होते हैं, तो ये लोग सड़कांे और गलियों की ख़ाक छानते रहते हैं। बीमार पड़ने पर दस-बीस रूपए की स्वास्थ्य सुविधाओं से काम चलाना पड़ता है। दो-चार दिन काम बंद हो जाए तो इनके सामने भूखे रहने की भी परिस्थितियां पैदा हो जाती हैं। इस समय पूरा देश लाॅकडाउन की आपात परिस्थिति में है। रोज़ कमाने-खाने वाले इन अस्थाई ठेले वालों के लिए यह परिस्थिति किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। सोशल और फिजिकल दूरी बनाए रखना, बार-बार हाथ धुलना, फेस मास्क का इस्तेमाल इनके लिए सहज काम नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि संक्रमण का डर इन्हें नहीं है। लेकिन रोज कमाने-खाने की दिक्कतें ऐसी हैं कि यह डर कोई मायने नहीं रखता। हालात ऐसे हैं कि इन्हें घर-घर सब्जी, दूध, गैस सिलेण्डर और अन्य आवश्यक वस्तुएं पहुंचाने का बीड़ा उठाना पड़ रहा है। ठेले वालों और मज़दूरों के अर्थोपार्जन की प्रक्रिया रूक गयी है। चूंकि सब्जी और फल ज़रूरी वस्तुओं में शुमार है। इसका फायदा हर ग़रीब उठाना चाहता है। ताकि वो अपना परिवार चला सके। यही वजह है कि कोई चाट-पकौड़े वाला सब्जी बेच रहा है, तो किसी मज़दूर फल बेच जीवन चलाना पड़ रहा है। निस्संदेह इनकी आजीविका की आवश्यकताएं हैं। लेकिन इनके सेवा को कम करके नहीं देखा जा सकता है। क्योंकि ये वो लोग हैं जो महामारी की आपात परिस्थिति में साहस करके हम तक आलू, प्याज, लहसुन, अदरक, धनिया, पोदिना, नींबू और साग आदि पहुंचा रहे हैं। ताकि हमारे मुंह का ज़ायका न बिगड़ने पाए और हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बीमारी से लड़ने लायक बनी रहे। अनिल मेरे बचपन का दोस्त है। उसका छोटा भाई पप्पू चाट-पकौड़ा बेचकर घर चलाता है। इन दिनों जब हम और आप अपने-अपने घरों में हैं। पप्पू चेहरे पर मुस्कान लिए सब्जियां बेच रहा है। क्योंकि पप्पू के लिए आजीविका का संकट कोरोना से भी बड़ा है। फरीद मियां उन सब्जी विक्रेताओं में हैं, जिन्होंने हवा के खिलाफ जाकर सब्जी बेचने का बीड़ा उठाया है। इस काम में वो अकेले नहीं हैं। बच्चे को भी काम में हाथ बंटाना पड़ता है।

उन महिलाओं और बच्चियों का जिक्र भी ज़रूरी है, जो आपात परिस्थिति में घण्टे-दो घण्टे के लिए ही सही, सड़क किनारे सब्जी बेचते देखी जा रही हैं। फैयाज़ भाई बढ़ई का काम करते हैं। इन दिनों काम बंद है। एक पत्नी और तीन बच्चों का परिवार बड़ा नहीं है। लेकिन संकट के बादलों से पार पाना इनके लिए भी बड़ी चुनौती है। फैयाज़ भाई इस चुनौती का सामना साग-सब्जी जैसी आवश्यक वस्तुओं को घर-घर पहुंचाकर कर रहे हैं। अशरफ भाई पंचर बनाते हैं, लेकिन दुकान बंद है और इन दिनों ठेले पर सब्ज़ियां बेच जिन्दगी गुजर-बसर कर रहे हैं। राम नरायन कुशवाहा अहिरौली से पैदल ठेले पर सब्जी लेकर मुहम्मदाबाद आते हैं। कोविड-19 से डरे हुए हैं। लाॅकडाउन में पुलिसिया डण्डा भी खाया। लेकिन पेट का सवाल इनके लिए बहुत बड़ा सवाल है। मुंह पर देसी मास्क बांधे मुस्कराते हुए कहते हैं “कि पेटवा क का करल जा।”

निज़ामुद्दीन पहले पावरलूम कारीगर थे। भीवण्डी रहते थे। जिस घर की जिम्मेदारी निभाने के लिए भीवण्डी गए थे, उसी घर की जिम्मेदारियों ने जल्द ही उन्हें घर बुला लिया। उन्हें भिवण्डी छोड़े लगभग सात बरस हो चुके हैं। मेहनत मज़दूरी करके दिहाड़ी से अपना परिवार चलाते हैं। निर्माण कार्य रूका हुआ है। अपने परिवार का पेट पालने के लिए आजकल निज़ामुद्ीन मुहल्ले के लोगों और बाज़ार के बीच कड़ी के तौर पर काम कर रहे हैं। वो हर सुबह दो घण्टे तक अपने घर से बाहर रहकर मुहल्ले के लोगों का सामान-लाने, ले जाने का काम कर रहे हैं। बदले में जो कुछ मिलता है, उससे गुजारा कर रहे हैं। निज़ामुद्दीन सन्निर्माण श्रमिक में हैं लेकिन श्रम विभाग में उनका पंजीयन नहीं है। पंजीयन के लिए दो वर्ष पहले मैंने खु़द उन्हें प्रेरित किया था। उनका फार्म भी भरवा दिया था। लेकिन शिक्षा और जागरूकता न होने के कारण निज़ामुद्दीन जैसे मज़दूर अपनी पहचान से वंचित हैं। इसलिए ऐसे मज़दूर सरकार की ओर से दी जाने वाली 1000 रूपए की सहायता राशि से भी वंचित हैं। कोविड-19 के कारण लाॅकडाउन की इस परिस्थिति में गैस सिलेण्डर पहुंचाने वाले मेहनतकश मज़दूरों की सेवाएं भी काबि़ले तारीफ़ है। यदि ये सिलेण्डर घर-घर न पहुंचाएं तो बहुत से घरों में समय पर चूल्हा जलना मुश्किल हो जाएगा। सुबह-सवेरे दूध वाले दूध न दें तो दूध पीते बच्चों को भूखा रहना पड़ेगा।

दर असल ये वो साहसी लोग हैं, जो अपने परिवार की आजीविका के लिए सड़कों पर हैं। खासकर तब जब बाकी लोग संक्रमण से सुरक्षित रहने के लिए अपने-अपने घरों में हैं। रोज कमाने-खाने वाले ये लोग पहले से शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं। लेकिन आज की कठिन परिस्थिति में इनकी सेवाएं किसी डाॅक्टर, नर्स, पुलिस-प्रशासन और सामाजिक कार्यकर्ता से कम नहीं है। ये वो लोग हैं, जो दूसरों के लिए अपने घरों से बाहर रहते हैं। हमारे-आपके बीच आते-जाते रहते हैं। लेकिन हमेशा से अदृश्य रहे हैं। ये लोग मज़दूर हैं, मजबूर हैं और शिक्षा से दूर हैं। ये वो लोग हैं जो अपनी सेवाएं उपलब्ध कराने की एवज में फोटो नहीं खिंचाते। इन लोगों के लिए भी आभार, धन्यवाद और सैल्यूट तो बनता ही है।

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Saturday, April 4, 2020

कोविड-19 का उत्पादन, मांग और आपूर्ति पर प्रभाव


ह समय गंभीर है। इस समय को संवाद, संवेदना, धैर्य और अनुशासन से ही जिया और जीता जा सकता है। यह तो अर्थशास्त्री ही बता सकते हैं कि मंदी की ओर जाती अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर आने में कितना समय लगेगा। इसलिए आर्थिक धैर्य से काम लेना हर व्यक्ति के लिए इस समय की बड़ी ज़रूरत है। जैसे वस्तुओं के इस्तेमाल में अनुशासन बरतना। भोजन नष्ट न करना। यह आत्मसात करना कि हमारे ही जैसे हज़ारों गरीब बच्चे, बड़े, बूढ़े और महिलाएं अपनी कम भोजन कर रहे हैं या फिर भूखे रह रहे हैं। हमारी संवेदना ही हमें कोविड-19 और इससे पैदा हुई आर्थिक संकट से उबरने में मदद करेगी। लेकिन आर्थिक मोर्चे पर सरकार को अभिनव प्रयास करने होंगे।


दुनिया के सैंकड़ों देश इन दिनों कोविड-19 के संक्रमण का सामना कर रहे हैं। चीन, अमेरिका, इटली, फ्रांस, स्पेन और जर्मनी आदि देशों में इस महामारी के कारण हज़ारों लोगों को जान गंवानी पड़ी है। कई देशों को जीवन और मृत्यु के बीच लाॅकडाउन की सीमा रेखा खींचनी पड़ी है। भारत भी इस संक्रमण के साए में है। ये अलग बात है कि यहां पर संक्रमण अमेरिका और यूरोपीय देशों की तरह नहीं फैला है। लेकिन संक्रमित मरीज़ों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। सरकार के बार-बार अपील करने और प्रशासन की सक्रियता का असर दिख भी रहा है। कुछ संवेदनहीन और लापरवाह लोगों को छोड़कर बाकी सभी लोग घरों में हैं। दुनियाभर के डाॅक्टर, नर्स प्रशासनिक और सामाजिक सेवा से जुड़े व्यक्ति युद्ध स्तर पर काम कर रहे हैं। सब्जी वाले, किराना स्टोर वाले, दूध वाले और रसोई ईंधन वाले भी अपनी जान जोखि़म में डाल कर दूसरे के घरों तक आवश्यक वस्तुएं पहुंचा रहे हैं। एक तरह से पूरी मानवता परीक्षा के कठिन दौर से गुज़र रही है। देखना यह है कि इस परीक्षा में सफलता कब प्राप्त होती है। चीन की बात करें, तो वहां पर संक्रमण कम होने की ख़बरें हैं। लेकिन दुनिया के शेष देशों से कोई सुखद समाचार नहीं आ रहा है। विशेषज्ञों की राय है कि अमेरिका और यूरोपीय देशों को अपनी लापरवाही का खामियाज़ा चुकाना पड़ रहा है। ऐसी आशंकाएं भी व्यक्त की जा रही हैं कि भारत जैसे देश को भी लापरवाही की कीमत चुकानी पड़ सकती है। बहरहाल, हर संकट समाधान ले कर आता है। हालांकि कोविड-19 लाइलाज है। फिर भी सोशल डिस्टैन्सिंग, बार-बार हाथ धुलना, मास्क लगाना, चेहरे पर बार-बार हाथ न ले जाना, मुंह में, नांक में हाथ न डालना आदि सुरक्षा उपायों में ही फिलहाल इस संकट का समाधान छुपा है। कम से कम कोविड-19 संक्रमण की दवा की खोज होने तक या इस संक्रमण के स्वतः समाप्त होने तक इन उपायों को अपनाए रखना होगा।

हामारी के समय में जब घरों में बंद रहना पड़ता है, तो जीवन बहुत मुश्किल और नीरस हो जाता है। लेकिन मानव सभ्यता के इतिहास में शायद ही कोई संकट ऐसा आया हो जब एक दूसरे की मदद के लिए लोग आगे न आए हों। यहां तक कि जन सेवा में लोगों की जान भी चली जाती है। कोविड-19 संक्रमण से लोगों की जान बचाने की कवायद में लगे सैंकड़ों डाॅक्टरों की मौत हो चुकी है। संकट का समय मनुष्य के मानव स्वाभाव की परीक्षा का भी समय होता है। इन दिनों भारत के विभिन्न राज्यों में बहुत से लोग यथा स्थिति में रहने को विवश हैं। सरकारों के साथ-साथ सामाजिक संस्थाएं गरीबों, भूखों और बेसहारा लोगों की मदद कर रहे हैं। यह ज़रूरी भी है। क्योंकि हर गरीब कहीं न कहीं उत्पादन की प्रक्रिया में एक किसान, मज़दूर और सेवा प्रदाता के रूप सकल घरेलू उत्पाद में अपना योगदान देता है। लेकिन इनके जीवन में स्थायित्व नहीं होता है। जो लोग आर्थिक रूप से समृद्ध हैं, वो हर परिस्थिति का सामना कर लेते हैं। लेकिन रोज कमाने-खाने वाले गरीब किसानों और मज़दूरों के लिए कोई भी आपात स्थिति कठिनाइयों भरी होती है। बहुत से घरों में चूल्हे नहीं जल पाते हैं। इन्हें कई-कई वक्त भूखे रहना पड़ता है।

न मज़दूरों का ज़िक्र ज़रूरी है, जो घर से दूर दिल्ली, मुम्बई, भिवन्डी, कोलकता, हैदराबाद, सूरत, अहमदाबाद, लुधियाना, रूद्रपुर, मेरठ, मुज़फ्फरनगर, गाज़ियाबाद, आगरा, पानीपत, फरीदाबाद, गुड़गांव, आदि शहरों में रहते हैं। मज़दूरों का अपने घर-परिवार और गांव-कस्बे से दूर बड़े-बड़े शहरों में स्थित बड़े-बड़े कल-कारखानों में काम करना दो बातें उजागर करता है। पहला यह कि मज़दूर अपने परिवार से दूर रह कर जो आजीविका अर्जित करता है, वही आजीविका गांव-कस्बे में रहकर अर्जित करना संभव नहीं होता है। क्योंकि गांव की अर्थव्यवस्था औद्योगिक नगरों से छोटी और कमज़ोर होती है।

ज़ाहिर है मज़दूरों की आर्थिक आवश्यकताएं पलायन का मुख्य कारणों में है। जिसका ज़िक्र अक्सर होता रहता है। मज़दूरों के पलायन का दूसरा पहलू यह है कि मज़दूर सिर्फ अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बड़े शहरों की ओर पलायन नहीं करते हैं। दर असल उनकी स्थिति उत्पादन की प्रक्रिया में मूल ईकाई की तरह होती है। बात खेती-किसानी की हो, उद्योग-धंधों की हो या कल-कारखानों की। हर जगह मज़दूर श्रम का योगदान करते हैं। जिसके बदले में उन्हें पारिश्रमिक मिलता है। कुछ काम हैं, जिसके बंद होने से नियोक्ता और उपभोक्ता पर तत्काल कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ता है। लेकिन मज़दूर का हित तुरंत प्रभावित होता है। बहुत से काम ऐसे हैं, जिसमें नियोजित मज़दूर यदि काम बन्द कर दें, तो उत्पादन, मांग और पूर्ति में असंतुलन जल्द ही ज़ाहिर होने लगते हैं। किसान के उदाहरण से उत्पादन, मांग और पूर्ति के आपसी संबंध को समझा जा सकता है। यदि किसी कारणवश किसान अन्न उत्पादन की प्रक्रिया से अलग हो जाएं, तो दुनिया के समक्ष खाद्यान्न संकट पैदा हो सकता है। इसी तरह यदि कल-कारखानों में मज़दूर काम करना बंद कर दें, तो उपभोक्ताओं के समक्ष आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित हो सकती है। वस्तुओं की मांग और आपूर्ति में संतुलन उत्पादन की प्रक्रिया के सुचारू रूप से गतिमान रहने पर बना रहता है। उत्पादन की प्रक्रिया इसमें शामिल व्यक्तियों पर निर्भर करता है।

चूंकि इस समय देश 21 दिनों के लाॅकडाउन की आपात परिस्थिति से गुज़र रहा है। इसलिए यह विचार करना ज़रूरी है कि इस दौरान खाद्यान्न और अन्य मूलभूत ज़रूरी वस्तुओं के उत्पादन, मांग और आपूर्ति की क्या स्थिति है। किसी भी आपात परिस्थिति में उपलब्ध संसाधनों का सही नियोजन सुनिश्चित करना शासन-प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती होती है। जैसा कि इस समय देखा जा सकता है। सरकार ने खाद्य पदार्थों का गैर ज़रूरी भण्डारण न करने का निर्देश दिया है। सरकारी सस्ते गल्ले के वितरण केन्द्रों (राशन की दुकानों) पर पात्र गृहस्ती के कार्ड धारकों को समय से खाद्यान्न वितरण सुनिश्चित करने के लिए भी विशेष निर्देश जारी किए गए हैं। रसोई ईंधन (एलपीजी) की होम डिलिवरी पहले से कहीं बेहतर नज़र आ रही है। शासन-प्रशासन जिस प्रतिबद्धता से लाूकडाउन में जन सुविधाओं को सुचारू बनाए रखने की कोशिशों को अंजाम दे रही है, आपात परिस्थिति में गरीबों के लिए बड़ी राहत है। यह तभी तक संभव है, जब तक सरकार के पास इन वस्तुओं का पर्याप्त भण्डार उपलब्ध रहेगा। बात करते हैं उन लोगों की जो मध्य या उच्च वर्ग में आते हैं। इन लोगों के पास अपनी क्रय शक्ति है। जिसके अनुसार इस वर्ग के लोग ज़रूरी खाद्य पदार्थ खरीद सकते हैं। लेकिन यदि लाॅकडाउन को आगे बढ़ाना पड़ा तो इस वर्ग के लोगों के पास मज़बूत क्रय शक्ति होने के बाद भी इनके खाद्याान्न से वंचित रहने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। क्योंकि आपूर्ति बाधित होने का मतलब है कोई वस्तु एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं पहुंचना। यद्यपि जरूरी सेवाओं की पहुंच को सुगम बनाने के प्रयास युद्ध स्तर पर चल रहे हैं। फिर भी भविष्य आने वाले समय में यह चिन्ता का एक बड़ा विषय होगा। इस पर विचार करने की आवश्यकता है। ऐसा इसलिए भी संभव है, क्योंकि आपात परिस्थिति में उत्पादन की कई बड़ी इकाइयों में उत्पादन ठप्प पड़ गया है।

हालांकि किसानों के समक्ष वो समस्या नहीं है, जो खाद्य सामग्री के विनिर्माण उद्योग के समक्ष है। साग-सब्जी की आपूर्ति सुचारू रूप से चल रही है और आगे भी जारी रहेगी। लेकिन जो द्वितीयक उत्पाद हैं। जिसे हम पैक्ड आइटम हैं के रूप में बाज़ार से खरीदते हैं, उनका उत्पादन और आपूर्ति अवश्य बाधित होगी। इससे भी बड़ी चुनौती होगी आम जन की सोच से लड़ना। जब भी आपात परिस्थितियां पैदा होती हैं, अधिशेष भण्डारण एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आती है। इसकी वजह से आपूर्ति प्रभावित होती है और कीमतें भी आसमान छूने लगती हैं। पिछले कुछ वर्षाें प्याज और टमाटर का अनुभव कुछ ऐसा ही रहा है। मनुष्य के सोच और स्वभाव में सिर्फ भण्डारण ही नहीं है बल्कि विषम परिस्थितियों में ‘मेरा भला, तो जग भला’ की प्रवृत्ति है। यह प्रवृत्ति दो रूपों में अभिव्यक्त होती है। एक तरफ विक्रेता अधिक लाभ कमाने के लिए आवश्यक वस्तुओं का भण्डारण करता है। तो दूसरी ओर उपभोक्ताओं में मज़बूत क्रय शक्ति वाले लोग एक ही बार में पूरा बाज़ार खरीद लेने के लिए लालायित रहते हैं। यदि लोगों तक मांग और आपूर्ति की सही जानकारी नहीं पहुंचती है, तो लाॅकडाउन के बाद इस तरह की परिस्थिति पैदा हो सकती हैं। यह काम इसलिए भी कठिन प्रतीत होता है क्योंकि अभी बहुत से लोग ऐसे हैं, जो माननीय प्रधानमंत्री जी के हाथ जोड़कर विनय करने पर भी घर में रहने का संयम और अनुशासन नहीं दिखा रहे हैं। ये वही लोग हैं जो एक कड़ी तोड़ कर पूरा माला बिखेर देते हैं। यदि समय रहते स्थानीय स्तर पर मांग और आपूर्ति की वस्तु स्थिति का पता लगा लिया जाए, तो आने वाले समय में व्यक्ति और बाज़ार की क्रियाओं में किसी हंगामी परिस्थिति के पैदा होने से बचा जा सकता है।

ह समय गंभीर है। इस समय को संवाद, संवेदना, धैर्य और अनुशासन से ही जिया और जीता जा सकता है। यह तो अर्थशास्त्री ही बता सकते हैं कि मंदी की ओर जाती अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर आने में कितना समय लगेगा। इसलिए आर्थिक धैर्य से काम लेना हर व्यक्ति के लिए इस समय की बड़ी ज़रूरत है। जैसे वस्तुओं के इस्तेमाल में अनुशासन बरतना। भोजन नष्ट न करना। यह आत्मसात करना कि हमारे ही जैसे हज़ारों गरीब बच्चे, बड़े, बूढ़े और महिलाएं अपनी कम भोजन कर रहे हैं या फिर भूखे रह रहे हैं। हमारी संवेदना ही हमें कोविड-19 और इससे पैदा हुई आर्थिक संकट से उबरने में मदद करेगी। लेकिन आर्थिक मोर्चे पर सरकार को अभिनव प्रयास करने होंगे।
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Monday, March 30, 2020

डर का मनोविज्ञान और कोविड-19


अच्छा तो यह है कि हम डरे हुए लोग वर्तमान स्थिति के साथ बेहतर सामंजस्य बनाने की कोशिश करें। गीत, कविता, किस्से-कहांनियां सुनें और सुनाएं। हंसे और हंसाएं। जीवन अमूल्य है। घर से बाहर जाकर या घर में रहकर बीमार होना विकल्प नहीं है। अपनी ऊर्जा साकारात्मक सोच के साथ रचनात्मक कार्यों में लगाना ही उचित है। सुख और दुःख जीवन के दो पहलू हैं। मानव सभ्यता ने विकास का लम्बा सफर इसी धूप-छांव में तय किया है।



र, भय, ख़ौफ़ का भाव मानव ही नहीं अपितु जानवरों में भी होता है। मनुष्य के दो भाव जन्मना होते हैं। एक भाव सुखद होता है तो दूसरा दुःखद होता है। डर का भाव दुःखद होता है। जिसमें मनुष्य को किसी तरह की हानि पहुंचने की संभावना होती है। ऐसी संभावना निजी और सामजिक जीवन की परिस्थितियों में उतार-चढ़ाव से बनती है। कहा जा सकता है कि मानवीय भावना के विकास में मनुष्य का परिवेश और परिस्थितियों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। मनुष्य अपने परिवेश और परिस्थिति में रहकर ही भावनात्मक परिपक्वता प्राप्त करता है। चूंकि विकास की प्रक्रिया निरन्तर जारी रहती है। इसलिए समय और परिस्थितियां बदलती हैं तो मनुष्य की भावनाओं में भी बदलाव परिलक्षित होता है। उदाहरण के लिए कोई बच्चा कमरे में अकेले होता है तो उसे डर का अनुभव होता है। किसी बच्चे को अकेले घर से बाहर जाने डर लगता है। कोई बच्चा समूह में खेलने से डरता है। डर के बहुत से कारण गिनाए जा सकते हैं। लेकिन बाल विकास की विभिन्न अवस्थाओं में भावनात्क संतुलन और सामंजस्य के लिए माता-पिता, शिक्षक और एक समय के बाद बच्चा खुद भी प्रयास करते हैं। यही कारण है कि जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, उसके मन में डर का भाव कम होता जाता है। यदि बच्चे अपने घर और समाज के परिवेश से अलग रहते हैं, तो ऐसे बच्चों के भावनात्मक विकास में संतुलन का अभाव होता है। इसके कारण ऐसे बच्चे वयस्क होने के बाद भी डरते रहते हैं। लेकिन कुछ बच्चे परिस्थितियों के कारण बिल्कुल नहीं डरते हैं। बांसफोर समुदाय के बच्चों को चाकू और गंडासे से बांस काटने में डर नहीं लगता है। किसान के बच्चों को खेत में नंगे पांव जाने में डर नहीं लगता है। किसी महिला या हलवाई को चूल्हे पर रखे तेल के गरम कड़ाहे से जलने का डर नहीं होता है। ऐसा परिस्थितियों के कारण ही संभव हो पाता है।

स समय पूरी दुनिया के लोग डरे हुए हैं। कोविड-19 के संक्रमण के फैलाव के परिणामों की कल्पना ही डर का बड़ा कारण है। लोग घरों में रहने के लिए विवश हैं। परिस्थितियां कुछ ऐसी बन पड़ी हैं कि जन सामान्य ‘घर में रहना, सोशल डिस्टैन्सिंग और हाथ धुलते रहना’ आदि उपायों से जीवन और मौत के बीच विभाजक रेखा खींच रहा है। लेकिन इन्हीं परिस्थितियों में बहुत से ऐसे लोग हैं, जो हेल्थ सर्विसेज, पुलिस प्रशासन और सामाजिक संस्थाओं से प्रतिबद्ध होकर न सिर्फ मरीजों बल्कि असामान्य परिस्थितियों में पलायन कर रहे मज़दूरों, गरीबों और भूखों की मदद कर रहे हैं। 

लेक्ट्राॅनिक, प्रिन्ट और सोशल मीडिया में कोविड-19 से संक्रमण की ख़बरें किसी मैच के स्कोर बोर्ड की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है। टीवी और मोबाइल तकिया-बिछौना का हिस्सा बन चुका है। मैसेज आते ही फारवर्ड का बटन दब जाना आम बात है। हर कोई दूर होकर भी अपने प्रिय जनों को अद्यतन सूचनाओं से अपडेट रखने के प्रयास में है। कहना होगा कि बच्चा, जवान और बूढ़े लगभग सभी कोविड-19 की चिन्ताओं के साथ सो और जाग रहे हैं। इनकी दिनचर्या में इस संक्रमण के भय ने मजबूत स्थान बना लिया है। दर असल देश और दुनिया की परिस्थितियां कुछ ऐसी हैं कि हर किसी को डर के अनुभव से होकर गुज़रना पड़ रहा है। कोविड-19 का डर भयावह इसलिए भी है, क्योंकि इससे बचने के लिए अभी तक कोई वैक्सीन तैयार करने में सफलता नहीं प्राप्त हो सकी है।

ज मनुष्य घर में रहने वाली परिस्थितियों में फंसा हुआ है। डर का भाव कई बार मनुष्य के लिए लाभप्रद सिद्ध होता है। क्योंकि डर का भाव संयम और अनुशासन बनाने में सहायक होता है। जिसकी आवश्यकता इस कठिन परिस्थिति में सबसे अधिक है। फिर भी लोगों की भीड़ गैर-ज़रूरी तौर पर विभिन्न घरों के बाहर और मुहल्लों में बाल पंचायत, किशोर पंचायत और युवा पंचायत के रूप में देखी जा रही है। पुलिस प्रशासन शासनादेश के अन्तर्गत इन्हें माइक से बार-बार निदेश दे रही है, लेकिन इन पंचायतों में शामिल व्यक्तियों को डर का एहसास नहीं है। क्योंकि उनके व्यक्तित्व के भावनात्मक विकास में डर के भाव का संतुलित विकास नहीं हुआ है। वहीं बहुत से व्यक्ति ऐसे हैं जो सिर्फ डरे हुए नहीं हैं बल्कि उनके अन्दर डर का एक मनोविज्ञान तैयार हो चुका है। ऐसे व्यक्ति घर के बाथरूम और छत पर जाने में भी डर रहे हैं। डर का यह मनोविज्ञान भी ठीक नहीं कहा जा सकता है। जिसके लिए टीवी के डरावने स्कोर बोर्ड वाले समाचार और सोशल मीडिया में शोधहीन और अप्रमाणित स्रोतों से भेजे जाने वाले मेसेज जिम्मेदार हैं।

क्त प्रसंग व्यक्ति, परिवार और समाज में व्याप्त भय के विभिन्न रूपों को प्रदर्शित करता है।  संकट की इस घड़ी में संयम और अनुशासन का व्यवहार ही उचित है। डर का भाव मनुष्य के व्यक्तित्व का स्थाई तत्व है। यह जीवन से मुत्यु तक बना रहता है। लेकिन विकास की विभिन्न अवस्थाओं में विभिन्न परिस्थियों में मनुष्य के भाव नए अनुभवों से होकर गुज़रते हैं। निश्चित तौर पर आज देश और दुनिया के तमाम लोग डरे हुए हैं। लेकिन “भयभीत न होना और अत्यधिक भयभीत होना” दोनों ही भावों से हमें दूर रहने की आवश्यकता है। अति निडरता में सावधानी हटने पर संक्रमण का खतरा है, तो वहीं दूसरी तरफ अत्यधिक भयभीत होना व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं होता है। अच्छा तो यह है कि हम डरे हुए लोग वर्तमान स्थिति के साथ बेहतर सामंजस्य बनाने की कोशिश करें। गीत, कविता, किस्से-कहांनियां सुनें और सुनाएं। हंसे और हंसाएं। जीवन अमूल्य है। घर से बाहर जाकर या घर में रहकर बीमार होना विकल्प नहीं है। अपनी ऊर्जा साकारात्मक सोच के साथ रचनात्मक कार्यों में लगाना ही उचित है। सुख और दुःख जीवन के दो पहलू हैं। मानव सभ्यता ने विकास का लम्बा सफर इसी धूप-छांव में तय किया है।
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