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Saturday, July 25, 2020

लाॅकडाउन और बुनकर मज़दूरों का अर्थशास्त्र

नोटः
यह लेख उत्तर प्रदेश के जिला गाजीपुर स्थित रसूलपुर गांव के पुराने अनुभवों और लाॅकडाउन के दौरान क्रमशः 12, 13 और 15 मई 2020 को बुनकर मजदूर मेराज अंसारी से हुई विशेष बातचीत पर आधारित है।
यह लेख एक पत्रिका में प्रकाशित होना था। लेकिन लाॅकडाउन के कारण अब तक पत्रिका प्रकाशित नहीं हो सका है। आज सुबह फेसबुक, व्हाट्सअप और ट्वीटर पर बनारस के एक बुनकर की आत्महत्या की ख़बरें प्राप्त हुईं। बुनकरों के जीवन को नज़दीक से देखना पहले से ही मन को दुःखित करता रहा है। यह लेख बुनकरों की ज़िन्दगी और कारोबार से जुड़े अब तक  के अनुभवों  के लेखकीय अभिव्यक्ति का ही हिस्सा है। पुराने प्रकाशित लेख भी आप तक पहुंचाने की कोशिश रहेगी। क्योंकि पहले से ही अपने परंपरागत व्यवसाय को बचाने और आजीविका अर्जित करने की चुनौतियों से जूझ रहे बुनकरों के लिए मौजूदा स्थिति त्रासद और भयावह है। 


“गेंहू, चावल तो राशन से मिल रहा है। लेकिन साग-सब्जी खरीदने के लिए पैसा चाहिए। तबियत खराब हो जाए, तो इलाज के लिए पैसे चाहिए। गांव में सरकारी डाॅक्टर नहीं हैं। स्वास्थ्य सुविधा के नाम पर गांव में आंगनवाड़ी कार्यकतृी हैं। उनका काम दो बूंद जिन्दगी तक सीमित है। लाॅकडाउन में यह काम भी बंद है। गांव वालों के लिए स्वास्थ्य केन्द्र का नाम बताना बड़ी चुनौती है। लाॅकडाउन में गांव वालों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं बिल्कुल ही नदारद है। गांव वालों का इलाज पहले ही प्राइवेट डाॅक्टरों के भरोसे रहा है। आपात परिस्थिति में अगर ये डाॅक्टर, गांव से हट जाएं या सुई-दवाई बंद कर दें, तो गांव वालों को प्राथमिक उपचार से वंचित होना पडे़गा।” ये कहना है भारत के एक गांव के बुनकर मज़दूर मेराज अंसारी का। मेराज अंसारी जवानी में ही वृद्ध दिखते हैं। हथकरघा का चलना ही इनके घर-परिवार का चलना है। हथकरघा का इतिहास कबीर से भी पुराना है। हथकरघा के ताने-बाने पर दुनिया के बेहतरीन कपड़े तैयार होते रहे हैं। पिछले लगभग तीन दशकों में बड़ी संख्या में पावरलूम ( बिजली चालित करघा ) ने हथकरघा का स्थान लिया है। लेकिन मेराज अंसारी जैसे बुनकर अभी भी हथकरघा ही चलाते हैं। इस काम में इनका पूरा परिवार (बच्चे, बड़े, बूढ़े और महिलाएं सभी) सहायक की तरह शामिल है। हथकरघा पर गमछा और लुंगी आदि वस्त्र की बुनाई के बाद, इसे बाज़ार तक पहुंचाना होता है। हथकरघे पर तैयार सामान को बाज़ार पहुंचाना ज़ोखि़म भरा काम होता है। लेकिन रीब को दो पैसे कमाने के लिए सिर्फ मेहनत ही नहीं, बल्कि अपने खाने-पीने की वस्तुओं और यात्रा के खर्च में भी कटौती करनी पड़ती है। तब कहीं जाकर घर-परिवार का पेट पलता है। इसलिए मेराज़ अंसारी जैसे बुनकर मज़दूरों को अपनी ज़िन्दगी दाव पर लगाने का जोखि़म उठाना पड़ता है।

क दिन की बात है। मैं अपने मित्र विजय राव के साथ मऊ की ओर जा रहा था। मेरी नज़र एक बाइक सवार पर पड़ती है। हम लोगों की रफ्तार उस बाइक सवार से कुछ अधिक होती है। हम लोगों और बाइक सवार के बीच का फासला लगातार कम होता जाता है। मैं बाइक सवार से रूकने का इशारा करता हूं। रूकने की वजह बाइक पर लदे हुए कपड़े और बाइक सवार की स्थिति होती है। बाइक सवार अपने चेहरे से हेलिमेट हटाता है। अरे! ये तो मेराज भाई हैं! मैं और विजय भाई हैरान होते हैं। हम हैरान होने के सिवा मेराज भाई के लिए कुछ कर नहीं पाते। हर मुलाक़ात की तरह, इस मुलाक़ात में भी कुछ औपचारिक बातों के साथ सिर्फ यही बता पाए, कि श्रम विभाग में मज़दूरों का पंजीकरण कहां और कैसे होता है। हथकरघा पर काम करने वाले बुनकर मज़दूरों का पंजीकरण कहां होता है। बुनकर मज़दूरों लिए सरकार की ओर से कौन सी योजनाएं चलाई जा रही हैं। प्रत्यक्ष को प्रमाण की ज़रूरत नहीं होती है। मेराज अंसारी की बाइक शायद इस लायक नहीं है, कि उससे एक जगह से दूसरी जगह जाया जा सके। मैं भूल नहीं पाता कि उन्होंने किस जतन से बाइक को रोका था। जब चलने को हुए तो संतुलन बनाने में कितनी मशक्क़त करनी पड़ी थी। यही नहीं बाइक को कुछ दूर ठेलना पड़ा था। तब मुझे इल्म हुआ कि बुनकरी सिर्फ ताने-बाने पर सूत और धागों को सुलझाने का नाम नहीं है। बल्कि बुनकर मज़दूरों को बाज़ार तक तैयार माल पहुंचाने में ज़िन्दगी दाव पर लगाने का नाम भी है। मेराज अंसारी जैसे बुनकरों की जीवन शैली को समझना बेहद ज़रूरी है। क्योंकि गांव के अर्थतंत्र को संभालने में मेराज़ अंसारी जैसे बुनकर मज़दूरों का बड़ा योगदान है। इनकी मेहनत से ही पूंजी निर्माण होता है। जब इनका कुनबा शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं से दूर रहकर काम करता है, तो गांव में पूंजी का प्रवाह बनता है। लाॅकडाउन ने मेराज़ भाई जैसे बुनकर मज़दूरों को न सिर्फ घरों और गांवों में लाॅक कर दिया है, बल्कि इनके रोज़ी-रोटी पर भी तालाबंदी कर दी है। हालांकि मेराज भाई अपनी बाइक से सामान पहुंचाने का बड़ा ख़तरा उठाते रहे हैं। लेकिन लाॅकडाउन की आपात परिस्थिति ने उससे भी बड़ा खतरा पैदा कर दिया है। यह ख़तरा है आजीविका का। जिस पर संकट के बादल मंडला रहे हैं।

सूलपुर उन गांवों में है, जहां बुनकर मज़दूरों का ताना-बाना ही ज़िन्दगी की पहली और आखि़री उम्मीद है। लाॅकडाउन में हथकरघे बंद पड़े हैं। ऐसे में मेराज अंसारी जैसे बुनकर मज़दूरों को न तो बुनकरी का काम करना पड़ रहा है और न ही हथकरघा पर तैयार सामान बाज़ार तक पहुंचाने का काम करना पड़ रहा है। लेकिन मज़दूर काम न करे, तो ज़िन्दगी बोझ बन जाती है। वो ख़तरा न उठाए तो खाने को लाले पड़ जाते हैं। अभावों का जीवन जीने वाले मज़दूर लाॅकडान का सामना जिस साहस से कर रहे हैं, वो वाकई लाजवाब है। उधर दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े-बड़े शहरों से प्रवासी मज़दूर साइकिल और पैदल ही हज़ारों मील दूर अपने घरों के लिए रवाना होने का हौसला दिखा रहे हैं, तो इधर गांवों में बहुत से मज़दूर बिना अर्थ के ही पेट के अर्थशास्त्र के साथ तालमेल बनाने का नज़ीर पेश कर रहे हैं। मज़दूरों के धैर्य, संयम और अनुशासन की इससे बड़ी परीक्षा और क्या हो सकती है?

लाॅकडाउन की अवधि में आवश्यक सेवाओं को जारी रखने की अनुमति है। हम जानते हैं कि हर सेवा के तार किसी न किसी तरह पेट से जुड़े होते हैं। खाद्यान्न आपूर्ति, साग-सब्जी, गैस सप्लाई और किराने की दुकानों को खोलने की अनुमति इसी उद्देश्य से है। लेकिन मेराज अंसारी जैसे बुनकर मज़दूरों के लिए खाद्यान्न आपूर्ति को छोड़कर अन्य सभी सेवाओं का कोई मतलब नहीं है। मेराज अंसारी बताते हैं कि बाज़ार जाने के लिए पैसे चाहिएं। जो उनके पास नहीं हैं। उन जैसे मज़दूरों के लिए बैंक का खुलना-बंद होना भी बेमानी है। उनके पास कोई बैंक बैलेन्स नहीं है और न ही किसी योजना के तहत सरकार की ओर से कोई धनराशि उनके खाते में भेजी गयी है।

गांव का अर्थशास्त्र समझने के लिए गांव के लोगों से संवाद और उनकी जीवन शैली को समझना जरूरी है। मेराज अंसारी बताते हैं कि ‘जो लोग कपड़ा बुनकर आजीविका अर्जित करते हैं, या मज़दूरी करके दो जून की रोटी जुटाते हैं, उनके हाथ खाली हैं। गेंहू और चावल तो राशन से मिल रहा है। लेकिन साग-सब्जी खरीदने के लिए पैसा चाहिए। तबियत खराब हो जाए, तो इलाज के लिए पैसे चाहिए। रोज़मर्रा ज़रूरत की वस्तुओं के लिए किराना के दुकान पर जाना हो, तो बिना पैसे कैसे जाया जाय? यह बात समझ से परे है। कोई उधार भी दे, तो कैसे दे? उधार मांगा जाए तो, किससे और कब तक?’ मेराज अंसारी जैसे मज़दूरों की बातें सुनकर अंदाज़ा होता है कि गांव के किराना वाले का अर्थतंत्र भी पूंजी के बहाव में बह जाने के कगार पर पहुंच गया है। इन दिनों गांव के लोग महामारी की आपात परिस्थिति से उपजी इन समस्याओं से जूझ रहे हैं। मज़दूर काम पर नहीं जा रहे हैं। रोज़ कमाने वाले-खाने वाले मज़दूरों के सामने जीवन और मृत्यु का संकट मंडला रहा है। राशन का अनाज बिना तेल-नमक, आलू-प्याज, दाल और मिर्च-मसाले के कैसे खाया जाता है, यह मज़दूर ही जानता है। रसूलपुर गांव के लगभग ज़्यादातर परिवारों की आजीविका मज़दूरी पर ही निर्भर है। रोज-कमाने खाने की प्रक्रिया में शामिल मज़दूरों में कोई लूम चलाता है, कोई बुनाई करता है, कोई गारा-माटी करता है, तो कोई खेत मज़दूर है। इनमें हर परिवार की महिलाएं भी काम करती है। बच्चे भी अपने घर के काम में सहायक की भूमिका निभाते हैं। यदि पूरा परिवार एक इकाई की तरह काम न करे, तो खाए बिना मरने की नौबतें पैदा हो सकती हैं। यह समय लाॅकडाउन की आपात परिस्थिति का है। मज़दूरों के हाथ-पैर बंध से गए हैं।

नरेगा मज़दूरों के लिए राहत की बात है। उनके लिए काम का आवंटन हो रहा है। उनके खाते में पैसे आना भी उनके लिए बड़ी राहत का सबब है। लेकिन बहुत से मज़दूर और उनका परिवार पात्र होते हुए भी मनरेगा जाब काॅर्ड या श्रमिक सन्निर्माण मजदूर की पहचान से वंचित है। इस वजह से ऐसे मज़दूर 1000 रूपए के मुख्यमंत्री राहत राशि से भी वंचित हैं। मेराज अंसारी की बात करें तो, ये बुनकर मज़दूर हैं। इसलिए मनरेगा और श्रमिक सन्निर्माण मज़दूर की पहचान से वंचित हैं। समाज सेवी संस्थाओं द्वारा मदद के तौर पर भोजन का पैकेट पहुंचाए जाने की खबरें टीवी स्क्रीन और अख़बारों का हिस्सा ज़रूर बन रही हैं। लेकिन रसूलपुर गांव की बात करें, तो अभी तक यह गांव ऐसी किसी मदद से अछूता है। गांव के लोग सरकार की ओर मुंह किए मदद के इंतेज़ार में हैं।

मेराज अंसारी इस बात से भी चिन्तित हैं कि मैं उनके गांव की कहानी सुधी जनों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा हूं, तो इससे गांव के लोगों के समक्ष विशेषकर मेराज अंसारी को किसी तरह की समस्या का सामना तो नहीं करना पड़ेगा। इस बात को दृष्टिगत रखते हुए यह बताना भी ज़रूरी है कि इस आलेख का उद्देश्य सामाजिक व सामुदायिक जीवन में बेहतरी के प्रयासों में सहभागी बनना है। न कि डर का मनोविज्ञान तैयार करना या किसी व्यक्ति या संस्था की कार्यशैली की बुराई करना है।



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नोटः यह लेख उत्तर प्रदेश के जिला ग़ाज़ीपुर स्थित रसूलपुर गांव के पुराने अनुभवों और लाॅकडाउन के दौरान क्रमशः 12, 13 और 15 मई 2020 को बुनकर मज़दूर मेराज अंसारी से हुई विशेष बातचीत पर आधारित है।

Monday, April 13, 2020

मुश्किल वक्त के इन साथियों को भी सलाम

ये वो लोग हैं, जो दूसरों के लिए अपने घरों से बाहर रहते हैं। हमारे-आपके बीच आते-जाते रहते हैं। लेकिन हमेशा से अदृश्य रहे हैं। ये लोग मज़दूर हैं, मजबूर हैं और शिक्षा से दूर हैं। ये वो लोग हैं जो अपनी सेवाएं उपलब्ध कराने की एवज में फोटो नहीं खिंचाते। इन लोगों के लिए भी आभार, धन्यवाद और सैल्यूट तो बनता ही है।

इन दिनों पूरा देश कोविड-19 के संक्रमण के फैलाव को रोकने के लिए लाॅकडाउन की आपात स्थिति में है। संक्रमण लगातार बढ़ रहा है। हज़ारों लोग कोरैंटीन और आइसोलेसन में हैं। बहुत से लोग ऐसे हैं, जो संक्रमित नहीं हैं। लेकिन ज़रा सी चूक इन्हें संक्रमण का शिकार बना सकती है। इनमें गरीब, मज़दूर, किसान हैं। बड़ी तादाद उन सुविधा प्रदाताओं की है, जिनका ठेला हर रोज़ हमारे घरों की दहलीज पर आ खड़ा होता है। कभी ‘सब्जी वाला, कभी साग वाला, कभी आलू, प्याज और टमाटर वाला बनकर। इनमें फल विक्रेता होते हैं। जो हमारे-आप के लिए कभी अमरूद ले आते हैं, कभी तो केला, सेव और सन्तरा। हम इन्हें चाट वाले, चाय वाले, चाउमिन वाले, चनाचूर वाले, फुल्की वाले, भुजा वाले और सोन पापड़ी वाले के रूप में भी देखते हैं। ये वही लोग हैं जो अपनी सेवाएं हम तक हर रोज़ पहुंचाते हैं। इन्हें पैदल, गली-गली घूमना पड़ता है। ताकि दो जून की रोटी का जुगाड़ हो सके। सामान्य दिनों में चिलचिलाती धूप में खीरा, तरबूज़ और कुल्फी की ठण्डक का एहसास इन्हीं लोगों की बदौलत कर पाते हैं। गर्मी के दिनों में जब लू से बचने के लिए लोग अपने-अपने घरों में पंखे, कूलर और एसी कमरों में होते हैं, तो ये लोग सड़कांे और गलियों की ख़ाक छानते रहते हैं। बीमार पड़ने पर दस-बीस रूपए की स्वास्थ्य सुविधाओं से काम चलाना पड़ता है। दो-चार दिन काम बंद हो जाए तो इनके सामने भूखे रहने की भी परिस्थितियां पैदा हो जाती हैं। इस समय पूरा देश लाॅकडाउन की आपात परिस्थिति में है। रोज़ कमाने-खाने वाले इन अस्थाई ठेले वालों के लिए यह परिस्थिति किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। सोशल और फिजिकल दूरी बनाए रखना, बार-बार हाथ धुलना, फेस मास्क का इस्तेमाल इनके लिए सहज काम नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि संक्रमण का डर इन्हें नहीं है। लेकिन रोज कमाने-खाने की दिक्कतें ऐसी हैं कि यह डर कोई मायने नहीं रखता। हालात ऐसे हैं कि इन्हें घर-घर सब्जी, दूध, गैस सिलेण्डर और अन्य आवश्यक वस्तुएं पहुंचाने का बीड़ा उठाना पड़ रहा है। ठेले वालों और मज़दूरों के अर्थोपार्जन की प्रक्रिया रूक गयी है। चूंकि सब्जी और फल ज़रूरी वस्तुओं में शुमार है। इसका फायदा हर ग़रीब उठाना चाहता है। ताकि वो अपना परिवार चला सके। यही वजह है कि कोई चाट-पकौड़े वाला सब्जी बेच रहा है, तो किसी मज़दूर फल बेच जीवन चलाना पड़ रहा है। निस्संदेह इनकी आजीविका की आवश्यकताएं हैं। लेकिन इनके सेवा को कम करके नहीं देखा जा सकता है। क्योंकि ये वो लोग हैं जो महामारी की आपात परिस्थिति में साहस करके हम तक आलू, प्याज, लहसुन, अदरक, धनिया, पोदिना, नींबू और साग आदि पहुंचा रहे हैं। ताकि हमारे मुंह का ज़ायका न बिगड़ने पाए और हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बीमारी से लड़ने लायक बनी रहे। अनिल मेरे बचपन का दोस्त है। उसका छोटा भाई पप्पू चाट-पकौड़ा बेचकर घर चलाता है। इन दिनों जब हम और आप अपने-अपने घरों में हैं। पप्पू चेहरे पर मुस्कान लिए सब्जियां बेच रहा है। क्योंकि पप्पू के लिए आजीविका का संकट कोरोना से भी बड़ा है। फरीद मियां उन सब्जी विक्रेताओं में हैं, जिन्होंने हवा के खिलाफ जाकर सब्जी बेचने का बीड़ा उठाया है। इस काम में वो अकेले नहीं हैं। बच्चे को भी काम में हाथ बंटाना पड़ता है।

उन महिलाओं और बच्चियों का जिक्र भी ज़रूरी है, जो आपात परिस्थिति में घण्टे-दो घण्टे के लिए ही सही, सड़क किनारे सब्जी बेचते देखी जा रही हैं। फैयाज़ भाई बढ़ई का काम करते हैं। इन दिनों काम बंद है। एक पत्नी और तीन बच्चों का परिवार बड़ा नहीं है। लेकिन संकट के बादलों से पार पाना इनके लिए भी बड़ी चुनौती है। फैयाज़ भाई इस चुनौती का सामना साग-सब्जी जैसी आवश्यक वस्तुओं को घर-घर पहुंचाकर कर रहे हैं। अशरफ भाई पंचर बनाते हैं, लेकिन दुकान बंद है और इन दिनों ठेले पर सब्ज़ियां बेच जिन्दगी गुजर-बसर कर रहे हैं। राम नरायन कुशवाहा अहिरौली से पैदल ठेले पर सब्जी लेकर मुहम्मदाबाद आते हैं। कोविड-19 से डरे हुए हैं। लाॅकडाउन में पुलिसिया डण्डा भी खाया। लेकिन पेट का सवाल इनके लिए बहुत बड़ा सवाल है। मुंह पर देसी मास्क बांधे मुस्कराते हुए कहते हैं “कि पेटवा क का करल जा।”

निज़ामुद्दीन पहले पावरलूम कारीगर थे। भीवण्डी रहते थे। जिस घर की जिम्मेदारी निभाने के लिए भीवण्डी गए थे, उसी घर की जिम्मेदारियों ने जल्द ही उन्हें घर बुला लिया। उन्हें भिवण्डी छोड़े लगभग सात बरस हो चुके हैं। मेहनत मज़दूरी करके दिहाड़ी से अपना परिवार चलाते हैं। निर्माण कार्य रूका हुआ है। अपने परिवार का पेट पालने के लिए आजकल निज़ामुद्ीन मुहल्ले के लोगों और बाज़ार के बीच कड़ी के तौर पर काम कर रहे हैं। वो हर सुबह दो घण्टे तक अपने घर से बाहर रहकर मुहल्ले के लोगों का सामान-लाने, ले जाने का काम कर रहे हैं। बदले में जो कुछ मिलता है, उससे गुजारा कर रहे हैं। निज़ामुद्दीन सन्निर्माण श्रमिक में हैं लेकिन श्रम विभाग में उनका पंजीयन नहीं है। पंजीयन के लिए दो वर्ष पहले मैंने खु़द उन्हें प्रेरित किया था। उनका फार्म भी भरवा दिया था। लेकिन शिक्षा और जागरूकता न होने के कारण निज़ामुद्दीन जैसे मज़दूर अपनी पहचान से वंचित हैं। इसलिए ऐसे मज़दूर सरकार की ओर से दी जाने वाली 1000 रूपए की सहायता राशि से भी वंचित हैं। कोविड-19 के कारण लाॅकडाउन की इस परिस्थिति में गैस सिलेण्डर पहुंचाने वाले मेहनतकश मज़दूरों की सेवाएं भी काबि़ले तारीफ़ है। यदि ये सिलेण्डर घर-घर न पहुंचाएं तो बहुत से घरों में समय पर चूल्हा जलना मुश्किल हो जाएगा। सुबह-सवेरे दूध वाले दूध न दें तो दूध पीते बच्चों को भूखा रहना पड़ेगा।

दर असल ये वो साहसी लोग हैं, जो अपने परिवार की आजीविका के लिए सड़कों पर हैं। खासकर तब जब बाकी लोग संक्रमण से सुरक्षित रहने के लिए अपने-अपने घरों में हैं। रोज कमाने-खाने वाले ये लोग पहले से शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं। लेकिन आज की कठिन परिस्थिति में इनकी सेवाएं किसी डाॅक्टर, नर्स, पुलिस-प्रशासन और सामाजिक कार्यकर्ता से कम नहीं है। ये वो लोग हैं, जो दूसरों के लिए अपने घरों से बाहर रहते हैं। हमारे-आपके बीच आते-जाते रहते हैं। लेकिन हमेशा से अदृश्य रहे हैं। ये लोग मज़दूर हैं, मजबूर हैं और शिक्षा से दूर हैं। ये वो लोग हैं जो अपनी सेवाएं उपलब्ध कराने की एवज में फोटो नहीं खिंचाते। इन लोगों के लिए भी आभार, धन्यवाद और सैल्यूट तो बनता ही है।

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Saturday, April 4, 2020

कोविड-19 का उत्पादन, मांग और आपूर्ति पर प्रभाव


ह समय गंभीर है। इस समय को संवाद, संवेदना, धैर्य और अनुशासन से ही जिया और जीता जा सकता है। यह तो अर्थशास्त्री ही बता सकते हैं कि मंदी की ओर जाती अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर आने में कितना समय लगेगा। इसलिए आर्थिक धैर्य से काम लेना हर व्यक्ति के लिए इस समय की बड़ी ज़रूरत है। जैसे वस्तुओं के इस्तेमाल में अनुशासन बरतना। भोजन नष्ट न करना। यह आत्मसात करना कि हमारे ही जैसे हज़ारों गरीब बच्चे, बड़े, बूढ़े और महिलाएं अपनी कम भोजन कर रहे हैं या फिर भूखे रह रहे हैं। हमारी संवेदना ही हमें कोविड-19 और इससे पैदा हुई आर्थिक संकट से उबरने में मदद करेगी। लेकिन आर्थिक मोर्चे पर सरकार को अभिनव प्रयास करने होंगे।


दुनिया के सैंकड़ों देश इन दिनों कोविड-19 के संक्रमण का सामना कर रहे हैं। चीन, अमेरिका, इटली, फ्रांस, स्पेन और जर्मनी आदि देशों में इस महामारी के कारण हज़ारों लोगों को जान गंवानी पड़ी है। कई देशों को जीवन और मृत्यु के बीच लाॅकडाउन की सीमा रेखा खींचनी पड़ी है। भारत भी इस संक्रमण के साए में है। ये अलग बात है कि यहां पर संक्रमण अमेरिका और यूरोपीय देशों की तरह नहीं फैला है। लेकिन संक्रमित मरीज़ों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। सरकार के बार-बार अपील करने और प्रशासन की सक्रियता का असर दिख भी रहा है। कुछ संवेदनहीन और लापरवाह लोगों को छोड़कर बाकी सभी लोग घरों में हैं। दुनियाभर के डाॅक्टर, नर्स प्रशासनिक और सामाजिक सेवा से जुड़े व्यक्ति युद्ध स्तर पर काम कर रहे हैं। सब्जी वाले, किराना स्टोर वाले, दूध वाले और रसोई ईंधन वाले भी अपनी जान जोखि़म में डाल कर दूसरे के घरों तक आवश्यक वस्तुएं पहुंचा रहे हैं। एक तरह से पूरी मानवता परीक्षा के कठिन दौर से गुज़र रही है। देखना यह है कि इस परीक्षा में सफलता कब प्राप्त होती है। चीन की बात करें, तो वहां पर संक्रमण कम होने की ख़बरें हैं। लेकिन दुनिया के शेष देशों से कोई सुखद समाचार नहीं आ रहा है। विशेषज्ञों की राय है कि अमेरिका और यूरोपीय देशों को अपनी लापरवाही का खामियाज़ा चुकाना पड़ रहा है। ऐसी आशंकाएं भी व्यक्त की जा रही हैं कि भारत जैसे देश को भी लापरवाही की कीमत चुकानी पड़ सकती है। बहरहाल, हर संकट समाधान ले कर आता है। हालांकि कोविड-19 लाइलाज है। फिर भी सोशल डिस्टैन्सिंग, बार-बार हाथ धुलना, मास्क लगाना, चेहरे पर बार-बार हाथ न ले जाना, मुंह में, नांक में हाथ न डालना आदि सुरक्षा उपायों में ही फिलहाल इस संकट का समाधान छुपा है। कम से कम कोविड-19 संक्रमण की दवा की खोज होने तक या इस संक्रमण के स्वतः समाप्त होने तक इन उपायों को अपनाए रखना होगा।

हामारी के समय में जब घरों में बंद रहना पड़ता है, तो जीवन बहुत मुश्किल और नीरस हो जाता है। लेकिन मानव सभ्यता के इतिहास में शायद ही कोई संकट ऐसा आया हो जब एक दूसरे की मदद के लिए लोग आगे न आए हों। यहां तक कि जन सेवा में लोगों की जान भी चली जाती है। कोविड-19 संक्रमण से लोगों की जान बचाने की कवायद में लगे सैंकड़ों डाॅक्टरों की मौत हो चुकी है। संकट का समय मनुष्य के मानव स्वाभाव की परीक्षा का भी समय होता है। इन दिनों भारत के विभिन्न राज्यों में बहुत से लोग यथा स्थिति में रहने को विवश हैं। सरकारों के साथ-साथ सामाजिक संस्थाएं गरीबों, भूखों और बेसहारा लोगों की मदद कर रहे हैं। यह ज़रूरी भी है। क्योंकि हर गरीब कहीं न कहीं उत्पादन की प्रक्रिया में एक किसान, मज़दूर और सेवा प्रदाता के रूप सकल घरेलू उत्पाद में अपना योगदान देता है। लेकिन इनके जीवन में स्थायित्व नहीं होता है। जो लोग आर्थिक रूप से समृद्ध हैं, वो हर परिस्थिति का सामना कर लेते हैं। लेकिन रोज कमाने-खाने वाले गरीब किसानों और मज़दूरों के लिए कोई भी आपात स्थिति कठिनाइयों भरी होती है। बहुत से घरों में चूल्हे नहीं जल पाते हैं। इन्हें कई-कई वक्त भूखे रहना पड़ता है।

न मज़दूरों का ज़िक्र ज़रूरी है, जो घर से दूर दिल्ली, मुम्बई, भिवन्डी, कोलकता, हैदराबाद, सूरत, अहमदाबाद, लुधियाना, रूद्रपुर, मेरठ, मुज़फ्फरनगर, गाज़ियाबाद, आगरा, पानीपत, फरीदाबाद, गुड़गांव, आदि शहरों में रहते हैं। मज़दूरों का अपने घर-परिवार और गांव-कस्बे से दूर बड़े-बड़े शहरों में स्थित बड़े-बड़े कल-कारखानों में काम करना दो बातें उजागर करता है। पहला यह कि मज़दूर अपने परिवार से दूर रह कर जो आजीविका अर्जित करता है, वही आजीविका गांव-कस्बे में रहकर अर्जित करना संभव नहीं होता है। क्योंकि गांव की अर्थव्यवस्था औद्योगिक नगरों से छोटी और कमज़ोर होती है।

ज़ाहिर है मज़दूरों की आर्थिक आवश्यकताएं पलायन का मुख्य कारणों में है। जिसका ज़िक्र अक्सर होता रहता है। मज़दूरों के पलायन का दूसरा पहलू यह है कि मज़दूर सिर्फ अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बड़े शहरों की ओर पलायन नहीं करते हैं। दर असल उनकी स्थिति उत्पादन की प्रक्रिया में मूल ईकाई की तरह होती है। बात खेती-किसानी की हो, उद्योग-धंधों की हो या कल-कारखानों की। हर जगह मज़दूर श्रम का योगदान करते हैं। जिसके बदले में उन्हें पारिश्रमिक मिलता है। कुछ काम हैं, जिसके बंद होने से नियोक्ता और उपभोक्ता पर तत्काल कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ता है। लेकिन मज़दूर का हित तुरंत प्रभावित होता है। बहुत से काम ऐसे हैं, जिसमें नियोजित मज़दूर यदि काम बन्द कर दें, तो उत्पादन, मांग और पूर्ति में असंतुलन जल्द ही ज़ाहिर होने लगते हैं। किसान के उदाहरण से उत्पादन, मांग और पूर्ति के आपसी संबंध को समझा जा सकता है। यदि किसी कारणवश किसान अन्न उत्पादन की प्रक्रिया से अलग हो जाएं, तो दुनिया के समक्ष खाद्यान्न संकट पैदा हो सकता है। इसी तरह यदि कल-कारखानों में मज़दूर काम करना बंद कर दें, तो उपभोक्ताओं के समक्ष आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित हो सकती है। वस्तुओं की मांग और आपूर्ति में संतुलन उत्पादन की प्रक्रिया के सुचारू रूप से गतिमान रहने पर बना रहता है। उत्पादन की प्रक्रिया इसमें शामिल व्यक्तियों पर निर्भर करता है।

चूंकि इस समय देश 21 दिनों के लाॅकडाउन की आपात परिस्थिति से गुज़र रहा है। इसलिए यह विचार करना ज़रूरी है कि इस दौरान खाद्यान्न और अन्य मूलभूत ज़रूरी वस्तुओं के उत्पादन, मांग और आपूर्ति की क्या स्थिति है। किसी भी आपात परिस्थिति में उपलब्ध संसाधनों का सही नियोजन सुनिश्चित करना शासन-प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती होती है। जैसा कि इस समय देखा जा सकता है। सरकार ने खाद्य पदार्थों का गैर ज़रूरी भण्डारण न करने का निर्देश दिया है। सरकारी सस्ते गल्ले के वितरण केन्द्रों (राशन की दुकानों) पर पात्र गृहस्ती के कार्ड धारकों को समय से खाद्यान्न वितरण सुनिश्चित करने के लिए भी विशेष निर्देश जारी किए गए हैं। रसोई ईंधन (एलपीजी) की होम डिलिवरी पहले से कहीं बेहतर नज़र आ रही है। शासन-प्रशासन जिस प्रतिबद्धता से लाूकडाउन में जन सुविधाओं को सुचारू बनाए रखने की कोशिशों को अंजाम दे रही है, आपात परिस्थिति में गरीबों के लिए बड़ी राहत है। यह तभी तक संभव है, जब तक सरकार के पास इन वस्तुओं का पर्याप्त भण्डार उपलब्ध रहेगा। बात करते हैं उन लोगों की जो मध्य या उच्च वर्ग में आते हैं। इन लोगों के पास अपनी क्रय शक्ति है। जिसके अनुसार इस वर्ग के लोग ज़रूरी खाद्य पदार्थ खरीद सकते हैं। लेकिन यदि लाॅकडाउन को आगे बढ़ाना पड़ा तो इस वर्ग के लोगों के पास मज़बूत क्रय शक्ति होने के बाद भी इनके खाद्याान्न से वंचित रहने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। क्योंकि आपूर्ति बाधित होने का मतलब है कोई वस्तु एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं पहुंचना। यद्यपि जरूरी सेवाओं की पहुंच को सुगम बनाने के प्रयास युद्ध स्तर पर चल रहे हैं। फिर भी भविष्य आने वाले समय में यह चिन्ता का एक बड़ा विषय होगा। इस पर विचार करने की आवश्यकता है। ऐसा इसलिए भी संभव है, क्योंकि आपात परिस्थिति में उत्पादन की कई बड़ी इकाइयों में उत्पादन ठप्प पड़ गया है।

हालांकि किसानों के समक्ष वो समस्या नहीं है, जो खाद्य सामग्री के विनिर्माण उद्योग के समक्ष है। साग-सब्जी की आपूर्ति सुचारू रूप से चल रही है और आगे भी जारी रहेगी। लेकिन जो द्वितीयक उत्पाद हैं। जिसे हम पैक्ड आइटम हैं के रूप में बाज़ार से खरीदते हैं, उनका उत्पादन और आपूर्ति अवश्य बाधित होगी। इससे भी बड़ी चुनौती होगी आम जन की सोच से लड़ना। जब भी आपात परिस्थितियां पैदा होती हैं, अधिशेष भण्डारण एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आती है। इसकी वजह से आपूर्ति प्रभावित होती है और कीमतें भी आसमान छूने लगती हैं। पिछले कुछ वर्षाें प्याज और टमाटर का अनुभव कुछ ऐसा ही रहा है। मनुष्य के सोच और स्वभाव में सिर्फ भण्डारण ही नहीं है बल्कि विषम परिस्थितियों में ‘मेरा भला, तो जग भला’ की प्रवृत्ति है। यह प्रवृत्ति दो रूपों में अभिव्यक्त होती है। एक तरफ विक्रेता अधिक लाभ कमाने के लिए आवश्यक वस्तुओं का भण्डारण करता है। तो दूसरी ओर उपभोक्ताओं में मज़बूत क्रय शक्ति वाले लोग एक ही बार में पूरा बाज़ार खरीद लेने के लिए लालायित रहते हैं। यदि लोगों तक मांग और आपूर्ति की सही जानकारी नहीं पहुंचती है, तो लाॅकडाउन के बाद इस तरह की परिस्थिति पैदा हो सकती हैं। यह काम इसलिए भी कठिन प्रतीत होता है क्योंकि अभी बहुत से लोग ऐसे हैं, जो माननीय प्रधानमंत्री जी के हाथ जोड़कर विनय करने पर भी घर में रहने का संयम और अनुशासन नहीं दिखा रहे हैं। ये वही लोग हैं जो एक कड़ी तोड़ कर पूरा माला बिखेर देते हैं। यदि समय रहते स्थानीय स्तर पर मांग और आपूर्ति की वस्तु स्थिति का पता लगा लिया जाए, तो आने वाले समय में व्यक्ति और बाज़ार की क्रियाओं में किसी हंगामी परिस्थिति के पैदा होने से बचा जा सकता है।

ह समय गंभीर है। इस समय को संवाद, संवेदना, धैर्य और अनुशासन से ही जिया और जीता जा सकता है। यह तो अर्थशास्त्री ही बता सकते हैं कि मंदी की ओर जाती अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर आने में कितना समय लगेगा। इसलिए आर्थिक धैर्य से काम लेना हर व्यक्ति के लिए इस समय की बड़ी ज़रूरत है। जैसे वस्तुओं के इस्तेमाल में अनुशासन बरतना। भोजन नष्ट न करना। यह आत्मसात करना कि हमारे ही जैसे हज़ारों गरीब बच्चे, बड़े, बूढ़े और महिलाएं अपनी कम भोजन कर रहे हैं या फिर भूखे रह रहे हैं। हमारी संवेदना ही हमें कोविड-19 और इससे पैदा हुई आर्थिक संकट से उबरने में मदद करेगी। लेकिन आर्थिक मोर्चे पर सरकार को अभिनव प्रयास करने होंगे।
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Thursday, January 10, 2019

आरक्षण की मूल भावना को समझना होगा

......बुनियादी स्तर पर आरक्षण के मूल मंतव्य को समझना होगा। अधिक शिक्षित और सम्मानित लोगों की जिम्मेदारी भी अधिक होती है। एक बेहतर और प्रगतिशील समाज के निर्माण में ऐसे लोगों की भूमिका भी अधिक होती है। ऐसे लोगों को इस सच्चाई से रूबरू होना होगा कि देश से प्रतिभा पलायन का कारण आरक्षण नहीं है। बी.पी.ओ. के माध्यम से भारत की युवा प्रतिभाओं का खून चूसने का काम आरक्षण की व्यवस्था नहीं कर रही है और न ही युवा भारतीयों के सपनों को काल सेन्टरों के केबिनों तक सीमित करने का काम ही आरक्षण कर रहा है। वास्तविकता यह है कि ........
Published in Shilpkar Times, New Delhi, Issue: 16-31 July 2011


विविधता और विभिन्नता प्रधान हमारे देश में सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना अभी भी व्यवस्थापिका और न्यायपालिका की प्रमुख चुनौतियों में से एक है। राजधानी के तीन प्रमुख विश्वविद्यालयों में इन दिनों सामाजिक न्याय की मुहिम चल रही है। जामिया में माइनारिटी स्टेटस और मुस्लिम रिजर्वेशन, डी॰यू॰ और जे॰एन॰यू॰ में प्रवेश और नियुक्ति में ओ॰बी॰सी॰ आरक्षण का ध्यान न रखा जाना बहस का मुद्दा बना हुआ है। जाहिर है बुनियादी सवाल संवैधानिक उपबंधों के उल्लंघन का है। लेकिन आरक्षण का जिक्र होते ही जाति आधारित भेदभाव और मेरिट-डिमेरिट जैसे मुद्दे बहस के केन्द्र में आ जाते हैं। आरक्षण के पक्ष और विपक्ष में तर्कों के तीर चलने लगते हैं। बाजारपरस्त एज आफ ग्लोबल कम्पटीशन के हिमायती भी इस बहस में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। कहते नहीं थकते कि प्रतिस्पर्धा का आधार योग्यता, मेरिट और दक्षता है न कि जाति। लेकिन बुद्धिजीवियों का एक खेमा यह कहता है कि सवाल दक्षता, योग्यता और मेरिट का नहीं बल्कि अवसर का है। सन् 2005-06 में जब यूपीए सरकार ने निजी क्षेत्र में अनुसूचित जाति/जनजाति आरक्षण का शगूफा छोड़ा था तब भी और इससे पहले जब मण्डल आयोग की सिफारिशें लागू हुईं थीं तब भी छात्रों का एक बड़ा हिस्सा विरोध में आंदोलित हो उठा था। जामिया का मामला माइनारिटी स्टेटस से जुड़ा है। इसलिए इस पर अलग से बात की जाएगी। फिलहाल बात करते हैं आरक्षण की नीति, आरक्षण की राजनीति और आरक्षण की मूल भावना की।
मामला पब्लिक सेक्टर का हो या प्राइवेट सेक्टर का पहले तो विरोधी के तेवर विरोध तक सीमित थे लेकिन जे॰एन॰यू॰ और डी॰यू॰ के मामलों में यह तेवर कानून की और संवैधानिक उपबंधों में निहित सामाजिक मर्यादा की भावना के उल्लंघन और मर्माहत करने का है। कम से कम प्रगतिशील विचारों के पोषक लोगों और संस्थाओं से तो यह अपेक्षा की ही जानी चाहिए कि अवसरों से वंचित लोगों को मुख्य धारा में शामिल करने के मुहिम का हिस्सा बनें न कि छद्म प्रगतिशील आदर्शों के व्याख्याता। बात उन लोगों की भी जो यह समझते हैं कि रिजर्वेशन के कारण उनका हक मारा जा रहा है। दरअसल रिजर्वेशन की मूल भावना सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन है। ये बात अलग है कि ‘द पाॅलिसी आॅफ रिजर्वेशन’ ‘द पाॅलिटिक्स आॅफ रिजर्वेशन’ में बदल गयी। जबकि शैक्षिक-सामाजिक पिछड़ेपन का सवाल पीछे छूटता गया। लेकिन यह सब अचानक नहीं हुआ है। इस होने में भी काफी वक्त लगा है। अच्छी बात यह है कि तमाम विकृतियों और दिशाहीनता के बाद भी सामाजिक न्याय के लिए लोग पहले से कहीं अधिक संख्या में आवाज उठा रहे हैं। भीड़तंत्र में ही सही लोकतंात्रिक आवाजें उठाई जा रही हैं। ये बात अलग है कि कारपोरेट मीडिया के लिए कौन से सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विषय पाॅपुलर न्यूज स्टोरी हैं या नहीं। यही वजह है कि फारबिसगंज की हालया फायरिंग पर मीडिया कवरेज में देर हो जाती है।
शिक्षा हेतु बुनियादी सुविधाओं को हर व्यक्ति तक पहुंचाया जाना चाहिए। सर्व शिक्षा अभियान के तहत वजीफा, ड्रेस, किताबें और मध्यान्ह भोजन को इस तरह की सुविधा में शामिल किया जा सकता है। लेकिन उस सामाजिक बुराई को कैसे समाप्त किया जाए जिसके कारण मिड डे मिल बनाने वाली दलित और पिछड़ी जाति की महिलाओं द्वारा बनाए गए खाना को अबोध बालकों ने खाने से इंकार कर दिया हो। क्या यह इनक्रेडिबल इंडिया के लिए मुंह चिढ़ाने जैसी घटना नहीं है।
मुद्दा सामाजिक सम्मान का है। जो लोग बार-बार प्रतिभा की दुहाई देकर आरक्षण का विरोध करते हैं, जिनमें खुद पिछड़ों की भी अच्छी-खासी तादाद है, को जानकारी होनी चाहिए कि 90 के दशक में जब ओ॰बी॰सी॰ आरक्षण लागू हुआ था, उस समय विरोध करने वालों में एक समूह ऐसा भी था जिसने विरोध भी किया और फर्जी प्रमाण पत्र बनवाकर कहीं एडमिशन में लाभ उठाया तो कहीं नौकरियों में। ये बात अलग है कि सबूत नहीं है और न ही स्ट्रींग आपरेशन की कोई फुटेज। आम धारणा है कि हर व्यक्ति में प्रतिभा एक समान नहीं होती है। यह ईश्वर प्रदत्त गुण है जो कुछ विशेष लोगों में होता है और इसीलिए आरक्षण या किसी भी पाॅजीटिव डिस्क्रिमीनेशन जैसे उपाय से प्रतिभा का अनादर या इसे हतोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए। यह एक स्थापित तर्क है जिससे किसी भी व्यक्ति की सहमति स्वाभाविक है। लेकिन साइंस और टेक्नोलाजी के मौजूदा दौर में जब व्यक्ति हर चीज की परत दर परत जांच-पड़ताल करने के बाद किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुंच रहा है, तो लेहाजा प्रतिभा से संबंधित संस्थागत धारणा की पड़ताल भी होनी चाहिए। इस क्रम में जब हम इतिहास का अवलोकन करते हैं तो यही पाते हैं कि समाजिक स्तरीकरण के लिहाज से भारत में जो विषंगतियां व्याप्त हैं वो ईश्वर प्रदत्त नहीं बल्कि सामजिक विकास के क्रम में एक ऐतिहासिक घटना से अनुप्राणित हैं। जब प्राचीन काल में लोहे के प्रयोग से समाज के एक तबके का वर्चस्व अन्य तबकों पर स्थापित हो गया तब इस तबके के लोग हर उस काम काम को अंजाम देने लगे जिससे सामाजिक असमानता की खाई बढ़ती गयी। इस तबके को समय-समय पर पुरोहित वर्ग वैधता का प्रमाण पत्र देकर सदा ही इनके और अपने हितों का पोषण करता रहा। इस तरह इन दोनों वर्गों की मिली भगत ने वर्ण व्यवस्था को जन-जन के मन में, व्यवहार में, संस्कार में, यहां तक कि उनकी आत्मा में कुछ इस तरह स्थापित किया कि दलित-पिछड़ा तबका सामाजिक रूप से भद्र जनों की सेवा को ईश्वरीय आज्ञा और अपना धर्म समझता रहा। इन सच्चाइयों को अगर और करीब से महसूस करना है तो वैदिक और गुप्त कालीन ऐतिहासिक ग्रंथों को पढ़ना होगा। कालीदास के एक ग्रंथ में तो भाषा के अनुसार सामाजिक स्तरीकरण का उल्लेख हुआ है। जहां संभ्रांत लोग संस्कृत और नीचे के लोग अपभ्रंश बोलते हैं।
हरहाल तुर्कों और मुगलों के शासन काल में भारत में इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए नई संभावनाएं बनीं। इस्लाम ने यहां भी अपने मूल तत्व ‘‘एकता ओर समानता’’ का बिगुल फूंका। प्रभाव स्वरूप बड़े पैमाने पर दबे कुचले और पिछड़े लोगों ने भेदभावमूलक ब्राम्हणवादी व्यवस्था को त्यागकर इस्लाम स्वीकार कर लिया। ज्ञात हो कि छठीं शताब्दी ई॰पू॰ महात्मा बुद्ध और महावीर जैन ने भी समतामूलक समाज के निर्माण और विकास के लिए अथक प्रयास किए थे। बहरहाल, तुर्कों और मुगलों के दौर में सामाजिक सम्मान की आस में जिन पिछड़ों ने धर्म परिवर्तन किया उन्हें धार्मिक समानता तो मिली, लेकिन इतिहास और वर्तमान दोनों ही गवाह हैं कि वो लोग आज भी सामाजिक समानता और सम्मान से कोसों दूर हैं।
गौरतलब है कि आजादी के बाद राष्ट्रपति के अध्यादेश द्वारा अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए आरक्षण का संवैधानिक उपबंध किया गया। लेकिन संविधान का अनुच्छेद 341 में संशोधन न होना धर्म आधारित भेदभाव को मूक सहमति देने जैसा है। अनुच्छेद 341 के अनुसार कोई भी दलित वर्ग का व्यक्ति यदि धर्म परिवर्तन करके मुस्लिम या ईसाई बन जाता है तो वह आरक्षण का लाभ नहीं प्राप्त कर सकता। मुमकिन है संविधान निर्माताओं ने इस्लाम के ‘‘समानता और एकता’’ की मूल भावना को मद्देनजर रखते हुए अनुच्छेद 341 के उपबंध को स्वीकृती दी हो। लेकिन आजादी के 63 साल बाद भी यह नहीं माना जा सकता कि जिन लोगों ने हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध या जैन धर्म अपना लिया हो उनकी सामाजिक सिथति या उनके प्रति उच्च जातियों के लोगों का सामाजिक व्यवहार जैसे का तैसा है। जिसके आधार पर ये लोग आज भी आरक्षण के अधिकारी हैं। दूसरी तरफ यह भी विश्वास से परे है कि जो लोग इस्लाम या ईसाई धर्म अपना लिए हों उन्हें अचानक ही सामाजिक समानता का दर्जा मिल गया हो और उन्हें आरक्षण के योग्य नहीं समझा जाए।
जाहिर है प्रतिभा एक तरह का मैन मेड स्थापित संस्थागत धारणा है। कोई भी प्रगतिशील समाज मानव निर्मित सामाजिक भेदभाव पर आधारित परंपरा, सिद्धांत, व्यवहार और मूल्य को अधिक समय तक बर्दाश्त नहीं कर सकता है। जहां तक प्रतिभा की दुहाई देने वालों की बात है तो उनको बुनियादी स्तर पर आरक्षण के मूल मंतव्य को समझना होगा। अधिक शिक्षित और सम्मानित लोगों की जिम्मेदारी भी अधिक होती है। एक बेहतर और प्रगतिशील समाज के निर्माण में ऐसे लोगों की भूमिका भी अधिक होती है। ऐसे लोगों को इस सच्चाई से रूबरू होना होगा कि देश से प्रतिभा पलायन का कारण आरक्षण नहीं है। बी.पी.ओ. के माध्यम से भारत की युवा प्रतिभाओं का खून चूसने का काम आरक्षण की व्यवस्था नहीं कर रही है और न ही युवा भारतीयों के सपनों को काल सेन्टरों के केबिनों तक सीमित करने का काम ही आरक्षण कर रहा है। वास्तविकता यह है कि नई आर्थिक व्यवस्था ने पिछले लगभग बीस बरसों में हमारे देश में विकास के पहिए को उस दिशा में घुमा दिया है जहां जीवन का अर्थ बनावटीपन के सिवा कुछ नहीं। नई आर्थिक नीति ने हमारे रगों में उपभोक्तावादी चरित्र और सुविधाभोगी मानसिकता का संचार किया है।
ज हममें से हर कोई नई माॅडल की गाड़ी, फ्रीज, मोबाइल और बर्गर, पिज्जा व कोला का भोग करना चाहता है। हम अपनी आवश्यकताओं और प्राथमिकताओं को अपनी क्षमता के अनुरूप तय नहीं कर रहे हैं बल्कि मल्टीनेशनल्स तय कर रही हैं। ऐसे में पूंजी आधारित सामाजिक असमानता का ग्राफ दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है। फलस्वरूप एक तरफ प्रतिभा पलायन और उनके शोषण की प्रवृत्ति नित नए तेवरों में बढ़ रही है तो दूसरी तरफ निजीकरण की बयार से सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए बचा खुचा अवसर भी समाप्त होता जा रहा है। यही वजह है कि 2005-06 में आरक्षण की सियासत करने वालों ने निजी क्षेत्र की नौकरियों और उच्च शिक्षा में आरक्षण का शगूफा छोड़ा था। सवाल यह है कि पहले से उपलब्ध आरक्षण की व्यवस्था को हम सही रूप में लागू नहीं करा पा रहे हैं तो इस क्षेत्र में नई व्यवस्था को कहां तक लागू किया जा सकेगा।

Wednesday, September 27, 2017

बुनियादी शिक्षा में सुरक्षा के सरोकार: व्यक्ति, समाज और सरकार


शिक्षक दिवस के ठीक दो दिन बाद 8 सितम्बर 2017 अन्तर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस की सुबह हरियाणा के गुरूग्राम स्थित एक प्रतिष्ठित निजी स्कूल में कक्षा दो में पढ़ने वाले एक बच्चे की हत्या हुई। खबरों में यौन अपराध को हत्या का कारण बताया गया। आरोपी बस कन्डक्टर को गिरफ्तार कर लिया गया। अभिभावकों ने बड़ी संख्या में स्कूल के सामने विरोध-प्रदर्शन और तोड़फोड़ करके अपने गुस्से का इजहार किया। स्कूल की प्रिन्सिपल को सस्पेन्ड कर दिया गया और मांग करने वालों ने स्कूल को अविलम्ब बन्द करने की मांग की। विरोध-प्रदर्शन कर रहे अभिभावकों को यह कहते हुए भी सुना गया कि “स्कूल वाले फीस अधिक लेते हैं और बस वालों से उनकी सेटिंग है।” इन सबके बीच शासन प्रशासन अपना काम तो कर ही रहा है। जो सबसे महत्वपूर्ण है, वो यह कि जांच करके एक रिपोर्ट प्रस्तुत करना। जांच में घटना का विवरण, कारण और अन्य जानकारियां हो सकती हैं। फिर भी मुझ जैसे लेखक को महसूस होता है कि इस घटना के प्रकाश में सिर्फ निजी स्कूलों की ही नहीं बल्कि शासन-प्रशासन की भूमिका के साथ-साथ व्यक्ति और समाज की महत्वाकांक्षा की जांच भी हानी चाहिए। क्योंकि इस घटना ने एक तरफ जहां हमें हमारी शिक्षण व्यस्था के दोष से अवगत कराया है, वहीं दूसरी तरफ इस घटना ने शिक्षण व्यवस्था के प्रति व्यक्ति और समाज के दृष्टिकोण और दायित्व को भी उजागर किया है कि आखिर हमारा समाज अपने बच्चों की शिक्षा के लिए किस प्रकार का शिक्षण व्यवस्था तैयार कर रहा है? सवाल यह भी है कि क्या हमारा समाज निजी महत्वाकांक्षाओं वाली व्यवस्था के अधीन खुद को समर्पित कर चुका है या सामूहिक प्रतिनिधित्व वाली लोकतांत्रिक संस्थाओं में नयी संभावनाओं के बीज भी बोना चाहता है।

कोई भी स्कूल अपने समाज की सीमाओं से परे नहीं हो सकता है। इस आलोक में प्रथम दृष्टिया कहा जा सकता है कि स्कूल प्रबन्धन की लापरवाही के कारण ही बच्चे की जान गयी होगी। स्कूल प्रबन्धन और बाल शिक्षा के सिद्धान्तों के अनुरूप स्कूल प्रबन्धन को इस जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता कि वो बच्चे के पारिवारिक पृष्ठभूमि से लेकर उसके समाज और स्कूल के आस-पास के वातावरण आदि का संज्ञान ले और तत्संबन्धी विवरण रखे। ऐसा करने से किसी भी स्कूल प्रबन्धन के पास इस तरह की घटना को टालने की संभावना अधिक होती है। अगर बाल शिक्षा में गाइडेन्स की भाषा में कहा जाए तो स्कूल प्रबन्धन द्वारा इकट्ठा की गयी इस तरह की जानकारी चेक बॉक्स का काम करती है। चूंकि हरियाणा के गुरूग्राम के जिस स्कूल में बच्चे की हत्या की घटना घटी है, वो स्कूल नामी-गिरामी है, इसलिए ऐसे स्कूलों के प्रबन्ध कर्ताओं से ऐसी लापरवाही की उम्मीद नहीं की जा सकती है। वैसे भी निजी स्कूल वाले या कोई भी निजी प्रतिष्ठान अपने स्टॉफ से कम समय और कम पारिश्रमिक में अधिक काम लेने के लिए बदनाम रहे हैं। सरकार भी इस मंतव्य से सहमत है। दिलचस्प यह भी है कि जबसे निजीकरण की बयार चली है तब से कामकाज के इस तरीके को कारपोरेट के साथ-साथ सरकारें भी बढ़ावा दे रही हैं। बहरहाल, ऐसा प्रतीत होता है कि बस चालक स्कूल का स्टॉफ नहीं था और उसकी किसी अध्यापक या अध्यापिका की भांति टीचिंग-लर्निंग का हिस्सा मानकर ट्रेनिंग नहीं की गयी हो। ज्ञात हो सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में बच्चों को माता-पिता और अध्यापक-अध्यापिका के केन्द्र में रखकर शैक्षिक क्रिया-कलाप सम्पन्न होता है। ज़रूरी है कि स्कूल बस (चालक और खलासी के साथ) को संचालित करने वाले व्यक्ति/संस्था को भी माता-पिता और अध्यापक-अध्यापिका की तरह एक छोर पर रखा जाए। सरकारों को इस बिन्दु पर शोधपरक समझदारी विकसित कर इस दिशा में कानून भी बनाने की जरूरत है। ताकि स्कूल जाते हुए बच्चों के परिवेश में जो भी चीजें, व्यक्ति या बातें हों, उन्हें उनकी शिक्षा को प्रभावित करने वाले साकारात्मक अथवा नाकारात्मक कारक के रूप में मान्यता मिल सके। जब ऐसी मान्यता मिल जाएगी तो बस चालक हो या खलासी या सड़क और बाजार, हर व्यक्ति के अन्दर और हर एक स्थान पर बच्चों को एक ऑब्जेक्ट के रूप में देखने का नजरया विकसित होगा। एक ऐसा ऑब्जेक्ट जिसके बारे में कहा जाता है कि बच्चे देश के भविष्य हैं। न जाने कितने गीत और कविताएं इन पर लिखे और गाए गए है। उदाहरण के तौर पर “इनमें मेरे आने वाले जमाने की तस्वीर है.....“, “बच्चे मन के सच्चे.....”, “आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं.....”, “मुझे दुश्मन के बच्चों को पढ़ाना है.....” वगैरह-वगैरह। ऐसे आदर्श सामाजिक परिस्थिति में कोई भी बच्चा “सेक्सुअल एब्यूज“ यानि यौन शोषण या वायलेन्स (हिंसा) का शिकार नहीं होगा।

जाहिर है हम स्कूल से जुड़े विभिन्न व्यक्तियों, कर्मचारियों और संस्थाओं को सीखने-सिखाने के विषय पर निरंतर संवेदीकरण करते रहें तो मुमकिन है कि बच्चों को विभिन्न कारणों से हिंसा का शिकार बनने से बचाया जा सकता है। लेकिन हमें यह भी देखना होगा कि आजादी के बाद से अब तक हमने शिक्षा के क्षेत्र में जो प्रयोग किए गए हैं, उनका प्रभाव क्या पड़ा? खासकर 1991 में जब आर्थिक सुधारों से अनुप्राणित निजीकरण की शुरूआत हुई। निस्संदेह आर्थिक सुधारों ने बुनियादी शिक्षा को निजीकरण के रास्ते पर आगे बढ़ाया है। इसे प्रगति के रूप भी देखा जा सकता है और बुनियादी शिक्षा के पतन के तौर पर भी परिभाषित किया जा सकता है। प्रगति इसलिए क्योंकि बुनियादी शिक्षा में नित नए प्रयोग हुए और माण्टेसरी एवं किण्डरगार्टेन की शिक्षण प्रणाली का विस्तार हुआ। लेकिन दूसरी तरफ इन नए प्रयोगों की आड़ में सरकारों ने बुनियादी शिक्षा में पूंजी की भूमिका को प्रमुखता से स्थापित किया। पूंजी की भूमिका को बढ़ाने का सवाल शिक्षा के बाजारीकरण के सवाल से जुड़ा हुआ है। यह सवाल हमें इस दिशा में विचार करने का अवसर देता है कि एक के बाद एक हमारी सरकारें बुनियादी शिक्षा के तंत्र पर समाज के विविध समुदायों की निर्भरता को कम करने संबंधी नीतियां बनाती रही हैं। शिक्षा का निजीकरण (बाजारीकरण) सरकार के कामकाज के इसी रवैये की अभिव्यक्ति है। कहा जा सकता है कि निजीकरण की नीती में आत्मनिर्भरता का पुट है। यह नीती गुणवत्ता और सेवा की प्रतिबद्धता से ओत-प्रोत है। लेहाजा देश भर में निजी स्कूलों का बड़ा नेटवर्क देखा जा सकता है। जिनके होर्डिंग्स पर क्वालिटी एजूकेशन के एक से एक वादे लिखे रहते हैं। इनके पाठ्यक्रम में महंगी किताबें होती हैं, महंगे अध्यापक/अध्यापिका हो सकते हैं, पूंजी प्रायोजित संभ्रान्त संस्कृति का प्रदर्शन हो सकता है, लेकिन समाजिक सरोकारों का मूल्य, परंपरा और संस्कार के रूप में सर्वथा अभाव रहता है। ऐसी स्थिति पूंजी प्रायोजित शिक्षण संस्थाओं और मानवीय संवेदनाओं के बीच की खाई को बढ़ाने वाली होती है। ऐसे में अमानवीय कुमनोवृत्तियों को समय रहते चिन्हित करना संभव नहीं होता। यदि हरियाणा वाली घटना की बात करें तो इस संभावना से इंकार मुश्किल है कि पूंजी की प्रधानता ने ही स्कूल प्रबन्धन को बस चालक के मन की बात को पढ़ने से वंचित रखा। यह घटना हमें यह सीख भी देती है कि किसी भी स्कूल में वाहन चालक के लिए न्यूनतम शैक्षिक और सामाजिक अर्ह्ता का निर्धारण वक्त की जरूरत है। जिस तरह से रेल के परिचालन के लिए ड्राइवरों के स्वास्थ्य की जांच वगैरह का नियम है, उसी तरह से स्कूल वाहनों के परिचालकों का समय-समय पर सामान्य स्वास्थ्य और मनोवैज्ञानिक परीक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए।

अक्सर ऐसी खबरें भी आती हैं कि ड्राइवर की गलती या लापरवाही से स्कूली वाहन पलट गया, बच्चे घायल हो गए या मर गए। ऐसे मामलों में अभिभावकों का गुस्सा भी देखने में आता है। तोड़फोड़ से लेकर आगजनी सबकुछ पलभर में कर देते हैं। गौरतलब है कि जो अभिभावक अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए नामी-गिरामी स्कूलों में भेजता है। वही अभिभावक अपने बच्चे के साथ कुछ अप्रिय होने पर हिंसक और क्रूर क्यों हो जाता है? यही रवैया निजी नर्सिंग होम या निजी अस्पतालों या निजी प्रैक्टिशनरों के साथ देखा गया है। जब तक गुणवत्ता और सेवा मिलता रहता है, तब तक तो अभिभावक स्कूलों की ओर और तीमारदार अस्पताल की ओर नजर नहीं करते। लेकिन जैसे ही कुछ उन्नीस-बीस होता है, अभिभावक और तीमारदार अपनी नागरिक जिम्मेदारियों को भूलकर हिंसक हो उठते हैं। शायद इसलिए कि अभिभावक और तीमारदार के रूप में हमारी महत्वाकांक्षा उस शिखर पर पहुंच चुकी है, जहां से हमें अपनी वैयक्तिक इच्छाओं के अलावा किसी और के दुःख-दर्द की पीड़ा महसूस नहीं होती है। शायद इन्हीं कारणों और परिस्थितियों के चलते हम अपने बच्चों के लिए पूंजी प्रायोजित स्कूलों को चुनते हैं। जहां मैं, मेरा का बोध ज्यादा होता है और सामाजिक संवेदना का अभाव होता है। दूसरी बात यह कि यदि पूंजी प्रायोजित स्कूल या अस्पताल फीस अधिक ले रहे हैं और उन्हें बच्चों और मरीजों की चिन्ता नहीं है तो हम अपने बच्चों का दाखिला सरकारी स्कूलों में क्यों नहीं कराते? या सरकार पर दबाव क्यों नहीं बनाते कि शिक्षा की पूरी जिम्मेदारी सरकार खुद उठाए।

कुछ लोग यह सुझाव दे रहे हैं कि विद्यालयों में सीसीटीवी कैमरे अनिवार्य कर देने चाहिएं। एडवोकेट जैनेश कश्यप का विचार है कि स्कूल में सीसीटीवी कैमरों को संचालित करने के लिए अलग से एक ऑपरेटर की नियुक्ति करनी चाहिए, जो नित्य प्रतिदिन इसे देखा और जांचा करे। दिनेश चन्द्र राय इण्टर कॉलेज मुहम्मदाबाद में अंग्रेजी के प्रवक्ता रहे हैं। उनकी जिज्ञासा “यह व्यवस्था कौन करेगा?“ का जवाब देते हुए एडवोकेट जैनेश कश्यप अपने फेसबुक वाल पर लिखते हैं कि “यह व्यवस्था विद्यालय प्रशासन को करनी चाहिए। उनके ऊपर अभिभावकों व जिला प्रशासन का दबाव होना चाहिए।”  एडवोकेट जैनेश कश्यप और दिनेश चन्द्र राय की बातों से जाहिर होता है कि अगर स्कूल प्रबन्धन सीसीटीवी कैमरा का बन्दोबस्त करले और इसके लिए एक ऑपरेटर रख ले तो बच्चों के साथ होने वाली आपराधिक घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सकती है। तकनीक के इस्तेमाल से हमारे जीवन में आसानिया पैदा हुई हैं। चूंकि बात एक यौन अपराध के आइने में एक बच्चे की नृशंस हत्या के संदर्भ में हो रही है, तो हमें देखना पड़ रहा है कि तकनीक ने मानव मन को उसकी नैसर्गिक दोष युक्त सोच से मुक्त करने में क्या भूमिका निभाया? इस सवाल पर गौर करने से ऐसा प्रतीत होता है कि हम तकनीक के क्षेत्र में, तकनीक के इस्तेमाल से कामयाबी की तमाम सीढ़ियां चढ़ने के बाद भी मानव मन में साकारात्मक सामाजिक सोच युक्त संवेगों की प्रबल धारा प्रवाहित करने में असफल रहे हैं। इस आलोक में यह सवाल लाजमी है कि किसी स्कूल या प्रतिष्ठान में स्थापित सीसीटीवी कैमरा जैसे किसी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण या यंत्र को ऑपरेट करने वाले की अर्ह्ता (सामाजिक और मनोवैज्ञानिक) की जांच कौन करेगा? ऐसे ऑपरेटरों के लिए न्यूनतम योग्यता का निर्धारण कौन करेगा और इनके लिए जो भी पाठ्यक्रम बनाया जाएगा, उसकी पढ़ाई की फीस कितनी होगी? किन संस्थानों को ऐसी शार्ट टर्म या लान्ग टर्म कोर्स कराने के लिए भारत या प्रदेश सरकारों की ओर से अधिसूचित किया जाएगा? इन सवालों के बीच इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि स्कूलों में कैमरा नहीं होना चाहिए। बिल्कुल होना चाहिए, लेकिन क्या यह उचित होगा कि हम अपने ही समाज के लोगों के साथ अविश्वास के संबंधों को मजबूत करें। क्या ऐसा करना लिंग आधारित विविधता और निजता को बनाए रखने की दृष्टि से उचित होगा? क्योंकि किसी भी बुराई के पीछे बहुत से कारक होते हैं। इनमें सबसे प्रमुख हमारा समाज और समाज में रहने वाले विभिन्न सामाजिक समूहों की सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक, सास्कृतिक परिस्थितियां और गतिविधियां शामिल होती हैं। उदाहरण स्वरूप कई बार माता-पिता हैरान होते हैं कि उनका बच्चा गाली कहां से सीखता है। जब कि न तो उनके स्कूल में गालियां सिखाने की कोई क्लास होती है और न ही घर का कोई सदस्य गाली देता या देती है। यह भी सत्य और तथ्य है कि ज्यादातर गालियां महिला केन्द्रित होती हैं। यानि हम अपने बच्चों से कुछ अच्छा करने की उम्मीद एक ऐसे सामाजिक परिवेश में करते हैं, जहां मर्दानापन यानि पितृसत्तात्मक सोच से अनुप्राणित गालियां और अन्य गतिविधियां होती हैं। जिसका सीधा संबंध शक्ति के दो ध्रुवों से होता है। जो धु्रव अपने आप में मजबूत होता है, वो कमजोर के साथ अन्याय, भेदभाव, अपमान, अनादर, हिंसा और क्रूरता जैसे व्यवहार करता है। अनुभव बताता है कि बच्चे अपने सामाजिक परिवेश में ही गालियां सीखते हैं। जैसे मुहल्ले में खेलकूद के समय, घर से बाहर कहीं आते-जाते समय। गालियां देता कौन है? हमारे-आप जैसे लोग ही गालियां देते हैं। दूसरी तरफ बलवान का बल कहीं न कहीं उसके सामाजिक ढ़ांचे के स्वरूप और उसकी परंपरागत प्रवृत्तियों से अक्षुण्य रहता है। इस उदाहरण का संदर्भ इसलिए भी देना पड़ा है कि हम अकेले कुछ तय नहीं कर सकते हैं। विशेषकर ऐसे समाज में जहां पितृसत्ता और अलोकतांत्रिक मूल्य अभी बहुत मजबूत है। इसीलिए ऐसा मुमकिन है कि जो सीसीटीवी कैमरा स्कूल के कर्मचारियों की निगरानी करने के मकसद से लगा हो, क्या पता उसका उपयोग ऑपरेटर अपने कुंठित भावनाओं को तृप्त करने के लिए करने लगे। इस घटना में ड्राइवर को एक ऐसे ही ऑपरेटर के तौर पर देखा जाए तो अंदाजा होता है कि सीसीटीवी सुरक्षा के साथ-साथ अपने नाकारात्मक प्रभावों में ऐसी हिंसक घटनाओं को जन्म दे सकता है। इसलिए जरूरी है कि पहले हम और हमारा समाज संवेदनशील बने। शिक्षा का दृष्टिकोण विकसित करे। किसी भी सामाजिक-शैक्षिक कार्य में अपनी सहभागिता सुनिश्चित करे। वैसे भी स्कूल-कॉलेज को चन्द कैमरों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है। बल्कि इसके लिए संवेदनशील, समझदार और जिम्मेदार स्कूल प्रबन्धन के साथ-साथ परिपक्व और प्रशिक्षित मानव मन की जरूरत होती है। तब जाकर कहीं बचपन को संवारने और निखाने की साधना पूरी होती है।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया में प्रवक्ता मेरी एक मित्र कंचन जो इस समय यूरोप के बूडापेस्ट में हैं, इस घटना को कर्मचारियों और अन्य स्टॉफ के लिए अलग से टॉयलेट होने और न होने से जोड़कर देखती हैं। वो अपने फेसबुक वाल पर लिखती हैं कि “आम तौर पर जैसे रेजिडेंशियल कॉलोनी में काम करने के लिए आने वाली घरेलू नौकरानियों के लिए कॉलोनी में कोई टॉयलेट नहीं होते और वे किसी घर में चुपके से चली जाती हैं या सभ्य लोगों की रिहाईश के किसी किनारे निपट लेती हैं। ऐसे ही स्कूल में बस ड्राइवर, कंडक्टर, कर्मचारियों के लिए भी बच्चों से अलग कोई अलग टॉयलेट की व्यवस्था नहीं करने की मानसिकता खतरे पैदा करते हैं।... कितना शर्मनाक है लगता है कि हम अपने बच्चों को इन्सानों से डरना सिखाते हैं!!” 

इस संदर्भ में बताना जरूरी मालूम होता है कि जब मैं कहानियों पर शोध प्रबन्ध लिख रहा था, उस समय इकबाल मजीद की कहानी “पेशाब घर आगे है!” पढ़ी थी। कहानी में एक व्यक्ति को पेशाब के दबाव से होकर गुजरना पड़ता है। शहर की भीड़ में सबकुछ है, लेकिन न तो टॉयलेट है और न ही पेशाब के दबाव से उत्पन्न पीड़ा झेल रहे व्यक्ति को किसी दुकानदार की अनुमति है कि उसके दुकान के साइड में या पीछे पेशाब किया जा सके। इकबाल मजीद के कहानी “पेशाब घर आगे है!” का संदर्भ बहुत वृहद हो सकता है। यहां मित्र कंचन और संवेदनशील लेखिका ने इस दिशा में कुछ ऐसा लिखा, जिसको नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। क्योंकि हमारा समाज भी कहीं न कहीं ऐसे दबाव में है, जिससे मुक्ति के लिए कोई रास्ता देना नहीं चाहता। हमें अपने स्वार्थ की पूर्ति करने की लालसा है लेकिन कोई जन सुविधाओं के बारे में गंभीर नहीं है। जो लोग गंभीर हैं, उन्हें भी पूंजी आधारित निवेश और मुनाफा की फिक्र ज्यादा है। फलस्वरूप कमजोर पहचान वालों पर चैतरफा खतरा बढ़ा है। ऐसे में कंचन की टिप्पणी “कितना शर्मनाक है, लगता है कि हम अपने बच्चों को इन्सानों से डरना सिखाते हैं!!” बुनियादी शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वालों की सोई हुई संवेदना को कुरेदने वाली है। इनमें स्कूल प्रबन्धन से लेकर, स्कूल के टीचिंग स्टॉफ, नॉन टीचिंग स्टाफ, किताब बेचने वाले और अभिभावक के रूप में किताब खरीदने वाले सभी शामिल हैं।

वास्तव में पेशाब और शौच शहरों और गांवों दोनों ही जगहों पर एक बड़ी समस्या है। गांव में जहां लोग खुले में शौच करने के अभ्यस्त हैं, उन्हें विभिन्न स्वास्थ्य, संस्कार और स्वच्छता जैसे कारणों के चलते घर के अन्दर शौच करने का अभियान चलाया जा रहा है। फिर भी शाम ढ़लते ही गांव से लगे सड़कों और पगडंडियों के किनारे महिलाओं-पुरूषों की बड़ी संख्या में मौजूदगी चिन्ता का विषय है। उसमें भी कुछ स्वयं सेवक टॉर्च दिखाकर कैमरा से फोटो खींच लें या फिर किसी की बहन-बेटी के साथ अभद्र व्यवहार करें, तो हम-आप जैसे लोग कुछ करने में असमर्थ होते हैं। क्योंकि यहां भी डर और खौफ निजता के सवाल पर भारी पड़ता है। यह तो आउटडोर का मामला है। यदि “क्राइम इन इण्डिया” का संदर्भ लें तो ज्यादातर आपराधिक घटनाएं इनडोर यानि घर-मकान के अंदर होती हैं। ऐसी घटनाओं को अंजाम भी वही लोग देते हैं, जिनका संबंध बहुत करीब का होता या फिर जो परिचित और विश्वासी होते हैं। जाहिर है हम और हमारे समाज की सांसे तकनीक के सहारे नहीं चल सकती हैं। तकनीक का इस्तेमाल पीड़ित को राहत पहुंचाने के लिए करना ठीक है। तकनीक का इस्तेमाल किसी आम इंसान विशेषकर महिला, बच्चा, गरीब, पिछड़ा, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक वगैरह कमजोर पहचान वाले व्यक्तियों को हिंसा और यातना देने के लिए करना ठीक नहीं है। तकनीक के इस्तेमाल की पहली शर्त पूंजी है। पूंजी मजबूत लोगों के पास है या मजबूत लोगों का पूंजी पर नियंत्रण है। ऐसे में अगर सीसीटीवी कैमरे जैसे यंत्रों से स्कूल और समाज के संभ्रान्त वर्ग को ही सुरक्षा प्रदान किया जा सकता है। एक और मित्र महेन्द्र सिंह के फेसबुक वाल के माध्यम से गाजियाबाद स्थिति इन्दिरापुरम के एक स्कूल प्रबन्धन की बच्चों की सुरक्षा संबंधी चिन्ता का संज्ञान हुआ है। महेन्द्र सिंह जी ने अपने वाल पर स्कूल द्वारा भेजी गयी चिट्ठी पर लगाया है और स्कूल प्रबन्धन के संवेदनशील होने की बात कही है। 

जाहिर है इस पूरे प्रकरण में बच्चों की सुरक्षा ही चिन्ता का विषय है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि गुरूग्राम का मामला एक स्कूल का मामला नहीं, बल्कि पूरे देश का मामला है। इस संदर्भ में सभी राज्य सरकारों को नोटिस भी जारी की गयी है। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम सराहनीय है। लेकिन गौर करने का विषय यह है कि क्या सुप्रीम कोर्ट के बयान और राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर देने भर से बच्चों के साथ होने वाली आपराधिक घटनाओं पर लगाम लगाया जा सकता है? मौजूदा दौर में जिस तरह से सरकारों ने शिक्षा के क्षेत्र में पूंजी निवेश को बढ़ावा दिया है, उससे शिक्षा के न सिर्फ दो मॉडल, निजी और सरकारी दिखाई देते हैं, बल्कि विकास का निजी मॉडल देश के बहुसंख्यक परिवारों के बच्चों के लिए निराशा पैदा करने वाला रहा है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट और सरकारों को इस दिशा में भी विचार करने की आवश्यकता है कि हमारे तंत्र में ऐसा क्या है कि निजी मॉडल में कुछ होता है तो उसकी गूंज सत्ता के गलियारों से लेकर सुप्रीम कोर्ट हर जगह सुनाई देती है। वहीं दूसरी तरफ किसी पांच साल की बेटी का बलात्कार होने पर भी सत्ता के पुराधाओं और सुप्रीम कोर्ट के कान पर जूं तक नहीं रेंगती है। ऐसा प्रतीत होता है कि हमारी सरकारों और संविधान द्वारा स्थापित लोकतांत्रिक संस्थाएं जैसे स्कूल-कॉलेज और अस्पताल आदि को पतन के रास्ते पर जानबूझ कर ढ़केला जा रहा है। यदि ऐसा नहीं होता तो सरकार शिक्षा पर बजट बढ़ाने और सरकारी स्कूलों के प्रसार की दिशा में काम करती, न कि अपने ही देश के बच्चों को पूंजीपतियों के रहमों करम पर छाड़ने के लिए सरकारी स्कूलों को हतोत्साहित करने वाले कानून बनाती। यदि वास्तव में सरकार और सुप्रीम कोर्ट को लगता है कि जो बच्चे यौन हिंसा या बलात्कार जैसे किसी घटना का शिकार बन रहे हैं तो कार्यपालिका और न्यापालिका को शिक्षा शास्त्र के सिद्धान्तों को मद्दे नजर रखते हुए शिक्षा और समाज को एक समन्वित इकाई के तौर पर मान्यता देना चाहिए। जिसमें इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया जाना चाहिए कि हर बच्चा देश के लिए महत्वपूर्ण है और बच्चों की शिक्षा सिर्फ मां-बाप और अध्यापक-अध्यापिका की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि उस समाज की भी जवाबदेही है जहां बच्चा आने-जाने, खेलने-कूदने जैसे विविध गतिविधियां करता है। जिन अभिभावकों को अपने बच्चों के साथ हिंसात्मक आपराधिक घटनाओं की पीड़ा झेलनी पड़ रही है, उन्हें निजी स्कूलों के खिलाफ सरकारी सरकारी स्कूलों की बेहतरी के लिए आवाज उठानी चाहिए। ऐसे लोगों की आवाज में समाज के शिक्षित और जागरूक लोगों की आवाज भी मिलनी चाहिए। समाज के बेस्ट प्रैक्टिसेज को प्रचारित और प्रसारित करना समाज में आगे बढ़ चुके लोगों का नैतिक और सामाजिक दायित्व होना चाहिए। यदि “कॉरपोरेट सोशल रिस्पान्सिबिलिटी” मुमकिन है तो यह भी मुमकिन है कि “पीपल्स एजूकेशनल रिस्पॉन्सिबिलिटी” जैसी किसी युक्ति को लागू किया जाए। तब जाकर समाज में शिक्षा की दृष्टि पैदा होगी और बच्चों का बचपन सही मायनों में संवारा जा सकेगा। वरना टेक्नोक्रेसी का उफान और कमजार हो रहे लोकतांत्रिक मूल्य न सिर्फ बुनियादी शिक्षा के लिए खतरे पैदा करने वाले हैं, बल्कि मानव मन की विकृतियों को दिनों दिन बढ़ाने वाले हैं, जो संविधान में उल्लिखित लोकतांत्रिक आदर्शों के अनुरूप समाज के दीर्घकालिक हित में नहीं है।

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Thursday, June 15, 2017

दोहरी शिक्षा व्यवस्था और आहत अभिभावक


निजी विद्यालयों द्वारा मनमाना फीस लेना अभिभावकों पर भारी पड़ रहा है। पिछले लगभग एक दशक में देश के विभिन्न क्षेत्रों विशेषकर यू.पी., बिहार और दिल्ली जैसे राज्यों में बढ़ती फीस के खिलाफ अभिभावकों में अच्छा-खासा रोष देखा गया है। खास बात यह है कि यह रोष किसी मौसमी बीमारी की तरह प्रवेश के समय ही देखा गया है। जिस तरह से गर्मी शुरू होते ही पारा चढ़ने लगता है, उसी तरह मार्च का महीना करीब आते ही फीस वृद्धि की खबरें अखबारों की सुर्खियां बनने लगती हैं। फीस वृद्धि से संबन्धित खबरों में निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावकों की पीड़ा इस तरह से बयान होती है जैसे नयी बीमारी के बाद कोई व्यक्ति खून उगल रहा हो। कहना नहीं है कि निजी विद्यालयों में फीस के साथ-साथ किताबों और समय-समय पर भुगतान की जाने वाली अन्य शुल्क का बोझ भी अभिभावकों की जेब पर भारी पड़ रहा है। यही कारण है कि निजी विद्यालयों में अपने बच्चों का भविष्य संवारने का सपना सजोने वाले मां-बाप नयी व्यवस्था के चरित्र से कराह रहे हैं। गौर तलब है कि निजी स्कूलों में फीस वुद्धि के मुद्दे का समय-समय पर सरकारों ने भी संज्ञान लिया है और अपनी तरफ से उचित कदम उठाने का आश्वासन दिया है। निजी विद्यालयों में फीस की अधिक दर संज्ञान लिया जाना और तत्संबंधी उपचार पर विचार करना अच्छी पहल है। लेकिन कुछ सवाल हैं, जिन पर विचार ज़रूरी है। पहला यह कि जो लोग फीस वृद्धि से त्रस्त हैं वे समाज के किस वर्ग से संबंध रखते हैं? दूसरा यह कि क्या वास्तव में फीस वृद्धि स्कूल जाने वाले बच्चों की बहुसंख्यक आबादी और अभिभावकों का मुद्दा है? तीसरा यह कि यदि फीस वृद्धि बहुसंख्यक बाल आबादी और ऐसे बच्चों के माँ-बाप के लिए मुद्दा है तो ऐसे अभिभावक मनमानी फीस वसूलने वाले निजी स्कूलों का परित्याग कर अपने बच्चों को परिषदीय या निकाय द्वारा संचालित स्कूलों में दाखिला क्यों नहीं कराते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि फीस वृद्धि का मामला चन्द लोगों का मामला हो और इसे आम जनता की समस्या बनाकर पेश किया जा रहा हो। कहीं ऐसा तो नहीं कि यह समस्या उस वर्ग विशेष का है, जो नौकरी पेशा है, या व्यापारी है, या शिक्षा के प्रति किसी हद तक जागरूक है। दो टूक शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि यह समस्या उस वर्ग की है, जो उपभोक्तावाद को बढ़ाने में पूंजीपतियों के साथ खड़ा है लेकिन नागरिक अधिकारों का उल्लंघन होने पर पूंजीवाद का वैचारिक और
सैद्धांतिक विरोध नहीं करता। बल्कि अपने हित को सबके हित से जोड़कर फीस वृद्धि जैसी समस्या को सामूहिक समस्या के रूप में व्याख्यायित करता है। जबकि स्कूल शिक्षा के बारे में कम से कम उत्तर प्रदेश के संदर्भ में
एन.सी.ई.आर.टी. के आठवें अखिल भारतीय शैक्षिक सर्वेक्षण के अनुसार सरकारी, निकाय द्वारा संचालित,
सहायता प्राप्त निजी और गैर सहायता प्राप्त निजी प्राथमि स्कूलों का अनुपात क्रमशः 76, 4, 2, 18 प्रतिशत है। अर्थात उत्तर प्रदेश में सरकारी प्राथमिक और निजी प्राथमिक स्कूलों का अनुपात 80 और 20 प्रतिशत है।

ये आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में अभी भी बाल आबादी का बड़ा हिस्सा प्राथमिक शिक्षा के लिए सरकारी विद्यालयों पर निर्भर है। पिछले दो दशकों में ये भी हुआ है कि मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग के साथ-साथ गरीब और अभावग्रस्त जीवन व्यतीत करने वाले लोगों का एक बड़ा हिस्सा सरकारी स्कूलों से विमुख हुआ है। फिर भी सरकारी स्कूलों का आस्तित्व गरीब, पिछड़े, दलित, महिला और पसमांदा समाज के लोगों के लिए डूबते को तिनके का सहारा से कम नहीं। बावजूद इसके इस आलेख के माध्यम से सरकारी स्कूलों से विमुखता की वास्तविकता को जानने की कोशिश की जा रही है। क्योंकि सरकारी स्कूलों से मोह भंग होने के पक्ष में जो सबसे बड़ी दलील दी जाती है वो ‘गुणवत्ता’ है। ज़रूरी है कि गुणवत्ता को भी समझा जाए। क्योंकि “गुणवत्ता“ का संबंध फीस वृद्धि से है। बल्कि यह कहा जाना चाहिए कि “गुणवत्ता“ नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के पिटारे से निकला ऐसा जिन्न है, जो जीवन के हर क्षेत्र में हमारा पीछा कर रहा है। देश की अर्थ व्यवस्था में ढ़ांचागत बदलाव को परिलक्षित करने वाले इस जिन्न से बुनियादी शिक्षा का ढ़ांचा भी अछूता नहीं रहा है। इसे अंग्रेजी में “क्वालिटी“ कहते हैं। इसके साथ “सर्विस“ का होना भी लाजमी है। आर्थिक सुधारों से अनुप्राणीत हर काम में इन दो तत्वों का होना अपरिहार्य है। लिहाजा शिक्षा के क्षेत्र में भी इन दो तत्वों की तलाश शुरू हुई। आर्थिक सुधारों को प्रचारित और प्रसारित करने में तीसरा तत्व “प्रतिस्पर्धा“ का रहा है। शायद बुनियादी शिक्षा के क्षेत्र में इन तीन मिथकों को स्थापित करना जरूरी था और इसीलिए क्वालिटी, सर्विस और कम्पटीटीवनेस को बढ़ावा देने वाले स्कूलों की नई प्रथा शुरू हुई। इन्हें पब्लिक और काॅनवेन्ट स्कूलों की परिपाटी के रूप में भी देखा जा सकता है। जब ये स्कूल अपने शुरूआती दौर में थे उस समय अखबारों की सुर्खियों में “गली-गली कुकुरमुत्ता की तरह ..... पब्लिक स्कूल” खबर प्रकाशित होती थी। दो-ढ़ाई दशक गुजरने के बाद अब अखबारों की सुर्खियों में “निजी स्कूलों की मनमानी से ........ अभिभावक परेशान“ या “अभिभावकों ने किया प्रदर्शन....“ आदि खबरें प्रकाशित होती हैं। इसे एक शिफ्ट के रूप में देखे जाने की जरूरत है। पिछले लगभग पच्चीस वर्षाें में समाचार की सुर्खियों में इस तरह के बदलाव से अंदाजा होता है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था एक बड़े बदलाव से गुजर चुकी है। बदलाव की हज़ारों अनकही कहानियां हैं। कुछ एक का संदर्भ लेने पर चित्र और स्पष्ट हो जाता है कि जो सरकारी स्कूल बुनियादी शिक्षा की रीढ़ की हड्डी हुआ करते थे, आज वही स्कूल खिचड़ी, वजीफा और किताबों, शिक्षा मित्रों की बहाली, शिक्षकों का स्थानान्तरण, छुट्टियां वगैरह से पहचाने जा रहे हैं।
 संदर्भ के तौर पर बाबूजी के बारे लिखना ज़रूरी हो जाता है। “हमारे पड़ोस के विजय बाबूजी अपने ज़माने के ग्रेजुएट की योग्यता रखते हुए ही भारतीय रेल को न भूलने वाली सेवाएं दीं। बाबूजी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन रिटायरमेन्ट के बाद उन्होंने जिन बच्चों को अपने बरामदे में बैठाकर अंग्रजी पढ़ाई वो बच्चे उन्हें आज भी याद करते हैं। बाबूजी से अंग्रेजी पढ़ने वाले बच्चों को तो मालूम भी नहीं है कि बाबूजी की शैक्षिक योग्यता क्या थी? या बाबूजी किस सर्विस में थे? या तमाम उम्र रेलगाड़ी में हिचकोले खाने वाले बाबूजी को अंग्रेजी ग्रामर से कब दिलचस्पी हुई, उन्होंने कैसे पढ़ाई की वगैरह-वगैरह...। ऐसे ही व्यक्तित्व के मालिक थे स्व॰ श्री जगदीश चन्द्र श्रीवास्तव। जिन्होंने नायब तहसीलदार पद से रिटायर होने के बाद मेरे जैसे बहुतों को उर्दू और फारसी की सीख दी। कहते थे कि अपने जीवन में 40000 बच्चों को पढ़ाया है। गौर करने का मोकाम है कि सर्विस पीरियड में पहले के लोग चाहे किसी भी विभाग में हों, सीखने-सिखाने के संदर्भ में पढ़ाई के लिए तत्पर रहते थे। दादा जी, जिनका असल नाम हमीद खाँ था। सदर रोड स्थित डाॅ॰ फतह मुहम्मद के क्लिनिक में हर सुबह-व-शाम बैठकी करने वालों में एक नाम तौकीर अहमद खाँ वकील का है, जिनकी उम्र 84 वर्ष हो चुकी है। तौकीर अहमद खाँ दादा जी को अपना बहनोई समझते हैं। उन्होंने बताया कि दादा जी का परिवार तातारी पठानों से ताल्लुक रखता है। दादा जी के बारे कहा जाता है कि वो अंग्रेज़ों के ज़माने के दारोगा थे। उन्होंने जितने दिन नौकरी की, उससे कहीं अधिक दिनों तक पेन्शन उठाई। गुलाम हिन्दुस्तान में दारोगा रहे दादा जी की क्वालीफिकेशन तौकीर अहमद खाँ वकील के मुताबिक 10वीं पास की थी, लेकिन उर्दू शेर की उनकी समझ और परख ने उन्हें गे्रजुएशन के छात्र/छात्राओं का उस्ताद ज़रूर बना दिया। उस पर तुर्रा ये कि वो फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते थे। उनके मुंह से अंग्रेजी सुनकर ऐसा मालूम होता था कि हमारे बीच कोई अंग्रेज आ बैठा है।“ तौकीर अहमद खाँ वकील की बातों पर यकीन करें तो अंग्रेजी की ही बदौलत दादा जी को पहली बार हवलदार की नौकरी मिली थी। लेकिन अब जबकि हम आधुनिकता की बिसात पर कई कदम आगे निकल आए हैं तो “क्वालिटी, सर्विस और प्रतिस्पर्धा“ की चुनौतियों से प्रतिदिन जूझना पड़ रहा है। बाबूजी और दादाजी के जमाने की शिक्षण पद्धति अब बीते दिनों की बातें मालूम होती हैं। बुनियादी शिक्षा का परिदृश्य कुछ ऐसा है कि कदम-कदम पर पैसे की मांग बढ़ी है। बात फीस की ही नहीं है। काॅपी-किताब और डेªस से लेकर आए दिन विभिन्न प्रकार के प्रोजेक्ट और अन्य गतिविधियों के नाम पर खर्च होने वाले पैसे की भी है। पहले एक किताब से एक के बाद एक कई बच्चे पढ़ाई कर लिया करते थे। लेकिन अब प्रतिवर्ष किताबों का बदल जाना अभिभावकों की जेब पर भारी पड़ रहा है। डेªस का भी मामला कुछ ऐसा ही है। लेकिन यह खर्च 20 प्रतिशत स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावकों के लिए ही समस्या है। बाकी बच्चे तो आज भी परिषदीय या नगर निकाय द्वारा संचालित प्राथमिक विद्यालयों पर निर्भर हैं। ज़ाहिर है बुनियादी शिक्षा में सरकार की भूमिका को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता है। यदि सरकार चाहे तो सरकारी स्कूलों का कवरेज बढ़ाने के लिए उपाय कर सकती है। जैसे प्राथमिक स्तर पर किताबों की कोई एक नीति बनाना। सभी विद्यालयों को इस बात के लिए प्रोत्सहित करना की सरकारी किताबें ही पढ़ाएं। कहीं भी गैर सरकारी किताबें पढ़ाए जाने पर उचित अनुशासनात्मक कार्यवाही करना आदि। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि किताबों की प्रिन्टिंग की जिम्मेदारी सरकार खुद ले और समय पर किताबों की छपाई और स्कूलों तक किताबों को पहुंचाना सुनिश्चित करे। चूंकि हम लोकतंत्र में रह सकते हैं और शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका को सुनिश्चित करना किसी भी कल्याणकारी राज्य में सरकार का दायित्व समझा जाता है। लेहाज सरकार से किताबों की अपेक्षा रखने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए। जिन लोगों को सरकारी किताबों के पृष्ठ गन्दे, पुराने और घटिया किस्म के लगते हैं, वो लोग निश्चित तौर पर संभ्रान्त कहे जाने चाहिए। ये वही लोग हैं जो अपने बच्चों की प्राथमिक शिक्षा के लिए निजी की व्यवस्था चाहते हैं। जिसके लिए कोई भी मूल्य जैसे डोनेशन और फीस की अधिक रकम आदि अदा करने के लिए तैयार रहते हैं। लेकिन फीस वृद्धि की समस्या का समाधान सरकार से चाहते हैं। ऐसे लोग अपने बच्चों को बेशक क्वालिटी, सर्विस और प्रतिस्पर्धा के नाम पर निजी स्कूलों में पढाते हैं। ये लोग अपने बच्चों को बी.एड., इंजीनियरिंग, मेडिकल और किसी अन्य डिसिप्लीन/विषय में स्नातक व परास्नातक स्तर की पढ़ाई के लिए सरकारी काॅलेजों/संस्थानों को प्राथमिकता सूची में ऊपर रखते हैं लेकिन सरकारी प्राइमरी स्कूलों में नहीं पढ़ाने चाहते हैं? सवाल लाज़मी है कि ऐसा क्यों है? यदि अपवाद स्वरूप निम्न मध्यम वर्ग, एवं मजदूर, किसान, गरीब दलित, पिछड़ और पसमांदा परिवारों के चन्द बच्चों को छोड़ दिया जाए तो फीस की बड़ी रकम या फीस वृद्धि वाकई संभ्रान्त वर्ग की समस्या है, जिसे बार-बार सामूहिक समस्या के तौर पर पेश किया जाता है।
सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि सरकारी स्कूलों में अपने मूल मंतव्य से हट गए हैं। कम से कम मेरे लिए यह सवाल परेशानी का सबब ज़रूर है कि जिन परिषदीय और निकाय द्वारा संचालित स्कूलों को खिचड़ी और घटिया डेªस के लिए बदनामी का दंश सहना पड़ता है, वहां शत-प्रतिशत शिक्षित और प्रशिक्षित अध्यापक/अध्यापिका हैं। बावजूद इसके व्यवस्थागत दोष के चलते सरकारी विद्यालय योजनाओं के क्रियान्वयन का प्रयोगशाला बने हुए हैं। ऐसे में निजी विद्यालय गुणवत्तापरक शिक्षण व्यवस्था के चैम्पियन बने हुए हैं। मौजूदा हालात ऐसे हैं कि निजी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना जुनून बनता जा रहा है। यह भी देखा जा रहा है कि क्वालिटी और सर्विस के नाम पर मध्यम वर्ग के साथ-साथ शिक्षा के प्रति नवजागरूक निम्न मध्यम एवं निम्न वर्ग का भी एक बड़ा हिस्सा अपना सबकुछ लुटाने को आतुर है। चूंकि हम लोकतांत्रिक गणराज्य के नागरिक हैं और हम लोग नागरिकता के अधिकार के साथ-साथ अपने कर्तव्य से बंधे हैं। इस आलोक में किसी निजी स्कूल या उसके कामकाज के तौर-तरीकों का विरोध यहां मकसद नहीं है। लोकतंत्र इस बात की आज़ादी देता है कि लोग अपने पसंद के शिक्षण संस्था चला सकते हैं, अपने बच्चों का अपने पसंद की शिक्षा दे सकते हैं। लेकिन लोकतंत्र में पूंजी नियोजित निजी स्कूलों की श्रृंखला को मजबूत करना सर्वथा अनुचित है। क्योंकि शिक्षा का निजिकरण और बाजारीकरण समाज के अभिवंचित तबकों के लिए वंचना की नयी शुरूआत कर सकती है। दिलचस्प है कि गरीबों को प्राथमिक शिक्षा की वंचना से बचाने के लिए 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के अन्तर्गत निजी स्कूल में 25 प्रतिशत गरीब बच्चों का दाखिला सुनिश्चित करने का उपबंध किया गया है। ऐसा सुनने में आया है कि कई निजी स्कूल अपने यहां दाखिला देने में आनाकानी कर रहे हैं। बहरहाल, अगर बड़े स्कूलों में दाखिला मिल भी जाए तो इन 25 प्रतिशत गरीब बच्चों के लिए संभ्रांत संस्कृति को वहन करने का खर्च उठा पाना मुश्किल होगा। ऐसे में गरीब बच्चों का मनोबल टूटेगा और उनकी स्थिति न इधर की न उधर की रहेगी। क्यों न संभ्रांतों के लिए ही सरकारी प्राथमिक स्कूलों में सीट सुरक्षित कर दिया जाए। एक बार कोर्ट ने ऐसा निदेश दिया भी था कि सरकारी अधिकारी अपने बच्चों का सरकारी स्कूलों में पढ़ाएं। लेकिन लोकतंत्र पसंद और नापसंद करने की आज़ादी देता है। लिहाजा इस आइडिया को छोड़कर ही बात की जानी उचित है। पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पड़ोस में शिक्षा प्राप्त करने की अवधारणा को लागू करने संबंधी एक शासनादेश जारी किया गया। जिसके अनुसार यदि सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में किसी कक्षा में 30 बच्चों की संख्या पूरी हो जाती है तो इसके बाद के बच्चों का दाखिला नजदीक स्थित निजी स्कूल में कराया जाए। इस तरह के उपाय करके सरकारें अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हुआ मान लेती हैं। ऐसे कानूनी प्रावधान और शासन के आदेश से ज़ाहिर है कि सरकारें शिक्षा के निजीकरण, व्यावसायीकरण और बाजारीकरण के सवाल पर खामोश हैं? सरकार की खामोशी बताती है कि शिक्षा उनके एजेण्डे में प्राथमिकता सूची में बहुत नीचे है। शायद यही वजह है कि सरकारें फीस वृद्धि पर बयान जारी करके वाह-वाही तो बटोरती हंै, लेकिन फीस को नियंत्रित करने या शिक्षा पर बजट बढ़ाने का निर्णय नहीं करती हैं।
कहना पड़ रहा है कि सरकारी और निजी स्कूल प्रबंधन की बहस में प्राथमिक शिक्षण व्यवस्था दुर्दशा का शिकार हुआ है। क्योंकि सरकारी विद्यालयों से पढ़े पिछली पीढ़ी के व्यक्ति ही आज की तारीख में देश के उच्च पदों पर आसीन हैं। ऐसे अधिकारी और राजनेताओं की संख्या कम नहीं है जिन्होंने प्राथमिक शिक्षा सरकारी स्कूलों में प्राप्त किया है। फिर अचानक से सरकारी स्कूल स्तरहीन कैसे हो गए? दर असल यह सब अचानक नहीं हुआ। इसके पीछे दो दशक का समय लगा है। वो समय जिसका एक-एक लम्हा अधिशेष मुनाफा, शार्टकट और उपभोक्तावादी सोच को आगे बढ़ाने में खर्च किया जाता रहा है। इस सोच को पोषण देने और पल्लवित करने में खुद सरकार का योगदान भी रहा है। सर्व शिक्षा अभियान का दम भरने वाली सरकार के पास उपलब्धि के नाम पर नामांकन और नए विद्यालयों की संख्या में वृद्धि के अलावा कुछ और नहीं है। सरकारी स्कूलों से विमुख होते लोगों के कदम को रोकने के उपाय नहीं हैं। हो भी कैसे, सरकार की अपनी जिम्मेदारियों में शिक्षण संस्थाएं महज कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन का प्रयोगशाला बनकर रह गए हैं। गुणवत्ता की बात होती है, तो माॅडल स्कूलों और सीबीएसई बोर्ड की तर्ज पर पढ़ाई की बातें अखबारों की सुर्खियां अवश्य बनती हैं। लेकिन शिक्षकों की कमी पर ध्यान नहीं जाता है। तदर्थ शिक्षकों को स्थायी करना और नयी नियुक्तियां भी समानान्तर जारी रहती हैं, लेकिन विद्यालयों की आवश्यकताओं का सही आंकलन या तो किया नहीं जाता है, या फिर किया भी जाता है, तो समय रहते विद्यालयों की ज़रूरतों को पूरा करना शिक्षा महकमे के कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए टेढ़ी खीर होती है। 
फीस वृद्धि पर बहस जारी है। लेकिन सरकार के कंधे पर प्राथमिक शिक्षा खुद बड़ी बोझ बन गयी है। कहना पड़ रहा है कि सरकार ने बुनियादी शिक्षा को कानूनन मौलिक अधिकार बना तो दिया लेकिन शिक्षा पर खर्च होने वाले बजट के सवाल पर सरकार का मौन प्राथमिक शिक्षा के निजीकरण को बढ़ाने वाला है। एक वजह यह भी है कि इन दिनों गांव-कस्बे के लोग मतवाले की तरह प्राइवेट स्कूलों की ओर भाग रहे हैं। बल्कि भगाए जा रहे हैं। सरकार द्वारा अपना गुडविल न बनाकर निजी स्कूलों के कामकाज के तरीकों को अपनाना सरकारी स्कूलों को किसी हद तक खिचड़ी वाले स्कूलों की छवि से बचा तो सकते हैं। लेकिन शिक्षा के निजीकरण के सवाल पर सरकार की चुप्पी निजी स्कूलों में आम लोगों का भरोसा बढ़ाने वाली है। इनमें बड़ी संख्या में वो लोग भी हैं, जो पेशे से मज़दूर है, किसान हैं और मामूली दुकानों के मालिक हैं, जिनकी आजीविका किसी प्रकार चल जाती है। ये वो लोग हैं, जिनके घर का छप्पर हर बारिश में रिसने लगता है।
बहरहाल, इस स्थिति से उबरना भी ज़रूरी है। इसके लिए कई स्तरों पर कोशिश की जाने की ज़रूरत है। पहला यह कि सरकार को शिक्षा पर बजट बढ़ाना होगा। बजट बढ़ने का सीधा अर्थ है कि शिक्षक-छात्र अनुपात ठीक होगा और विद्यालयों का आन्तरिक वातावरण सुधरेगा। बात भवन की हो, पुस्तकों की हो, शिक्षा का स्तर एक बार फिर से सुधर सकता है। और जिन निजी विद्यालयों से प्रतिस्पर्धा करना है उन विद्यालयों की शिक्षण स्तर को बनाए रखा जा सकेगा। आखिर केन्द्रीय विद्यालय, सैनिक विद्यालय, नवोदय विद्यालयों की श्रृंखला सरकार ही तो संचालित करती है। फिर सरकारी स्कूल क्यों नहीं?
इस कार्य में जो बड़ी बाधा है वो है जनमानस का। जो जनमानस निजी विद्यालयों की फीस की बड़ी रकम में कुछ रियायत पर मान जाता है उसको अपना नजरिया बदलना होगा। वो चाहे तो सरकारी विद्यालयों में गठित होने वाले विद्यालय प्रबंधन समिति का हिस्सा बनकर शिक्षण के स्तर में सुधार की संभावनाएं बना सकता है। शार्ट कट और महंगे स्कूलों के रथ पर सवार होकर लक्ष्य तक पहुंचने का सपना छोड़ना होगा। क्योंकि बच्चों को बुनियादी शिक्षा चाहिए, न कि बाज़ार की उपभोक्तावादी संस्कृति। बच्चों को नम्बर एक पे देखने की हसरत त्यागनी होगी। सबसे महंगे स्कूल में पढ़ाने की ख्वाहिश भी छोड़नी होगी। यदि ऐसा होता है तो निश्चित ही शोषक चरित्र वाले निजी विद्यालयों से निजात मिलेगी। और निःशुल्क बच्चों को गुणवत्तापरक शिक्षा मिल सकेगी। बच्चा सरकारी स्कूल में पढ़े या निजी स्कूल में समाज में स्टेटस मेन्टेन करना अभिभावक के लिए कोई चुनौती नहीं होगी।
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Saturday, September 22, 2012

खुदरा बाज़ार में एफडीआई: कठिन सुधारों की कठिन मार

"खुदरा बाजार में एफडीआई महज सरकार की असफलता को नहीं दर्शाता है बल्कि विपक्ष में बैठे उन तमाम दलों की सियासी समझदारी पर भी सवालिया निशान है जो इस देश के गरीब, नौजवान, किसान, मज़दूर, दलित, पिछड़े और पसमांदा अवाम के हक की बात करते हैं। कहना होगा कि यह असफलता उन कारोबारियों की भी है जिन्होंने बतौर मतदाता अपने लोकतांत्रिक दायित्वों के निर्वहन में बार-बार कोताही की है।"

खुदरा बाज़ार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को मंजूरी के फैसले को मुद्रा स्फीति में सुधार, रोजगार के नए अवसरों का सृजन और देश में विदेशी मुद्रा के प्रवाह में वृद्धि आदि कारणों से उचित बताया जा रहा है। दूसरी तरफ विरोधी खेमा इस फैसले को खुदरा बाजार पर विदेशी प्रभुत्व के बढ़ते प्रभाव के रूप में देख रहे हैं। ये बात और है कि विभिन्न दल क्षेत्रीय राजनीतिक ज़रूरतों के मद्दे नज़र इस फैसले का समर्थन और विरोध कर रहे हैं। खुदरा व्यापार में एफडीआई से असहमति की अभिव्यक्ति से कुछ बातें स्पष्ट हैं। जैसे, खुदरा कारोबारियों का आस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। ठीक वैसे ही जैसे कि मुक्त बाजार नीति के चलते छोटे-छोटे घरेलू उद्योगों का हाल हुआ है। इसमें बनारसी साड़ी से लेकर अलीगढ़ के ताला उद्योग सभी शामिल हैं। तथ्य यह है कि अगर नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के दूरगामी परिणामों को समझने में 20 वर्षों से अधिक समय लगा तो क्या यह समझा जाए कि खुदरा बाजर में एफडीआई के परिणामों को समझने में भी लगभग इतना ही समय लगेगा। यदि ऐसा होता है तो आने वाले दो दशकों में खुदरा कारोबार में एफडीआई के कूप्रभावों को झेलने के लिए हमें तैयार रहना चाहिए। इन प्रभावों में एक यह होगा कि खुदरा बाज़ार के कारोबारियों की वैयक्तिक व्यावसायिक पहचान और आस्तित्व समाप्त हो जाएगा। इस वास्तविकता को दोबारा साबित करने की ज़रूरत भी नहीं है क्योंकि पिछले कुछ एक दशकों में शापिंग  माल कल्चर के अंधाधुंध प्रसार ने पहले ही व्यावसायिक आज़ादी को शापिंग माल कल्चर के रास्ते बाज़ारपरस्त पूंजीपतियों के यहां गिरवी हो चुकी है। अब बारी छोटे शहरों-कस्बों और गांव-देहातों की है। देखने और सुनने में शापिंग माॅल का कल्चर बेहद अच्छा और सुखद लगता है। लेकिन पांच की तरबूज तीस में बिकने के बाद भी जब तरबूज पैदा करने वाले किसानों की जेब में उचित पैसा नहीं पहुँचता तो सवाल लाज़मी तौर पर उठता है कि एफडीआई के रास्ते कितने किसानों और कितने दुकानदारों का भला होगा?
रही बात नौकरियों के अवसर सृजन का तो इस संभावना से इंकार मुश्किल है कि जो कारोबारी छोटी पूंजी से कारोबार कर रहे हैं क्या वो आने वाले समय में एफडीआई के बड़ी पूंजी के चंगुल में नहीं फंसेगे। बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है वाला मुहावरा सटिक बैठता है। इस संभावना से इसलिए भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है क्योंकि आर्थिक सुधारों की एक बुनियादी शर्त प्रतिस्पर्धा को बढ़ाना और बढ़े हुए प्रतिस्पर्धी माहौल में गुणवत्ता को बनाए रखना है। प्रतिस्पर्धा अच्छी बात है लेकिन बड़ी मछली और छोटी मछली के बीच प्रतिस्पर्धा क्या समतामूलक सिद्धांतों की अनदेखी नहीं है?
ज़ाहिर है जब प्रतिस्पर्धा समानता के मूलभूत सिद्धांतों को धता-बता कर होगी तो बड़ी मछली छोटी-छोटी मछलियों को एक-एक करके निगलती जाएगी। बताना नहीं है कि खुदरा कारोबारियों की स्थिति छोटी-छोटी मछलियों की सी है। जब बड़ी पूंजी का दखल उनके कारोबार की चौखट पर दस्तक देगा तो किसी तरह अपनी दुकान और घर-परिवार चलाने वाले छोटे कारोबारियों की लाइफ लाइन ही छिन जाएगी। चमक-दमक वाली गुणवत्ता की प्रतिस्पर्धा में बने रहने का दबाव ऐसे दुकानदारों पर पहाड़ बन कर टूट पड़ेगा। छोटी पूंजी की स्थिति छोटी मछली की होती है। इसलिए ऐसे कारोबारी मालिक से नौकर की स्थिति में आ जाएंगे। अर्थात नौकरियां निश्चित रूप से बढ़ेंगी। लेकिन यह सब व्यावसायिक स्वंतंत्रता को गिरवी रखवाने के बाद होगा।
समकालीन राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि सरकार अपने फैसले पर पुनर्विचार करने जा रही है। जो क्षेत्रीय पार्टियां विरोध का स्वर बुलन्द कर रही हैं उनके पास एफडीआई के विरोध का तात्कालिक तर्क तो है लेकिन एफडीआई जैसे तमाम फैसलों की तह तक जाने का साहस नहीं है। शायद इन्हें भी पता है कि ऐसे जनविरोधी फैसलों के तार आर्थिक सुधारों से जुड़े हैं। यह बात किसी से छुपी नहीं रह गयी है कि सुधारों के मोर्चे पर सूबाई सियासत की धार पर केन्द्र में मज़बूत स्थिति रखने वाली पार्टियां अपने ही घर में किस तरह नाकाम हुई हैं।
कहना पड़ रहा है कि खुदरा बाजार में एफडीआई महज सरकार की असफलता को नहीं दर्शाता है बल्कि विपक्ष में बैठे उन तमाम दलों की सियासी समझदारी पर भी सवालिया निशान है जो इस देश के गरीब, नौजवान, किसान, मज़दूर, दलित, पिछड़े और पसमांदा अवाम के हक की बात करते हैं। कहना होगा कि यह असफलता उन कारोबारियों की भी है जिन्होंने बतौर मतदाता अपने लोकतांत्रिक दायित्वों के निर्वहन में बार-बार कोताही की है। चूंकि सभी दल अभी से 2014 के चुनावी दंगल में उतरने की तैयारी में हैं तो जनता को भी इस दंगल में दो-दो हाथ करने के लिए कमर कस लेना चाहिए। यह समय देश की राजनीति और अर्थव्यव्यस्था के लिए संकट का समय है। इसका समाधान तभी निकलेगा जब उबी हुई और उकताई हुई जनता अपना विकल्प खुद सामने लाएगी। वरना आर्थिक संवृद्धि के नाम पर प्रधानमंत्री के कठिन सुधारों की कठिन मार झेलने के लिए तैयार रहना होगा।

कैनविज टाइम्स, 22 सितम्बर 2012

Wednesday, August 1, 2012

निवेश आधारित मीडिया की दशा और दिशा


पिछले कुछ वर्षों में खासकर इलेक्ट्राॅनिक मीडिया में ऐसी प्रस्तुतियों को प्रधानता प्राप्त हुई है जो निवेश और मुनाफा के सिद्धांतों पर आधारित हैं। चूंकि मीडिया भी एक तरह का साहित्य है और साहित्य समाज का दर्पण कहा जाता है। लेहाजा यह मानना होगा कि मीडिया में भी जो कुछ दिखाया जा रहा है वह हमारे समाज का सच है। लेकिन मीडिया की प्रस्तुतियों को सिर्फ साहित्य के दायरे तक सिमित करके नहीं देखा जा सकता है। क्योंकि मीडिया मनोरंजन के साथ-साथ संवाद का असरदार माध्यम भी है और लोकतंत्र के चैथे स्तंभ के रूप में इसकी अपनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी होती हैं। मौजूदा दौर में तो इलेक्ट्राॅनिक मीडिया समय की तंगी का सस्ता और आसान विकल्प भी है। देखा जाए तो पिछले बीस बरसों में मीडिया बदलाव के बड़े दौर से गुज़रा है। बदलाव के इन दो दशकों में मीडिया विशेषकर इलेक्ट्राॅनिक मीडिया की जो नयी पहचान बनी है, उसे निवेश, टी.आर.पी. और मुनाफा से अलग करके नहीं देखा जा सकता है।
निवेश आमंत्रित करना अर्थव्यवस्था के प्राथमिक उद्देश्यों में है। क्योंकि इसका संबंध आर्थिक विकास की दर से बताया जाता है। इस दृष्टि से मीडिया निवेश आमंत्रित करने और निवेशकों दोनों के लिए एक ऐसा क्षेत्र है जहां कम समय में अधिक मुनाफा का संयोग प्रबल है। सरकार उच्च विकास दर हासिल करने के लिए अधिक से अधिक निवेश चाहती है तो वहीं दूसरी तरफ देसी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अधिक से अधिक मुनाफा प्राप्त करने के लिए अधिकाधिक निवेश की करने को लालायित हैं। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि बाजारवादी व्यवस्था में “अधिक निवेश और अधिक मुनाफा” के फार्मुला पर काम करता है। 1991 के बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था की दशा और दिशा में जो बदलाव सामने आए हैं, उससे सरकार और कल्याणकारी राज्य की अवधारणा ही बदल गयी है। जिसके चलते मनोरंजन चैनलों की प्रस्तुतियों में समाज के गंभीर मुद्दों को उपभोग करने वाली ऐसी वस्तु के रूप में परोसा जाना संभव हुआ है जिसे देखने वालों की संख्या निरन्तर बढ़ी है। ऐसे मनोरंजक प्रस्तुतियों को देखने वाले दर्शकों की संख्या में वृद्धि का सीधा संबध टी.आर.पी. से है। टी.आर.पी. में वृद्धि का मतलब है अधिक विज्ञापन और अधिक मुनाफा। ज़ाहिर है, निवेश, टी.आर.पी. और मुनाफा रंजित मनोरंजक सीरियलों में किसी गंभीर सामाजिक समस्या की प्रस्तुति और समस्या के समाधान की संभावनाएं निरन्तर कम होती गयी हैं। पिछले दिनों देश में गिरते शिशु लिंगानुपात, दहेज और बच्चों के साथ यौनाचार जैसे मुद्दों पर एक चैनल ने “सत्यमेव जयते” शुरू किया जिसके एंकर आमिर खान को प्रस्तुति के एवज में करोणों-करोण का भुगतान किया जा रहा है। “सत्यमेव जयते” या ऐसे अन्य सीरियलों/रियालिटी शो की प्रस्तुति के मुद्दों से कोई विरोध नहीं है। लेकिन देखना होगा कि क्या समाज के गंभीर मुद्दों को मीडिया के केन्द्र में लाने और समाज को जागरूक करने के लिए सेलेब्रिटि का होना अनिवार्य और अपरिहार्य हैं? क्या ऐसे मुद्दों पर समाज को चेतित करने में ज़मीनी सतह पर काम करने वाले लोगों की कोई भूमिका नहीं रही है? दरअसल सेलेब्रिटी द्वारा प्रस्तुति का संबंध भी मीडिया के निवेशवादी माॅडल से है। यह संबंध निवेश, टी.आर.पी. प्रस्तुति, प्रसारण और दर्शक हर स्तर पर है। ऐसे कार्यक्रमों के स्क्रिप्ट राइटर, एडिटर, प्रस्तुतकर्ता और इन्हें देखने वाले तथा टिप्पणी करने वाले सभी उसी क्लास से आते हैं जो मुनाफा आधारित सुविधाभोगी जीवन में विश्वास करते हैं। यही वजह है कि जमीनी कार्यकर्ताओं को उनके तमाम संघर्षों के बाद भी न तो उन्हें उचित मानदेय/पारिश्रमिक मिल पाता है और न ही ख्याति। मीडिया का यही रूप नागवार है।
आज की मीडिया निवेश के दम पर मुख्य धारा की मीडिया को परिभाषित कर रही है। प्रस्तुति के विषय, तौर तरीके और दर्शक की संख्या तय कर रही है। कुछ कहिए तो एक मिथक जनता पर थोप कर खुद को आर्थिक दोहन के इल्जाम से बरी भी कर लेती है। सवाल लाज़मी है कि आर्थिक दोहन के पूरे प्रकरण में मीडिया का एकतरफा प्रभाव कैसे संभव हो पाता है। दरअसल सैटेलाइट चैनलों के माध्यम से एक ही समय में लाखों-करोड़ों परिवारों और व्यक्तियों तक पहुंचना तो मुमकिन है। लेकिन लाखों-करोणों व्यक्तियों के लिए एक क्लिक में अपनी शिकायतों को सही जगह पहुंचाना संभव नहीं है। बहरहाल, सैटेलाइट चैनलों पर शिकायत करने के लिए http://www.nbanewdelhi.com/ फ्लैश किया जा रहा है। ताकि किसी कार्यक्रम में किसी भी तरह की आपत्ति हो तो दर्शक इस वेव साइट पर आॅन लाइन शिकायत कर सकें। लेकिन इस साइट पर जो आॅब्जेक्टिव दिए गए हैं उनमें निवेशवादी मीडिया इंडस्ट्री के हित रक्षण का ध्येय अधिक प्रभावी जान पड़ता है। दूसरी तरफ कानूनी कार्यवाही के लिए न जो जनता के पास पैसे हैं और न ही इतना समय कि वो मनोरंजन के आर्थिक दोहन की गतिविधियों के विरोध में व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर कोई कानूनी हस्तक्षेप करे। खासकर ऐसे में जबकि कमरतोड़ महंगाई और आजीविका के लिए अधिक से अधिक संसाधन जुटाने का वैश्विक संकट दिनों-दिन गहराता जा रहा हो। “सोने की जेब और लोहे के पैर” वाली कहावत प्रासंगिक जान पड़ता, है जो पूंजीपरस्त मीडिया घरानों के पास ही है। लोकतंत्र में सभी को आज़ादी का समान हक है। शायद यही वजह है कि यदि चैनलों को प्रस्तुति के तौर-तरीकों की आज़ादी है तो वहीं दूसरी तरफ दर्शकों को चैनलों पर दिखाए गए किसी कार्यक्रम के खिलाफ शिकायत की आज़ादी भी है। लेकिन कहना होगा कि लोकतांत्रिक आज़ादी की सीमा तय करने में आर्थिक सुधारों पर आधारित निवेश की भूमिका लगातार बढ़ी है। जिसकी वजह से बड़ी और मज़बूत आज़ादी के सामने छोटी और कमज़ोर आज़ादी को दम तोड़ना पड़ रहा है।
जाहिर है मीडिया के नए ताने-बाने और तौर-तरीकों को स्वाभाविक स्वीकृति आर्थिक सुधारों के मीडिया पर पड़ने वाले प्रभावों में सबसे अहम है। ऐसे में तथाकथित मुख्य धारा की मीडिया की भूमिका निवेश के अनुरूप तय होना भी स्वाभाविक है। समाज के किसी ज्वलंत मुद्दे का अर्थपूर्ण होना या महत्वहीन होने में इस स्वाभाविकता की बड़ी भूमिका है। इस स्वाभाविकता के चलते ही न तो ज़मीनी समस्याओं को प्रमुखता मिल पाती है और ज़मीनी स्तर पर काम करने वाली हाशिए की आवाज़ों को यथा सम्मान मिल पाता है।


कैनविज टाइम्स, 27 जून 2012

Monday, May 28, 2012

आर्थिक सुधारों की विवशता है मूल्य वृद्धि

पेट्रोल की कीमतों में की जाने वाली वृद्धि को पेट्रोलियम मंत्री ने अर्थव्यवस्था के दीर्घकालिक हित के लिए उचित फैसला बताया तो वहीं दूसरी तरफ बढ़ी कीमतों का ठीकरा राज्य सरकारों के सर फोड़ते हुए यही भी कहा गया कि यदि राज्य सरकारें करों में कमी करें तो पेट्रोल सस्ता हो सकता है। तीसरी ओर छुटपुट विरोध-प्रदर्शनों को छोड़ दें तो  मूल्य वृद्धि की खबरें प्रसारित होते ही बाइक और कार सवार उपभोक्ताओं को पेट्रोल पम्पों की ओर कूच करते देखा गया ताकि वो अधिक से अधिक ईंधन संरक्षित कर सकें। यह पहली बार नहीं है कि ईंधन में वृद्धि की गयी है। बल्कि पिछले कुछ बरसों में कभी वैश्विक बाजार में प्रति बैरल पेट्रोलियम ईंधन की कीमतों में वृद्धि तो कभी वैश्विक मंदी को संदर्भित करके ईंधन में वृद्धि की जाती रही है। पेट्रोल कीमतों में हालिया वृद्धि के पीछे सबसे बड़ा तर्क यह दिया जा रहा है कि अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए वृद्धि जरूरी थी।

जहां तक भारतीय अर्थव्यवस्था की बात है तो 1991 में इसे राजकोषीय घाटा और मुद्रा स्फीति के संकट से बचाना सबसे बड़ी चुनौती थी। इस निमित्त भूमण्डलीकरण को सबसे अच्छा विकल्प मानकर आर्थिक सुधारों की नीति अपनायी गयी। आर्थिक सुधारों की राह पर पग रखते हुए यह कहा गया था कि इस नीति के बदौलत आने वाले समय में अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होगी। लेकिन पिछले दो दशकों के अनुभव बताते हैं कि अर्थव्यवस्था में कमोबेश उतार-चढ़ाव को छोड़ दिया जाए तो इसके नाकारात्मक परिणाम ही अधिक रहे हैं। यह बात अलग है कि संवृद्धि को ही सम्पूर्ण विकास मानने वाले अर्थशास्त्रियों और विश्लेषकों की नज़र में देश पहले से खुशहाल और समृद्ध हुआ है। लेकिन सामाजिक संदर्भों में देखा जाए तो अमीरी और गरीबी की खाई पहले से कहीं अधिक बढ़ी है। दूसरी तरफ मंहगाई कब एक से दो अंकों में पहुंच जाती है इसका पता आम जनता को नहीं होता। जाहिर है पेट्रोल कीमतों में लगातार वृद्धि को सही ठहराने के लिए एक बार फिर 1991 जैसे ही तर्कों का सहारा लिया जा रहा है कि आने वाले समय में देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। एक आम नागरिक की हैसियत से इस सवाल को आपके बीच रखना चाहता हूं कि वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि से अर्थव्यवस्था को यदि वास्तव में मजबूती मिलती है और समाज के हर तबके तक विकास की धारा पहुंचती है तो कहना नहीं होगा कि पिछले दो दशक में तमाम वस्तुओं की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। लेकिन दुःखद है कि मंहगाई ही अर्थव्यवस्था की मजबूती की शर्त है तो आसमान छूती मंहगाई के इस दौर में भी देश की अर्थव्यवस्था आखिर क्यों संकटों से घिरी हुई है?

गौर तलब है कि राज्य सरकारों को करों में कमी करके मूल्य वृद्धि से राहत दिलाने का तर्क देकर न सिर्फ वृद्धि से ध्यान हटाने की कोशिश हो रही है बल्कि मूल्य वृद्धि के फैसले को वापस लेने के सरोकार की संभावनाओं को भी सिरे से नकारा जा रहा है। पूरी बहस इस बिन्दु पर केन्द्रित है कि यदि राज्य सरकारें चाहें तो पेट्रोलियम ईंधन पर करों में कमी करके पेट्रोल कीमतों को कम कर सकते हैं। ध्यान देना होगा कि एक तरफ केन्द्र सरकार मुक्त बाजार के सिंद्धांतों या यूं कहें कि आर्थिक सुधारों की विवशता के कारण तेल कम्पनियों पर नियंत्रण समाप्त करने की दिशा में अग्रसर है वहीं दूसरी तरफ वृद्धि के फैसले खुद करके राज्य सरकारों को अपने करों में कमी करने का सुझाव भी दे रही है। निश्चित तौर पर पेट्रोलियम उत्पादों पर राज्य द्वारा वैट की दर कम किए जाने की भी जरूरत है। लेकिन यह भी तय होना चाहिए कि इस कमी के बाद पेट्रोल जैसे ईंधन उचित मूल्य पर उपलब्ध होने लगेंगे?

पेट्रोलियम कंपनियों का हाल यह है कि ये नियंत्रणहीनता और मुनाफा चाहती हैं। अर्थशास्त्रीय शब्दावली में कहा जाए तो हानि की स्थिति में कोई भी व्यापारिक प्रतिष्ठान अधिक दिनों तक सेवा नहीं दे सकता है। लेकिन मुक्त बाजार के सिद्धांतों के अनुरूप लिया जाने वाला हर फैसला मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति को न सिर्फ बढ़ावा दे रहा है बल्कि आम जनता तक संसाधनों की पहुंच में रूकावट पैदा कर रहा है। इस बात को इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि जब-जब पेट्रोल या डीजल जैसे ईंधनों में वृद्धि होती है इसका प्रभाव यातायात किराया पर भी पड़ता है। विशेषकर गांव से कस्बों और कस्बों को शहरों से जोड़ने वाले यातायात पर। अनुमानतः 20 किमी की यात्रा के लिए एक आम व्यक्ति को कम से कम 20 रूपए का भुगतान करना पड़ता है। वो भी वैसे स्थानों पर जहां नियमित रूप से यातायात संसाधन उपलब्ध हैं।

कुछ बातें मीडिया की भी हो जाए। मीडिया को पेट्रोल पम्पों पर कार सवारों और बाइक सवारों की भीड़ आसानी से नजर आ जाती है। लेकिन बसों और रेलगाडि़यों की भीड़ जो हर दिन हर बस और रेलगाड़ी में जानवरों की मानिन्द सफर करती है, उस भीड़ की ओर कैमरा घुमाना और प्रसारण दिक्कत तलब काम होता है। कहना नहीं है कि ईंधन की कीमतों में वृद्धि यातायात संसाधनों की सिमित सुलभता जैसी स्थिति में यातायात संकट को अधिक गहराने वाला फैसला है। ऐसे में यदि कोई गरीब यदि समय रहते इलाज के लिए अस्पताल न पहुंच पाने के कारण दम तोड़ दे तो हैरानी की बात नहीं। कोई आम व्यक्ति अपने किसी प्रिय संबंधी या शुभचिंतक का कुशलक्षेम पूछने दस-बीस किमी की यात्रा न कर पाए तो भी हैरान होने की ज़रूरत नहीं है। क्योंकि अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए इनकी भावनाओं की अवहेलना और त्याग आवश्यक है। पेट्रोल पम्पों पर भीड़ लगाकर टंकी फुल करवाने वालों का क्या! वो तो क्षणिक राहत प्राप्त करने के अभ्यस्त हो चुके हैं। विरोध-प्रदर्शन तो बस राजनीतिक क्षमता प्रदर्शन तक सिमित होकर रह गया है। वरना संसद में बैठ प्रतिनिधियों से आंख चुराकर किसी भी सरकार के लिए जनविरोधी फैसले लेना आसान काम नहीं है।

कैनविज टाइम्स, 29 मई, 2012