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Wednesday, September 27, 2017

बुनियादी शिक्षा में सुरक्षा के सरोकार: व्यक्ति, समाज और सरकार


शिक्षक दिवस के ठीक दो दिन बाद 8 सितम्बर 2017 अन्तर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस की सुबह हरियाणा के गुरूग्राम स्थित एक प्रतिष्ठित निजी स्कूल में कक्षा दो में पढ़ने वाले एक बच्चे की हत्या हुई। खबरों में यौन अपराध को हत्या का कारण बताया गया। आरोपी बस कन्डक्टर को गिरफ्तार कर लिया गया। अभिभावकों ने बड़ी संख्या में स्कूल के सामने विरोध-प्रदर्शन और तोड़फोड़ करके अपने गुस्से का इजहार किया। स्कूल की प्रिन्सिपल को सस्पेन्ड कर दिया गया और मांग करने वालों ने स्कूल को अविलम्ब बन्द करने की मांग की। विरोध-प्रदर्शन कर रहे अभिभावकों को यह कहते हुए भी सुना गया कि “स्कूल वाले फीस अधिक लेते हैं और बस वालों से उनकी सेटिंग है।” इन सबके बीच शासन प्रशासन अपना काम तो कर ही रहा है। जो सबसे महत्वपूर्ण है, वो यह कि जांच करके एक रिपोर्ट प्रस्तुत करना। जांच में घटना का विवरण, कारण और अन्य जानकारियां हो सकती हैं। फिर भी मुझ जैसे लेखक को महसूस होता है कि इस घटना के प्रकाश में सिर्फ निजी स्कूलों की ही नहीं बल्कि शासन-प्रशासन की भूमिका के साथ-साथ व्यक्ति और समाज की महत्वाकांक्षा की जांच भी हानी चाहिए। क्योंकि इस घटना ने एक तरफ जहां हमें हमारी शिक्षण व्यस्था के दोष से अवगत कराया है, वहीं दूसरी तरफ इस घटना ने शिक्षण व्यवस्था के प्रति व्यक्ति और समाज के दृष्टिकोण और दायित्व को भी उजागर किया है कि आखिर हमारा समाज अपने बच्चों की शिक्षा के लिए किस प्रकार का शिक्षण व्यवस्था तैयार कर रहा है? सवाल यह भी है कि क्या हमारा समाज निजी महत्वाकांक्षाओं वाली व्यवस्था के अधीन खुद को समर्पित कर चुका है या सामूहिक प्रतिनिधित्व वाली लोकतांत्रिक संस्थाओं में नयी संभावनाओं के बीज भी बोना चाहता है।

कोई भी स्कूल अपने समाज की सीमाओं से परे नहीं हो सकता है। इस आलोक में प्रथम दृष्टिया कहा जा सकता है कि स्कूल प्रबन्धन की लापरवाही के कारण ही बच्चे की जान गयी होगी। स्कूल प्रबन्धन और बाल शिक्षा के सिद्धान्तों के अनुरूप स्कूल प्रबन्धन को इस जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता कि वो बच्चे के पारिवारिक पृष्ठभूमि से लेकर उसके समाज और स्कूल के आस-पास के वातावरण आदि का संज्ञान ले और तत्संबन्धी विवरण रखे। ऐसा करने से किसी भी स्कूल प्रबन्धन के पास इस तरह की घटना को टालने की संभावना अधिक होती है। अगर बाल शिक्षा में गाइडेन्स की भाषा में कहा जाए तो स्कूल प्रबन्धन द्वारा इकट्ठा की गयी इस तरह की जानकारी चेक बॉक्स का काम करती है। चूंकि हरियाणा के गुरूग्राम के जिस स्कूल में बच्चे की हत्या की घटना घटी है, वो स्कूल नामी-गिरामी है, इसलिए ऐसे स्कूलों के प्रबन्ध कर्ताओं से ऐसी लापरवाही की उम्मीद नहीं की जा सकती है। वैसे भी निजी स्कूल वाले या कोई भी निजी प्रतिष्ठान अपने स्टॉफ से कम समय और कम पारिश्रमिक में अधिक काम लेने के लिए बदनाम रहे हैं। सरकार भी इस मंतव्य से सहमत है। दिलचस्प यह भी है कि जबसे निजीकरण की बयार चली है तब से कामकाज के इस तरीके को कारपोरेट के साथ-साथ सरकारें भी बढ़ावा दे रही हैं। बहरहाल, ऐसा प्रतीत होता है कि बस चालक स्कूल का स्टॉफ नहीं था और उसकी किसी अध्यापक या अध्यापिका की भांति टीचिंग-लर्निंग का हिस्सा मानकर ट्रेनिंग नहीं की गयी हो। ज्ञात हो सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में बच्चों को माता-पिता और अध्यापक-अध्यापिका के केन्द्र में रखकर शैक्षिक क्रिया-कलाप सम्पन्न होता है। ज़रूरी है कि स्कूल बस (चालक और खलासी के साथ) को संचालित करने वाले व्यक्ति/संस्था को भी माता-पिता और अध्यापक-अध्यापिका की तरह एक छोर पर रखा जाए। सरकारों को इस बिन्दु पर शोधपरक समझदारी विकसित कर इस दिशा में कानून भी बनाने की जरूरत है। ताकि स्कूल जाते हुए बच्चों के परिवेश में जो भी चीजें, व्यक्ति या बातें हों, उन्हें उनकी शिक्षा को प्रभावित करने वाले साकारात्मक अथवा नाकारात्मक कारक के रूप में मान्यता मिल सके। जब ऐसी मान्यता मिल जाएगी तो बस चालक हो या खलासी या सड़क और बाजार, हर व्यक्ति के अन्दर और हर एक स्थान पर बच्चों को एक ऑब्जेक्ट के रूप में देखने का नजरया विकसित होगा। एक ऐसा ऑब्जेक्ट जिसके बारे में कहा जाता है कि बच्चे देश के भविष्य हैं। न जाने कितने गीत और कविताएं इन पर लिखे और गाए गए है। उदाहरण के तौर पर “इनमें मेरे आने वाले जमाने की तस्वीर है.....“, “बच्चे मन के सच्चे.....”, “आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं.....”, “मुझे दुश्मन के बच्चों को पढ़ाना है.....” वगैरह-वगैरह। ऐसे आदर्श सामाजिक परिस्थिति में कोई भी बच्चा “सेक्सुअल एब्यूज“ यानि यौन शोषण या वायलेन्स (हिंसा) का शिकार नहीं होगा।

जाहिर है हम स्कूल से जुड़े विभिन्न व्यक्तियों, कर्मचारियों और संस्थाओं को सीखने-सिखाने के विषय पर निरंतर संवेदीकरण करते रहें तो मुमकिन है कि बच्चों को विभिन्न कारणों से हिंसा का शिकार बनने से बचाया जा सकता है। लेकिन हमें यह भी देखना होगा कि आजादी के बाद से अब तक हमने शिक्षा के क्षेत्र में जो प्रयोग किए गए हैं, उनका प्रभाव क्या पड़ा? खासकर 1991 में जब आर्थिक सुधारों से अनुप्राणित निजीकरण की शुरूआत हुई। निस्संदेह आर्थिक सुधारों ने बुनियादी शिक्षा को निजीकरण के रास्ते पर आगे बढ़ाया है। इसे प्रगति के रूप भी देखा जा सकता है और बुनियादी शिक्षा के पतन के तौर पर भी परिभाषित किया जा सकता है। प्रगति इसलिए क्योंकि बुनियादी शिक्षा में नित नए प्रयोग हुए और माण्टेसरी एवं किण्डरगार्टेन की शिक्षण प्रणाली का विस्तार हुआ। लेकिन दूसरी तरफ इन नए प्रयोगों की आड़ में सरकारों ने बुनियादी शिक्षा में पूंजी की भूमिका को प्रमुखता से स्थापित किया। पूंजी की भूमिका को बढ़ाने का सवाल शिक्षा के बाजारीकरण के सवाल से जुड़ा हुआ है। यह सवाल हमें इस दिशा में विचार करने का अवसर देता है कि एक के बाद एक हमारी सरकारें बुनियादी शिक्षा के तंत्र पर समाज के विविध समुदायों की निर्भरता को कम करने संबंधी नीतियां बनाती रही हैं। शिक्षा का निजीकरण (बाजारीकरण) सरकार के कामकाज के इसी रवैये की अभिव्यक्ति है। कहा जा सकता है कि निजीकरण की नीती में आत्मनिर्भरता का पुट है। यह नीती गुणवत्ता और सेवा की प्रतिबद्धता से ओत-प्रोत है। लेहाजा देश भर में निजी स्कूलों का बड़ा नेटवर्क देखा जा सकता है। जिनके होर्डिंग्स पर क्वालिटी एजूकेशन के एक से एक वादे लिखे रहते हैं। इनके पाठ्यक्रम में महंगी किताबें होती हैं, महंगे अध्यापक/अध्यापिका हो सकते हैं, पूंजी प्रायोजित संभ्रान्त संस्कृति का प्रदर्शन हो सकता है, लेकिन समाजिक सरोकारों का मूल्य, परंपरा और संस्कार के रूप में सर्वथा अभाव रहता है। ऐसी स्थिति पूंजी प्रायोजित शिक्षण संस्थाओं और मानवीय संवेदनाओं के बीच की खाई को बढ़ाने वाली होती है। ऐसे में अमानवीय कुमनोवृत्तियों को समय रहते चिन्हित करना संभव नहीं होता। यदि हरियाणा वाली घटना की बात करें तो इस संभावना से इंकार मुश्किल है कि पूंजी की प्रधानता ने ही स्कूल प्रबन्धन को बस चालक के मन की बात को पढ़ने से वंचित रखा। यह घटना हमें यह सीख भी देती है कि किसी भी स्कूल में वाहन चालक के लिए न्यूनतम शैक्षिक और सामाजिक अर्ह्ता का निर्धारण वक्त की जरूरत है। जिस तरह से रेल के परिचालन के लिए ड्राइवरों के स्वास्थ्य की जांच वगैरह का नियम है, उसी तरह से स्कूल वाहनों के परिचालकों का समय-समय पर सामान्य स्वास्थ्य और मनोवैज्ञानिक परीक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए।

अक्सर ऐसी खबरें भी आती हैं कि ड्राइवर की गलती या लापरवाही से स्कूली वाहन पलट गया, बच्चे घायल हो गए या मर गए। ऐसे मामलों में अभिभावकों का गुस्सा भी देखने में आता है। तोड़फोड़ से लेकर आगजनी सबकुछ पलभर में कर देते हैं। गौरतलब है कि जो अभिभावक अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए नामी-गिरामी स्कूलों में भेजता है। वही अभिभावक अपने बच्चे के साथ कुछ अप्रिय होने पर हिंसक और क्रूर क्यों हो जाता है? यही रवैया निजी नर्सिंग होम या निजी अस्पतालों या निजी प्रैक्टिशनरों के साथ देखा गया है। जब तक गुणवत्ता और सेवा मिलता रहता है, तब तक तो अभिभावक स्कूलों की ओर और तीमारदार अस्पताल की ओर नजर नहीं करते। लेकिन जैसे ही कुछ उन्नीस-बीस होता है, अभिभावक और तीमारदार अपनी नागरिक जिम्मेदारियों को भूलकर हिंसक हो उठते हैं। शायद इसलिए कि अभिभावक और तीमारदार के रूप में हमारी महत्वाकांक्षा उस शिखर पर पहुंच चुकी है, जहां से हमें अपनी वैयक्तिक इच्छाओं के अलावा किसी और के दुःख-दर्द की पीड़ा महसूस नहीं होती है। शायद इन्हीं कारणों और परिस्थितियों के चलते हम अपने बच्चों के लिए पूंजी प्रायोजित स्कूलों को चुनते हैं। जहां मैं, मेरा का बोध ज्यादा होता है और सामाजिक संवेदना का अभाव होता है। दूसरी बात यह कि यदि पूंजी प्रायोजित स्कूल या अस्पताल फीस अधिक ले रहे हैं और उन्हें बच्चों और मरीजों की चिन्ता नहीं है तो हम अपने बच्चों का दाखिला सरकारी स्कूलों में क्यों नहीं कराते? या सरकार पर दबाव क्यों नहीं बनाते कि शिक्षा की पूरी जिम्मेदारी सरकार खुद उठाए।

कुछ लोग यह सुझाव दे रहे हैं कि विद्यालयों में सीसीटीवी कैमरे अनिवार्य कर देने चाहिएं। एडवोकेट जैनेश कश्यप का विचार है कि स्कूल में सीसीटीवी कैमरों को संचालित करने के लिए अलग से एक ऑपरेटर की नियुक्ति करनी चाहिए, जो नित्य प्रतिदिन इसे देखा और जांचा करे। दिनेश चन्द्र राय इण्टर कॉलेज मुहम्मदाबाद में अंग्रेजी के प्रवक्ता रहे हैं। उनकी जिज्ञासा “यह व्यवस्था कौन करेगा?“ का जवाब देते हुए एडवोकेट जैनेश कश्यप अपने फेसबुक वाल पर लिखते हैं कि “यह व्यवस्था विद्यालय प्रशासन को करनी चाहिए। उनके ऊपर अभिभावकों व जिला प्रशासन का दबाव होना चाहिए।”  एडवोकेट जैनेश कश्यप और दिनेश चन्द्र राय की बातों से जाहिर होता है कि अगर स्कूल प्रबन्धन सीसीटीवी कैमरा का बन्दोबस्त करले और इसके लिए एक ऑपरेटर रख ले तो बच्चों के साथ होने वाली आपराधिक घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सकती है। तकनीक के इस्तेमाल से हमारे जीवन में आसानिया पैदा हुई हैं। चूंकि बात एक यौन अपराध के आइने में एक बच्चे की नृशंस हत्या के संदर्भ में हो रही है, तो हमें देखना पड़ रहा है कि तकनीक ने मानव मन को उसकी नैसर्गिक दोष युक्त सोच से मुक्त करने में क्या भूमिका निभाया? इस सवाल पर गौर करने से ऐसा प्रतीत होता है कि हम तकनीक के क्षेत्र में, तकनीक के इस्तेमाल से कामयाबी की तमाम सीढ़ियां चढ़ने के बाद भी मानव मन में साकारात्मक सामाजिक सोच युक्त संवेगों की प्रबल धारा प्रवाहित करने में असफल रहे हैं। इस आलोक में यह सवाल लाजमी है कि किसी स्कूल या प्रतिष्ठान में स्थापित सीसीटीवी कैमरा जैसे किसी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण या यंत्र को ऑपरेट करने वाले की अर्ह्ता (सामाजिक और मनोवैज्ञानिक) की जांच कौन करेगा? ऐसे ऑपरेटरों के लिए न्यूनतम योग्यता का निर्धारण कौन करेगा और इनके लिए जो भी पाठ्यक्रम बनाया जाएगा, उसकी पढ़ाई की फीस कितनी होगी? किन संस्थानों को ऐसी शार्ट टर्म या लान्ग टर्म कोर्स कराने के लिए भारत या प्रदेश सरकारों की ओर से अधिसूचित किया जाएगा? इन सवालों के बीच इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि स्कूलों में कैमरा नहीं होना चाहिए। बिल्कुल होना चाहिए, लेकिन क्या यह उचित होगा कि हम अपने ही समाज के लोगों के साथ अविश्वास के संबंधों को मजबूत करें। क्या ऐसा करना लिंग आधारित विविधता और निजता को बनाए रखने की दृष्टि से उचित होगा? क्योंकि किसी भी बुराई के पीछे बहुत से कारक होते हैं। इनमें सबसे प्रमुख हमारा समाज और समाज में रहने वाले विभिन्न सामाजिक समूहों की सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक, सास्कृतिक परिस्थितियां और गतिविधियां शामिल होती हैं। उदाहरण स्वरूप कई बार माता-पिता हैरान होते हैं कि उनका बच्चा गाली कहां से सीखता है। जब कि न तो उनके स्कूल में गालियां सिखाने की कोई क्लास होती है और न ही घर का कोई सदस्य गाली देता या देती है। यह भी सत्य और तथ्य है कि ज्यादातर गालियां महिला केन्द्रित होती हैं। यानि हम अपने बच्चों से कुछ अच्छा करने की उम्मीद एक ऐसे सामाजिक परिवेश में करते हैं, जहां मर्दानापन यानि पितृसत्तात्मक सोच से अनुप्राणित गालियां और अन्य गतिविधियां होती हैं। जिसका सीधा संबंध शक्ति के दो ध्रुवों से होता है। जो धु्रव अपने आप में मजबूत होता है, वो कमजोर के साथ अन्याय, भेदभाव, अपमान, अनादर, हिंसा और क्रूरता जैसे व्यवहार करता है। अनुभव बताता है कि बच्चे अपने सामाजिक परिवेश में ही गालियां सीखते हैं। जैसे मुहल्ले में खेलकूद के समय, घर से बाहर कहीं आते-जाते समय। गालियां देता कौन है? हमारे-आप जैसे लोग ही गालियां देते हैं। दूसरी तरफ बलवान का बल कहीं न कहीं उसके सामाजिक ढ़ांचे के स्वरूप और उसकी परंपरागत प्रवृत्तियों से अक्षुण्य रहता है। इस उदाहरण का संदर्भ इसलिए भी देना पड़ा है कि हम अकेले कुछ तय नहीं कर सकते हैं। विशेषकर ऐसे समाज में जहां पितृसत्ता और अलोकतांत्रिक मूल्य अभी बहुत मजबूत है। इसीलिए ऐसा मुमकिन है कि जो सीसीटीवी कैमरा स्कूल के कर्मचारियों की निगरानी करने के मकसद से लगा हो, क्या पता उसका उपयोग ऑपरेटर अपने कुंठित भावनाओं को तृप्त करने के लिए करने लगे। इस घटना में ड्राइवर को एक ऐसे ही ऑपरेटर के तौर पर देखा जाए तो अंदाजा होता है कि सीसीटीवी सुरक्षा के साथ-साथ अपने नाकारात्मक प्रभावों में ऐसी हिंसक घटनाओं को जन्म दे सकता है। इसलिए जरूरी है कि पहले हम और हमारा समाज संवेदनशील बने। शिक्षा का दृष्टिकोण विकसित करे। किसी भी सामाजिक-शैक्षिक कार्य में अपनी सहभागिता सुनिश्चित करे। वैसे भी स्कूल-कॉलेज को चन्द कैमरों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है। बल्कि इसके लिए संवेदनशील, समझदार और जिम्मेदार स्कूल प्रबन्धन के साथ-साथ परिपक्व और प्रशिक्षित मानव मन की जरूरत होती है। तब जाकर कहीं बचपन को संवारने और निखाने की साधना पूरी होती है।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया में प्रवक्ता मेरी एक मित्र कंचन जो इस समय यूरोप के बूडापेस्ट में हैं, इस घटना को कर्मचारियों और अन्य स्टॉफ के लिए अलग से टॉयलेट होने और न होने से जोड़कर देखती हैं। वो अपने फेसबुक वाल पर लिखती हैं कि “आम तौर पर जैसे रेजिडेंशियल कॉलोनी में काम करने के लिए आने वाली घरेलू नौकरानियों के लिए कॉलोनी में कोई टॉयलेट नहीं होते और वे किसी घर में चुपके से चली जाती हैं या सभ्य लोगों की रिहाईश के किसी किनारे निपट लेती हैं। ऐसे ही स्कूल में बस ड्राइवर, कंडक्टर, कर्मचारियों के लिए भी बच्चों से अलग कोई अलग टॉयलेट की व्यवस्था नहीं करने की मानसिकता खतरे पैदा करते हैं।... कितना शर्मनाक है लगता है कि हम अपने बच्चों को इन्सानों से डरना सिखाते हैं!!” 

इस संदर्भ में बताना जरूरी मालूम होता है कि जब मैं कहानियों पर शोध प्रबन्ध लिख रहा था, उस समय इकबाल मजीद की कहानी “पेशाब घर आगे है!” पढ़ी थी। कहानी में एक व्यक्ति को पेशाब के दबाव से होकर गुजरना पड़ता है। शहर की भीड़ में सबकुछ है, लेकिन न तो टॉयलेट है और न ही पेशाब के दबाव से उत्पन्न पीड़ा झेल रहे व्यक्ति को किसी दुकानदार की अनुमति है कि उसके दुकान के साइड में या पीछे पेशाब किया जा सके। इकबाल मजीद के कहानी “पेशाब घर आगे है!” का संदर्भ बहुत वृहद हो सकता है। यहां मित्र कंचन और संवेदनशील लेखिका ने इस दिशा में कुछ ऐसा लिखा, जिसको नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। क्योंकि हमारा समाज भी कहीं न कहीं ऐसे दबाव में है, जिससे मुक्ति के लिए कोई रास्ता देना नहीं चाहता। हमें अपने स्वार्थ की पूर्ति करने की लालसा है लेकिन कोई जन सुविधाओं के बारे में गंभीर नहीं है। जो लोग गंभीर हैं, उन्हें भी पूंजी आधारित निवेश और मुनाफा की फिक्र ज्यादा है। फलस्वरूप कमजोर पहचान वालों पर चैतरफा खतरा बढ़ा है। ऐसे में कंचन की टिप्पणी “कितना शर्मनाक है, लगता है कि हम अपने बच्चों को इन्सानों से डरना सिखाते हैं!!” बुनियादी शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वालों की सोई हुई संवेदना को कुरेदने वाली है। इनमें स्कूल प्रबन्धन से लेकर, स्कूल के टीचिंग स्टॉफ, नॉन टीचिंग स्टाफ, किताब बेचने वाले और अभिभावक के रूप में किताब खरीदने वाले सभी शामिल हैं।

वास्तव में पेशाब और शौच शहरों और गांवों दोनों ही जगहों पर एक बड़ी समस्या है। गांव में जहां लोग खुले में शौच करने के अभ्यस्त हैं, उन्हें विभिन्न स्वास्थ्य, संस्कार और स्वच्छता जैसे कारणों के चलते घर के अन्दर शौच करने का अभियान चलाया जा रहा है। फिर भी शाम ढ़लते ही गांव से लगे सड़कों और पगडंडियों के किनारे महिलाओं-पुरूषों की बड़ी संख्या में मौजूदगी चिन्ता का विषय है। उसमें भी कुछ स्वयं सेवक टॉर्च दिखाकर कैमरा से फोटो खींच लें या फिर किसी की बहन-बेटी के साथ अभद्र व्यवहार करें, तो हम-आप जैसे लोग कुछ करने में असमर्थ होते हैं। क्योंकि यहां भी डर और खौफ निजता के सवाल पर भारी पड़ता है। यह तो आउटडोर का मामला है। यदि “क्राइम इन इण्डिया” का संदर्भ लें तो ज्यादातर आपराधिक घटनाएं इनडोर यानि घर-मकान के अंदर होती हैं। ऐसी घटनाओं को अंजाम भी वही लोग देते हैं, जिनका संबंध बहुत करीब का होता या फिर जो परिचित और विश्वासी होते हैं। जाहिर है हम और हमारे समाज की सांसे तकनीक के सहारे नहीं चल सकती हैं। तकनीक का इस्तेमाल पीड़ित को राहत पहुंचाने के लिए करना ठीक है। तकनीक का इस्तेमाल किसी आम इंसान विशेषकर महिला, बच्चा, गरीब, पिछड़ा, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक वगैरह कमजोर पहचान वाले व्यक्तियों को हिंसा और यातना देने के लिए करना ठीक नहीं है। तकनीक के इस्तेमाल की पहली शर्त पूंजी है। पूंजी मजबूत लोगों के पास है या मजबूत लोगों का पूंजी पर नियंत्रण है। ऐसे में अगर सीसीटीवी कैमरे जैसे यंत्रों से स्कूल और समाज के संभ्रान्त वर्ग को ही सुरक्षा प्रदान किया जा सकता है। एक और मित्र महेन्द्र सिंह के फेसबुक वाल के माध्यम से गाजियाबाद स्थिति इन्दिरापुरम के एक स्कूल प्रबन्धन की बच्चों की सुरक्षा संबंधी चिन्ता का संज्ञान हुआ है। महेन्द्र सिंह जी ने अपने वाल पर स्कूल द्वारा भेजी गयी चिट्ठी पर लगाया है और स्कूल प्रबन्धन के संवेदनशील होने की बात कही है। 

जाहिर है इस पूरे प्रकरण में बच्चों की सुरक्षा ही चिन्ता का विषय है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि गुरूग्राम का मामला एक स्कूल का मामला नहीं, बल्कि पूरे देश का मामला है। इस संदर्भ में सभी राज्य सरकारों को नोटिस भी जारी की गयी है। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम सराहनीय है। लेकिन गौर करने का विषय यह है कि क्या सुप्रीम कोर्ट के बयान और राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर देने भर से बच्चों के साथ होने वाली आपराधिक घटनाओं पर लगाम लगाया जा सकता है? मौजूदा दौर में जिस तरह से सरकारों ने शिक्षा के क्षेत्र में पूंजी निवेश को बढ़ावा दिया है, उससे शिक्षा के न सिर्फ दो मॉडल, निजी और सरकारी दिखाई देते हैं, बल्कि विकास का निजी मॉडल देश के बहुसंख्यक परिवारों के बच्चों के लिए निराशा पैदा करने वाला रहा है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट और सरकारों को इस दिशा में भी विचार करने की आवश्यकता है कि हमारे तंत्र में ऐसा क्या है कि निजी मॉडल में कुछ होता है तो उसकी गूंज सत्ता के गलियारों से लेकर सुप्रीम कोर्ट हर जगह सुनाई देती है। वहीं दूसरी तरफ किसी पांच साल की बेटी का बलात्कार होने पर भी सत्ता के पुराधाओं और सुप्रीम कोर्ट के कान पर जूं तक नहीं रेंगती है। ऐसा प्रतीत होता है कि हमारी सरकारों और संविधान द्वारा स्थापित लोकतांत्रिक संस्थाएं जैसे स्कूल-कॉलेज और अस्पताल आदि को पतन के रास्ते पर जानबूझ कर ढ़केला जा रहा है। यदि ऐसा नहीं होता तो सरकार शिक्षा पर बजट बढ़ाने और सरकारी स्कूलों के प्रसार की दिशा में काम करती, न कि अपने ही देश के बच्चों को पूंजीपतियों के रहमों करम पर छाड़ने के लिए सरकारी स्कूलों को हतोत्साहित करने वाले कानून बनाती। यदि वास्तव में सरकार और सुप्रीम कोर्ट को लगता है कि जो बच्चे यौन हिंसा या बलात्कार जैसे किसी घटना का शिकार बन रहे हैं तो कार्यपालिका और न्यापालिका को शिक्षा शास्त्र के सिद्धान्तों को मद्दे नजर रखते हुए शिक्षा और समाज को एक समन्वित इकाई के तौर पर मान्यता देना चाहिए। जिसमें इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया जाना चाहिए कि हर बच्चा देश के लिए महत्वपूर्ण है और बच्चों की शिक्षा सिर्फ मां-बाप और अध्यापक-अध्यापिका की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि उस समाज की भी जवाबदेही है जहां बच्चा आने-जाने, खेलने-कूदने जैसे विविध गतिविधियां करता है। जिन अभिभावकों को अपने बच्चों के साथ हिंसात्मक आपराधिक घटनाओं की पीड़ा झेलनी पड़ रही है, उन्हें निजी स्कूलों के खिलाफ सरकारी सरकारी स्कूलों की बेहतरी के लिए आवाज उठानी चाहिए। ऐसे लोगों की आवाज में समाज के शिक्षित और जागरूक लोगों की आवाज भी मिलनी चाहिए। समाज के बेस्ट प्रैक्टिसेज को प्रचारित और प्रसारित करना समाज में आगे बढ़ चुके लोगों का नैतिक और सामाजिक दायित्व होना चाहिए। यदि “कॉरपोरेट सोशल रिस्पान्सिबिलिटी” मुमकिन है तो यह भी मुमकिन है कि “पीपल्स एजूकेशनल रिस्पॉन्सिबिलिटी” जैसी किसी युक्ति को लागू किया जाए। तब जाकर समाज में शिक्षा की दृष्टि पैदा होगी और बच्चों का बचपन सही मायनों में संवारा जा सकेगा। वरना टेक्नोक्रेसी का उफान और कमजार हो रहे लोकतांत्रिक मूल्य न सिर्फ बुनियादी शिक्षा के लिए खतरे पैदा करने वाले हैं, बल्कि मानव मन की विकृतियों को दिनों दिन बढ़ाने वाले हैं, जो संविधान में उल्लिखित लोकतांत्रिक आदर्शों के अनुरूप समाज के दीर्घकालिक हित में नहीं है।



Wednesday, May 15, 2013

समीक्षा - महिलाओं के अधिकार और मुस्लिम समाज

रीब डेढ़ साल पहले एक्शनएड, लखनऊ और सेन्टर फार हारमोनी एण्ड पीस, वाराणसी के सौजन्य से डा॰ असग़र अली इंजीनियर की किताब Rights of Women and Muslim Society के हिन्दी अनुवाद “महिलाओं के अधिकार और मुस्लिम समाज को पढ़ने का अवसर मिला था। इस दौरान मैंने हिन्दी अनुवाद का संपादन भी किया और एक संक्षिप्त समीक्षा भी लिखी जो प्रकाशित नहीं हो सकी थी। हिन्दी-उर्दू मीडिया/सोशल मीडिया के दोस्त चाहें तो यह समीक्षा अपने यहां प्रकाशित कर सकते हैं।

मौजूदा दौर में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों पर जो लेखक, बुद्धिजीवी, समाज विज्ञानी और पत्रकार अपनी लेखनी के माध्यम से समाज में जागरूकता और चेतना फैलाने का काम कर रहे हैं उनमें एक महत्वपूर्ण नाम डा॰ असग़र अली इंजीनियर का है। डा॰ इंजीनियर सेन्टर फार स्टडी आफ सोसाइटी एण्ड सेक्युलरिज्म के माध्यम से अपने विचार समाज तक पहुंचाते रहे हैं। अब तक डा॰ इंजीनियर द्वारा लिखी और संपादित 65 से अधिक किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। किताबों की इस कड़ी में Rights of Women and Muslim Society (महिलाओं के अधिकार और मुस्लिम समाज) इस दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है कि यह किताब हमें ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के बारे में न सिर्फ जानकारी देती है बल्कि जागरूक और सचेत भी करती है। इस पुस्तक में डा॰ इंजीनियर ने मुस्लिम समाज के परिप्रेक्ष्य में महिलाओं के अधिकारों पर विस्तार से प्रकाश डाला है। इस पुस्तक में इस्लाम के अविर्भाव से पहले और बाद के अरबी समाज में महिलाओं की स्थिति का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करने के साथ-साथ कुरान की आयतों को संदर्भित करके महिलाओं के अधिकारों के बारे जानकारी दी गयी है। इस किताब के माध्यम से इस्लाम और मुसलमान के फर्क को भी स्पष्ट करने की कोशिश की गयी है। यह बताने की कोशिश की गयी है कि किन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कारणों के चलते मुस्लिम महिलाओं के बारे तरह-तरह के धारणाएं स्थापित हुईं और उन्हें सामाजिक वैधता प्रदान की गयी।
डा॰ इंजीनियर का मानना है कि इस्लामिक देश महिला-पुरूष समानता के प्रति रूढि़वादी हैं। लैंगिक न्याय सुनिश्चित करने में इस्लामी दुनिया काफी पीछे है। उनके अनुसार कुरान में महिलाओं को पुरूषों के बराबर अधिकार का उल्लेख है, लेकिन उलेमा वर्ग के फतवों के कारण लैंगिक न्याय सुनिश्चित नहीं हो पा रहा है। डा॰ इंजीनियर ने इस किताब के माध्यम से बताने की कोशिश की है कि महिलाओं के प्रति मुस्लिम समाज का भेदभाव परक व्यवहार के लिए कुरान नहीं बल्कि शरीयत/हदीस (इस्लामी कानून) के रूप में इसकी अलग-अलग व्याख्याएं जिम्मेदार हैं। हिजाब (परदा), श्रृंगार, बीबी को मारना-पीटना, महिलाओं को अर्धसाक्षी मानना, उत्तराधिकार में उनका हिस्सा, शादी, तलाक और हलाला आदि मुस्लिम महिलाओं से संबंधित निजी कानूनों पर यह किताब एक तार्किक बहस प्रस्तुत करता है।
विभिन्न मुद्दों पर विचार संप्रेषण में लेखक ने उदारवादी नज़रया अपनाया है। लेखक ने विवादित मुद्दों से खुद को अलग रखते हुए कुरान में उल्लिखित महिला अधिकारों की ओर ध्यान दिलाने की कोशिश की है। लेखक ने शादी और तलाक जैसे मामलों में कुरान की व्याख्या में सामंती और पुरूष सत्तात्मक सोच को प्रभावी कारण माना है। उनके अनुसार अहदिसों के ज़रिए महिला अधिकारों को कर्तव्य आधारित कर दिया गया है। इसी संदर्भ में डा॰ इंजीनियर अशरफ थानवी (बहिश्ति जे़वर के लेखक/संपादक) के विचारों का विरोध करते भी दिखते हैं।
किताब के अन्तिम भाग में लेखक ने समकालीन मुस्लिम दुनिया में महिलाओं की शैक्षिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। किताब के इस अध्याय में मिश्र व अन्य मुस्लिम देशों में पश्चिमी साम्राज्यवादी ताकतों के हस्तक्षेप और महिला सशक्तीकरण की राह में उदारवादी मुस्लिम नेतृत्व की बात की गयी है। किताब के इस हिस्से में मुस्लिम दुनिया में महिलाओं के शैक्षिक व आर्थिक पिछड़ापन के साथ रूढ़ीवादी मौलवियों और सामंती जमींदारों के बीच गठबंधन को जिम्मेदार बताया गया है। समकालीन वैश्विक चुनौतियों के संदर्भ में सऊदी अरब, खाड़ी और अफगानिस्तान में महिलाओं की दयनीय स्थिति के कारणों में अमेरिकी प्रभुत्व और मुल्ला वर्ग की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया गया है। इस क्रम में लेखक ने मोरक्को और ट्यूनिशिया को उन देशों की श्रेणी में रखा है जहां किसी हद तक महिलाओं को मौलिक अधिकार की प्राप्ति हुई है। लेकिन कुवैत में महिला अधिकारों की बहाली का मुख्य कारण इराक के विरूद्ध संघर्ष में एकजुटता कायम करना बताया है। दुनिया के विभिन्न मुस्लिम देशों में हो रहे बदलावों के बीच लेखक आशा व्यक्त करते हैं कि महिलाएं आवाज़ उठा रही हैं और उनके हालात बदल रहे हैं।
हरहाल, यह किताब पूर्व इस्लामी समाज-संस्कृति और इस्लाम के अविर्भाव के बाद की सामाजिक-सांस्कृतिक उतार-चढ़ाव के अध्ययन की अपील करता है। लेखक का मंतव्य है कि इस किताब से कुरान की व्याख्याओं पर सही राय कायम करके महिला अधिकारों और बराबरी की मूल भावना को समझा जाए। ताकि मुस्लिम महिलाओं के बारे में पहले से स्थापित मिथक, पूर्वाग्रह और दुराग्रह को समाप्त किया जा सके। लेखक धर्मनिरपेक्ष कानूनों के प्रवर्तन को दीर्घकालीक कार्य बताते हुए बीच का रास्ता अपनाते हुए शरीयत कानूनों को संहिताबद्ध करने की बात पर बल देते हैं, ताकि शादी, तलाक, उत्तराधिकार, तलाक के मामले में बच्चों की अभिरक्षा, विवाह की स्थिरता व तलाक के बाद भरण-पोषण को विधिक रूप प्रदान किया जा सके।
शा है यह किताब आने वाले समय में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों पर होने वाली बहस को नई दिशा प्रदान करेगा।

Monday, January 21, 2013

सवाल आधी दुनिया के अधिकार का


जिम्मेदारी बनती है उस नेतृत्व की जो आम जनता की भागीदारी वाले आंदोलनों की भावना को समझे और राजनीतिक चेतना के विकास में मददगार की भूमिका अदा करे। कुछ ऐसे कि खुद को गैर राजनीतिक बताने वाले या लोकतांत्रिक चुनावी प्रक्रिया से खुद को बाहर रखने वाले लोगों का राजनीति से अलगाव समाप्त हो सके और वो खुलकर राजनीतिक गतिविधियों में अपनी भूमिका का निर्वहन करने लगें। ऐसा इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि हमारी संसदीय प्रक्रिया में तमाम चीजें राजनीति से ही तय होती है। ...
दिल्ली गैंग रेप की घटना दिसम्बर के आखिरी दो हफ्तों तक प्रमुखता से मीडिया में छाई रही है। मीडिया से इतर सामाजिक स्तर पर भी देश के विभिन्न हिस्सों में हजारों की संख्या में लोगों को बैनर-पोस्टर के साथ सड़कों पर देखा गया। एक माह पुरानी सामूहिक बलात्कार के दोषियों को कोई फांसी की सूली पर चढ़ाने की मांग कर रहा है तो कोई फास्ट ट्रैक अदालतों में मुकदमें की सुनवाई की ज़रूरत बता रहा है। अधिवक्ताओं का एक बड़ा समूह आरोपियों के पक्ष में किसी भी वकील द्वारा पैरवी नहीं होने देने की वकालत कर रहा है। न्याय के प्राकृतिक सिद्धान्तों के हिस्से के तौर पर किसी भी आरोपी को “एमिकस क्यूरी” के तहत सरकारी वकील की सुविधा का भी अधिवक्ताओं ने विरोध किया है। बहरहाल, पिछले दिनों इण्डिया गेट से शुरू हुए विरोध-प्रदर्शनों की लहर की तीव्रता को मीडिया की आंखों से देश भर में फैलता हुआ देखा गया। संवेदना के सागर में राजनीतिक दलों और राजनेताओं को भी डूबते-उतराते देखा गया। लेकिन लैंगिक भेदभाव और मुहावरा बन चुके हर बीस मिनट में एक बलात्कार की घटना को अपने सियासी एजेण्डा का हिस्सा बनाने के सवाल पर शिक्षा से लेकर संसद तक महिला आरक्षण विधेयक का राग अलापने वाले राजनेताओं की चुप्पी से एक बार फिर साफ हो गया है कि इनकी संवेदना महिला आरक्षण की सियासत तक सीमित है। पितृ सत्ता और पूंजी सत्ता की चुनौतियां इनके लिए कोई खास मायने नहीं रखती हैं।

गौर तलब है कि दिल्ली गैंग रेप पर संवेदना के कैंडल लाइट जलाने वाले आंदोलनकारी साथियों का जोश अभी ठण्डा भी नहीं पड़ा था कि दक्षिणपंथी खेमे से महिला विरोधी बयानों की घिसी-पिटी श्रृंखला जारी करने से परहेज नहीं किया गया। महिलाओं के बारे में वो तमाम बातें और मिथक एक बार फिर से दोहराए जा रहे हैं, जिन्हें लिंगभेद के आधार पर सभ्यता के विकास के किसी न किसी पड़ाव पर संस्थागत रूप दिया गया है। ऐतिहासिक रूप से लिंगभेद जनित सामाजिक पिछड़ेपन का दंश झेलने वाली महिलाओं के लिए ड्रेस कोड के हिमायतियों की भावनाएं इस कदर फूट रही हैं कि उन्हें यह कहने में भी संकोच और शर्म का एहसास नहीं हो रहा है कि “रात में लक्जरी बस में बैठने की ज़रूरत क्या थी?” 16 दिसम्बर 2012 के यौन उत्पीड़न की घटना से जन्मे आन्दोलन के दौरान सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के समर्थक और वेलेण्टाइन डे जैसे कुछ एक अवसरों पर पौरूषता का प्रदर्शन करने वाले समान नागरिक संहिता के ठेकेदारों को भी संवेदना से तार-तार होते देखा गया। लेकिन जब समस्या के मूल जड़ पर वार करने की बात होती है तो यही लोग संवेदनहीन हो जाते हैं। कहना होगा कि जब तक महिलाओं के खिलाफ गर्भ से शुरू होने वाले भेदभाव को राजनीतिक एजेण्डे में केन्द्रीय महत्व नहीं मिलेगा तब तक बेटियों के साथ अत्याचार किसी न किसी रूप में जारी रहेगा।

चूंकि राजकाज और सामाजिक आचार तय करने में राजनीति और नेतृत्व दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। दिल्ली गैंग रेप की घटना ने एक बार फिर देश की राजनीति और नेतृत्व को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है। ज़रूरी है कि उन चोटी के राजनेताओं, चाहे वो पुरूष हों या महिला, दोनों के इरादों और उनके व उनकी पार्टी के राजनीतिक एजेण्डे की पड़ताल की जाए कि वो किस हद तक महिला-पुरूष की साक्षी दुनिया की आधी आबादी को न्याय दिलाने के पक्ष में खड़े हैं। ऐसा इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि सड़क से संसद तक आंसू बहाने वाले ऐसे नेता दलगत एजेण्डा से ऊपर उठने का साहस नहीं कर पा रहे हैं। हमारे नेता कठोर से कठोर कानून बनाने की बात तो करते हैं लेकिन किसी भी कानून के प्रभावी क्रियान्वयन की धज्जियां उड़ाने वालों को प्रश्रय देना नहीं भूलते। इसे पिछले दो दशकीय राजनीति के अपराधीकरण और अपराध के राजनीतिकरण के रूप में भी देखा जाना चाहिए, जो समग्र राजनीतिक परिदृश्य को मजबूर और लाचार बनाती है। शायद यह बड़ी वजह है कि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के खिलाफ हिंसा को जन्म देने और बनाए रखने वाले तमाम कारक समाप्त होने के बजाए और अधिक उग्र और क्रूर रूप में सामने आ रहे हैं। महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा की घटनाओं में कनविक्शन रेट का कम होना ऐसी ही मजबूरी और लाचारी की दास्तान बयान करती है।

बहरहाल, मौजूदा हालात ऐसे हैं कि जिसे देखो वही देश की बात कर रहा है। क्या इससे पहले देश नहीं था और क्या इसके बाद देश बचेगा नहीं। बेशक देश शर्मसार हुआ है, लेकिन यह पहली बार नहीं है। जितना हमने-आपने सुना और देखा, उतना तो ज़रूर हुआ है। अपराध और राजनीति के गठजोड़ ने न्याय और समानता की राह में बाधाएं भी खड़ी की हैं। अपराध और राजनीति के गठजोड़ को पोषण प्रदान करने वाली गैर बराबरी के सिद्धान्तों पर खड़ी भूमण्डलीकरण की नीतियां पितृसत्तात्मक मूल्य और परम्परा को भी मज़बूत कर रही हैं। लिहाजा यौन उत्पीड़न की घटनाओं को निजीकरण और विनिवेश से जोड़कर देखने और समझने की भी जरूरत है। विशेषकर उन तर्कों और तार्किक व्यक्तियों के लिए जो यह समझते हैं कि अगर बस में वो दोनों नहीं चढ़ते तो उनके साथ ऐसा नहीं होता। निजीकरण और विनिवेश की बात उन लोगों को भी समझ में आनी चाहिए जो यह कहते फिर रहे हैं कि वह बस चार्टर बस थी, इसलिए ऐसा हुआ। इन लोगों को ही देश मान लिया जाय तो भी ज़ाहिर है सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की सेवाओं पर जनता का विश्वास अभी बाकी है। फिर सवाल यह है कि लोगों का वह हुजूम, जो फांसी से नीचे की बात ही नहीं करता, देश और दुनिया के संदर्भ में निजिकरण, विनिवेश और भूमण्डलीकरण की नीतियों का विरोध क्यों नहीं करता?

दिल्ली में जन्तर-मन्तर से लेकर इंडिया गेट तक के विरोध प्रदर्शनों में शामिल लोगों में आम लोगों ने बड़े पैमाने पर भाग लिया।  यह भी कहा गया कि इनमें अधिकतर का किसी राजनीतिक संगठन या पार्टी से कोई संबंध नहीं था। कहा जा सकता है कि सामूहिक बलात्कार से उपजा आंदोलन आम जनता की सहभागिता वाला आंदोलन था। यह आन्दोलन अन्ना और केजरीवाल के आंदोलन के बरखिलाफ महिलाओं के यौन उत्पीड़न और हिंसा के विरोध में जारी मौजूदा आंदोलन के जनवादी चरित्र को उजागर करता है। लेकिन दूसरी तरफ दिसम्बर 2012 और जनवरी 2013 के इंडिया गेट और जन्तर-मन्तर के आंदोलन से यह भी पता चलता है कि वे लोग जो इस आंदोलन का हिस्सा नहीं रहे उन्हें दरअसल चमकीली राजनीति और पिकनिक के एहसास वाला विरोध-प्रदर्शन अधिक रास आता है। खासकर उन लोगों के लिए जो राजनीति से खुद को अलग-थलग रखते रहे हैं। अगर यक़ीन न हो तो पिछले दो लोकसभा और विधान सभा के चुनावों में ऐसे लागों की मतदाता के रूप में भागीदारी का प्रतिशत का संज्ञान लिया जा सकता है।

ज़ाहिर है ये वही लोग हैं जो शहरीकरण की मौजूदा प्रक्रिया में पूंजीवाद अनुप्राणित विकास की उध्र्वाधर रूपरेखा तय करने से लेकर नव उदारवादी सुधारों से प्रेरित हर उस कदम को मौन सहमति देने वालों में शामिल रहे हैं। फिर शहर तो शहर है। इतना कुछ होने के बाद भी शायद शहर का एकाकीपन इन पर भारी नहीं पड़ रहा है। दाद के हक़दार हैं वो तमाम लोग जिन्होंने देर से ही सही, अपनों के नुकसान के डर से ही सही, परदेस में असुरक्षा के चलते ही सही, मशाल जुलूस के बजाए कैंडिल लाइट के ज़रिए ही सही, प्रतिरोध की मशाल को जलाए रखने की जिम्मेदारी उठाई है। अच्छा होता कि ऐसे आन्दोलनों के सहारे सुख-सुविधा और उपभोग की वैतरणी पार करने वाले भी “ले मशाले चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के...” का हिस्सा बनते।

मौजूदा हालात में जिम्मेदारी बनती है उस नेतृत्व की जो आम जनता की भागीदारी वाले आंदोलनों की भावना को समझे और राजनीतिक चेतना के विकास में मददगार की भूमिका अदा करे। कुछ ऐसे कि खुद को गैर राजनीतिक बताने वाले या लोकतांत्रिक चुनावी प्रक्रिया से खुद को बाहर रखने वाले लोगों का राजनीति से अलगाव समाप्त हो सके और वो खुलकर राजनीतिक गतिविधियों में अपनी भूमिका का निर्वहन करने लगें। ऐसा इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि हमारी संसदीय प्रक्रिया में तमाम चीजें राजनीति से ही तय होती है। राजनीति में आधी आबादी का आनुपातिक प्रतिनिधित्व जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी महिलाओं के लिए लोकतांत्रिक स्थान बनाएगा। समाज बदलाव के उस स्पर्श को छूकर महसूस कर सकेगा कि बेटियां हिंसा और आबरूरेज़ी के लिए पैदा नहीं होती हैं बल्कि समाज और देश के विभिन्न क्रिया कलापों में इनकी भी समान भागीदारी और हिस्सेदारी है।

                                                       कैनविज टाइम्स, 19 जनवरी 2013                               

Monday, May 7, 2012

मन के विज्ञान से हताहत होती बेटियां


पिछले माह बंगलोर की आफरीन के साथ जो कुछ हुआ उससे एक बार फिर साफ हो गया है कि अग्नि 5 तक का सफर तय कर चुका हमारा देश सामाजिक जीवन में लैंगिक भेदभाव को समाप्त करने की दिशा में अभी बहुत पीछे है। कहने को शिक्षा और साक्षरता निरन्तर बढ़ रही है। फिर भी बच्चियों, बेटियों और महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। तीन माह की आफरीन की मृत्यु ऐसी ही भेदभाव जनित घटनाओं की एक कड़ी है। ऐसी घटनाओं का विरोध, निन्दा और लिंगभेद से जुड़े कारकों पर विद्वता पूर्वक बहस भी होती है। लेकिन सबकुछ के बाद आए दिन होने वाली घटनाएं कहीं न कहीं सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में लिंगभेद के खिलाफ होने वाली कोशिशों की नाकामी की ओर इशारा करते हैं। यही वजह है कि लिंगभेद को जन्म देने वाले कारकों पर बार-बार ध्यान जाता है। बेटियों के प्रति मौजूदा दौर में बढ़ती हिंसात्मक घटनाओं के मद्दे नज़र ज़रूरी हो जाता है कि लिंगभेद के कारणों पर नए सिरे से गौर किया जाए, कि आखिर किन परिस्थितियों में मानव मन में लिंगभेद की इच्छाएं आकार लेती हैं और देखते-देखते किसी आफरीन या फलक को मौत के दहाने पर पहुंचा देती हैं।

इतिहास का अवलोकन किया जाए तो प्राचीन काल में अपाला, घोषा और लोपा जैसी विदुषी महिलाओं का उल्लेख आता है। सल्तनत काल में रजिया सुल्ताना और फिर मुगल काल में नूरजहां, अरजुमंद बानो बेगम जैसी महिलाओं ने राजनीति और साहित्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भक्ति आंदोलन के दौरान साध्वी महिलाएं भी हुयीं। 19वीं-20वीं सदी से होते हुए अब 21वीं सदी में सामाजिक जीवन में महिलाओं की भूमिका में एक बार फिर बदलाव देखा जा सकता है। यह सिलसिला महिला सशक्तिकरण से भी जुड़ता है। लेकिन फलक और आफरीन के केस से स्पष्ट है कि बेटियों के खिलाफ समाज का रवैय्या अभी भी सख्त है। बदलाव सिर्फ स्वरूप में हुआ है। पुराने ज़माने में बच्चियों को जिंदा दफनाने के उदाहरण मिलते हैं तो मौजूदा वैज्ञानिक दौर में वैज्ञानिक तकनीक का प्रयोग कर बच्चियों को गर्भ में मारने की घटनाएं हो रही हैं। कहना नहीं है कि जहां गुरबत का साया होता है वहां बच्चियों को लावारिश छोड़ने या फिर क्रूरता पूर्वक पिटाई या अन्य तरह की पाबन्दियां सामान्य बातें होती हैं। फलक और आफरीन दर असल समाज के उन परिवारों से थीं जो धार्मिक और आर्थिक रूप से भ्रूण परिक्षण नहीं करवा सकते थे। यह बात परिकल्पनात्मक ज़रूर है लेकिन सत्य से दूर नहीं है। यदि ये बच्चियां किसी रईस परिवार की किसी महिला की कोख में रही होतीं या उमर फारूक खुद कोई रईस होता तो शायद उसकी पुत्र प्राप्ति की इच्छा के चलते आफरीन जैसी बच्ची की भ्रूण में ही हत्या की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। जैसा कि अन्य बहुत से मामलों में हो रहा है।

बहरहाल बात करते हैं उन कारणों की जिनके चलते बेटियों का जीवन असुरक्षित है। कुछ लोग अल्ट्रासाउण्ड सोनाग्राफी मशीनों को तो कुछ लोग व्यक्ति विशेष को जिम्मेदार मानते हैं। यदि आफरीन के केस की बात करें तो उसकी मौत की असल वजह उसके पिता उमर फाररूक की पुत्र प्राप्ति की चाह थी। पहली नज़र में उसके पिता उमर फारूक को गुनहगार माना जाना अपनी जगह सर्वथा उचित है। उसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही और सजा भी उचित है।ऐसी सजा, जो समाज के शेष लोगों के लिए न भूलने वाली नज़ीर बन जाए। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती क्योंकि यह मामला लिंगभेद का भी है और सिर्फ एक उमर फारूक को जेल भेजने भर से लिंगभेद की समस्या का स्थाई समाधान नहीं होने वाला। क्योंकि उमर फारूक जैसे व्यक्तियों को गुनहगार बनाने वाले कारक कहीं न कहीं किसी स्रोत से पैदा होते हैं और समय-समय पर उमर फारूक जैसे व्यक्तियों के मन का विज्ञान बनाते हैं। इसलिए इस पक्ष पर ध्यान दिए बगैर ऐसे मामलों में किसी अन्तिम निष्कर्ष पर पहुंचना तार्किक नहीं है। विशेषकर ऐसे में जब पुत्र प्राप्ति के लिए प्रेरित करने वाले कारक अदृश्य और अप्रत्यक्ष हों और जिन्हें कानूनन सबूत के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता हो। दरअसल उमर फारूक जैसे व्यक्ति भी तो इसी समाज के पैदावार हैं। स्त्रीवादी व्याख्या के अनुसार पुरूष सत्ता के केन्द्र से ही लिंगभेद का प्रत्यक्ष और परोक्ष संचालन होता है। फिर भी हमें देखना होगा कि इस सत्ता के केन्द्र को पोषण कहां से प्राप्त होता है? इसलिए कानूनी कार्यवाही के साथ-साथ सामाजिक कार्यवाही भी ज़रूरी हो जाता है। मेरा मतलब समाजिक कार्यवाही के नाम पर खाप पंचायत जैसी किसी संस्था या संगठन से नहीं है। बल्कि व्यापक सामाजिक संदर्भों में उन परिस्थितियों के गहन अध्ययन से है जिनके चलते कभी गर्भ में ही बच्चियों का गला घोंट दिया जाता है तो कभी तीन माह की बच्चियों की हत्या होती है या फिर तीन साल की बच्चियों का बलात्कार और फिर हत्या होती है।

असुरक्षा और खौफ हमारे सामाजिक संरचना के खास तत्व हैं। बेटियों को शुरू से ही सार्वजनिक स्थलों और क्रियाकलापों से अलग रखने के पीछे सबसे बड़ा कारण असुरक्षा और खौफ का वातावरण ही है। यह कारण पारिवारिक से अधिक सामाजिक इसलिए है क्योंकि जो लड़की परिवार में एक ही छत के नीचेे सुरक्षित रहती है, घर से बाहर निकलते ही पग-पग पर उसे असुरक्षा का सामना करना पड़ता है। इसी तरह परिवार में जिन लड़कों का घर की महिलाओं के प्रति व्यवहार अच्छा होता है, वो घर से बाहर निकलते ही अपने सामाजिक दायित्वों से मुक्त हो जाते हैं। इसके पीछे एक बड़ी वजह है समाज का व्यक्ति केन्द्रीत सोच है। मौजूदा दौर में विकास के जो माॅडल स्थापित हुए हैं उसमें व्यक्ति, परिवार और समाज की कल्पना “मैं” तक सिमट कर रह गयी है। ऐसे में सामाजिक स्तर पर संवेदनाओं का टूटना-बिखरना स्वाभाविक है। ऐसे में कोई भी गंभीर घटना सिर्फ भुक्तभोगी परिवार के लिए ही दुःख का कारण बनता है। शेष सामाजिक प्राणियों को न तो कोई हमदर्दी होती है और न ही कोई संवेदना। गौरतलब है कि व्यक्तिवादी सोच को बढ़ाने में नई आर्थिक सुधार और इससे जनित उपभोक्तावादी संस्कृति की अहम भूमिका रही है।

ज़ाहिर है संवेदनाएं टूट रही हैं, असुरक्षा बढ़ रही है। शायद इसकी वजह भी पुरूष सत्ता के केन्द्र में ही है। वरना कैसे संभव है कि जो व्यक्ति अपने घर में उचित व्यवहार करता है, वही व्यक्ति घर से बाहर निकलते ही बेलगाम कैसे हो जाता है? व्यक्ति का सामाजिक ताने-बाने में बेलगााम होना ही पुरूष सत्ता को मजबूत करता है। जहां से अन्य व्यक्ति भय और भविष्य की असुरक्षा प्राप्त करते हैं। असुरक्षा की बलवती होने वाली यह भावना ही पुत्र प्राप्ति की चाह को बढ़ाता है। ऐसी स्थिति में खानदान का चिराग, बुढ़ापे का सहारा, परिवार का रक्षक आदि पुरातन मान्यताएं और मजबूत होती हैं। फिर कोई अनपढ़-गंवार हो या पढ़ा-लिखा संभ्रांत दोनों ही बेटियों को दोयम दर्जे की सन्तान मानने की गलती करते हैं। यह मानना ही माता-पिता के मन में बेटियों के प्रति दोहरे व्यवहार का मनोविज्ञान तैयार करता है। जिसके परिणाम भू्रण हत्या से लेकर बलात्कार जैसी घटनाओं के रूप में सामने आता है।

उक्त संदर्भ में उचित यही है कि असुरक्षा को कम करने के लिए सुरक्षा के उपबंध करने के बजाए असुरक्षा को जन्म देने वाले सामाजिक कारकों पर चोट किया जाए। यह किसी एक का दायित्व नहीं है। इस कार्य को करने में व्यक्ति-व्यक्ति की अपनी भूमिका है। सुविधाभोग के नाम पर यदि व्यक्ति इस भूमिका से और अधिक विमुख होगा तो इसका खमियाजा भी उसे भुगतना होगा। खासकर ऐसे समय में जबकि उत्तर प्रदेश सहित देश के अन्य कई राज्यों में बाल लिंगानुपात में गिरावट दर्ज की गयी हो और संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून अपने भारत दौरे के अवसर पर मुम्बई में बाल लिंगानुपात और शिशु मृत्युदर पर चिंता व्यक्त कर रहे हों, तो ज़रूरी हो जाता है कि मौजूदा दौर की सामाजिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक परिस्थितियों में लिंगभेद को समाप्त करने के लिए जनमानस की संवेदनाओं को जगाया जाए। वरना उपभोक्तावाद की राह पर तीव्र गति से आगे बढ़ते समाज के पास पछताने के लिए कुछ भी नहीं बचेगा।

७ मई २०१२, कैनविज़ टाईम्स, लखनऊ