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Tuesday, April 28, 2020

ऑनलाइन शिक्षाः बच्चों के लिए कितना लाभप्रद


इस समय दुनिया के सैकड़ों देश कोविड-19 के संक्रमण जूझ रहे हैं। बहुत से देशों में लाॅकडाउन की आपात परिस्थितियां हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं है। स्कूल-काॅलेज, दुकानें और सामान्य यातायात सेवाएं बंद हैं। कोविड-19 के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए उत्तर प्रदेश में 13 मार्च से ही कक्षा 8 तक के स्कूल बंद चल रहे हैं। जिसका सीधा प्रभाव बच्चों की परीक्षा, मूल्यांकन, परिणाम और आगे की पढ़ाई पर पड़ा है। बच्चे स्कूल की औपचारिक शैक्षिक क्रियाओं से दूर हैं। उनकी पढ़ाई पीछे छूट रही है। महामारी की विभीषिका ऐसी है कि घर में रहना, शारीरिक दूरी बनाकर रखना, सार्वजनिक स्थानों पर भीड़ न इकट्ठा होना, फेस माॅस्क का प्रयोग करना, बार-बार हाथ धुलते रहना और नाक, मुंह एवं चेहरे पर बार-बार हाथ न ले जाना आदि ही इस संक्रमण से बचाव के उपाय हैं। भारत में भी संक्रमित मरीज़ों की संख्या लगातार बढ़ रही है। संक्रमण का ख़तरा कब तक बना रहेगा, कहना मुश्किल है। 14 अप्रैल को लाॅकडाउन की आपात परिस्थिति अगले 3 मई तक के लिए बढ़ा दी गयी है। डाॅक्टर, नर्स, पुलिस-प्रशासन और समाज सेवी कोविड-19 से जनता को बचाने की कोशिशों में लगे हुए हैं। इनकी सक्रियता काबिले तारीफ है। शिक्षा से जुड़े लोग भी सक्रिय हैं। इन्हें इस बात की चिन्ता है कि लाॅकडाउन के दौरान बच्चों को कैसे पढ़ाया जाए। सिलेबस कैसे कवर किया जाए। स्कूल एजूकेशन में आॅनलाइन क्लासेज की योजना की चर्चाएं अख़बारों और सोशल मीडिया में हर रोज आ रही हैं। सोशल मीडिया में एजूकेशनल एप्स के प्रचार के विज्ञापन भी मौजूद हैं। मोबाइल फोन के माध्यम से बच्चों के अभिभावकों को आॅनलाइन शिक्षण के बारे में जागरूक बनाया जा रहा है। फलस्वरूप बड़े शहरों से लेकर छोटे नगरों और गांवों तक के लोग आॅनलाइन कक्षाओं के बारे में कुछ न कुछ जानकारी या जिज्ञासा रख रहे हैं। शिक्षा में नुकसान की भरपाई के लिए पहले तो बड़े-बड़े अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों ने आॅनलाइन कक्षाएं आरंभ हुईं। बाद में उत्तर प्रदेश सरकार ने भी परिषदीय विद्यालयों में आॅनलाइन शिक्षा का आदेश जारी किया। यह समझना ज़रूरी है कि ऑनलाइन क्लासेज का माॅड्यूल क्या है। क्या यह बच्चों के हित में है। इससे कितने स्कूली छात्रों को लाभ पहुंचेगा। बच्चों के शैक्षिक नुकसान की भरपाई में यह प्रयोग किस हद तक सफल है। यह आलेख महामारी के कारण लाॅकडाउन के साथ-साथ बाढ़, लू, सूखा, अत्यधिक ठण्ड, ओलावृष्टि, भूकम्प आदि आपदा की परिस्थितियों में भी ऑनलाइन एजूकेशन की युक्ति को समझने की कोशिश है।

क्या है ऑनलाइन शिक्षा

कोविड-19 के कारण लाॅकडाउन की आपात परिस्थिति बच्चों ही नहीं बल्कि माता-पिता/अभिभावक और शिक्षकों के लिए भी कठिन समय है। समय चाहे कितना ही कठिन क्यों न हो स्वास्थ्य का ठीक रहना ज़रूरी है। कहा जाता है कि स्वस्थ्य शरीर में ही स्वस्थ्य मस्तिष्क का विकास होता है। यही वजह है कि इस समय कोविड-19 के संक्रमण से सुरक्षा शिक्षा से भी अधिक महत्व का कार्य है। फिर भी शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी और गैर-सरकारी तौर पर बच्चों को घर पर ही पढ़ाने के लिए पहल किया जा रहा है। स्कूली शिक्षा में यह एक प्रयोग पहली बार व्यापक स्तर पर देखा जा रहा है। इस प्रयोग में बच्चे घर पर रह कर ही अपने स्कूल और शिक्षकों से जुड़ सकते हैं। विभिन्न विषयों के अभ्यास कर सकते हैं। उनके अभ्यास कार्य की जांच हो सकती है। इस तरह बच्चों का कोर्स घर पर रहते हुए पूरा हो सकता है। कोर्स कवर कराने का यही तरीका आॅनलाइन कहा जा रहा है।

ऑनलाइन शिक्षा में बच्चों को एक निश्चित समय के लिए एप्स के माध्यम से एक नेटवर्क से जोड़ दिया जाता है। बच्चे अपने स्कूल की ड्रेस पहनकर अपने-अपने घरों में निश्चित स्थान पर बैठते हैं। उनके सामने कक्षा का ब्लैकबोर्ड या व्ह्ाइटबोर्ड के बजाए एक अदद एन्ड्राएड मोबाइल होता है। मोबाइल में उनके शिक्षक की तस्वीर और आवाज़ सुनाई देती है। बच्चा अपने शिक्षक को कक्षा की बजाय मोबाइल में देखता-सुनता है। अपनी जिज्ञासाएं व्यक्त करता है। इसे विडियो क्लासेज कहा जा सकता है। विडियो क्लास के संचालन के लिए मोबाइल में एप्स का होना ज़रूरी है। यह एप कोई साफ्टवेयर डेवलपर व्यक्ति या कम्पनी बनाती और बेचती है। समाचारों में सुनने में आ रहा है कि एप निर्माताओं ने एक विडियो क्लास में छात्रों की अधिकतम संख्या 40 निर्धारित किया है। एप्स के प्रयोग का फायदा बड़े-बड़े शहरों, बड़े-बड़े स्कूलों और बड़े-बड़े घरों के बच्चों तक पहुंच रहा है। यह प्रयोग बच्चों के जीवन में एक रोचक अध्याय भी जोड़ रहा है। बालमन में नएपन का समावेश हो रहा है। बच्चे पढ़ाई के नए तर्ज से फूले नहीं समा रहे हैं। ऑनलाइन शिक्षा के माध्यम के तौर पर व्हाट्सएप और यूट्यूब का भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है।

ज़ाहिर है एप्स के माध्यम से बच्चे घर पर रहते हुए एक निश्चित समय के लिए ऑनलाइन विडियो क्लास से जुड़ जाते हैं। अभ्यास के लिए व्हाट्सएप के माध्यम से अभ्यास कार्य की साफ्ट काॅपी बच्चों के पास भेज दी जाती है। बच्चा मोबाइल या कम्प्यूटर में देख कर अभ्यास कार्य अपनी नोटबुक में करता है। अभ्यास करने के बाद उसका फोटो खींच कर संबंधित अध्यापक, व्हाट्सएप ग्रुप या विडियो क्लास वाले ग्रुप में शेयर करता है। इस तरह उसके अभ्यास कार्य की जांच की जाती है। फिर अगले दिन अगली कक्षा, अगला अभ्यास.... इत्यादि। इस तरह आॅनलाइन पढ़ाई चल रही है। माता-पिता और अभिभावक के लिए शिक्षा का ऑनलाइन तरीका काफी संतोषप्रद है। राजस्थान की राजधानी जयपुर में रहने वाले एक मित्र बताते हैं कि ऑनलाइन शिक्षा आरंभ होने के बाद उन्हें बड़ी राहत मिली है। वरना बच्चों का अधिकतम समय टीवी दखने या मोबाइल गेम खेलने में व्यतीत हो रहा था। अब वो स्टडी और अभ्यास कार्य भी कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की भाभी जी भी खुश हैं कि उनका बच्चा विडियो क्लास में उच्च अनुशासन दिखा रहा है। लखनऊ के ही एक मित्र बताते हैं कि उनकी चार साल की नन्ही बच्ची मोबाइल स्क्रीन पर ही अपनी मिस के साथ प्ले वे लर्निंग कर रही है।

जाहिर है ऑनलाइन शिक्षा बच्चों को घर पर स्टडी और अभ्यास से जोड़ने में सफल है। यह तकनीक आधारित है। एन्ड्राएड मोबाइल फोन, कम्प्यूटर या टैबलेट के साथ इंटरनेट डाटा पैक इसकी मूलभूत ज़रूरतें हैं। यह तकनीक कम्प्यूटर विज्ञान के क्षेत्र में हुई प्रगति का हिस्सा है। वैसे तो बच्चों के लिए इंटरनेट पर बहुत से लर्निंग एप्स मौजूद हैं। लेकिन एप्स का औपचारिक इस्तेमाल बाल शिक्षा में व्यापक स्तर पर पहली बार देखने में आ रहा है। तकनीक आधारित एप्स के इस्तेमाल ने जीवन के दूसरे क्षेत्रों की ही तरह शिक्षा में भी समय और मानव श्रम की बचत को संभव बनाया है। इसे परंपरागत और डिजिटल कक्षा के उदाहरण से समझा जा सकता है। कक्षा में शिक्षण कार्य समय-सारणी के अनुसार होता है। कक्षा और छात्र के बीच उचित अनुपात का ध्यान रखना होता है। आम तौर पर स्कूल की कक्षा में एक समय में एक अध्यापक लगभग 30 से 40 बच्चों को पढ़ाता है। बच्चों की संख्या इससे अधिक होने पर माइक का इस्तेमाल किया जाता है या सेक्शन अलग कर दिया जाता है। विभिन्न विषयों के टाॅपिक्स के बारे में अवधारणात्मक समझ विकसित करने में प्रोजेक्टर आदि का इस्तेमाल भी होता है। माइक सिस्टम और कम्प्यूटर के प्रयोग ने इन बंधनों को तोड़ दिया है। एक समय में कक्षा में 30-40 के बजाए 60 बच्चे भी शिक्षक की आवाज़ सुन सकते हैं। दृश्य माध्यम जैसे, प्रोजेक्टर स्क्रीन या टीवी स्क्रीन से पिछली पंक्ति में बैठे छात्रों की ब्लैक बोर्ड पर देखकर न पढ़ पाने की समस्या का समाधान हो जाता है। कोचिंग क्लासेज में यह सिस्टम काफी कामयाब है। ऐसा अक्सर होता है कि कोई बच्चा बीमारी या किसी कारणवश स्कूल में उपस्थित होकर कक्षा में शिक्षक का लेक्चर नहीं सुन पाता है। बाद में उसे किसी बच्चे की काॅपी लेकर छुटा हुआ काम पूरा करना पड़ता है। ऑनलाइन स्टडी मैटेरियल से ऐसे बच्चों की मदद होना एक बेहतर विकल्प है। इस विकल्प को अपनाने वाले बच्चे स्कूल के समय और कक्षा के अनुशासन से बंधे नहीं होते हैं। अपनी सुविधानुसार एन्ड्राएड मोबाइल फोन या कम्प्यूटर में इण्टरनेट के माध्यम से पढ़ते हैं। इस तरह की पढ़ाई एक तरफा संवाद पर आधारित है, जहां बच्चा जब चाहे मोबाइल या कम्प्यूटर की मदद से पढ़ता है। विडियो क्लासेज में कहने को दो तरफा संवाद होती है, जैसा कि स्कूल की कक्षा में होता है। लेकिन इस संवाद की प्रकृति भी एक तरफा होती है। क्योंकि विडियो क्लासेज में बाल विकास के विविध पक्षों का ध्यान रखना संभव नहीं है। ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि तकनीक आधारित ऑनलाइन कक्षाओं को सफलता पूर्वक संपन्न कराने के लिए शिक्षक और छात्रों, दोनों के पास एन्ड्राएड मोबाइल फोन का होना, दोनों का मोबाइल के संचालन में दक्ष होना, मोबाइल फोन में इण्टरनेट डाटा पैक का होना, नेटवर्क की निरन्तरता का होना, घर के अनौपचारिक माहौल में कक्षा की तरह का शान्तिपूर्ण स्थान और अनुशासन का होना आदि ज़रूरी शर्त हैं। इस बारे में कई शिक्षकों से बात हुई। उनके अनुसार 10 से 11 प्रतिशत बच्चों का ही व्हाट्सएप गु्रप बन पाया है। ऐसे में अधिकतर बच्चों का शिक्षा की प्रक्रिया से वंचित होना निश्चित है।

शिक्षा, समाज और ऑनलाइन तकनीक

शिक्षा को समाज से अलग करके नहीं देखा जा सकता है। भारतीय समाज के वर्गीय विभाजन को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता है। स्कूल-काॅलेज भी भारतीय समाज के वर्गीय विभाजन का प्रतिनिधित्व करते हैं। शिक्षा को सार्वभौमिक बनाने का अभियान और समान शिक्षा का पहल आदि का उद्देश्य समाज के वर्गीय चरित्र की समस्या को दूर करना है। ताकि सभी बच्चों को शिक्षा का समान अवसर प्राप्त हो सके। 2009 में कक्षा 1 से 8 तक की शिक्षा को कानूनी तौर पर बच्चों का मौलिक अधिकार बनाया गया। लेकिन मौजूदा शिक्षण व्यवस्था वास्तविकता से कोसों दूर है। एक ही देश में अलग-अलग वर्गों के बच्चे अलग-अलग तरह के स्कूलों में पढ़ते हैं। परिषदीय विद्यालयों और काॅनवेन्ट एवं पब्लिक स्कूलों का अन्तर इसी सच्चाई का प्रमाण है। स्कूल भवन और प्रशिक्षित शिक्षकों आदि के रूप में शैक्षिक संसाधन उपलब्ध होने के बाद भी सरकार बुनियादी शिक्षा के क्षेत्र में रोल माॅडल नहीं बन पायी है। बल्कि प्राइवेट स्कूलों को अपना रोल माॅडल बना रही है। जबकि केन्द्रीय विद्यालय और नवोदय विद्यालय भी सरकार का माॅडल हो सकते हैं। यदि तकनीक की बात करें तो आॅनलाइन शिक्षा हेतु आवश्यक सुविधाएं जैसे एन्ड्राएड मोबाइल और इंटरनेट की उपलब्धता समाज के सभी वर्गों तक नहीं है। 

ज़ाहिर है, आपात परिस्थिति में वैकल्पिक शिक्षा के तौर पर ऑनलाइन विडियो कक्षाएं, व्हाट्सअप और यूट्यूब ट्यूटोरियल्स समाज के कमजोर तबके के बच्चों को शिक्षा की मूल प्रक्रिया से अलग-थलग करने वाला प्रयोग साबित होगा। बाल शिक्षा में आॅनलाइन की मौजूदा पहल में 40 बच्चों को एप् के माध्यम से पढ़ाने के चक्कर में हर गांव-कस्बे के न जाने कितने 40 बच्चे पढ़ाई से वंचित रह जाएंगे। क्योंकि आॅनलाइन शिक्षा हेतु मूलभूत संसाधनों और सुविधाओं जैसे, एन्ड्राएड मोबाइल फोन और इंटरनेट आदि तक इनकी पहुंच नहीं हैं। यदि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की बात करें तो यहां ज्यादातर वो बच्चे पढ़ते हैं, जिनके परिवार सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक रूप से कमजोर और पिछडे़ हैं। इनमें बहुत से परिवार ऐसे हैं, जिनके काम में बच्चे हाथ न बटाएं तो घर चलाना मुश्किल हो जाता है। ऐसी स्थिति आने वाले समय में समाज के अंदर शैक्षिक खाई को और बढ़ाएगी?

ऑनलाइन शिक्षा विभेदकारी है

ऑनलाइन शिक्षा के प्रचार-प्रसार के पीछे सबसे महत्वपूण कारण यह बताया जा रहा है कि बच्चों की पढ़ाई पीछे नहीं होनी चाहिए। एप निर्माता स्कूल ऐट होम का संदेश देते हुए बता रहे हैं कि “कोविड-19 को अपने बच्चे की पढ़ाई में बाधा न बनने दें। जल्दी कीजिए् नया बैच दिनांक ...................... से शुरू हो रहा है।” एक लर्निंग एप एक बड़े सेलेबे्रटी का फोटो लगाकर यह दावा करता है कि “विडियो लर्निंग से बच्चों में बेहतर अवधारणात्मक समझ विकसित करने के साथ ही उन्हें बेहतर शिक्षार्थी बनने में मदद करता है।” सोशल मीडिया पर ऑनलाइन शिक्षण के एप्स की बाढ़ आ गयी है। एप का हर विज्ञापन कुछ न कुछ कह रहा है। एक एप का विज्ञापन ऐसा भी है “तो फिर सोचना क्या - जुड़िए हमारे स्मार्ट स्कूल एजूकेशन इनिशिएटिव के साथ, और अपना खु़द का बिजनेस बेहद कम इनवेस्टमेन्ट के साथ शुरू करें।” महानिदेशक, स्कूल शिक्षा, उत्तर प्रदेश द्वारा जारी संदेश में व्हाट्सएप गु्रप के माध्यम से ई-पाठशाला और दूरदर्शन के प्रोग्राम से अधिक से अधिक बच्चों को लाभ पहुंचाने की बात कही गयी है। ऐसा माहौल बन गया है कि ऑनलाइन का विकल्प शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले बहुत से व्यक्तियों और संस्थाओं को उचित लग रहा है। लेकिन ऑनलाइन शिक्षा का फार्मूला कई मायनों में विभेदकारी है। यह बच्चों और समाज के व्यापक हित में नहीं है। आॅनलाइन का आइडिया आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के बच्चों को शिक्षा के अवसर से वंचित करती है। उन परिवारों का उदाहरण लिया जा सकता है, जिनके पास एन्ड्राएड मोबाइल नहीं है या जिनके पास एन्ड्रायड मोबाइल में डेटा पैक का रिचार्ज कराने की क्षमता नहीं है। गरीबी की रेखाएं बहुत लम्बी हैं। इस लम्बी रेखा के दायरे में रहने वाले बहुत से घरों में बिजली नहीं है। रोज कमाने-खाने की दिक्कते हैं। रहने की समस्याएं हैं। पलायन और बेकारी की समस्या है। इन समस्याओं का समाधान किए बिना आम जनता के बच्चों के लिए ऑनलाइन शिक्षण व्यवस्था एक बोझ बन जाएगा। यदि उत्तर प्रदेश की बात करें, तो यहां परिषदीय विद्यालयों में आॅनलाइन शिक्षण हेतु व्हाट्सएप् गु्रप बनाए गए हैं। लेकिन शायद ही कोई गु्रप ऐसा है, जिसमें 15 या 20 प्रतिशत से अधिक बच्चे शामिल हुए हों। कारण स्पषट है। ज़्यादातर बच्चों के घर में एन्ड्राएड मोबाइल फोन नहीं है। ज़्यादातर अभिभावक अशिक्षित हैं। उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वो अपने बच्चों की शिक्षा के लिए महंगे एन्ड्राएड फोन और इंटरनेट डाटा पैक का खर्च उठा सकें। यह भी सत्य है कि परिषदीय स्कूलों के अधिकतर बच्चे अपने माता-पिता के साथ अपने घर के कामों में जैसे, खेती-किसानी, मजदूरी और दुकानदारी आदि में हाथ बंटाते हैं। इन बच्चों को स्कूल में बनाए रखने के लिए ही मिड डे मिल, डेªस और वजीफा आदि योजनाएं क्रियान्वयन में हैं। अक्सर समाचारों में यह भी सुनने में आता है कि परिषदीय विद्यालयों के छात्र आम तौर पर अपनी आयु और कक्षा के अनुरूप लिखना-पढ़ना नहीं जानते हैं। ऐसे में इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि व्हाट्सएप गु्रप के माध्यम से पढ़ने की लालसा में परिषदीय स्कूलों के बच्चे बेहतर लर्नर बनने के बजाय मोबाइल का आदी बन जाएं। यदि ऐसा होता है, तो गरीबी की धूप-छांव में जीवन गुजारने वाले परिवारों का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा। दूसरी ओर यह भी मुमकिन है गरीबी और अभाव में जीवन यापन करने वाले परिवारों के बच्चों का एक बड़ा हिस्सा अपने परिवार के कमजोर आर्थिक स्थिति को धता-बताते हुए अपने माता-पिता पर एन्ड्राएड मोबाइल खरीदने का दबाव बनाए।

फिर भी यदि सरकार और ऑनलाइन शिक्षा के विशेषज्ञों को बाल शिक्षा में डिजिटल, वर्चअल, विडियो, व्हाट्एप, यूट्यूब आदि का प्रयोग तर्क संगत लगता है। तो अच्छा होता कि हर बच्चे के घर में सरकार एन्ड्राएड फोन या कम्प्यूटर उपलब्ध कराती। जैसा कि उत्तर प्रदेश में पिछली सरकार ने कम्प्यूटर और लैपटाॅप योजना के अन्तर्गत लाखों उपकरण वितरित किए थे। पिछली सरकार ने ये उपकरण हमेशा-हमेशा के लिए दे दिया था। मौजूदा सरकार चाहे तो लाॅडाउन की आपात परिस्थिति समाप्त होने के बाद इन उपकरणों को वापस अपने पास जमा करवा ले। चुनाव में इस्तेमाल होने वाले ईवीएम मशीन की तरह ही ये तकनीकी संसाधन भारत सरकार या प्रदेश सरकारों की संपत्ति होती। जब भी अत्यधिक ठण्ड, ओला वृष्टि, बारिश, आंधी, तूफान और बाढ़ आदि के कारण आपात परिस्थितियां पैदा होतीं, सरकार इन तकनीकी यंत्रों को बच्चों के लिए निःशुल्क उपलब्ध कराती। अपने स्कूल काॅलेज का परिचय पत्र दिखा कर बच्चे इन यंत्रों को लेते और इस्तेमाल करने के बाद वापस कर देते। सरकार को ऑनलाइन शिक्षण जारी रहने तक नेट पैक रिचार्ज कराने की जिम्मेदारी खुद लेनी चाहिए। यदि रेलवे स्टेशनों पर निःशुल्क वाई-फाई सुविधा दी जा सकती है, तो शिक्षा के लिए क्यों नहीं।

स्वयम् प्रभा और दूरदर्शन का उदाहरण

ऑनलाइन शिक्षण का एक विकल्प कम्युनिटी रेडियो या ज्ञानवाणी आदि सैटेलाइट टेलीकाॅस्ट भी हो सकता है। जिस तरह से हम निश्चित समय के लिए टीवी पर समाचार या कोई मनोरंजन चैनल पर कार्यक्रम देखते हैं, ठीक उसी तरह कक्षावार अलग-अलग विषयों पर व्याख्यान का प्रसारण कराया जा सकता है। जैसा कि उत्तर प्रदेश के स्कूल शिक्षा के महानिदेशक ने ई-पाठशाला के अन्तर्गत दूरदर्शन पर कार्यक्रमों के प्रसारण की बात कही है। इससे शिक्षा की मूल प्रक्रिया में अधिक से अधिक बच्चों को शामिल होने का अवसर मिल सकेगा। मानव श्रम और धन की बड़े पैमाने पर बचत भी होगी। इसकी तुलना इग्नू के आॅनलाइन कार्यक्रमों से की जा सकती है। लेकिन यह युक्ति बाल शिक्षा के लिए व्यावहारिक नहीं है। क्योंकि बच्चों की बुनियादी ज़रूरतें सिर्फ कुर्सी या बेन्च पर बैठ कर एक टक अपने शिक्षक और ब्लैकबोर्ड को निहारना नहीं है। बल्कि स्कूल के औपचारिक परिवेश में शिक्षक और अपने कक्षा के सहपाठियों के साथ विभिन्न क्रियाओं में लिप्त रहते हुए सीखना है।

यदि कक्षा 9 और इसके बाद की कक्षाओं के ऑनलाइन शिक्षा की बात करें तो सैटेलाइट चैनलों के माध्यम से औपचारिक शिक्षा की कमी को एक हद तक पूरा किया जा सकता है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा डिजिटल एजूकेशन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर आॅनलाइन शिक्षा के लिए स्वयम् प्रभा की शुरूआत की है। 28 मार्च 2020 की एनडीटीवी की रिपोर्टर अनिशा कुमारी की रिपोर्ट के अनुसार 23 से 28 मार्च के बीच आॅनलाइन शिक्षा से जुड़ने वाले व्यक्तियों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गयी है। इस रिपोर्ट के अनुसार स्वयम् के जनवरी 2020 सेमेस्टर के लिए 25 लाख छात्र पहले से ही 571 अलग-अलग कोर्स में पंजीकृत हैं। लाॅकडाउन के पहले सप्ताह में यानि 23 से 28 मार्च के दौरान लगभग 50,000 लोगों ने स्वयम् तक पहुंच बनाने की कोशिश की है। एनडीटीवी के ही पत्रकार शिहाबुद्दीन कुंजू एस. की 20 अप्रैल की रिपोर्ट के अनुसार स्वयम् आॅनलाइन एजूकेशन प्लेटफाॅर्म पर 1,902 कोर्स उपलब्ध हैं। रिपोर्ट में मानव संसाधन मंत्रालय के हवाले से बताया गया है, कि इस समय 26 लाख छात्र 574 कोर्सों में ऑनलाइन शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। 24 अप्रैल को मित्र शैलेन्द्र ने बताया कि स्वयम् प्रभा चैनल पर वो दोपहर के समय का प्रोग्राम देखते हैं। विशेषज्ञों द्वारा अलग-अलग विषयों पर व्याख्यान बहुत लाभकारी है। यहां दो बातें महत्वपूर्ण हैं। पहली यह कि टीवी का कवरेज मोबाइल से अधिक है। जिन परिवारों में मोबाइल वहन करने की क्षमता नहीं है, उन परिवारों के बच्चों के लिए स्वयम् प्रभा के टीवी कार्यक्रमों का प्रसारण लाभ पहुंचा सकती है। इस संदर्भ में लाॅक डाउन के एक सप्ताह में स्वयम् प्रभा चैनल के दर्शकों में 50,000 की वृद्धी बड़ी बात है। लेकिन यह सवाल फिर भी अनुत्तरित रह जाता है कि क्या दर्शकों की संख्या में वृद्धि होना शिक्षा की प्रक्रिया के सुचारू रूप से चलने का प्रमाण है? क्या 50,000 की यह संख्या ही पूरा भारत है? दूसरी बात यह कि स्वयम् प्रभा की ऑनलाइन टीचिंग्स और स्टडी मैटेरियल्स कक्षा 9 और इससे ऊपर की कक्षाओं के छात्रों के लिए हैं। ऑनलाइन एजूकेशन का प्रयोग इन दिनों पूर्व-प्राथमिक, प्राथमिक और उच्च प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ने वाले छात्रों के साथ भी किया जा रहा है। पूर्व-प्राथमिक, प्राथमिक और उच्च प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ने वाले छात्रों के लिए स्वयम् प्रभा कोई विकल्प नहीं है। यदि होता भी तो 4 घण्टे की अवधि में इन कक्षाओं के बच्चों के विभिन्न विषयों की पढ़ाई कैसे संभव है। यदि इसका कोई रास्ता निकाल भी लिया जाए तो टी.वी. स्क्रीन पर बच्चों के व्यक्तित्व विकास की विभिन्न गतिविधियों को संपन्न कराना असंभव है। बाल विकास बेतार संचार के माध्यम से असंभव है। इसके लिए स्कूल या स्कूल जैसा भौतिक वातावरण और शिक्षक एवं मार्गदर्शक के रूप में व्यक्तियों की मौजूदगी ज़रूरी है। दो तरफा संवाद का होना आवश्यक है। जो बेहतर तरीके से कक्षा में ही संभव होता है, न कि मोबाइल फोन या टीवी पर। ज़ाहिर है, संख्या और परिमाण दोनों ही दृष्टि से आॅनलाइन एजूकेशन की संकल्पना छात्रों के व्यापक हित में नहीं है। यदि इसके बावजूद भी आॅनलाइन शिक्षा का प्रसार होता है तो शिक्षा की गुणवत्ता गिरने और शिक्षा के सर्टिफिकेशन तक सीमित रहने की संभावना बढ़ेगी।

तकनीक का अधिभार

बहुत से अभिभावक ऐसे हैं, जिनके लिए समय से महीने की फीस जमा करना बड़ी समस्या है। ऐसे अभिभावकों पर तकनीक का अधिभार अवश्य बढ़ेगा। बाल मन की गहराइयों में उतरने पर अंदाज़ा होता है कि यह कितना भयावह है। मौजूदा दौर में किशोरों को मोबाइल स्क्रीन और डेटा पैक की दुनिया अपने में समाहित कर लेना चाहती है। शायद ही कोई माता-पिता ऐसा हो जिसका 15-18 वर्ष का बच्चे की मांग एक अदद एन्ड्राएड मोबाइल फोन की नहीं है। माता-पिता और बच्चों का संबंध बाॅयोलाजिकल है। इन संबंधों को पोषित करने के क्रम में बच्चे की हर मांग को पूरा करना अपना परम दायित्व समझते हैं। इसी का फायदा बाज़ार उठाता है। जबकि बाज़ार और बच्चे का संबंध भौतिक है। बाज़ार के क्रिया-कलाप में बाॅयोलाॅजिकल के अंदर की मानवीय संवेदना शून्य है। बाज़ार कोविड-19 की आपात परिस्थिति में भी हमारे घरों की चैखटों पर अपनी दस्तकें लगातार दे रहा है। टीवी और मोबाइल में जो विज्ञापन और संदेश प्रसारित किए जा रहे हैं, उन संदेशों में बच्चों की शिक्षा के प्रति चिन्तित होने की संवेदना की अभिव्यक्ति है। लेकिन इसकी शर्त है कि आप उनके रिचार्ज और टाॅपअप कराते रहें। डाटा पैक डलवाते रहे। उनके स्कीम और आॅफर वाले मेसेज दुःख के पलों में बहुत क्रूर प्रतीत होते हैं।

सोशल डिस्टैन्सिंग में बच्चे घरों में अकेले हैं। पहले से ही एकान्तवास के मनोरंजन के प्रसार में शामिल बाज़ार निर्दयी होकर घरों में बैठे हमारे बच्चों को निगल जाना चाहता है। इसलिए कि उसका आॅनलाइन मुनाफा रूके नहीं। शिक्षा को लेकर हम सभी पहले से कहीं अधिक जागरूक हैं। क्या बाज़ार की प्रक्रिया में शामिल तमाम लोग इसी समाज के नहीं हैं? क्या उनके बच्चे नहीं हैं? क्या उनका दायित्व नहीं है कि शिक्षा को कारोबारी गतिविधियों से अलग रखने में अपना योगदान दें? क्या संकट की इस घड़ी में बाज़ार की कोई साकारात्मक सामाजिक भूमिका नहीं बनती? कम से कम परिस्थितियां सामान्य होने तक स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में मुनाफा आधारित गतिविधियों को भी लाॅकडाउन के दायरे में लाने के लिए सरकार को गाइडलाइन्स जारी करना चाहिए। यह कदम उन अभिभावकों को राहत पहुंचाने वाला होगा, जो कठिन परिस्थितियों में अपने बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य दैनिक आवश्यकताएं पूरी करते है।

अनगिनत लर्निंग एप्स और स्टडी मैटीरियल के इस्तेमाल का खतरा

ऑनलाइन शिक्षा में माध्यम के तौर पर इंटरनेट के कई ख़तरे हैं। इनको नज़र अंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए। यह सच है कि इंटरनेट ने बहुत से काम आसान किए हैं। हम जानते हैं कि कोई बीस-पचीस बरस पहले एक चिट्ठी को एक शहर से दूसरे शहर तक पहुंचने में 5 से 15 या इससे भी अधिक दिनों तक का समय लगता था। अब चिट्ठियों के लिए कागज की ज़रूरत नहीं होती है। कम्प्यूटर या मोबाइल का एक बटन दबाते ही छोटी-बड़ी हर चिट्ठी दुनिया के किसी भी हिस्से में पहुंच जाती है। स्कूल-काॅलेज की कक्षाओं में शिक्षक का व्याख्यान समाप्त होने के बाद उसे फिर से सुना नहीं जा सकता है। एक स्कूल का छात्र एक ही शिक्षक का व्याख्यान सुन सकता है। लेकिन इंटरनेट हमें ऑनलाइन के जिस संसार में हमें ले जाती है, वहां एक ही विषय पर अनगिनत व्याख्यान और ट्यूटोरियल्स उपलब्ध होते हैं। यदि एक ट्यूटोरियल से विषय नहीं समझ में आता है, दूसरा, तीसरा ट्यूटोरियल्स देखने-सुनने के अपार अवसर होते हैं। बच्चे को जब तक विषय नहीं समझ में आए, वो तब तक ट्यूटोरियल्स देखने के लिए आज़ाद होता है। लेकिन इस प्रक्रिया में समय का एक बड़ा हिस्सा कब गुज़र जाता है, इस बात का पता ही नहीं चलता। ऑनलाइन की दुनिया की कोई सीमा नहीं है। इसलिए यह कहना मुश्किल है कि बच्चे का कितना समय मोबाइल से पढ़ाई में व्यतीत होगा। ऐसा भी मुमकिन है कि बच्चे का अधिकतर समय उसकी रूचि के किसी एक ही विषय सामग्री को समझने में व्यतीत हो जाए। कहा जा सकता है कि अनगिनत स्टडी मैटेरियल्स को पढ़ना बच्चों के उपयोगी समय के बरबाद होने का कारण बन सकता है। बच्चे मोबाइल का आदी बन सकते हैं। क्योंकि मोबाइल की दुनिया बाल विकास की विविधता के अनुरूप नहीं है। हर मोबाइल स्क्रीन पर आकर्षित करने वाली बहुत से विज्ञापन और एप्स मौजूद हैं, जो बच्चों को भावनात्मक और संवेगात्मक रूप से अत्यधिक सक्रिय और उत्तेजित करते हैं। बच्चों में व्यवहारगत समस्याएं उत्पन्न होती हैं। बच्चा अपने माता-पिता और वास्तविक परिवेश से दूर होने लगता है और मोबाइल की आभाषी दुनिया को ही वास्तविक समझने लगता है। वो एकान्तवास के मनोरंजन की ओर आकर्षित होता है। न समय से खाना-पीना और न समय से सोना-जागना। ऐसी परिस्थिति माता-पिता और अभिभावको के लिए चुनौती बन जाती है, कि वो अपने ही बच्चे को अपना मूल्य और संस्कार कैसे सिखाएं। बच्चा पूरी तरह बाजार और पूंजी आधारित मूल्यों का वाहक बन जाता है। जिसका खमियाज़ा माता-पिता, अभिभावक और समाज को भुगतना पड़ता है।

ऑनलाइन शिक्षा का बच्चों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव

ऑनलाइन पढ़ाई का तरीका बच्चों के लिए फायदेमंद प्रतीत हो रहा है। लेकिन मोबाइल का इस्तेमाल बच्चों के लिए कितना लाभप्रद है, इस विषय पर सरकार या किसी मेडिकल काउंसिल का कोई स्पष्ट निर्देश नहीं है। हालांकि ऑनलाइन कक्षाएं 2 घण्टे से 4 घण्टे तक चलाई जा रही हैं। लेकिन व्हाट्सएप पर विडियो मेसेजेज को देखने का कोई समय निश्चित नहीं है। हम जानते हैं कि हर बच्चा एक दूसरे से अलग होता है, जिसे वैयक्तिक भिन्नता कहते हैं। प्रत्येक बच्चे की सीखने के प्रति तत्परता, क्षमता और कार्य कुशलता भिन्न होती है। ऐसे में यह तय करना मुश्किल है कि किस बच्चे को विषय सामग्री के तौर पर उपलब्ध यूट्यूब विडियो कितनी बार देखना होगा। इसमें अनुमानित समय कितना लगेगा। यह विचारणीय है कि एक तरफ जहां डाॅक्टर बच्चों को मोबाइल का इस्तेमाल कम से कम करने की सलाह दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ बच्चों को आॅनलाइन पढ़ाई के नाम पर 4 से 8 घण्टे या इससे भी अधिक समय तक मोबाइल के इस्तेमाल के लिए प्रेरित किया जा रहा है। यह बच्चों की आंख और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है।

यह बात हम सभी जानते हैं कि आंखे अनमोल हैं। मोबाइल, टीवी या कम्प्यूटर स्क्रीन पर अधिक समय तक देखना आँखों को नुकसान पहुंचा सकता है। डाॅक्टरों का सुझाव है कि बच्चे देर तक टीवी न देखें। बच्चे देर तक मोबाइल न देखें। लेकिन ‘पढ़ाई छूट न जाए’ के नाम पर जब 4-5 बरस के बच्चों से लेकर 14-15 साल के बच्चों के समक्ष ऑनलाइन का विकल्प अपनाने को प्राथमिक बना दिया जाए, तो विज्ञान के शिक्षक द्वारा आंखों की संरचना पर दिए गए व्याख्यान बेमानी हो जाते हैं। आंखों की सुरक्षा पर डाॅक्टरों की सलाह बेकाम मालूम होने लगती है। स्थितियां ऐसी बन पड़ी हैं, कि विज्ञान के जो शिक्षक कल तक आंखों को प्रकाश की तेज चमक और मोबाइल व टीवी स्क्रीन से बचाने के उपाय बता रहे थे, वही शिक्षक विडियो क्लास में पढ़ाते नज़र आ रहे हैं।
मोबाइल और टीवी स्क्रीन मन और शरीर को थका देते हैं। बच्चों में इन उपकरणों का आदी बनने की प्रवृत्ति देखी गयी है। ऐसे में दो घण्टे की औपचारिक विडियो क्लास के लिए फाॅलोअप के तौर पर 2 से 4 घण्टे और मोबाइल के इस्तेमाल बाद के समय में बच्चे के बैक पेन (स्पाइनल कार्ड, कमर और पीठ दर्द) और स्पाॅन्डिलाटिस (गर्दन की हड्डियों में विकार) का कारण भी बन सकता है। स्वास्थ्य विकार के इन संभावनाओं को नज़र अंदाज करके आॅनलाइन पढ़ाई का तरीका उचित नहीं है। ऐसा करना बच्चों के दीर्घकालिक स्वास्थ्य हित में नहीं है। बच्चे देश का भविष्य हैं। यदि भविष्य का शरीर, मन और आंख से बीमार होगा, तो देश प्रगति और विकास की नई मंजिलें कैसे तय करेगा?

कुल मिला कर कहा जा सकता है कि किसी आपात परिस्थिति में बाल शिक्षा में वैकल्पिक शिक्षा के तौर पर आॅनलाइन शिक्षा बेहतर विकल्प नहीं है। बच्चों के शारीरिक, मानसिक, सांवेगिक, सामाजिक विकास में तकनीक का सीमित प्रयोग ही उचित है। आपात परिस्थिति में स्कूल बंद होने के कारण कोर्स पूरा कराने या शैक्षिक पिछड़ेपन की भरपाई के नाम पर डिजिटल तकनीक का बेलगाम इस्तेमाल बच्चों के साथ ज़्यादती है। इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि बच्चों के स्वास्थ्य सुरक्षा की कवायद के तौर पर तकनीक के बोझ तले उन्हें दबा न दिया जाए। यह किसी खेल के फाउल की तरह है। जो खेल के नियमों के खि़लाफ़ है। दर असल बच्चा बायोलाॅजिकल है। किसी भी बच्चे के साथ मनुष्य निर्मित तकनीक (या कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग) का प्रयोग करना तब तक ठीक नहीं है, जब तक कि वह बच्चा शारीरिक, मानसिक, सांवेगिक और सामाजिक रूप से परिपक्व न हो जाए। इस बात का विशेष ध्यान रखना माता-पिता और शिक्षकों से कहीं अधिक नीति निर्माताओं का है। जिन्हें यह तय करने का दायित्व है, कि बच्चों की शिक्षा कैसे होनी चाहिए।

हो सकता है कि आने वाले समय में ऑनलाइन शिक्षा का मौजूदा प्रयोग व्यापक स्तर पर अध्ययन-अध्यापन की प्रक्रिया का स्थाई अंग बन जाए या बना दिया जाए। फिर भी कहना होगा कि बाल शिक्षा में यह प्रयोग कदापि उचित नहीं है। कोई भी समाज तकनीक के इस बोझ को उठाने की स्थिति में नहीं है। इस तरह का प्रयोग बाल शिक्षा के सिद्धान्तों के अनुरूप नहीं है। यह बच्चों के स्वास्थ्य हित में नहीं है। यह बड़ी संख्या में बच्चों को शिक्षा की मूल प्रक्रिया में शामिल होने से रोकता है। अखिल भारतीय शैक्षिक सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार निजीकरण के दो दशकों के बाद भी स्कूल जाने वाले बच्चों की निर्भरता सरकारी स्कूलों पर ही अधिक है। ऐसे में ऑनलाइन शिक्षा का फार्मूला नितान्त वैयक्तिक, निजी, एक खास तबके के बच्चों के लिए उपयोगी प्रतीत होता है। इस प्रक्रिया से बाल जगत का बड़ा हिस्सा अछूता रहेगा। आने वाले समय में शैक्षिक खाई और बढ़ेगी। सरकार को ऐसी युक्ति पर विचार करना चाहिए, जिससे शिक्षा की मूल प्रक्रिया में अधिक से अधिक बच्चों को शामिल किया जा सके।

Monday, April 13, 2020

मुश्किल वक्त के इन साथियों को भी सलाम

ये वो लोग हैं, जो दूसरों के लिए अपने घरों से बाहर रहते हैं। हमारे-आपके बीच आते-जाते रहते हैं। लेकिन हमेशा से अदृश्य रहे हैं। ये लोग मज़दूर हैं, मजबूर हैं और शिक्षा से दूर हैं। ये वो लोग हैं जो अपनी सेवाएं उपलब्ध कराने की एवज में फोटो नहीं खिंचाते। इन लोगों के लिए भी आभार, धन्यवाद और सैल्यूट तो बनता ही है।

इन दिनों पूरा देश कोविड-19 के संक्रमण के फैलाव को रोकने के लिए लाॅकडाउन की आपात स्थिति में है। संक्रमण लगातार बढ़ रहा है। हज़ारों लोग कोरैंटीन और आइसोलेसन में हैं। बहुत से लोग ऐसे हैं, जो संक्रमित नहीं हैं। लेकिन ज़रा सी चूक इन्हें संक्रमण का शिकार बना सकती है। इनमें गरीब, मज़दूर, किसान हैं। बड़ी तादाद उन सुविधा प्रदाताओं की है, जिनका ठेला हर रोज़ हमारे घरों की दहलीज पर आ खड़ा होता है। कभी ‘सब्जी वाला, कभी साग वाला, कभी आलू, प्याज और टमाटर वाला बनकर। इनमें फल विक्रेता होते हैं। जो हमारे-आप के लिए कभी अमरूद ले आते हैं, कभी तो केला, सेव और सन्तरा। हम इन्हें चाट वाले, चाय वाले, चाउमिन वाले, चनाचूर वाले, फुल्की वाले, भुजा वाले और सोन पापड़ी वाले के रूप में भी देखते हैं। ये वही लोग हैं जो अपनी सेवाएं हम तक हर रोज़ पहुंचाते हैं। इन्हें पैदल, गली-गली घूमना पड़ता है। ताकि दो जून की रोटी का जुगाड़ हो सके। सामान्य दिनों में चिलचिलाती धूप में खीरा, तरबूज़ और कुल्फी की ठण्डक का एहसास इन्हीं लोगों की बदौलत कर पाते हैं। गर्मी के दिनों में जब लू से बचने के लिए लोग अपने-अपने घरों में पंखे, कूलर और एसी कमरों में होते हैं, तो ये लोग सड़कांे और गलियों की ख़ाक छानते रहते हैं। बीमार पड़ने पर दस-बीस रूपए की स्वास्थ्य सुविधाओं से काम चलाना पड़ता है। दो-चार दिन काम बंद हो जाए तो इनके सामने भूखे रहने की भी परिस्थितियां पैदा हो जाती हैं। इस समय पूरा देश लाॅकडाउन की आपात परिस्थिति में है। रोज़ कमाने-खाने वाले इन अस्थाई ठेले वालों के लिए यह परिस्थिति किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। सोशल और फिजिकल दूरी बनाए रखना, बार-बार हाथ धुलना, फेस मास्क का इस्तेमाल इनके लिए सहज काम नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि संक्रमण का डर इन्हें नहीं है। लेकिन रोज कमाने-खाने की दिक्कतें ऐसी हैं कि यह डर कोई मायने नहीं रखता। हालात ऐसे हैं कि इन्हें घर-घर सब्जी, दूध, गैस सिलेण्डर और अन्य आवश्यक वस्तुएं पहुंचाने का बीड़ा उठाना पड़ रहा है। ठेले वालों और मज़दूरों के अर्थोपार्जन की प्रक्रिया रूक गयी है। चूंकि सब्जी और फल ज़रूरी वस्तुओं में शुमार है। इसका फायदा हर ग़रीब उठाना चाहता है। ताकि वो अपना परिवार चला सके। यही वजह है कि कोई चाट-पकौड़े वाला सब्जी बेच रहा है, तो किसी मज़दूर फल बेच जीवन चलाना पड़ रहा है। निस्संदेह इनकी आजीविका की आवश्यकताएं हैं। लेकिन इनके सेवा को कम करके नहीं देखा जा सकता है। क्योंकि ये वो लोग हैं जो महामारी की आपात परिस्थिति में साहस करके हम तक आलू, प्याज, लहसुन, अदरक, धनिया, पोदिना, नींबू और साग आदि पहुंचा रहे हैं। ताकि हमारे मुंह का ज़ायका न बिगड़ने पाए और हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बीमारी से लड़ने लायक बनी रहे। अनिल मेरे बचपन का दोस्त है। उसका छोटा भाई पप्पू चाट-पकौड़ा बेचकर घर चलाता है। इन दिनों जब हम और आप अपने-अपने घरों में हैं। पप्पू चेहरे पर मुस्कान लिए सब्जियां बेच रहा है। क्योंकि पप्पू के लिए आजीविका का संकट कोरोना से भी बड़ा है। फरीद मियां उन सब्जी विक्रेताओं में हैं, जिन्होंने हवा के खिलाफ जाकर सब्जी बेचने का बीड़ा उठाया है। इस काम में वो अकेले नहीं हैं। बच्चे को भी काम में हाथ बंटाना पड़ता है।

उन महिलाओं और बच्चियों का जिक्र भी ज़रूरी है, जो आपात परिस्थिति में घण्टे-दो घण्टे के लिए ही सही, सड़क किनारे सब्जी बेचते देखी जा रही हैं। फैयाज़ भाई बढ़ई का काम करते हैं। इन दिनों काम बंद है। एक पत्नी और तीन बच्चों का परिवार बड़ा नहीं है। लेकिन संकट के बादलों से पार पाना इनके लिए भी बड़ी चुनौती है। फैयाज़ भाई इस चुनौती का सामना साग-सब्जी जैसी आवश्यक वस्तुओं को घर-घर पहुंचाकर कर रहे हैं। अशरफ भाई पंचर बनाते हैं, लेकिन दुकान बंद है और इन दिनों ठेले पर सब्ज़ियां बेच जिन्दगी गुजर-बसर कर रहे हैं। राम नरायन कुशवाहा अहिरौली से पैदल ठेले पर सब्जी लेकर मुहम्मदाबाद आते हैं। कोविड-19 से डरे हुए हैं। लाॅकडाउन में पुलिसिया डण्डा भी खाया। लेकिन पेट का सवाल इनके लिए बहुत बड़ा सवाल है। मुंह पर देसी मास्क बांधे मुस्कराते हुए कहते हैं “कि पेटवा क का करल जा।”

निज़ामुद्दीन पहले पावरलूम कारीगर थे। भीवण्डी रहते थे। जिस घर की जिम्मेदारी निभाने के लिए भीवण्डी गए थे, उसी घर की जिम्मेदारियों ने जल्द ही उन्हें घर बुला लिया। उन्हें भिवण्डी छोड़े लगभग सात बरस हो चुके हैं। मेहनत मज़दूरी करके दिहाड़ी से अपना परिवार चलाते हैं। निर्माण कार्य रूका हुआ है। अपने परिवार का पेट पालने के लिए आजकल निज़ामुद्ीन मुहल्ले के लोगों और बाज़ार के बीच कड़ी के तौर पर काम कर रहे हैं। वो हर सुबह दो घण्टे तक अपने घर से बाहर रहकर मुहल्ले के लोगों का सामान-लाने, ले जाने का काम कर रहे हैं। बदले में जो कुछ मिलता है, उससे गुजारा कर रहे हैं। निज़ामुद्दीन सन्निर्माण श्रमिक में हैं लेकिन श्रम विभाग में उनका पंजीयन नहीं है। पंजीयन के लिए दो वर्ष पहले मैंने खु़द उन्हें प्रेरित किया था। उनका फार्म भी भरवा दिया था। लेकिन शिक्षा और जागरूकता न होने के कारण निज़ामुद्दीन जैसे मज़दूर अपनी पहचान से वंचित हैं। इसलिए ऐसे मज़दूर सरकार की ओर से दी जाने वाली 1000 रूपए की सहायता राशि से भी वंचित हैं। कोविड-19 के कारण लाॅकडाउन की इस परिस्थिति में गैस सिलेण्डर पहुंचाने वाले मेहनतकश मज़दूरों की सेवाएं भी काबि़ले तारीफ़ है। यदि ये सिलेण्डर घर-घर न पहुंचाएं तो बहुत से घरों में समय पर चूल्हा जलना मुश्किल हो जाएगा। सुबह-सवेरे दूध वाले दूध न दें तो दूध पीते बच्चों को भूखा रहना पड़ेगा।

दर असल ये वो साहसी लोग हैं, जो अपने परिवार की आजीविका के लिए सड़कों पर हैं। खासकर तब जब बाकी लोग संक्रमण से सुरक्षित रहने के लिए अपने-अपने घरों में हैं। रोज कमाने-खाने वाले ये लोग पहले से शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं। लेकिन आज की कठिन परिस्थिति में इनकी सेवाएं किसी डाॅक्टर, नर्स, पुलिस-प्रशासन और सामाजिक कार्यकर्ता से कम नहीं है। ये वो लोग हैं, जो दूसरों के लिए अपने घरों से बाहर रहते हैं। हमारे-आपके बीच आते-जाते रहते हैं। लेकिन हमेशा से अदृश्य रहे हैं। ये लोग मज़दूर हैं, मजबूर हैं और शिक्षा से दूर हैं। ये वो लोग हैं जो अपनी सेवाएं उपलब्ध कराने की एवज में फोटो नहीं खिंचाते। इन लोगों के लिए भी आभार, धन्यवाद और सैल्यूट तो बनता ही है।

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Monday, March 30, 2020

डर का मनोविज्ञान और कोविड-19


अच्छा तो यह है कि हम डरे हुए लोग वर्तमान स्थिति के साथ बेहतर सामंजस्य बनाने की कोशिश करें। गीत, कविता, किस्से-कहांनियां सुनें और सुनाएं। हंसे और हंसाएं। जीवन अमूल्य है। घर से बाहर जाकर या घर में रहकर बीमार होना विकल्प नहीं है। अपनी ऊर्जा साकारात्मक सोच के साथ रचनात्मक कार्यों में लगाना ही उचित है। सुख और दुःख जीवन के दो पहलू हैं। मानव सभ्यता ने विकास का लम्बा सफर इसी धूप-छांव में तय किया है।



डर, भय, ख़ौफ़ का भाव मानव ही नहीं अपितु जानवरों में भी होता है। मनुष्य के दो भाव जन्मना होते हैं। एक भाव सुखद होता है तो दूसरा दुःखद होता है। डर का भाव दुःखद होता है। जिसमें मनुष्य को किसी तरह की हानि पहुंचने की संभावना होती है। ऐसी संभावना निजी और सामजिक जीवन की परिस्थितियों में उतार-चढ़ाव से बनती है। कहा जा सकता है कि मानवीय भावना के विकास में मनुष्य का परिवेश और परिस्थितियों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। मनुष्य अपने परिवेश और परिस्थिति में रहकर ही भावनात्मक परिपक्वता प्राप्त करता है। चूंकि विकास की प्रक्रिया निरन्तर जारी रहती है। इसलिए समय और परिस्थितियां बदलती हैं तो मनुष्य की भावनाओं में भी बदलाव परिलक्षित होता है। उदाहरण के लिए कोई बच्चा कमरे में अकेले होता है तो उसे डर का अनुभव होता है। किसी बच्चे को अकेले घर से बाहर जाने डर लगता है। कोई बच्चा समूह में खेलने से डरता है। डर के बहुत से कारण गिनाए जा सकते हैं। लेकिन बाल विकास की विभिन्न अवस्थाओं में भावनात्क संतुलन और सामंजस्य के लिए माता-पिता, शिक्षक और एक समय के बाद बच्चा खुद भी प्रयास करते हैं। यही कारण है कि जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, उसके मन में डर का भाव कम होता जाता है। यदि बच्चे अपने घर और समाज के परिवेश से अलग रहते हैं, तो ऐसे बच्चों के भावनात्मक विकास में संतुलन का अभाव होता है। इसके कारण ऐसे बच्चे वयस्क होने के बाद भी डरते रहते हैं। लेकिन कुछ बच्चे परिस्थितियों के कारण बिल्कुल नहीं डरते हैं। बांसफोर समुदाय के बच्चों को चाकू और गंडासे से बांस काटने में डर नहीं लगता है। किसान के बच्चों को खेत में नंगे पांव जाने में डर नहीं लगता है। किसी महिला या हलवाई को चूल्हे पर रखे तेल के गरम कड़ाहे से जलने का डर नहीं होता है। ऐसा परिस्थितियों के कारण ही संभव हो पाता है।

इस समय पूरी दुनिया के लोग डरे हुए हैं। कोविड-19 के संक्रमण के फैलाव के परिणामों की कल्पना ही डर का बड़ा कारण है। लोग घरों में रहने के लिए विवश हैं। परिस्थितियां कुछ ऐसी बन पड़ी हैं कि जन सामान्य ‘घर में रहना, सोशल डिस्टैन्सिंग और हाथ धुलते रहना’ आदि उपायों से जीवन और मौत के बीच विभाजक रेखा खींच रहा है। लेकिन इन्हीं परिस्थितियों में बहुत से ऐसे लोग हैं, जो हेल्थ सर्विसेज, पुलिस प्रशासन और सामाजिक संस्थाओं से प्रतिबद्ध होकर न सिर्फ मरीजों बल्कि असामान्य परिस्थितियों में पलायन कर रहे मज़दूरों, गरीबों और भूखों की मदद कर रहे हैं। 

इलेक्ट्राॅनिक, प्रिन्ट और सोशल मीडिया में कोविड-19 से संक्रमण की ख़बरें किसी मैच के स्कोर बोर्ड की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है। टीवी और मोबाइल तकिया-बिछौना का हिस्सा बन चुका है। मैसेज आते ही फारवर्ड का बटन दब जाना आम बात है। हर कोई दूर होकर भी अपने प्रिय जनों को अद्यतन सूचनाओं से अपडेट रखने के प्रयास में है। कहना होगा कि बच्चा, जवान और बूढ़े लगभग सभी कोविड-19 की चिन्ताओं के साथ सो और जाग रहे हैं। इनकी दिनचर्या में इस संक्रमण के भय ने मजबूत स्थान बना लिया है। दर असल देश और दुनिया की परिस्थितियां कुछ ऐसी हैं कि हर किसी को डर के अनुभव से होकर गुज़रना पड़ रहा है। कोविड-19 का डर भयावह इसलिए भी है, क्योंकि इससे बचने के लिए अभी तक कोई वैक्सीन तैयार करने में सफलता नहीं प्राप्त हो सकी है।

आज मनुष्य घर में रहने वाली परिस्थितियों में फंसा हुआ है। डर का भाव कई बार मनुष्य के लिए लाभप्रद सिद्ध होता है। क्योंकि डर का भाव संयम और अनुशासन बनाने में सहायक होता है। जिसकी आवश्यकता इस कठिन परिस्थिति में सबसे अधिक है। फिर भी लोगों की भीड़ गैर-ज़रूरी तौर पर विभिन्न घरों के बाहर और मुहल्लों में बाल पंचायत, किशोर पंचायत और युवा पंचायत के रूप में देखी जा रही है। पुलिस प्रशासन शासनादेश के अन्तर्गत इन्हें माइक से बार-बार निदेश दे रही है, लेकिन इन पंचायतों में शामिल व्यक्तियों को डर का एहसास नहीं है। क्योंकि उनके व्यक्तित्व के भावनात्मक विकास में डर के भाव का संतुलित विकास नहीं हुआ है। वहीं बहुत से व्यक्ति ऐसे हैं जो सिर्फ डरे हुए नहीं हैं बल्कि उनके अन्दर डर का एक मनोविज्ञान तैयार हो चुका है। ऐसे व्यक्ति घर के बाथरूम और छत पर जाने में भी डर रहे हैं। डर का यह मनोविज्ञान भी ठीक नहीं कहा जा सकता है। जिसके लिए टीवी के डरावने स्कोर बोर्ड वाले समाचार और सोशल मीडिया में शोधहीन और अप्रमाणित स्रोतों से भेजे जाने वाले मेसेज जिम्मेदार हैं।

उक्त प्रसंग व्यक्ति, परिवार और समाज में व्याप्त भय के विभिन्न रूपों को प्रदर्शित करता है।  संकट की इस घड़ी में संयम और अनुशासन का व्यवहार ही उचित है। डर का भाव मनुष्य के व्यक्तित्व का स्थाई तत्व है। यह जीवन से मुत्यु तक बना रहता है। लेकिन विकास की विभिन्न अवस्थाओं में विभिन्न परिस्थियों में मनुष्य के भाव नए अनुभवों से होकर गुज़रते हैं। निश्चित तौर पर आज देश और दुनिया के तमाम लोग डरे हुए हैं। लेकिन “भयभीत न होना और अत्यधिक भयभीत होना” दोनों ही भावों से हमें दूर रहने की आवश्यकता है। अति निडरता में सावधानी हटने पर संक्रमण का खतरा है, तो वहीं दूसरी तरफ अत्यधिक भयभीत होना व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं होता है। अच्छा तो यह है कि हम डरे हुए लोग वर्तमान स्थिति के साथ बेहतर सामंजस्य बनाने की कोशिश करें। गीत, कविता, किस्से-कहांनियां सुनें और सुनाएं। हंसे और हंसाएं। जीवन अमूल्य है। घर से बाहर जाकर या घर में रहकर बीमार होना विकल्प नहीं है। अपनी ऊर्जा साकारात्मक सोच के साथ रचनात्मक कार्यों में लगाना ही उचित है। सुख और दुःख जीवन के दो पहलू हैं। मानव सभ्यता ने विकास का लम्बा सफर इसी धूप-छांव में तय किया है।
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Tuesday, June 18, 2019

बच्चे, तकनीक और किताबें

"इस समय के बच्चों की तुलना उन पंक्षियों से करना बेमानी नहीं है, जो चारों ओर से शिकारी के जाल में फंसे हुए हों और जिनके समक्ष उड़ान भरने की चुनौती हो।"
दिन के लगभग ढाई बजे हैं। सुरेश माली के दरवाजे़ पर कुछ बच्चे मतदान संबंधी चर्चा कर रहे होते हैं। सुरेश माली के बड़े बेटे रमेश के चेहरे पर प्रसन्नता की लकीरें किसी खुशी का इज़हार कर रही थीं। उसने बताया “चाचा आज पहली बार वोट किया है।” पता चला कि सुरेश माली का बड़ा बेटा 23 साल का हो चुका है, और इस उम्र में उसने पहली बार वोट किया। वो बहुत उत्साहित होता है। उसने इसी साल पटना में रहकर एसी एण्ड रेफ्रीजरेशन में आई. टी. आई. की पढ़ाई की है। 23 मई को गाजियाबाद स्थित भारत इलेक्ट्राॅनिक्स लिमिटेड में अप्रैन्टिस के लिए इंटरविव है। अभी हम बात कर रहे होते हैं कि उसके घर के अन्दर, जो उसके माता-पिता की फूल-माला की दुकान भी है, से उसके भाई संजय की आवाज़ आती है कि “मैं जब 18 साल का हो जाउंगा तो ................... सरकार बनाउंगा।” निश्चित तौर पर अगले चुनाव यानि पांच साल के बाद संजय 18 की उम्र पूरी कर मतदाता की भूमिका में होगा। लेकिन मैं देर रात तक उसकी कही बात से बेचैन रहा। शायद इस बेचैनी का कारण मेरा लेखक और चिंतक होना और इससे बढ़कर अपने आस-पास के माहौल से संवेदित होना है। मैं सोचता रहा कि जिस उम्र में संजय जैसे बच्चों को अपने बड़े भाई रमेश की तरह पढ़ाई की बातें सोचनी चाहिए और उनकी अभिव्यक्तियों में कापी-कलम और किताब की बातें होनी चाहिएं, उस समय में ऐसे बच्चे सरकार बनाने के विचार से उद्वेलित हैं। रात के करीब 10 बजे होंगे, रमेश से फेसबुक लाइब पर बात करते हुए मैंने उससे इस बाबत भी बात की कि बहुत से बच्चे ऐसे हैं जिनका प्राइम टाइम यानि उनका जो पढ़ाई का समय है, उस समय में वो पढ़ाई से इतर अन्य गतिविधियों में लिप्त रहते हैं। रमेश ने बताया कि “हां... आजकल बच्चे एन्ड्रायड फोन के आदी हैं। रात के 4 बजे तक गेम खेलते हैं। यह ठीक नहीं है।” रमेश जिसने आज पहली बार वोट दिया था से मैंने कहा कि आप मोबाइल और तकनीक के क्षेत्र में प्रगति और आम लोगों तक इसकी पहुंच को रिजेक्ट कर रहे हैं। रमेश बिना किसी लाग लपेट के कहते हैं कि पढ़ाई की उम्र वाले बच्चों के लिए नयी तकनीक, मोबाइल फोन और एप्लीकेशन नुकसान पहुंचा रहा है। मैंने कहा कि तकनीक और मोबाइल को विकास का प्रतीमान बताया जा रहा है और आप इस आइडिया को रिजेक्ट कर रहे हैं। रमेश एक बार में कहते हैं कि यदि पढ़ने वाले बच्चों की पूरी रात मोबाइल गेम में कटेगी तो उनका दिन निश्चित तौर पर खराब होगा। रमेश से बातचीत के बाद उसे पहली बार मतदान में हिस्सा लेने के लिए बधाई देता हूं और उसके उज्जल भविष्य के लिए उसे शुभकामना देने के बाद अपने घोंसले में लौट आता हूं।

रमेश से बातचीत के बाद यह अंदाज़ा भी होता है कि बच्चों का एक-एक मिनट वास्तव में न सिर्फ उनके और उनके परिवार के लिए महत्वपूर्ण है बल्कि समाज और देश के लिए भी महत्वपूर्ण है। वो लोग जो तकनीकी क्रान्ति और इस क्रान्ति जनित यंत्रों के अबाध प्रसार में विकास की रूपरेखा देखते हैं, उन्हें उम्र की विविधता का ध्यान रखने की ज़रूरत है। नीतिगत स्तर पर इस युक्ति को अपनाने की ज़रूरत है कि कौन सी तकनीक और तकनीकी यंत्र बच्चे, बड़े, बूढ़े और महिलाओं के लिए उपयुक्त हैं। तकनीक का प्रसार आयु आधारित विविधता, पारिवारिक और सामाजिक विविधता को कैसे प्रभावित करता है, इस पर यथा संभव ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है। 

ऐसा इसलिए भी कहना पड़ रहा है कि प्रायः ऐसा देखा जा रहा है कि जिन बच्चों के पास नयी तकनीक युक्त एन्ड्रायड फोन हैं, वो बच्चे ऐसे फोन के दुरूपयोग और दुष्परिणामों से सावधान नहीं है। सतीश जो मेरे पड़ोस के जयपाल भइया का लड़का है इस समय 12वीं का छात्र है। 17वीं लोक सभा के चुनाव नतीजों के आने से ठीक दो दिन पहले 21 मई की दोपहर जब मैं नवापुरा स्थित डाॅ॰ सिद्दीकी की क्लिनिक में त्रिवेणी जायसवाल से बात कर रहा होता हूं, उसी समय गाज़ीपुर के तारिक भाई का फोन आता है। मैं फोन रिसिव करता, इससे पहले ही डिस्कनेक्ट हो जाता है। ठीक इसी समय सतीश के फेसबुक फ्रेण्ड रिक्वेस्ट पर नज़र पड़ती है। सतीश के फेसबुक फ्रेन्ड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट करते समय उसके फेसबुक वाल पर एक पोस्ट देखा। नमो अगेन के साथ कविता कुछ पंिक्तयां “गद्दार नहीं खु़द्दार चाहिए!!/कमजार नहीं दमदार चाहिये!!/तुम्हें मुबारक हो वंशवादी शहज़ादे/हमें हमारा चैकीदार चाहिये!!” लिखी हुई थीं। त्रिवेनी जायसवाल से बच्चों की पढ़ाई और उनके करियर पर बात के दौरान सतीश के इस पोस्ट पर भी देर तक बातें हुईं।
इत्तेफाक से उस पोस्ट पर भी नज़र पड़ी, जिसमें 12वीं की परीक्षा पास करने वाले अख़्तर ने अपने फेसबुक वाल पर लिखा था कि “......पी. वालों ........एम. गायब करवा के भी कुछ नहीं उखाड़ पाओगे। डेडिकेटेड टू भक्त लोग।” दो किशोरों की ऐसी अभिव्यक्तियां किसी भी संवेदनशील व्यक्ति की बेचनी का सबब हो सकती हैं। यह अंदाजा भी होता है कि मौजूदा दौर में किशोरावास्था के बच्चों के परिवेश से किस तरह काॅपी-कलम और किताब इत्यादि गायब हैं या गायब कर दी गयी हैं। माथे पर बल पड़ना स्वाभाविक है। क्योंकि ऐसा कैसे संभव हुआ कि शारीरिक, सामाजिक और बौद्धिक आवश्यकताओं की पूर्ति की संभावनाएं क्षीण पड़ गयी हैं। सवाल लाज़मी है कि क्या 17-18 वर्ष के दो किशोरों की ऐसी अभिव्यक्तियां उनकी अवस्था के अनुरूप उचित हैं? यदि शिक्षा मनोविज्ञान की शब्दावली में कहें तो बच्चों को आत्म अभिव्यक्ति के लिए अवसर ज़रूरी है। लोकतंत्र की पाठशाला में भी “अभिव्यक्ति की आज़ादी” एक महत्वपूर्ण बिन्दु है। लेकिन सवाल यह है कि जिन बच्चों को अपनी कक्षा के विषय और टाॅपिक्स को समझने में समय लगाना चाहिए और जिन बच्चों में आत्म अभिव्यक्ति के माध्यम से सर्जनात्मक क्षमताओं का विकास होना चाहिए, वो बच्चे सरकार बनाने और सरकार बचाने में समय लगा रहे हैं। बल्कि यह कहना अधिक प्रासंगिक है कि शैक्षिक अभिव्यक्तियों के बजाय राजनीतिक अभिव्यक्तियों में अपना समय गवां रहे हैं। उन्हें यह भी पता है कि उनकी ऐसी अभिव्यक्तियां उनकी कक्षा और किसी विषय से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित नहीं है। और न ही ऐसी अभिव्यक्तियों पर उन्हें ग्रेड या माक्र्स मिलने हैं। इन बातों का आशय यह नहीं है कि जो किशोर बच्चे किसी प्रभाव से ऐसा सोच रहे हैं, उन्हें अभिव्यक्ति के अवसर से रोका जाए। लेकिन ऐसे बच्चों की पारिवारिक और सामाजिक पृष्ठभूमि देखकर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति, जो नयी पीढ़ी के बेहतरी के सपने देखता है, इसके लिए कोशिशें करता है, की पीड़ा और बेचैनी का बढ़ जाना स्वाभाविक है। सतीश और अख़्तर का उदाहरण आइना दिखाने के लिए काफी है कि किशोरों की ऐसी अभिव्यक्तियां कदाचित उचित नहीं हैं।
सतीश और अख़्तर जैसे बच्चे अपने परिवारों की उम्मीदें हैं। इन्हीं पर निर्भर है कि वो पढ़-लिख कर अपने परिवारों को विषम परिस्थितियों से उबारेंगे। अक्सर समाचारों में पढ़ने-सुनने को मिलता है कि किसी पान बेचने वाले, चाय बेचने वाले या रिक्शा/टेम्पो चलाने वाले का बेटा/बटी आई.ए.एस. बन गया। इन बच्चों को इन्हीं कड़ियों का हिस्सा बनना होगा। यह सच है कि अभिव्यक्ति बच्चों की क्षमताओं का परिचायक है। लेकिन उचित समय पर उचित मार्गदर्शन के अभाव में बच्चों का शैक्षिक के बजाय अन्य प्रकार की अभिव्यक्तियों के लिए प्रेरित होना उनके और समाज दोनों के लिए हानिप्रद है। समय और स्थान के अनुरूप होने वाली अभिव्यक्तियां श्रेयस्कर और फलदायी होती हैं। इसलिए किशोरावस्था के बच्चों को शैक्षिक और सह-शैक्षिक अभिव्यक्तियों के लिए पे्ररित करना ज़रूरी है। वरना अपरिपक्वता और अतिउत्साह मन और शरीर को दिशाहीन बना देता है। ऐसे में बच्चे सामाजीकरण की उस प्रक्रिया से भी अलग-थलग रह जाते हैं, जिसमें उन्हें आयु, वर्ग और लिंग आधारित विविधता का ज्ञान होता है, परिपक्वता आती है और सच-झूठ, अच्छे-बुरे की समझ विकसित होती है। समझ का विकसित होना बेहद ज़रूरी है। क्योंकि समझ और सूझबूझ से ही व्यक्ति में “सुंदर” की बेहतरीन कल्पना को समझने और उसे साकार करने की क्षमता विकसित होती है। 

बेशक तकनीक और यंत्रों ने मानव जीवन में आसानियां पैदा की हैं। लेकिन मौजूदा दौर में जिस तरह का रोबोटिक डेवलपमेन्ट हो रहा है, उसके नकारात्मक प्रभावों से “बच्चा” नामक बायोलाॅजिकल जीव सुरक्षित नहीं है। रोबोटिक डेवलपमेन्ट और तकनीक आधारित गतिविधियां बाज़ार की ज़रूरत भी है। वो बाज़ार जहां व्यक्ति नागरिक नहीं उपभोक्ता है और जहां बच्चा छात्र/छात्रा नहीं बल्कि आदर्श उपभोक्ता है। बाज़ार की यह ज़रूरत बाल उपभोक्ताओं के मन के तारों में चिन्गारियां पैदा कर रही हैं और उन्हें रोबोट की तरह व्यवहार करना सिखा रही हैं। ऐसा रोबोट जो एक रिमोट से संचालित होता है। विचित्र बात है कि बाज़ार विविध रूपों और माध्यमों से बच्चों से संबंध बनाए हुए है। बच्चों के मन बहलाने वाले टाॅफी-चाॅकलेट, बिस्कुट और अन्य पोषक पदार्थों से लेकर उनकी शिक्षण सामग्री जैसे पेन्सिल, रबर, काॅपी-कलम और किताब आदि पर जी.एस.टी. लागू है। ऐसे बाज़ारमय परस्थितियों में तकनीक की मार अलग है। इन्हीं परिस्थितियों में “देश का भविष्य पल रहा है।” इस समय के बच्चों की तुलना उन पंक्षियों से करना बेमानी नहीं है, जो चारों ओर से शिकारी के जाल में फंसे हुए हों और जिनके समक्ष उड़ान भरने की चुनौती हो। 

यह समझने की ज़रूरत है और हमारे-आप जैसे लोगों का नैतिक दायित्व भी है कि हम बाज़ार की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए बच्चों विशेषकर किशोरावस्था के बच्चों को अपने ही मां-बाप और परिवार में विद्रोही बन जाने की परिस्थितियां पैदा करने वाले कामों में सहयोगी न बनें। कहा जाता है कि बच्चे देश का भविष्य हैं। तो मैं कहना चाहता हूं कि बच्चों को मोबाइल के लिए प्रेरित करके, उन्हें बायोलाॅजिकल से रोबोटिक न बनाया जाए। देश के भविष्य से खिलवाड़ करना किसी भी तरह उचित नहीं है। अच्छा होता कि बच्चों को किताबों से दोस्ती के लिए प्रेरित किया जाए। क्योंकि एक बेहतर कल का रास्ता किताबों की दुनिया से होकर निकलता है।

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नोट- वास्तविक घटना पर आधारित। सभी पात्रों के नाम बदल दिए गए हैं।

Saturday, September 8, 2018

बदलते दौर में शिक्षक दिवस ‘समारोह’ के मायने


डा॰ सर्वपल्ली राधा कृष्णन की जन्म तिथि शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। हमारे बीच कई ऐसे लोग हैं जिन्होंने इस तिथि को एक आदर्श शिक्षक के गुण-दोषों को उजागर करने और आदर्श शिक्षक बनने-बनाने की दिशा में एक लैण्ड मार्क के तौर पर अपनाया है। लेकिन पिछले कुछ बरसों में स्कूलों में शिक्षक दिवस मनाने का जो अंदाज़ देखा गया है, वह आदर्श शिक्षक/शिक्षिका के प्रतिमानों की झलक धूमिल कर देने वाली रही है। एक तरफ देश के प्रधानमंत्री देश के बहुसंख्यक छात्र/छात्राओं तक सीधी अपनी बात पहंुचाने की कोशिश कर रहे होते हैं, वहीं दूसरी तरफ बहुत से स्कूलों में पैसा, पार्टी, केक, पेय पदार्थ और उपहारों के लेन-देन ने शिक्षक दिवस समारोह का बदला हुआ अंदाज़ दिखाया है। इस लेख के माध्यम से यह जानने की कोशिश की जा रही है कि सीखने और सिखाने की प्रक्रिया में छात्र/छात्राओं और शिक्षक/शिक्षिकाओं के बीच शिक्षक दिवस मनाए जाने के क्या मायने हैं?

पिछले कुछ बरसों में शिक्षा के क्षेत्र में ढे़रों बदलाव आए हैं। प्राथमिक शिक्षा के व्यावसायिक केन्द्रों यानी निजी स्कूलों और तकनीकी प्रशिक्षण केन्द्रों में विशेषकर आए दिन बच्चों को भांति-भांति के प्रोजेक्ट बनाते और प्रस्तुत करते देखा जा सकता है। शिक्षक दिवस भी एक अवसर है, जिसके उपलक्ष्य में छोटे-छोटे बच्चों को पार्टियों की तैयारी करते देखा जा रहा है। खासकर छोटे-छोटे बच्चों को बड़ी-बड़ी पार्टियों की तर्ज पर अपनी कक्षाओं में केक और कैन्डिल का इंतेज़ाम करते देखा जा सकता है। इस वर्ष पांच सितंबर को मैं खु़द ऐसे अनुभव से होकर गुज़रा, जहां बच्चों के मन में अपने गुरूजनों के लिए अपार उत्साह था। 5 सितंबर को बच्चों में जो उत्साह मैंने देखी, शायद हमारे बचपन के समय में वैसा उत्साह नहीं होता था। यह उत्साह बार-बार मुझे इस दिशा में विचार के लिए प्रेरित कर रहा था शिक्षक दिवस का उत्साह कई मायनों में कृत्रिम है।
कक्षाओं का बच्चों द्वारा सजाया जाना, ब्लैक बोर्ड पर चाॅक से और बाकी दीवारों पर रंग-बिरंगे कागजों की मदद से हैप्पी टीचर्स डे का अंकन नए दौर के अनुरूप अध्यापक और अध्यापिकाओं के लिए संदेश था कि बच्चे उन्हें अपना आदर्श मानते हैं। चाहे वह अध्यापक/अध्यापिका अपने आचार, विचार और व्यवहार में कैसा भी हो। बच्चों की तरफ से होने वाली इस पहल की सबसे सुन्दर बात यह लगी कि उनके मन में अपने अध्यापकों के लिए सम्मान भाव व्यक्त करने में किसी भी तरह का लिंग, जाति, धर्म या क्षेत्र जैसी कोई मान्यता नहीं थी। फिर भी यह देखने में आया कि बच्चों की नज़र में वही अध्यापक/अध्यापिका खास रहे, जो अधिक समय तक उनके साथ रहते हैं। इसमें कम क्षमता वाले क्लास टीचर भी शामिल हैं और वो अध्यापक भी जो अपने विषय संबंधी बच्चों की कमज़ोरियों को दूर करने में बच्चों के सहयोगी की भूमिका में होते हैं।

बहरहाल, शिक्षक दिवस के अवसर पर बहुत से बच्चों को केक, कैन्डिल और गुब्बारों की व्यवस्था करते देखना उत्साहजनक और मन को भाने वाला था। लेकिन सबकुछ के बाद भी कम से कम मेरे लिए यह चिंता का विषय भी था। एक तरफ प्रधानमंत्री बच्चों से सीधे बात कर रहे थे, दूसरी ओर मैं अपनी चिंता को अपने मित्रों के साथ साझा कर रहा था। निश्चित तौर पर मैंने वैचारिक तौर पर खुद को अलग-थलग पाया। इसलिए कि अधिकतर मित्रों की राय यही थी कि बच्चों द्वारा कक्षा में केक और कैन्डिल पाटी करने में कोई बुराई नहीं है। फिर भी कहना पड़ रहा है कि शिक्षा के विमर्श में यह बात शामिल किया जाना चाहिए कि जिन बच्चों के माता-पिता के समक्ष पब्लिक और काॅनवेन्ट स्कूलों की मंहगी शिक्षण व्यवस्था को अपनाए जाने की विवशता है, उन अभिभावकों पर अलग से शिक्षक दिवस जैसे अवसरों पर केक, कैन्डिल और गुब्बारें के साथ उपहार प्रदान करने की परंपरा का थोपा जाना कहां तक उचित है? ऐसी परंपरा को आत्मसात करके और इसे बढ़ावा देकर हमारे शिक्षक/शिक्षिका आदर्श शिक्षक/शिक्षिका का कोई कीर्तिमान कैसे बना सकते हैं?

गौर तलब है कि स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, गांधी दिवस, महिला दिवस, विज्ञान दिवस, मज़दूर दिवस की तरह ही शिक्षक दिवस को एक ऐसे अवसर के रूप में देखे जाने की ज़रूरत है, जब हम उन आदर्शों, मूल्यों, परंपराओं और संस्कारों की याद ताज़ा करते हैं, जिनके बलबूते एक बेहतर समाज की स्थापना और विकास का दमखम पेश किया जाता है। कम से कम भारतीय संविधान में कही गयी बराबरी, न्याय और आज़ादी का मतलब भी यही है कि हम समाज को उस दिशा में ले जाने की कोशिशों में अपना सहयोग दें, जिससे अच्छाई की परिभाषा और परिपाटी मज़बूत होती है। लेकिन अफसोस इस बात का है कि हमारे बच्चों के अंदर शिक्षक दिवस को लेकर जो उत्साह है उसमें पार्टी और उपहार प्रधान तत्व बनते जा रहे हैं। ये वो तत्व हैं जिनका लगाम बाजार के हाथ में है। उदाहरण के तौर पर हम केक, कैन्डिल और पेय पदार्थों की ही बात करें तो बाल्यावस्था में ही बच्चों को यह बोध होना बाज़ार की ही देन है कि ऐसी वस्तुओं के उपभोग के बिना अध्यापकों/अध्यापिकाओं के प्रति उनका सम्मान अधूरा है। एक तर्क यह भी है कि सभी बच्चे थोड़े ऐसा करते हैं। लेकिन ऐसे तर्क संविधान के समतामूलक सिद्धांतों और व्यावहारिक आदर्शों के विपरीत असमानता का बोध कराने वाले हैं। इसे समझने के लिए किसी कक्षा का उदाहरण लिया जा सकता है। एक कक्षा में अलग-अलग जाति, धर्म, क्षेत्र, समाज, समुदाय और आर्थिक पृष्ठभूमि के परिवारों के बच्चे होते हैं। स्कूल की एक छत इन सभी के लिए समान होती है, एक ब्लैक बोर्ड और चाॅक के टुकड़े की उपियोगिता सभी बच्चों के लिए बराबर होती है। ऐसे में जब कुछ बच्चे अपने घरों से केक, कैन्डिल या पेन या अन्य उपहार लाते हैं और कक्षा में अपने प्रिय अध्यापकों/अध्यापिकाओं को देते हैं तो यह स्थिति उन छात्रों/छात्राओं के लिए अत्यधिक कठिन होती है। एक तरफ पूरा कक्षा उनकी आर्थिक कमज़ोरी या परेशानी से अवगत होता है तो दूसरी तरफ कक्षा में उपहारों के लेन-देन वाला वातावरण ऐसे पृष्ठभूमि के बच्चों का मनोबल तोड़ने वाला और उन्हें सीखने की प्रक्रिया में उनके उत्साह को कम करने वाला होता है। ऐसे बच्चों के मन में कुंठा की भावना का विकसित होना सामान्य बात होती है। फिर सवाल यह है कि ऐसा उत्साह बच्चों के किस काम का जो एक छत के नीचे बैठने वाले आधे से अधिक बच्चों को सीखने की उस प्रक्रिया से अलग-थलग कर दे, जहां से उसके व्यक्तित्व विकास की रूपरेखा तय होती है।

कुछ बातें उन शिक्षकों/शिक्षिकाओं और बच्चों की जो उपहार परंपरा में ही सम्मान प्राप्त करने और आशीर्वाद देने के आदी होते जा रहे हैं। समारोह का आयोजन करना और वो भी कक्षा के विभिन्न छात्र-छात्राओं के साथ मिलकर करना निश्चित तौर पर नयी पीढ़ी के बच्चों की क्रियाशीलता और रचनात्मकता को दर्शाने वाला है। लेकिन हमारे बच्चे जिन संस्कारों के वाहक बनाए जा रहे हैं, वह चिंता का विषय है। जिन उपहारों के दम पर हमारे बच्चे अपने अध्यापकों/अध्यापिकाओं के प्रति सम्मान प्रदर्शित करना चाहते हैं, उन्हें यह बताने की ज़रूरत है कि कोई भी सम्मान केक, कैन्डिल, पेय पदार्थ और पेन जैसे उपहारों से नहीं होता बल्कि आचरण और व्यवहार के श्रेष्ठ प्रदर्शन से होता है। यही बात अध्यापकों और अध्यापिकाओं के बारे में कही जा सकती है कि उनका आचरण बच्चों के लिए हमेशा से रोल माॅडल रहा है। हमने भी अपने बचपने में अपने अध्यापक/अध्यापिकाओं की नकल की है। उन मूल्यों को अपनाया है जो हमारे लिए श्रेयस्कर रहे हैं। लेकिन हमें इसके लिए कभी गुरू दक्षिणा के तौर पर न तो कभी पार्टी का आयोजन करना पड़ा और न ही कभी कलम या कोई अन्य उपहार देना पड़ा। मौजूदा दौर में गली-कूचों में खुलने वाले हर उस स्कूल में ऐसी परंपरा को उगते-पनपते देखा जा सकता है, जिसका रिमोट बाज़ार के हाथ में है। दुःख की बात यह है जिन अध्यापकों/अध्यापिकाओं के कंधे पर नयी पीढ़ी को संवैधानिक आदर्शों के अनुरूप शिक्षा के मूल उद्देश्यों को प्राप्त करने की जिम्मेदारी सौंपी गयी है, वो बच्चों से प्राप्त उपहारों में ही एक शिक्षक होने का सम्मान ढ़ूंढ़ते फिर रहे हैं। शिक्षक दिवस की ऐसी कल्पना रखने वाले शिक्षकों और शिक्षिकाओं के लिए यदि शिक्षक दिवस का नाम उपहार दिवस या केक या पार्टी दिवस रख दिया जाता तो बेहतर होता।
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Published in Inquilabi Nazar, Lucknow, 12 September 2014

Wednesday, September 27, 2017

बुनियादी शिक्षा में सुरक्षा के सरोकार: व्यक्ति, समाज और सरकार


शिक्षक दिवस के ठीक दो दिन बाद 8 सितम्बर 2017 अन्तर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस की सुबह हरियाणा के गुरूग्राम स्थित एक प्रतिष्ठित निजी स्कूल में कक्षा दो में पढ़ने वाले एक बच्चे की हत्या हुई। खबरों में यौन अपराध को हत्या का कारण बताया गया। आरोपी बस कन्डक्टर को गिरफ्तार कर लिया गया। अभिभावकों ने बड़ी संख्या में स्कूल के सामने विरोध-प्रदर्शन और तोड़फोड़ करके अपने गुस्से का इजहार किया। स्कूल की प्रिन्सिपल को सस्पेन्ड कर दिया गया और मांग करने वालों ने स्कूल को अविलम्ब बन्द करने की मांग की। विरोध-प्रदर्शन कर रहे अभिभावकों को यह कहते हुए भी सुना गया कि “स्कूल वाले फीस अधिक लेते हैं और बस वालों से उनकी सेटिंग है।” इन सबके बीच शासन प्रशासन अपना काम तो कर ही रहा है। जो सबसे महत्वपूर्ण है, वो यह कि जांच करके एक रिपोर्ट प्रस्तुत करना। जांच में घटना का विवरण, कारण और अन्य जानकारियां हो सकती हैं। फिर भी मुझ जैसे लेखक को महसूस होता है कि इस घटना के प्रकाश में सिर्फ निजी स्कूलों की ही नहीं बल्कि शासन-प्रशासन की भूमिका के साथ-साथ व्यक्ति और समाज की महत्वाकांक्षा की जांच भी हानी चाहिए। क्योंकि इस घटना ने एक तरफ जहां हमें हमारी शिक्षण व्यस्था के दोष से अवगत कराया है, वहीं दूसरी तरफ इस घटना ने शिक्षण व्यवस्था के प्रति व्यक्ति और समाज के दृष्टिकोण और दायित्व को भी उजागर किया है कि आखिर हमारा समाज अपने बच्चों की शिक्षा के लिए किस प्रकार का शिक्षण व्यवस्था तैयार कर रहा है? सवाल यह भी है कि क्या हमारा समाज निजी महत्वाकांक्षाओं वाली व्यवस्था के अधीन खुद को समर्पित कर चुका है या सामूहिक प्रतिनिधित्व वाली लोकतांत्रिक संस्थाओं में नयी संभावनाओं के बीज भी बोना चाहता है।

कोई भी स्कूल अपने समाज की सीमाओं से परे नहीं हो सकता है। इस आलोक में प्रथम दृष्टिया कहा जा सकता है कि स्कूल प्रबन्धन की लापरवाही के कारण ही बच्चे की जान गयी होगी। स्कूल प्रबन्धन और बाल शिक्षा के सिद्धान्तों के अनुरूप स्कूल प्रबन्धन को इस जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता कि वो बच्चे के पारिवारिक पृष्ठभूमि से लेकर उसके समाज और स्कूल के आस-पास के वातावरण आदि का संज्ञान ले और तत्संबन्धी विवरण रखे। ऐसा करने से किसी भी स्कूल प्रबन्धन के पास इस तरह की घटना को टालने की संभावना अधिक होती है। अगर बाल शिक्षा में गाइडेन्स की भाषा में कहा जाए तो स्कूल प्रबन्धन द्वारा इकट्ठा की गयी इस तरह की जानकारी चेक बॉक्स का काम करती है। चूंकि हरियाणा के गुरूग्राम के जिस स्कूल में बच्चे की हत्या की घटना घटी है, वो स्कूल नामी-गिरामी है, इसलिए ऐसे स्कूलों के प्रबन्ध कर्ताओं से ऐसी लापरवाही की उम्मीद नहीं की जा सकती है। वैसे भी निजी स्कूल वाले या कोई भी निजी प्रतिष्ठान अपने स्टॉफ से कम समय और कम पारिश्रमिक में अधिक काम लेने के लिए बदनाम रहे हैं। सरकार भी इस मंतव्य से सहमत है। दिलचस्प यह भी है कि जबसे निजीकरण की बयार चली है तब से कामकाज के इस तरीके को कारपोरेट के साथ-साथ सरकारें भी बढ़ावा दे रही हैं। बहरहाल, ऐसा प्रतीत होता है कि बस चालक स्कूल का स्टॉफ नहीं था और उसकी किसी अध्यापक या अध्यापिका की भांति टीचिंग-लर्निंग का हिस्सा मानकर ट्रेनिंग नहीं की गयी हो। ज्ञात हो सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में बच्चों को माता-पिता और अध्यापक-अध्यापिका के केन्द्र में रखकर शैक्षिक क्रिया-कलाप सम्पन्न होता है। ज़रूरी है कि स्कूल बस (चालक और खलासी के साथ) को संचालित करने वाले व्यक्ति/संस्था को भी माता-पिता और अध्यापक-अध्यापिका की तरह एक छोर पर रखा जाए। सरकारों को इस बिन्दु पर शोधपरक समझदारी विकसित कर इस दिशा में कानून भी बनाने की जरूरत है। ताकि स्कूल जाते हुए बच्चों के परिवेश में जो भी चीजें, व्यक्ति या बातें हों, उन्हें उनकी शिक्षा को प्रभावित करने वाले साकारात्मक अथवा नाकारात्मक कारक के रूप में मान्यता मिल सके। जब ऐसी मान्यता मिल जाएगी तो बस चालक हो या खलासी या सड़क और बाजार, हर व्यक्ति के अन्दर और हर एक स्थान पर बच्चों को एक ऑब्जेक्ट के रूप में देखने का नजरया विकसित होगा। एक ऐसा ऑब्जेक्ट जिसके बारे में कहा जाता है कि बच्चे देश के भविष्य हैं। न जाने कितने गीत और कविताएं इन पर लिखे और गाए गए है। उदाहरण के तौर पर “इनमें मेरे आने वाले जमाने की तस्वीर है.....“, “बच्चे मन के सच्चे.....”, “आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं.....”, “मुझे दुश्मन के बच्चों को पढ़ाना है.....” वगैरह-वगैरह। ऐसे आदर्श सामाजिक परिस्थिति में कोई भी बच्चा “सेक्सुअल एब्यूज“ यानि यौन शोषण या वायलेन्स (हिंसा) का शिकार नहीं होगा।

जाहिर है हम स्कूल से जुड़े विभिन्न व्यक्तियों, कर्मचारियों और संस्थाओं को सीखने-सिखाने के विषय पर निरंतर संवेदीकरण करते रहें तो मुमकिन है कि बच्चों को विभिन्न कारणों से हिंसा का शिकार बनने से बचाया जा सकता है। लेकिन हमें यह भी देखना होगा कि आजादी के बाद से अब तक हमने शिक्षा के क्षेत्र में जो प्रयोग किए गए हैं, उनका प्रभाव क्या पड़ा? खासकर 1991 में जब आर्थिक सुधारों से अनुप्राणित निजीकरण की शुरूआत हुई। निस्संदेह आर्थिक सुधारों ने बुनियादी शिक्षा को निजीकरण के रास्ते पर आगे बढ़ाया है। इसे प्रगति के रूप भी देखा जा सकता है और बुनियादी शिक्षा के पतन के तौर पर भी परिभाषित किया जा सकता है। प्रगति इसलिए क्योंकि बुनियादी शिक्षा में नित नए प्रयोग हुए और माण्टेसरी एवं किण्डरगार्टेन की शिक्षण प्रणाली का विस्तार हुआ। लेकिन दूसरी तरफ इन नए प्रयोगों की आड़ में सरकारों ने बुनियादी शिक्षा में पूंजी की भूमिका को प्रमुखता से स्थापित किया। पूंजी की भूमिका को बढ़ाने का सवाल शिक्षा के बाजारीकरण के सवाल से जुड़ा हुआ है। यह सवाल हमें इस दिशा में विचार करने का अवसर देता है कि एक के बाद एक हमारी सरकारें बुनियादी शिक्षा के तंत्र पर समाज के विविध समुदायों की निर्भरता को कम करने संबंधी नीतियां बनाती रही हैं। शिक्षा का निजीकरण (बाजारीकरण) सरकार के कामकाज के इसी रवैये की अभिव्यक्ति है। कहा जा सकता है कि निजीकरण की नीती में आत्मनिर्भरता का पुट है। यह नीती गुणवत्ता और सेवा की प्रतिबद्धता से ओत-प्रोत है। लेहाजा देश भर में निजी स्कूलों का बड़ा नेटवर्क देखा जा सकता है। जिनके होर्डिंग्स पर क्वालिटी एजूकेशन के एक से एक वादे लिखे रहते हैं। इनके पाठ्यक्रम में महंगी किताबें होती हैं, महंगे अध्यापक/अध्यापिका हो सकते हैं, पूंजी प्रायोजित संभ्रान्त संस्कृति का प्रदर्शन हो सकता है, लेकिन समाजिक सरोकारों का मूल्य, परंपरा और संस्कार के रूप में सर्वथा अभाव रहता है। ऐसी स्थिति पूंजी प्रायोजित शिक्षण संस्थाओं और मानवीय संवेदनाओं के बीच की खाई को बढ़ाने वाली होती है। ऐसे में अमानवीय कुमनोवृत्तियों को समय रहते चिन्हित करना संभव नहीं होता। यदि हरियाणा वाली घटना की बात करें तो इस संभावना से इंकार मुश्किल है कि पूंजी की प्रधानता ने ही स्कूल प्रबन्धन को बस चालक के मन की बात को पढ़ने से वंचित रखा। यह घटना हमें यह सीख भी देती है कि किसी भी स्कूल में वाहन चालक के लिए न्यूनतम शैक्षिक और सामाजिक अर्ह्ता का निर्धारण वक्त की जरूरत है। जिस तरह से रेल के परिचालन के लिए ड्राइवरों के स्वास्थ्य की जांच वगैरह का नियम है, उसी तरह से स्कूल वाहनों के परिचालकों का समय-समय पर सामान्य स्वास्थ्य और मनोवैज्ञानिक परीक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए।

अक्सर ऐसी खबरें भी आती हैं कि ड्राइवर की गलती या लापरवाही से स्कूली वाहन पलट गया, बच्चे घायल हो गए या मर गए। ऐसे मामलों में अभिभावकों का गुस्सा भी देखने में आता है। तोड़फोड़ से लेकर आगजनी सबकुछ पलभर में कर देते हैं। गौरतलब है कि जो अभिभावक अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए नामी-गिरामी स्कूलों में भेजता है। वही अभिभावक अपने बच्चे के साथ कुछ अप्रिय होने पर हिंसक और क्रूर क्यों हो जाता है? यही रवैया निजी नर्सिंग होम या निजी अस्पतालों या निजी प्रैक्टिशनरों के साथ देखा गया है। जब तक गुणवत्ता और सेवा मिलता रहता है, तब तक तो अभिभावक स्कूलों की ओर और तीमारदार अस्पताल की ओर नजर नहीं करते। लेकिन जैसे ही कुछ उन्नीस-बीस होता है, अभिभावक और तीमारदार अपनी नागरिक जिम्मेदारियों को भूलकर हिंसक हो उठते हैं। शायद इसलिए कि अभिभावक और तीमारदार के रूप में हमारी महत्वाकांक्षा उस शिखर पर पहुंच चुकी है, जहां से हमें अपनी वैयक्तिक इच्छाओं के अलावा किसी और के दुःख-दर्द की पीड़ा महसूस नहीं होती है। शायद इन्हीं कारणों और परिस्थितियों के चलते हम अपने बच्चों के लिए पूंजी प्रायोजित स्कूलों को चुनते हैं। जहां मैं, मेरा का बोध ज्यादा होता है और सामाजिक संवेदना का अभाव होता है। दूसरी बात यह कि यदि पूंजी प्रायोजित स्कूल या अस्पताल फीस अधिक ले रहे हैं और उन्हें बच्चों और मरीजों की चिन्ता नहीं है तो हम अपने बच्चों का दाखिला सरकारी स्कूलों में क्यों नहीं कराते? या सरकार पर दबाव क्यों नहीं बनाते कि शिक्षा की पूरी जिम्मेदारी सरकार खुद उठाए।

कुछ लोग यह सुझाव दे रहे हैं कि विद्यालयों में सीसीटीवी कैमरे अनिवार्य कर देने चाहिएं। एडवोकेट जैनेश कश्यप का विचार है कि स्कूल में सीसीटीवी कैमरों को संचालित करने के लिए अलग से एक ऑपरेटर की नियुक्ति करनी चाहिए, जो नित्य प्रतिदिन इसे देखा और जांचा करे। दिनेश चन्द्र राय इण्टर कॉलेज मुहम्मदाबाद में अंग्रेजी के प्रवक्ता रहे हैं। उनकी जिज्ञासा “यह व्यवस्था कौन करेगा?“ का जवाब देते हुए एडवोकेट जैनेश कश्यप अपने फेसबुक वाल पर लिखते हैं कि “यह व्यवस्था विद्यालय प्रशासन को करनी चाहिए। उनके ऊपर अभिभावकों व जिला प्रशासन का दबाव होना चाहिए।”  एडवोकेट जैनेश कश्यप और दिनेश चन्द्र राय की बातों से जाहिर होता है कि अगर स्कूल प्रबन्धन सीसीटीवी कैमरा का बन्दोबस्त करले और इसके लिए एक ऑपरेटर रख ले तो बच्चों के साथ होने वाली आपराधिक घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सकती है। तकनीक के इस्तेमाल से हमारे जीवन में आसानिया पैदा हुई हैं। चूंकि बात एक यौन अपराध के आइने में एक बच्चे की नृशंस हत्या के संदर्भ में हो रही है, तो हमें देखना पड़ रहा है कि तकनीक ने मानव मन को उसकी नैसर्गिक दोष युक्त सोच से मुक्त करने में क्या भूमिका निभाया? इस सवाल पर गौर करने से ऐसा प्रतीत होता है कि हम तकनीक के क्षेत्र में, तकनीक के इस्तेमाल से कामयाबी की तमाम सीढ़ियां चढ़ने के बाद भी मानव मन में साकारात्मक सामाजिक सोच युक्त संवेगों की प्रबल धारा प्रवाहित करने में असफल रहे हैं। इस आलोक में यह सवाल लाजमी है कि किसी स्कूल या प्रतिष्ठान में स्थापित सीसीटीवी कैमरा जैसे किसी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण या यंत्र को ऑपरेट करने वाले की अर्ह्ता (सामाजिक और मनोवैज्ञानिक) की जांच कौन करेगा? ऐसे ऑपरेटरों के लिए न्यूनतम योग्यता का निर्धारण कौन करेगा और इनके लिए जो भी पाठ्यक्रम बनाया जाएगा, उसकी पढ़ाई की फीस कितनी होगी? किन संस्थानों को ऐसी शार्ट टर्म या लान्ग टर्म कोर्स कराने के लिए भारत या प्रदेश सरकारों की ओर से अधिसूचित किया जाएगा? इन सवालों के बीच इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि स्कूलों में कैमरा नहीं होना चाहिए। बिल्कुल होना चाहिए, लेकिन क्या यह उचित होगा कि हम अपने ही समाज के लोगों के साथ अविश्वास के संबंधों को मजबूत करें। क्या ऐसा करना लिंग आधारित विविधता और निजता को बनाए रखने की दृष्टि से उचित होगा? क्योंकि किसी भी बुराई के पीछे बहुत से कारक होते हैं। इनमें सबसे प्रमुख हमारा समाज और समाज में रहने वाले विभिन्न सामाजिक समूहों की सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक, सास्कृतिक परिस्थितियां और गतिविधियां शामिल होती हैं। उदाहरण स्वरूप कई बार माता-पिता हैरान होते हैं कि उनका बच्चा गाली कहां से सीखता है। जब कि न तो उनके स्कूल में गालियां सिखाने की कोई क्लास होती है और न ही घर का कोई सदस्य गाली देता या देती है। यह भी सत्य और तथ्य है कि ज्यादातर गालियां महिला केन्द्रित होती हैं। यानि हम अपने बच्चों से कुछ अच्छा करने की उम्मीद एक ऐसे सामाजिक परिवेश में करते हैं, जहां मर्दानापन यानि पितृसत्तात्मक सोच से अनुप्राणित गालियां और अन्य गतिविधियां होती हैं। जिसका सीधा संबंध शक्ति के दो ध्रुवों से होता है। जो धु्रव अपने आप में मजबूत होता है, वो कमजोर के साथ अन्याय, भेदभाव, अपमान, अनादर, हिंसा और क्रूरता जैसे व्यवहार करता है। अनुभव बताता है कि बच्चे अपने सामाजिक परिवेश में ही गालियां सीखते हैं। जैसे मुहल्ले में खेलकूद के समय, घर से बाहर कहीं आते-जाते समय। गालियां देता कौन है? हमारे-आप जैसे लोग ही गालियां देते हैं। दूसरी तरफ बलवान का बल कहीं न कहीं उसके सामाजिक ढ़ांचे के स्वरूप और उसकी परंपरागत प्रवृत्तियों से अक्षुण्य रहता है। इस उदाहरण का संदर्भ इसलिए भी देना पड़ा है कि हम अकेले कुछ तय नहीं कर सकते हैं। विशेषकर ऐसे समाज में जहां पितृसत्ता और अलोकतांत्रिक मूल्य अभी बहुत मजबूत है। इसीलिए ऐसा मुमकिन है कि जो सीसीटीवी कैमरा स्कूल के कर्मचारियों की निगरानी करने के मकसद से लगा हो, क्या पता उसका उपयोग ऑपरेटर अपने कुंठित भावनाओं को तृप्त करने के लिए करने लगे। इस घटना में ड्राइवर को एक ऐसे ही ऑपरेटर के तौर पर देखा जाए तो अंदाजा होता है कि सीसीटीवी सुरक्षा के साथ-साथ अपने नाकारात्मक प्रभावों में ऐसी हिंसक घटनाओं को जन्म दे सकता है। इसलिए जरूरी है कि पहले हम और हमारा समाज संवेदनशील बने। शिक्षा का दृष्टिकोण विकसित करे। किसी भी सामाजिक-शैक्षिक कार्य में अपनी सहभागिता सुनिश्चित करे। वैसे भी स्कूल-कॉलेज को चन्द कैमरों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है। बल्कि इसके लिए संवेदनशील, समझदार और जिम्मेदार स्कूल प्रबन्धन के साथ-साथ परिपक्व और प्रशिक्षित मानव मन की जरूरत होती है। तब जाकर कहीं बचपन को संवारने और निखाने की साधना पूरी होती है।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया में प्रवक्ता मेरी एक मित्र कंचन जो इस समय यूरोप के बूडापेस्ट में हैं, इस घटना को कर्मचारियों और अन्य स्टॉफ के लिए अलग से टॉयलेट होने और न होने से जोड़कर देखती हैं। वो अपने फेसबुक वाल पर लिखती हैं कि “आम तौर पर जैसे रेजिडेंशियल कॉलोनी में काम करने के लिए आने वाली घरेलू नौकरानियों के लिए कॉलोनी में कोई टॉयलेट नहीं होते और वे किसी घर में चुपके से चली जाती हैं या सभ्य लोगों की रिहाईश के किसी किनारे निपट लेती हैं। ऐसे ही स्कूल में बस ड्राइवर, कंडक्टर, कर्मचारियों के लिए भी बच्चों से अलग कोई अलग टॉयलेट की व्यवस्था नहीं करने की मानसिकता खतरे पैदा करते हैं।... कितना शर्मनाक है लगता है कि हम अपने बच्चों को इन्सानों से डरना सिखाते हैं!!” 

इस संदर्भ में बताना जरूरी मालूम होता है कि जब मैं कहानियों पर शोध प्रबन्ध लिख रहा था, उस समय इकबाल मजीद की कहानी “पेशाब घर आगे है!” पढ़ी थी। कहानी में एक व्यक्ति को पेशाब के दबाव से होकर गुजरना पड़ता है। शहर की भीड़ में सबकुछ है, लेकिन न तो टॉयलेट है और न ही पेशाब के दबाव से उत्पन्न पीड़ा झेल रहे व्यक्ति को किसी दुकानदार की अनुमति है कि उसके दुकान के साइड में या पीछे पेशाब किया जा सके। इकबाल मजीद के कहानी “पेशाब घर आगे है!” का संदर्भ बहुत वृहद हो सकता है। यहां मित्र कंचन और संवेदनशील लेखिका ने इस दिशा में कुछ ऐसा लिखा, जिसको नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। क्योंकि हमारा समाज भी कहीं न कहीं ऐसे दबाव में है, जिससे मुक्ति के लिए कोई रास्ता देना नहीं चाहता। हमें अपने स्वार्थ की पूर्ति करने की लालसा है लेकिन कोई जन सुविधाओं के बारे में गंभीर नहीं है। जो लोग गंभीर हैं, उन्हें भी पूंजी आधारित निवेश और मुनाफा की फिक्र ज्यादा है। फलस्वरूप कमजोर पहचान वालों पर चैतरफा खतरा बढ़ा है। ऐसे में कंचन की टिप्पणी “कितना शर्मनाक है, लगता है कि हम अपने बच्चों को इन्सानों से डरना सिखाते हैं!!” बुनियादी शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वालों की सोई हुई संवेदना को कुरेदने वाली है। इनमें स्कूल प्रबन्धन से लेकर, स्कूल के टीचिंग स्टॉफ, नॉन टीचिंग स्टाफ, किताब बेचने वाले और अभिभावक के रूप में किताब खरीदने वाले सभी शामिल हैं।

वास्तव में पेशाब और शौच शहरों और गांवों दोनों ही जगहों पर एक बड़ी समस्या है। गांव में जहां लोग खुले में शौच करने के अभ्यस्त हैं, उन्हें विभिन्न स्वास्थ्य, संस्कार और स्वच्छता जैसे कारणों के चलते घर के अन्दर शौच करने का अभियान चलाया जा रहा है। फिर भी शाम ढ़लते ही गांव से लगे सड़कों और पगडंडियों के किनारे महिलाओं-पुरूषों की बड़ी संख्या में मौजूदगी चिन्ता का विषय है। उसमें भी कुछ स्वयं सेवक टॉर्च दिखाकर कैमरा से फोटो खींच लें या फिर किसी की बहन-बेटी के साथ अभद्र व्यवहार करें, तो हम-आप जैसे लोग कुछ करने में असमर्थ होते हैं। क्योंकि यहां भी डर और खौफ निजता के सवाल पर भारी पड़ता है। यह तो आउटडोर का मामला है। यदि “क्राइम इन इण्डिया” का संदर्भ लें तो ज्यादातर आपराधिक घटनाएं इनडोर यानि घर-मकान के अंदर होती हैं। ऐसी घटनाओं को अंजाम भी वही लोग देते हैं, जिनका संबंध बहुत करीब का होता या फिर जो परिचित और विश्वासी होते हैं। जाहिर है हम और हमारे समाज की सांसे तकनीक के सहारे नहीं चल सकती हैं। तकनीक का इस्तेमाल पीड़ित को राहत पहुंचाने के लिए करना ठीक है। तकनीक का इस्तेमाल किसी आम इंसान विशेषकर महिला, बच्चा, गरीब, पिछड़ा, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक वगैरह कमजोर पहचान वाले व्यक्तियों को हिंसा और यातना देने के लिए करना ठीक नहीं है। तकनीक के इस्तेमाल की पहली शर्त पूंजी है। पूंजी मजबूत लोगों के पास है या मजबूत लोगों का पूंजी पर नियंत्रण है। ऐसे में अगर सीसीटीवी कैमरे जैसे यंत्रों से स्कूल और समाज के संभ्रान्त वर्ग को ही सुरक्षा प्रदान किया जा सकता है। एक और मित्र महेन्द्र सिंह के फेसबुक वाल के माध्यम से गाजियाबाद स्थिति इन्दिरापुरम के एक स्कूल प्रबन्धन की बच्चों की सुरक्षा संबंधी चिन्ता का संज्ञान हुआ है। महेन्द्र सिंह जी ने अपने वाल पर स्कूल द्वारा भेजी गयी चिट्ठी पर लगाया है और स्कूल प्रबन्धन के संवेदनशील होने की बात कही है। 

जाहिर है इस पूरे प्रकरण में बच्चों की सुरक्षा ही चिन्ता का विषय है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि गुरूग्राम का मामला एक स्कूल का मामला नहीं, बल्कि पूरे देश का मामला है। इस संदर्भ में सभी राज्य सरकारों को नोटिस भी जारी की गयी है। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम सराहनीय है। लेकिन गौर करने का विषय यह है कि क्या सुप्रीम कोर्ट के बयान और राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर देने भर से बच्चों के साथ होने वाली आपराधिक घटनाओं पर लगाम लगाया जा सकता है? मौजूदा दौर में जिस तरह से सरकारों ने शिक्षा के क्षेत्र में पूंजी निवेश को बढ़ावा दिया है, उससे शिक्षा के न सिर्फ दो मॉडल, निजी और सरकारी दिखाई देते हैं, बल्कि विकास का निजी मॉडल देश के बहुसंख्यक परिवारों के बच्चों के लिए निराशा पैदा करने वाला रहा है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट और सरकारों को इस दिशा में भी विचार करने की आवश्यकता है कि हमारे तंत्र में ऐसा क्या है कि निजी मॉडल में कुछ होता है तो उसकी गूंज सत्ता के गलियारों से लेकर सुप्रीम कोर्ट हर जगह सुनाई देती है। वहीं दूसरी तरफ किसी पांच साल की बेटी का बलात्कार होने पर भी सत्ता के पुराधाओं और सुप्रीम कोर्ट के कान पर जूं तक नहीं रेंगती है। ऐसा प्रतीत होता है कि हमारी सरकारों और संविधान द्वारा स्थापित लोकतांत्रिक संस्थाएं जैसे स्कूल-कॉलेज और अस्पताल आदि को पतन के रास्ते पर जानबूझ कर ढ़केला जा रहा है। यदि ऐसा नहीं होता तो सरकार शिक्षा पर बजट बढ़ाने और सरकारी स्कूलों के प्रसार की दिशा में काम करती, न कि अपने ही देश के बच्चों को पूंजीपतियों के रहमों करम पर छाड़ने के लिए सरकारी स्कूलों को हतोत्साहित करने वाले कानून बनाती। यदि वास्तव में सरकार और सुप्रीम कोर्ट को लगता है कि जो बच्चे यौन हिंसा या बलात्कार जैसे किसी घटना का शिकार बन रहे हैं तो कार्यपालिका और न्यापालिका को शिक्षा शास्त्र के सिद्धान्तों को मद्दे नजर रखते हुए शिक्षा और समाज को एक समन्वित इकाई के तौर पर मान्यता देना चाहिए। जिसमें इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया जाना चाहिए कि हर बच्चा देश के लिए महत्वपूर्ण है और बच्चों की शिक्षा सिर्फ मां-बाप और अध्यापक-अध्यापिका की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि उस समाज की भी जवाबदेही है जहां बच्चा आने-जाने, खेलने-कूदने जैसे विविध गतिविधियां करता है। जिन अभिभावकों को अपने बच्चों के साथ हिंसात्मक आपराधिक घटनाओं की पीड़ा झेलनी पड़ रही है, उन्हें निजी स्कूलों के खिलाफ सरकारी सरकारी स्कूलों की बेहतरी के लिए आवाज उठानी चाहिए। ऐसे लोगों की आवाज में समाज के शिक्षित और जागरूक लोगों की आवाज भी मिलनी चाहिए। समाज के बेस्ट प्रैक्टिसेज को प्रचारित और प्रसारित करना समाज में आगे बढ़ चुके लोगों का नैतिक और सामाजिक दायित्व होना चाहिए। यदि “कॉरपोरेट सोशल रिस्पान्सिबिलिटी” मुमकिन है तो यह भी मुमकिन है कि “पीपल्स एजूकेशनल रिस्पॉन्सिबिलिटी” जैसी किसी युक्ति को लागू किया जाए। तब जाकर समाज में शिक्षा की दृष्टि पैदा होगी और बच्चों का बचपन सही मायनों में संवारा जा सकेगा। वरना टेक्नोक्रेसी का उफान और कमजार हो रहे लोकतांत्रिक मूल्य न सिर्फ बुनियादी शिक्षा के लिए खतरे पैदा करने वाले हैं, बल्कि मानव मन की विकृतियों को दिनों दिन बढ़ाने वाले हैं, जो संविधान में उल्लिखित लोकतांत्रिक आदर्शों के अनुरूप समाज के दीर्घकालिक हित में नहीं है।

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