Showing posts with label सामाजिक. Show all posts
Showing posts with label सामाजिक. Show all posts

Saturday, July 25, 2020

लाॅकडाउन और बुनकर मज़दूरों का अर्थशास्त्र

नोटः
यह लेख उत्तर प्रदेश के जिला गाजीपुर स्थित रसूलपुर गांव के पुराने अनुभवों और लाॅकडाउन के दौरान क्रमशः 12, 13 और 15 मई 2020 को बुनकर मजदूर मेराज अंसारी से हुई विशेष बातचीत पर आधारित है।
यह लेख एक पत्रिका में प्रकाशित होना था। लेकिन लाॅकडाउन के कारण अब तक पत्रिका प्रकाशित नहीं हो सका है। आज सुबह फेसबुक, व्हाट्सअप और ट्वीटर पर बनारस के एक बुनकर की आत्महत्या की ख़बरें प्राप्त हुईं। बुनकरों के जीवन को नज़दीक से देखना पहले से ही मन को दुःखित करता रहा है। यह लेख बुनकरों की ज़िन्दगी और कारोबार से जुड़े अब तक  के अनुभवों  के लेखकीय अभिव्यक्ति का ही हिस्सा है। पुराने प्रकाशित लेख भी आप तक पहुंचाने की कोशिश रहेगी। क्योंकि पहले से ही अपने परंपरागत व्यवसाय को बचाने और आजीविका अर्जित करने की चुनौतियों से जूझ रहे बुनकरों के लिए मौजूदा स्थिति त्रासद और भयावह है। 


“गेंहू, चावल तो राशन से मिल रहा है। लेकिन साग-सब्जी खरीदने के लिए पैसा चाहिए। तबियत खराब हो जाए, तो इलाज के लिए पैसे चाहिए। गांव में सरकारी डाॅक्टर नहीं हैं। स्वास्थ्य सुविधा के नाम पर गांव में आंगनवाड़ी कार्यकतृी हैं। उनका काम दो बूंद जिन्दगी तक सीमित है। लाॅकडाउन में यह काम भी बंद है। गांव वालों के लिए स्वास्थ्य केन्द्र का नाम बताना बड़ी चुनौती है। लाॅकडाउन में गांव वालों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं बिल्कुल ही नदारद है। गांव वालों का इलाज पहले ही प्राइवेट डाॅक्टरों के भरोसे रहा है। आपात परिस्थिति में अगर ये डाॅक्टर, गांव से हट जाएं या सुई-दवाई बंद कर दें, तो गांव वालों को प्राथमिक उपचार से वंचित होना पडे़गा।” ये कहना है भारत के एक गांव के बुनकर मज़दूर मेराज अंसारी का। मेराज अंसारी जवानी में ही वृद्ध दिखते हैं। हथकरघा का चलना ही इनके घर-परिवार का चलना है। हथकरघा का इतिहास कबीर से भी पुराना है। हथकरघा के ताने-बाने पर दुनिया के बेहतरीन कपड़े तैयार होते रहे हैं। पिछले लगभग तीन दशकों में बड़ी संख्या में पावरलूम ( बिजली चालित करघा ) ने हथकरघा का स्थान लिया है। लेकिन मेराज अंसारी जैसे बुनकर अभी भी हथकरघा ही चलाते हैं। इस काम में इनका पूरा परिवार (बच्चे, बड़े, बूढ़े और महिलाएं सभी) सहायक की तरह शामिल है। हथकरघा पर गमछा और लुंगी आदि वस्त्र की बुनाई के बाद, इसे बाज़ार तक पहुंचाना होता है। हथकरघे पर तैयार सामान को बाज़ार पहुंचाना ज़ोखि़म भरा काम होता है। लेकिन गरीब को दो पैसे कमाने के लिए सिर्फ मेहनत ही नहीं, बल्कि अपने खाने-पीने की वस्तुओं और यात्रा के खर्च में भी कटौती करनी पड़ती है। तब कहीं जाकर घर-परिवार का पेट पलता है। इसलिए मेराज़ अंसारी जैसे बुनकर मज़दूरों को अपनी ज़िन्दगी दाव पर लगाने का जोखि़म उठाना पड़ता है।

एक दिन की बात है। मैं अपने मित्र विजय राव के साथ मऊ की ओर जा रहा था। मेरी नज़र एक बाइक सवार पर पड़ती है। हम लोगों की रफ्तार उस बाइक सवार से कुछ अधिक होती है। हम लोगों और बाइक सवार के बीच का फासला लगातार कम होता जाता है। मैं बाइक सवार से रूकने का इशारा करता हूं। रूकने की वजह बाइक पर लदे हुए कपड़े और बाइक सवार की स्थिति होती है। बाइक सवार अपने चेहरे से हेलिमेट हटाता है। अरे! ये तो मेराज भाई हैं! मैं और विजय भाई हैरान होते हैं। हम हैरान होने के सिवा मेराज भाई के लिए कुछ कर नहीं पाते। हर मुलाक़ात की तरह, इस मुलाक़ात में भी कुछ औपचारिक बातों के साथ सिर्फ यही बता पाए, कि श्रम विभाग में मज़दूरों का पंजीकरण कहां और कैसे होता है। हथकरघा पर काम करने वाले बुनकर मज़दूरों का पंजीकरण कहां होता है। बुनकर मज़दूरों लिए सरकार की ओर से कौन सी योजनाएं चलाई जा रही हैं। प्रत्यक्ष को प्रमाण की ज़रूरत नहीं होती है। मेराज अंसारी की बाइक शायद इस लायक नहीं है, कि उससे एक जगह से दूसरी जगह जाया जा सके। मैं भूल नहीं पाता कि उन्होंने किस जतन से बाइक को रोका था। जब चलने को हुए तो संतुलन बनाने में कितनी मशक्क़त करनी पड़ी थी। यही नहीं बाइक को कुछ दूर ठेलना पड़ा था। तब मुझे इल्म हुआ कि बुनकरी सिर्फ ताने-बाने पर सूत और धागों को सुलझाने का नाम नहीं है। बल्कि बुनकर मज़दूरों को बाज़ार तक तैयार माल पहुंचाने में ज़िन्दगी दाव पर लगाने का नाम भी है। मेराज अंसारी जैसे बुनकरों की जीवन शैली को समझना बेहद ज़रूरी है। क्योंकि गांव के अर्थतंत्र को संभालने में मेराज़ अंसारी जैसे बुनकर मज़दूरों का बड़ा योगदान है। इनकी मेहनत से ही पूंजी निर्माण होता है। जब इनका कुनबा शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं से दूर रहकर काम करता है, तो गांव में पूंजी का प्रवाह बनता है। लाॅकडाउन ने मेराज़ भाई जैसे बुनकर मज़दूरों को न सिर्फ घरों और गांवों में लाॅक कर दिया है, बल्कि इनके रोज़ी-रोटी पर भी तालाबंदी कर दी है। हालांकि मेराज भाई अपनी बाइक से सामान पहुंचाने का बड़ा ख़तरा उठाते रहे हैं। लेकिन लाॅकडाउन की आपात परिस्थिति ने उससे भी बड़ा खतरा पैदा कर दिया है। यह ख़तरा है आजीविका का। जिस पर संकट के बादल मंडला रहे हैं।

रसूलपुर उन गांवों में है, जहां बुनकर मज़दूरों का ताना-बाना ही ज़िन्दगी की पहली और आखि़री उम्मीद है। लाॅकडाउन में हथकरघे बंद पड़े हैं। ऐसे में मेराज अंसारी जैसे बुनकर मज़दूरों को न तो बुनकरी का काम करना पड़ रहा है और न ही हथकरघा पर तैयार सामान बाज़ार तक पहुंचाने का काम करना पड़ रहा है। लेकिन मज़दूर काम न करे, तो ज़िन्दगी बोझ बन जाती है। वो ख़तरा न उठाए तो खाने को लाले पड़ जाते हैं। अभावों का जीवन जीने वाले मज़दूर लाॅकडान का सामना जिस साहस से कर रहे हैं, वो वाकई लाजवाब है। उधर दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े-बड़े शहरों से प्रवासी मज़दूर साइकिल और पैदल ही हज़ारों मील दूर अपने घरों के लिए रवाना होने का हौसला दिखा रहे हैं, तो इधर गांवों में बहुत से मज़दूर बिना अर्थ के ही पेट के अर्थशास्त्र के साथ तालमेल बनाने का नज़ीर पेश कर रहे हैं। मज़दूरों के धैर्य, संयम और अनुशासन की इससे बड़ी परीक्षा और क्या हो सकती है?

लाॅकडाउन की अवधि में आवश्यक सेवाओं को जारी रखने की अनुमति है। हम जानते हैं कि हर सेवा के तार किसी न किसी तरह पेट से जुड़े होते हैं। खाद्यान्न आपूर्ति, साग-सब्जी, गैस सप्लाई और किराने की दुकानों को खोलने की अनुमति इसी उद्देश्य से है। लेकिन मेराज अंसारी जैसे बुनकर मज़दूरों के लिए खाद्यान्न आपूर्ति को छोड़कर अन्य सभी सेवाओं का कोई मतलब नहीं है। मेराज अंसारी बताते हैं कि बाज़ार जाने के लिए पैसे चाहिएं। जो उनके पास नहीं हैं। उन जैसे मज़दूरों के लिए बैंक का खुलना-बंद होना भी बेमानी है। उनके पास कोई बैंक बैलेन्स नहीं है और न ही किसी योजना के तहत सरकार की ओर से कोई धनराशि उनके खाते में भेजी गयी है।

गांव का अर्थशास्त्र समझने के लिए गांव के लोगों से संवाद और उनकी जीवन शैली को समझना जरूरी है। मेराज अंसारी बताते हैं कि ‘जो लोग कपड़ा बुनकर आजीविका अर्जित करते हैं, या मज़दूरी करके दो जून की रोटी जुटाते हैं, उनके हाथ खाली हैं। गेंहू और चावल तो राशन से मिल रहा है। लेकिन साग-सब्जी खरीदने के लिए पैसा चाहिए। तबियत खराब हो जाए, तो इलाज के लिए पैसे चाहिए। रोज़मर्रा ज़रूरत की वस्तुओं के लिए किराना के दुकान पर जाना हो, तो बिना पैसे कैसे जाया जाय? यह बात समझ से परे है। कोई उधार भी दे, तो कैसे दे? उधार मांगा जाए तो, किससे और कब तक?’ मेराज अंसारी जैसे मज़दूरों की बातें सुनकर अंदाज़ा होता है कि गांव के किराना वाले का अर्थतंत्र भी पूंजी के बहाव में बह जाने के कगार पर पहुंच गया है। इन दिनों गांव के लोग महामारी की आपात परिस्थिति से उपजी इन समस्याओं से जूझ रहे हैं। मज़दूर काम पर नहीं जा रहे हैं। रोज़ कमाने वाले-खाने वाले मज़दूरों के सामने जीवन और मृत्यु का संकट मंडला रहा है। राशन का अनाज बिना तेल-नमक, आलू-प्याज, दाल और मिर्च-मसाले के कैसे खाया जाता है, यह मज़दूर ही जानता है। रसूलपुर गांव के लगभग ज़्यादातर परिवारों की आजीविका मज़दूरी पर ही निर्भर है। रोज-कमाने खाने की प्रक्रिया में शामिल मज़दूरों में कोई लूम चलाता है, कोई बुनाई करता है, कोई गारा-माटी करता है, तो कोई खेत मज़दूर है। इनमें हर परिवार की महिलाएं भी काम करती है। बच्चे भी अपने घर के काम में सहायक की भूमिका निभाते हैं। यदि पूरा परिवार एक इकाई की तरह काम न करे, तो खाए बिना मरने की नौबतें पैदा हो सकती हैं। यह समय लाॅकडाउन की आपात परिस्थिति का है। मज़दूरों के हाथ-पैर बंध से गए हैं।

मनरेगा मज़दूरों के लिए राहत की बात है। उनके लिए काम का आवंटन हो रहा है। उनके खाते में पैसे आना भी उनके लिए बड़ी राहत का सबब है। लेकिन बहुत से मज़दूर और उनका परिवार पात्र होते हुए भी मनरेगा जाब काॅर्ड या श्रमिक सन्निर्माण मजदूर की पहचान से वंचित है। इस वजह से ऐसे मज़दूर 1000 रूपए के मुख्यमंत्री राहत राशि से भी वंचित हैं। मेराज अंसारी की बात करें तो, ये बुनकर मज़दूर हैं। इसलिए मनरेगा और श्रमिक सन्निर्माण मज़दूर की पहचान से वंचित हैं। समाज सेवी संस्थाओं द्वारा मदद के तौर पर भोजन का पैकेट पहुंचाए जाने की खबरें टीवी स्क्रीन और अख़बारों का हिस्सा ज़रूर बन रही हैं। लेकिन रसूलपुर गांव की बात करें, तो अभी तक यह गांव ऐसी किसी मदद से अछूता है। गांव के लोग सरकार की ओर मुंह किए मदद के इंतेज़ार में हैं।

मेराज अंसारी इस बात से भी चिन्तित हैं कि मैं उनके गांव की कहानी सुधी जनों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा हूं, तो इससे गांव के लोगों के समक्ष विशेषकर मेराज अंसारी को किसी तरह की समस्या का सामना तो नहीं करना पड़ेगा। इस बात को दृष्टिगत रखते हुए यह बताना भी ज़रूरी है कि इस आलेख का उद्देश्य सामाजिक व सामुदायिक जीवन में बेहतरी के प्रयासों में सहभागी बनना है। न कि डर का मनोविज्ञान तैयार करना या किसी व्यक्ति या संस्था की कार्यशैली की बुराई करना है।



-----
नोटः यह लेख उत्तर प्रदेश के जिला ग़ाज़ीपुर स्थित रसूलपुर गांव के पुराने अनुभवों और लाॅकडाउन के दौरान क्रमशः 12, 13 और 15 मई 2020 को बुनकर मज़दूर मेराज अंसारी से हुई विशेष बातचीत पर आधारित है।

Thursday, May 7, 2020

किशोर बच्चों का परिवेश और माता-पिता एवं शिक्षक

"जब माता-पिता अपने बच्चों के परिवेश में शामिल नहीं होते तो ऐसे में बाहरी परिवेश में मौजूद व्यक्ति, समूह, वस्तु, और गतिविधियां बच्चों के मन में जगह बनाने लगती हैं। इस तरह बाहरी परिवेश बच्चों के आन्तरिक द्वन्द्व के समय में उनके सुख-दुःख का साथी बन जाता है। इन्हीं परिस्थितियों में बच्चों का भावनात्मक विकास परिपक्वता प्राप्त करता है। परिपक्व भावनाओं की अभिव्यक्ति बच्चों के आचरण, विचार और व्यवहार में होती है। ये बात और है कि बाहर के परिवेश में शामिल अच्छाई और बुराई में किस एक से बच्चा अधिक प्रभावित होता है।"


हम जानते हैं कि 10वीं और 12वीं कक्षा की पढ़ाई किसी छात्र/छात्रा के शैक्षिक जीवन में एक विभाजक दीवार की तरह होता है, जहां से बच्चों के भविष्य की दिशाएं तय होती हैं। शैक्षिक जीवन के इस मोड़ पर बच्चों में भविष्य में अपनी पढ़ाई और कॅरियर को लेकर स्पष्टता नहीं होती है। 10वीं और 12वीं कक्षा के बच्चों के लिए निर्णय करना कठिन होता है कि वो आगे की पढ़ाई किस विषय में, किस संस्थान से करें। एक तरफ इन कक्षाओं के बच्चों को किशोर अवस्था से वयस्क अवस्था में संक्रमण के द्वन्द से जूझना होता है। तो दूसरी तरफ इन्हें अपने परिवेश और परिस्थितियों से भी दो-चार होना पड़ता है। अवस्था संक्रमण में शरीर में हाॅरमोन संबधी बदलाव होते हैं। जिसकी स्पष्ट समझ आम तौर पर न तो बच्चों को होती है और न हीं माता-पिता को। ऐसे में बच्चों को भावनात्मक तौर पर माता-पिता और शिक्षकों की मदद नहीं मिल पाती है। जिसकी वजह से ज्यादातर बच्चे जीवन और कॅरियर के बारे में कुछ स्पष्ट निर्णय नहीं ले पाते हैं। सही समय पर सही निर्णय किसी बच्चे के आचार, विचार, व्यवहार, शैक्षिक, सामाजिक व संस्कारिक प्रगति का आधार होता है। इसे सुनिश्चित करने में काउंसलिंग की भूमिका एक महत्वपूर्ण टूल के समान है।

शारीरिक रूप-रंग और ढ़ांचे में बदलाव बच्चों में उत्तेजना का कारण होता है। उनके लिए अपने संवेगों को नियंत्रित रखना मुश्किल होता है। किशोरावस्था के संवेग साकारात्मक भी होते हैं और नाकारात्मक भी। नाकारात्मक संवेगों के प्रस्फुटन और प्रसार की संभावना अधिक होती है। क्योंकि ज़्यादातर बच्चों को पता ही नहीं होता है कि उनका शरीर और मन क्यों बदल रहा है। उनका संवेग उनके मन और शरीर से ही पैदा होता है और मन और शरीर पर हावी भी रहता है। इस उम्र के बच्चों को माता-पिता, शिक्षक और शुभचिन्तकों की बातें रास नहीं आती हैं। दूसरी ओर माता-पिता और शुभचिन्तक के पास बच्चे के अन्दर होने वाले बायोलाॅजिक बदलाओं की समझ नहीं होती है। जिस घर, स्कूल और समाज में बच्चों के आयु संबंधी शारीरिक और मानसिक बदलाव की समझ नहीं होती, वहां समय रहते बच्चों को अपनी भावनाओं के प्रकटीकरण में उनके निकट परिवेश में मौजूद व्यक्तियों, वस्तुओं और संस्थाओं की मदद नहीं मिल पाती है। माता-पिता द्वारा इस उम्र के बच्चों की निजता का अतिक्रमण आम बात है। ऐसे में बच्चे के अन्दर भ्रम के बीज आरोपित होते हैं। यदि बच्चों की निजता के बारे में वैज्ञानिक समझ बनाई जाए और उनके मन के आवेगों को समझने की कोशिश की जाए, तो बच्चा शारीरिक और मानसिक विकास के क्रम में प्रकट होने वाले सांवेगिक द्वन्द से समय रहते उबर जाता है। वरना उसके संवेग उन्हें गलत रास्ते पर ले जाते हैं। बच्चा बुरी आदतों का शिकार हो सकता है। उसके मन में अच्छाई की कल्पना स्थापित होने की संभावना क्षीण पड़ जाती है। बच्चों की भावनाएं बाहरी परिवेश में मौजूद व्यक्तियों, सहपाठियों और वस्तुओं की आभाषी दुनिया की कल्पना के अनुरूप आकार लेती है।

आम तौर पर माता-पिता और शिक्षक बच्चों से परिणामोन्मुख बातें करते हैं। ‘कहां जा रहे हो?’, ‘क्यों जा रहे हो?’, ‘कहां गए थे?’, ‘क्यों गए थे?’, ‘सुबह से अब तक क्या किया?’ आदि वो सवाल हैं, जो अक्सर माता-पिता अपने बच्चों से पूछते रहते हैं। स्कूल में शिक्षक पूछते हैं कि ‘गृह कार्य क्यों नही किया?’ घर और स्कूल दोनों ही जगह बच्चों के सामने एक बड़ा सा ‘क्यों?’ मुंह बाए खड़ा रहता है। इस ‘क्यों?’ में बच्चे के उत्तर की गुंजाइशें कम होती हैं। बड़ों में धैर्य नहीं होता है कि वो बच्चे से अपने ‘क्यों’ का जवाब भी सुनें। बच्चों में चुप रहने की आदत पड़ जाती है। बच्चों की खामोशी को माता-पिता और शिक्षक अपने-अपने तरीके से समझते हैं। बच्चे की खामोशी का कारण बच्चे से संवाद किए बिना ही ढू़ंढ़ लेते हैं, और किसी निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं। माता-पिता अपशब्दों का प्रयोग करते हुए बच्चे को जिम्मेदारी और आत्मनिर्भरता का बोध कराते हैं। तो स्कूल में शिक्षक कक्षा का अनुशासन बनाने में बच्चे के साथ कठोर व्यवहार करते हैं। इस स्थिति से हर किशोर को होकर गुजरना पड़ता है। क्योंकि घर, स्कूल और समाज के परिवेश में बच्चों के बारे में ‘क्यों?’ की मान्यता सामाजिक रूप से सुदृढ़ है। बच्चों को हमेशा बड़ों के ‘क्यों?’ के लिए तैयार रहना होता है।

ज़ाहिर है 15 से 18 वर्ष तक के बच्चों को न सिर्फ शरीर और मन के भावों से द्वन्द की स्थिति में रहना पड़ता है। बल्कि उनका परिवेश और परिस्थितियां उनके प्रति नितान्त आलोचनात्मक, व्यंगात्मक और परिहासात्मक होता है। बच्चों के परिवेश निकट या आन्तरिक और दूर या बाहरी दो भागों में वर्गीकृत करके समझा जा सकता है। निकट के परिवेश में माता-पिता व अभिभावक के अलावा उनके अध्यापक होते हैं। जिनसे बच्चे का प्रत्यक्ष संपर्क और संवाद होता है। ये बच्चे के वास्तविक शुभचिन्तक होतेे हैं। दूसरी ओर वह परिवेश होता है, जो दूर का होता है। जिसमें बच्चों के दोस्त हो सकते हैं। गांव-मुहल्ले के लोग हो सकते हैं। मनोरंजन के तरह-तरह के माध्यम जैसे, भ्रमण, सिनेमा, गेम, आदि हो सकते हैं। दूर का परिवेश अप्रत्यक्ष होता है। इसमें अनिश्चितता होती है। जिस तरह निकट के परिवेश में अच्छे-बुरे दोनों तरह की अभिव्यक्तियों की शामिल होती है, उसी तरह दूर के परिवेश में भी अच्छाई और बुराई की दोनों ही संभावनाएं शामिल होती हैं। निकट परिवेश में माता-पिता जैविक संबंधों का दायित्व निभाता है। बच्चे के हर अच्छे-बुरे आचरण और अभिव्यक्ति के लिए प्राथमिक तौर पर जिम्मेदार होता है। जबकि दूर परिवेश में शामिल व्यक्ति, वस्तु और वातावरण निर्माण के विभिन्न कारण प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार नहीं माने जाते हैं। लेकिन बच्चों के जीवन को प्रायः माता-पिता से अधिक प्रभावित करते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि जैसा परिवेश होगा, बच्चे का शारीरिक, मानसिक, संवेगात्मक और सामाजिक विकास वैसा ही होता है।

स्पष्ट है कि बच्चे के लिए उसका निकट और दूर दोनों ही परिवेश महत्वपूर्ण है। इनमें से किसी एक की कमी या किसी एक में असंतुलन बच्चे के विकास में नाकारात्मक परिणाम का कारण बन सकता है। यदि किसी बच्चे के जीवन में उसके माता-पिता की प्रत्यक्ष मौजूदगी नहीं है। तो ऐसे बच्चे अपने निकट परिवेश से दूर होते जाते हैं। उनके जीवन में दूर का परिवेश ही उन्हें अपना असल परिवेश लगने लगता है। वो दूर के परिवेश के आकर्षण में फंसते जाते हैं। जब माता-पिता अपने बच्चों के परिवेश में शामिल नहीं होते तो ऐसे में बाहरी परिवेश में मौजूद व्यक्ति, समूह, वस्तु, और गतिविधियां बच्चों के मन में जगह बनाने लगती हैं। इस तरह बाहरी परिवेश बच्चों के आन्तरिक द्वन्द्व के समय में उनके सुख-दुःख का साथी बन जाता है। इन्हीं परिस्थितियों में बच्चों का भावनात्मक विकास परिपक्वता प्राप्त करता है। परिपक्व भावनाओं की अभिव्यक्ति बच्चों के आचरण, विचार और व्यवहार में होती है। ये बात और है कि बाहर के परिवेश में शामिल अच्छाई और बुराई में किस एक से बच्चा अधिक प्रभावित होता है।

हर बच्चा अपने परिवार, समाज और देश के लिए महत्वपूर्ण होता है। इसलिए आवश्यक है कि बच्चे मन और भाव के द्वन्द्व से सफलतापूर्वक बाहर निकलें। उनकी मदद करना हर माता-पिता, शिक्षक और शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहे व्यक्तियों का दायित्व है। इसी दायित्व के निर्वहन में माता-पिता और शिक्षक दोनों की काउंसलिंग ज़रूरी है। ताकि वो किशोरावस्था के बच्चों का उचित मार्गदर्शन कर सकें। काउंसलिंग से न सिर्फ माता-पिता की समझ बनती और बढ़ती है बल्कि बच्चा स्वयं भी परिपक्व संवेग और संवेगों की अभिव्यक्ति में परिपक्वता आदि बातों को समझने लगता है। जिन माता-पिता और शिक्षकों को मार्गदर्शन का लाभ मिलता है, उसका लाभ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बच्चों तक भी पहुंचता है। काउंसलिंग प्राप्त बच्चों की शैक्षिक प्रगति अधिक संतोष जनक होती है।

ऐसे माता-पिता की संख्या कम है, जिन्हें आधुनिक शिक्षा की बुनियादी विशेषताओं का ज्ञान हो। ऐसे माता-पिता अपनी निजी व्यस्तताओं के चलते बच्चे की रूचियां और क्षमताओं से अनभिज्ञ रहते हैं। ऐसे माता-पिता के बच्चे भीड़ में अकेले रह जाते हैं। ऐस बच्चों के लिए यह निर्णय करना कठिन होता है कि उन्हें 10वीं और 12वीं के बाद किस विषय में पढ़ाई जारी रखनी है। ऐसे बच्चे और उनके माता-पिता कॅरियर को लेकर निश्चित नहीं होते हैं। बच्चों और माता-पिता के सामने यह स्थिति बादलों के धुंध की तरह होती है। जिसे काउंसलिंग की प्रक्रिया से साफ किया जा सकता है।

पिछले कुछ बरसों से मुझे खु़द बतौर एक काउंसलर इस बात का अनुभव है कि काउंसलिंग से बच्चों को सही दिशा में सोचने और पढ़ने के लिए प्रेरणा प्राप्त होती है। काउंसलिंग के अभाव में बहुत से बच्चे 10वीं और 12वीं के बाद सही दिशा में पढ़ाई जारी रखने के अवसर से वंचित रह जाते हैं। यह वंचना अक्सर अदृश्य होती है। जिन बच्चों को माता-पिता, शिक्षक या किसी प्रोफेशनल काउंसलर से सहायता नहीं मिलती है। उन बच्चों की प्रतिभा का क्षरण होता है। उनका समय बरबाद होता है। और तो और उनकी पढ़ाई पर खर्च होने वाला धन भी निरर्थक सिद्ध होता है। चूंकि प्रतिभा रूचि, तत्परता और क्षमता पर निर्भर होती है। इसलिए सही समय पर सही दिशा का चुनाव न होना रूचि, तत्परता और क्षमता के प्रदर्शन को प्रभावित करता है। जीवन की गाड़ी तो चलती रहती है, लेकिन रफ्तार वो नहीं बन पाती, जो सही टैªक और दिशा में होने पर बनती है। इसे हवा के खि़लाफ का उदाहरण कहा जा सकता है। प्रतिकूल दिशा में प्रयास सफल होने के बाद भी बच्चा अपने कॅरियर से संतुष्ट नहीं रहता है। दूसरा यह कि बच्चा परिवार, समाज और देश में जो योगदान अपनी रूचि, तत्परता और क्षमता वाली दिशा में जाकर कर सकता है, उस योगदान से परिवार, समाज और देश हमेशा-हमेशा के लिए वंचित रह जाता है।

काउंसलिंग एक ज़रूरी टूल है, जो बच्चों और उनके माता-पिता एवं शिक्षकों के लिए ज़रूरी है। इसे व्यापक प्रसार देने की ज़रूरत है। मौजूदा दौर के बच्चे पिछली पीढ़ी की तुलना में कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण परिवेश में सांस ले रहे हैं। माता-पिता और शिक्षक को एक मित्र काउंसलर की भूमिका में रहने की आवश्यकता है न कि “क्यों?” का पहाड़ लिए हुए एक सख़्त अभिभावक या कठोर अनुशासन प्रिय शिक्षक की भूमिका में रहने की ज़रूरत है। यही भूमिका किशोर बच्चों के आन्तरिक और वाह्य द्वन्द्व के समाधान का रास्ता निकालती है।


Friday, March 27, 2020

आपात परिस्थितियों में कैसे करें मूल्यांकन?

शिक्षक को यह बात हमेशा याद रखना चाहिए कि उन्हें न तो बच्चों के ज्ञान की परीक्षा लेनी होती है और न ही अपनी योग्यता का प्रमाण देना होता है। सीखना-सिखाना दो ध्रुवीय प्रक्रिया है जिसके केन्द्र में बच्चा होता है। हमें उस बच्चे के लिए निरन्तर अवसर सृजित करने की ओर अग्रसर रहना होता है न कि पास-फेल की प्रक्रियों को सम्पन्न कराने तक सीमित रहना होता है।


जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में हमें प्रतिस्पर्धा, प्रतियोगिता और परीक्षा जैसे शब्दों से दो-चार होना पड़ता है। ये शब्द हमें पास-फेल के रूप रूप में बहुत कुछ दे जाते हैं। किसी का जीवन पटरी पर सरपट दौड़ने लगता है तो किसी की ज़िन्दगी पटरी से उतर जाती है। फिर भी मनुष्य निर्मित व्यवस्था में हर व्यक्ति के जीवन में प्रतिस्पर्धा, प्रतियोगिता और परीक्षा की घड़ियां आती हैं। इस समय पूरी दुनिया में कोविड-19 नामक संक्रामक बीमारी ने आपात परिस्थितियां पैदा कर दी है। चीन, इटली और फ्रांस में संक्रमण की अनिंत्रित मामलों का संज्ञान लेते हुए भारत में केन्द्र और राज्य सरकारों को आपात कदम उठाने पड़े। यदि उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहां सरकार ने 13 मार्च को ही इसे महामारी घोषित करते हुए 14 मार्च से 22 मार्च तक कक्षा 1 से 8 तक के स्कूलों को बंद करने का आदेश जारी किया था। संक्रमण की भयावहता और स्वास्थ्य सुरक्षा को दृष्टिगत हुए यह समय 2 अप्रैल तक बढ़ाया दिया गया। इस बीच कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों को बिना परीक्षा ही अगली कक्षा में प्रोन्नति प्रदान करने का भी आदेश जारी किया। इसके पीछे कोविड-19 के संक्रमण से बच्चों को बचाना ही प्रमुख उद्देश्य रहा है।

उक्त परिस्थिति में दो बाते चिन्ता का विषय बनी हुई हैं। पहली यह कि वित्तीय वर्ष की ही तरह शैक्षिक सत्र का समय भी 1 मार्च से 31 मार्च तक होता है। लिहाजा 31 मार्च तक स्कूलों को परीक्षाएं आयोजित कर मूल्यांकन कार्य करके बच्चों को प्रगति पत्र वितरित करना होता है। इसके बाद ही कोई बच्चा अगली कक्षा में प्रान्नति के लिए अर्ह् होता है। लेकिन महामारी की आपात परिस्थितियों में छुट्टियां लगातार बढ़ानी पड़ीं हैं। पहले से चल रही परीक्षाओं को रोकना पड़ा। जिन स्कूलों में परीक्षाएं शुरू नहीं हुई थीं, उन्हें पहले टाला गया और अन्ततः निरस्त कर दिया गया। इस क्रम में 22 मार्च को जनता कफ्र्यू भी लगाना पड़ा। माननीय प्रधानमंत्री को देशवासियों से घरों में सुरक्षित बने रहने की अपील करनी पड़ी। यहां तक कि 25 अप्रैल से पूरे देश को लाॅकडाउन कर दिया। अपील किया गया कि सिर्फ आपात आवश्यकता के लिए ही बाहर निकलें। घर के अंदर बने रहने का हर संभव प्रयास करें। फिर भी बहुत से लोग घर के बाहर मुक्त रूप से निरूद्देश्य घूमने से परहेज नहीं कर रहे हैं। जिसकी चिन्ता माननीय प्रधानमंत्री जी ने ट्वीटर और 24 अप्रैल को शाम 8 बजे के अपने संबोधन में व्यक्त की। उन्होंने हाथ जोड़कर विनती की कि यदि अगले 21 दिनों तक हम अपने-अपने घरों में रह लें, तो कोविड-21 के भयावह दुष्परिणामों से लोगों को बचाया जा सकता है। इस लेख के माध्यम से मैं भी अपील करता हूं कि हममें से हर व्यक्ति नैतिक रूप से कोविड-19 के संक्रमण को फैलने से रोकने संबंधी सुझावों का अक्षरशः पालन सुनिश्चित करे। इस अपील के साथ मैं उन लोगों की समस्या पर ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं, जो माता-पिता और शिक्षक के तौर पर अपने बच्चों की परीक्षा और मूल्यांकन को लेकर चिन्तित हैं। यह चिन्ता स्वाभाविक भी है कि क्या बिना परीक्षा किसी बच्चे को अगली कक्षा में प्रोन्नत करना उचित है? ऐसे माता-पिता और शिक्षकों की चिन्ता अपनी जगह उचित है लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि महामारी  की परिस्थितियां असाधारण होती है। खासकर तब जब कोविड-19 जैसी संक्रामक महामारी को डाॅक्टरों, दवाइयों और उपलब्ध स्वास्थ्य सुविधाओं के दम पर टाला नहीं जा सकता है। कोविड-19 ऐसी ही बीमारी है, जो महामारी का रूप धारण कर चुकी है। ऐसे में परीक्षा और मूल्यांकन से अधिक आवश्यक यह हो जाता है कि जिसके लिए परीक्षा का आयोजन किया जाता है और जिसका मूल्यांकन करना होता है, उसके स्वास्थ्य सुरक्षा के उपाय सोचे जाएं और समय रहते उचित कदम उठाएं जाएं। स्कूलों और अन्य सार्वजनिक महत्व के स्थानों पर बच्चों को जाने से रोकना ऐसा ही कदम है। इस पर सवाल उठाना बेमानी है।

निश्चित तौर पर उन लोगों के सामने अपने बच्चों के मूल्यांकन और परीक्षा परिणामों की समस्या होगी, जो बच्चों के लिए औपचारिक परिवेश निर्माण में सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं। महामारी की परिस्थिति में सरकार द्वारा बिना परीक्षा बच्चों को उत्तीर्ण करने के निर्णय ने शिक्षकों के समक्ष यह चुनौती पैदा कर दी है कि वो अमूक छात्र/छात्रा को उत्तीर्ण करने की कवायद के हिस्से में क्या-क्या करें। कहना होगा कि इसका समाधान सतत मूल्यांकन प्रणाली में छुपा है। सतत मूल्यांकन क्या है, इसे कैसे समझा जा सकता है और इसे एक अंक पत्र पर कैसे अभिव्यक्त किया जा सकता है आदि के प्रशिक्षण से शायद की कोई शिक्षक वंचित होंगे। क्योंकि किसी भी शिक्षक को प्रशिक्षण के दौरान मूल्यांकन के विभिन्न पक्षों के बारे में भली-भांति सीखने का अवसर मिलता है। इसलिए परेशान होने या किसी आदेश का इंतेजार करने से बेहतर है कि शिक्षण कार्य में शामिल शिक्षक अपने विद्यार्थियों को सिखाई हुई बातों यानि विषयवार विभिन्न बिन्दुओं का मनन करें कि कब कौन सा टाॅपिक बच्चों को पढ़ाया था? किन बच्चों ने टाॅपिक के बारे में अवधाराणरात्मक समझ विकसित करने में कितनी गंभीरता का परिचय दिया था? शिक्षक स्कूल में बच्चों को पढ़ाते समय के क्षणों को याद करें। बच्चों के चेहरे उनकी आंखों के सामने आएंगे। बच्चों का व्यवहार, आचरण और शिष्टाचार स्पष्ट याद आने लगेगा। विषय विशेष में अलग-अलग बच्चों का लिखित और मौखिक प्रदर्शन भी याद आएगा। बच्चों के नाम क्रम से लिखकर प्रत्येक नाम पर विचार करें। निश्चित तौर पर एक पूरे शैक्षिक सत्र ही नहीं बल्कि पिछले कई वर्षों से बच्चों के साथ सीखने-सिखाने के ढ़ेर सारे क्षणों की याद ताज़ा हो उठेगी। फिर यह भी याद आएगा कि अमूक छात्र/छात्रा का विषय विशेष में क्या स्थिति रही है। इस तरह से मूल्यांकन का कार्य सम्पन्न किया जा सकता है।

आज देश और दुनिया के समक्ष जीवन बचाने का जो संकट पैदा हुआ है, उसमें सतत मूल्यांकन की प्रणाली को व्यावहारिक तौर पर अपना कर मूल्यांकन की समस्या का समाधान किया जा सकता है। यदि इसके विस्तार में जाएं तो यह मानना होगा कि अर्द्ध-वार्षिक और वार्षिक लिखित परीक्षा की स्थापित परिपाटी के प्रतिकूल मूल्यांकन की इस प्रणाली को व्यापक स्तर पर कम से कम कक्षा 8 तक के शिक्षण कार्य में अपनाना जा सकता है। लेकिन यह तभी संभव है जब हर शिक्षक पक्षपात, भेदभाव, वैयक्ति द्वेष और घृणा आदि भावों से स्वयं को दूर रखने के लिए स्वयं से ही वचनवद्ध हो।

बहुत सारे शिक्षकों के लिए सतत मूल्यांकन का कार्य बोझिल हो सकता है। यह तभी होता है जब हम किन्हीं अपरिहार्य कारणों से अपने विषय और बिंदु पर केन्द्रित नहीं होते। यह समझना ज़रूरी है कि सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में विषय बिन्दु पर केन्द्रित होने और केन्द्रित न होने के क्या मायने हैं। सीखने-सिखाने की गतिविधियां दो ध्रुवों के बीच बच्चों को केन्द्र में रखकर किया जाता है। बच्चा जिस केन्द्र में होता है उसके एक ध्रुव पर माता-पिता और अभिभावक होते हैं। वहीं दूसरे ध्रुव पर स्कूल और वहां शिक्षण कार्य में शामिल अध्यापक/अध्यापिका होते हैं। दोनों के काम बंटे हुए होने के बाद भी दोनों को केन्द्र में स्थित बच्चे के लिए अपनी दिनचर्या तय करनी होती है और समर्पित भाव से प्रयास करना पड़ता है। क्योंकि केन्द्र में स्थित बच्चा ठीक अवस्था में होगा तो घर-परिवार, देश और समाज को स्थायित्व मिलेगा। 

केन्द्र में स्थित बच्चे की कल्पना में भविष्य के एक सभ्य नागरिक, समाज सेवी, राजनीति कर्मी, डाॅक्टर, इंजीनीयर, वकील, प्रोफेशनल, किसान और मज़दूर आदि सभी शामिल होते हैं। ये सारे पहचान एक दूसरे के पूरक होते हैं। इनमें परस्पर सहजीविता की कल्पना निहीत होती है। यदि ऐसा नहीं होता तो केन्द्र में स्थित बच्चे के लिए माता-पिता और शिक्षकों को प्रयास ही नहीं करना पड़ता। बच्चे को न तो स्कूल के औपचारिक परिवेश में अच्छे मूल्यों और गुणात्मक सीख की आवश्यकता होती और न ही घर और समाज के अनौपचारिक परिवेश में माता-पिता को अपने बच्चों को परंपरा और संस्कार सिखाने की जिम्मेदारी निभानी पड़ती। मानव जीवन के इस सच को परीक्षा और मूल्यांकन की स्थापित प्रणाली से जोड़कर देखें तो अंदाज़ा होता है कि माता-पिता व्यक्तिगत और अनौपचारिक तौर पर अपने बच्चों का सतत मूल्यांकन करते रहते हैं। यही वजह है कि वो हर दिन, हर क्षण अपने बच्चों के समक्ष जीवन के उत्तम आचार, विचार और व्यवहार के साथ-साथ श्रेष्ठ अनुशासन, आचरण और शिष्टाचार आदि के आदर्श प्रस्तुत करते रहते हैं। ताकि बच्चे के व्यक्तित्व में ये बातें मूल्य के रूप में स्थापित और विकसित हो सकें।

अब बात करते हैं दूसरे ध्रुव की जहां शिक्षक होते हैं। शिक्षक केन्द्र में स्थित बच्चे के लिए औपचारिक प्रयास करते हैं। स्कूल के औपचारिक परिवेश में बच्चे को अनुशासन और शिष्टाचार के साथ-साथ निर्धारित पाठ्यक्रम को समयबद्ध तरीके से पढ़ाना-सिखाना शिक्षक का दायित्व होता है। शिक्षक के ऊपर यह जिम्मेदारी होती है कि वो बच्चों में विभिन्न विषयों से संबंधित विभिन्न बिन्दुओं की समझ बनाने में उसी समर्पण भाव का परिचय दे जैसा कि घर के अनौपचारिक परिवेश में माता-पिता और अभिभावक संस्कार की सीख देते समय दिखाते हैं। स्कूली शिक्षा में ऐसा करना ही शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए सुखद समझा जाता है। यदि मौजूदा दौर में स्कूली शिक्षा की बात करें तो लगभग सभी स्कूल और शिक्षक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए समर्पित नज़र आते हैं। मूल्यांकन की सतत प्रक्रिया को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से अलग करके नहीं देखा जा सकता है। उक्त बातों का ध्यान करके कोई भी शिक्षक अपने विद्यार्थियों की प्रगति रिपोर्ट तैयार कर सकता है।

यदि किसी शिक्षक के समक्ष फिर भी संशय की स्थिति हो कि ऐसी स्थिति में क्या करें जब उन्हें दो-तीन घण्टे की परीक्षा की प्रचलित परिपाटी के बिना ही बच्चों को पास करना है, तो उसे यह समझ लेना चाहिए कि अब तक वो जिन बच्चों का मूल्यांकन परीक्षा की स्थापित परिपाटी से करते रहे हैं, अब उन्हीं बच्चों के सामने अपना मूल्यांकन प्रस्तुत करना है। जो शिक्षक पूरे शैक्षिक सत्र भर केन्द्र में स्थित बच्चे के लिए समर्पित भाव से प्रयास करते हैं, उनके लिए किसी बच्चे का मूल्यांकन कोई बड़ी बात नहीं होती। यह भी सत्य है कि जब कोई शिक्षक विद्यार्थियों का मूल्यांकन करता है, तो इस प्रक्रिया में उस शिक्षक का खु़द का मूल्यांकन भी स्वतः होता रहता है। इसलिए ज़रूरी है कि चैतन्य होकर शिक्षा शास्त्र के सिद्धांतों को दृष्टिगत रखते हुए शिक्षक बिना औपचारिक परीक्षा के विद्यार्थियों का शैक्षिक मूल्यांकन कर प्रगति पत्र तैयार करें। इस काम को बिना किसी असहजता से किया जा सकता है। क्योंकि शिक्षक को अपने विद्यार्थियों के साथ स्कूल के औपचारिक परिवेश में एक या एक से अधिक शैक्षिक सत्र व्यतीत करने का अवसर मिलता है। शिक्षक को यह बात हमेशा याद रखना चाहिए कि उन्हें न तो बच्चों के ज्ञान की परीक्षा लेनी होती है और न ही अपनी योग्यता का प्रमाण देना होता है। सीखना-सिखाना दो धु्रवीय प्रक्रिया है जिसके केन्द्र में बच्चा होता है। हमें उस बच्चे के लिए निरन्तर अवसर सृजित करने की ओर अग्रसर रहना होता है न कि पास-फेल की प्रक्रियों को सम्पन्न कराने तक सीमित रहना होता है।

*****
नोटः- इस लेख पर आप अपनी प्रतिक्रिया नीचे लिखे ई मेल पता पर दे सकते हैं।
hashiyekasamvad@gmail.com
