Friday, February 10, 2012

समतामूलक समाज के सापेक्ष सम्मान की लड़ाई


सामाजिक अन्याय के खिलाफ लड़ाई नयी नहीं है। सामाजिक न्याय की दिशा में पहली बार छठीं शताब्दी ई॰पू॰ में बुद्ध और जैन धर्मों की तरफ से पहल की गयी। मध्यकालीन भारत में भी भक्ति और सूफी आंदोलनों के रूप में समानता के लिए आंदोलन चला। कबीर और नानक जैसे महान समाज सुधारकों ने इसी युग में जन्म लिया। जहां तक आधुनिक भारत में सम्मान और समानता का प्रश्न है तो ज्योतिबा फुले से लेकर डा॰ बी.आर. अंबेडकर तक यह कारवां आगे बढ़ा। 1947 में आजादी और उसके बाद 1950 में संविधान का लागू होना आधुनिक भारतीय इतिहास में एक लैण्डमार्क है कि कम से कम कानून इन तिथियों के बाद जाति, नस्ल, लिंग, धर्म, क्षेत्र और समुदाय के आधार पर किसी नागरिक के साथ न तो भेदभाव किया जाएगा और न ही शोषण होगा। इस बात को सुनिश्चित करने के लिए कि अछूत समझा जाने वाला तबका विकास के मुख्य धारा में शामिल हो सके, राष्ट्रपति के विशेष अध्यादेश से आरक्षण की व्यवस्था की गयी। मण्डल के दौर में आरक्षण पर नए सिरे से बहस भी शुरू हुई। ओ.बी.सी. में क्रिमीलेयर के प्रावधान के अनुरूप अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण की व्यवस्था में भी इस प्रावधान की हिमायत की गयी। इक्कीसवीं सदी में प्रवेश के साथ ही आरक्षण की नीति पर भी बहस के नए द्वार खुले। जैसे निजी क्षेत्र में आरक्षण को लागू करना, महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण, पसमांदा मुसलमानों के लिए सामाजिक स्टेटस के अनुकूल आरक्षण वगैरह।
आरक्षण के विरोधियों ने हर मोड़ पर अपनी आवाज़ बुलंद की। लेकिन सत्य यही है कि भेदभाव और शोषण पर आधारित  समाजिक व्यवस्था अभी भी मजबूत है। इस व्यवस्था का चरित्र भी अजीब है, जब जाहे, जहां चाहे और जैसे चाहे खुद को समायोजित कर लेती है। नब्बे के दशक में मण्डल कमीशन की अनुशंसाओं का लागू होना ऐसे ही प्रयासों और सामाजिक न्याय के लिए संघर्षरत्त पिछड़े लोगों की उपलब्धि थी। कम से कम शिक्षा और नौकरियों में अवसर के नए द्वार खुले। पिछड़ी जाति के लोगों को मुख्य धारा में शामिल होने का अवसर मिला। मण्डल कमीशन के अन्तर्गत लागू आरक्षण की व्यवस्था का साकारात्मक परिणाम व्यवहार में दिखाई देने लगा। लेकिन सामाजिक न्याय की राह में यह अन्तिम पड़ाव नहीं था। समय का चक्र घूमता रहा। विरोध-प्रदर्शन का लम्बा दौर चला। लेकिन पूर्व प्रधानपंत्री वी.पी. सिंह को याद करते हुए कहना पड़ रहा है कि उन्होंने जो किया वो इतिहास का एक अतिमहत्वपूर्ण फैसला था। पिछले बीस वर्षों में आरक्षण के माध्यम से अपनी हिस्सेदारी और हक प्राप्त करने वालों ने मेरिट के मिथ को धता-बता दिया है। फिर भी जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में पिछड़ी और दलित जातियों के लोगों के साथ भेदभाव बदस्तूर जारी है। मीडिया का हस्तक्षेप बढ़ने से घटनाएं प्रकाश में तो आ जा रही हैं। लेकिन सम्मान को ठेस पहुंचाने के कायदे और कानून शायद अभी भी संविधान से ऊपर हैं। ये कानून अदृश्य और अप्रतयक्ष हैं। ऐसे कानूनों से पार पाना कोई मामूली बात नहीं। यदि होता तो अभी हाल-फिलहाल में राजधानी की दो प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में ओ.बी.सी आरक्षण को लेकर बहस नहीं होती।
आरक्षण के पीछे मूल भावना “सम्मान” का रहा है। क्योंकि भेदभाव के ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ को वर्तमान से अलग नहीं किया जा सकता। इतिहास का अवलोकन करने पर स्पष्ट हो जाता है कि सामाजिक भेदभाव के मानक दैवीय या अलौकिक नहीं हैं बल्कि इन्हें मनुष्यों ने ही स्थापित किया है। इतिहास का थोड़ा भी ज्ञान रखने वाला व्यक्ति जानता है कि मनुस्मृति जैसी किताबों के सहारे भेदभाव को संस्थागत रूप प्रदान किया गया। इससे इतर कुछ संस्थाएं ऐसी भी खड़ी की गयीं जो बिल्कुल अप्रत्यक्ष और अदृश्य थीं। विकास के कालक्रम में ये संस्थाएं जिनकी मान्यता नहीं हैं अभी भी आस्तित्व में हैं। ध्यान दिलाना चाहता हूँ उन गालियां की तरफ जो समाज के पिछड़े और दलित तबके का केन्द्र में रखकर बनायी गयीं और जो आज भी हमारे सामाजिक जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। अपने गांव-मोहल्ले में चलते-फिरते लोगों का गुस्सा जब गालियों के माध्यम से व्यक्त होता है तो इनमें महिलाएं और पिछड़े-दलित ही निशाने पर होते हैं। उदाहरण भी प्रस्तुत कर देता हूँ। स्कूल के दिनों में जब बच्चे आपस में एक दूसरे स मजाक करते थे या चिढ़ाते थे तो प्रेम पूर्वक कही गयी कुछ बातें और उन बातों का निहितार्थ अब समझ में आता है। जैसे- “अहिर-बहिर बम्बोकड़ा क लासा, अहिरा पदलस भइल तमाशा।” यह गाली मजाक लगती है लेकिन किसी पिछड़े के मनोबल को बाल्यावस्था में ही तोड़ने के लिए काफी है। “चोरी-चमारी” में चोरी शब्द समझ में आता है लेकिन “चमारी” का अर्थ विचारणीय है। इसी तरह बात-बात में प्रगतिशील लोगों के मुंह से भी सुना जा सकता है “डोम हउव का” या फिर “जोलहा-जपाटी” और “धुनिया” वगैरह। ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसी गालियां पिछड़ों, दलितों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों को लक्ष्य करके किसी साजिश के तहत व्यवहार में लायी गयीं।
बहरहाल आज़ादी के बाद से लेकर अबतक सम्मान के इस संघर्ष में यदि वी.पी. सिंह जैसे कुछ लोगों को छोड़ दिया जाए तो आरक्षण विरोधियों को ऐसा लगता है कि आरक्षण से उनका हिस्सा मारा जा रहा है। कहना नहीं है कि प्रोफेशनल कोर्सेज के दौर में नयी पीढ़ी के बच्चों की सोच भी प्रोफेशनल बनती जा रही है। कहा जाता है कि हर आने वाली पीढ़ी अपने पूर्वजों से एक कदम आगे झंडा फहराती है। लेकिन सामाजिक विकास के सूचकांक पर देखा जाय तो आरक्षण विरोधियों ने अपने पूर्वजों से पीछे ही झंडा फहराया है। 2006-07 में एम्स के तथाकथित मेरिटोरियस डाॅक्टरों को जिन्होंने हिप्पोक्रेटिक शपथ को भी तिलांजली दे दी थी और आरक्षण विरोध की जंग में शामिल हो गये थे। गौर करने की बात यह है कि समान्यतः साइंस स्ट्रीम के छात्र-छात्रा जनआंदोलनों का हिस्सा बनते कभी-कभार ही देखा गया है। लेकिन जब आरक्षण की बात होती है तो ये मरीजों को मरता छोड़ आंदोलन में शामिल हो जाते हैं। इनका कहना है कि आरक्षण से अयोग्य डाॅक्टर बन जाएंगे। ध्यान देने की बात है कि पहले से सामाजिक रूप से सशक्त परिवारों से संबंध रखने वाले बच्चे जब प्राइवेट मेडिकल या इंजीनियरिंग कालेजों में कैपीटेशन की बड़ी रकम अदा करके डाॅक्टर या इंजीनियर बन जाते हैं तो उस समय इनका विरोध न जाने कहां चला जाता है।
पिछले दिनों मैं मऊ जा रहा था। ट्रेन में कुछ छात्रों से मुलाकात हुई। बातों का दौर शुरू हुआ। बात शिक्षा, नौकरी से होते हुए आरक्षण तक आ पहुंची। लड़कों की तारीफ करना चाहूंगा। बहुत भोले और शिष्ट थे। लेकिन आरक्षण के सवाल पर उनका यू टर्न लेना मेरे लिए हतप्रभ होने का विषय नहीं था। क्योंकि यह मेरे लिए कोई नया अनुभव नहीं था। कहना चाहता हूं कि उदारीकरण के इस दौर में बच्चों की पूरी परवरिश आधुनिकता के दायरे में हो रही है लेकिन सम्मान देने और लेने का संस्कार पीढि़यों पुरानी है। कहा जाता है कि पूंजीवाद मनुष्य को दकियानूसी सामाजिक मूल्यों और परंपराओं की जकड़ से मुक्त करता है। लेकिन यहां तो मामला ही अलग है। 2008 मे 27 नवम्बर को जिस दिन वी.पी. सिंह का निधन हुआ था उससे एक दिन पहले मुम्बई का बम हादसा हो गया था। पिछड़ों को सामाजिक समानता की सौगात देने वाले इस व्यक्ति का कद छोटा होते हम सबने देखा था। चलिए मान लेते हैं टी.आर.पी मीडिया के लिए ब्रेकिंग न्यूज जरूरी है। लेकिन 2009 और 2010 में इस तिथि को तो कहीं कोई बम विस्फोट नहीं हुआ था। फिर वी.पी. सिंह के योगदानों को मीडिया में प्रखुता से क्यों नहीं प्रस्तुत किया गया। जाहिर है निवेश और मुनाफे के सिद्धांतों पर खड़े बड़े-बड़े मीडिया घरानों में भी ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से वर्चस्व प्रधान लोगों का ही प्रभाव है। इस बात को अगस्त माह के भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना आंदोलन से भी जोड़कर देखा जा सकता है। मीडिया का पूंजीवादी और दलित-पिछड़ा विरोधी चरित्र उजागर हो जाता है। एक अन्ना जो भ्रष्टाचार जैसी गंभीर समस्या के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे, तो अधिकतर समय उनके आंदोलन, अनशन और स्वास्थ्य वगैरह समाचार और चर्चा-परिचर्चा का विषय बने हुए थे। देखा जाए तो अन्ना को अभी जन लोकपाल जैसा कोई कानून पास करवाना है। दूसरी तरफ आज से लगभग दो दशक पहले वी.पी. सिंह ने मण्डल को पास करवाया था और लागू भी करवाया था। जिससे शैक्षिक और सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों को मुख्य धारा में शामिल होने का अवसर मिला। लेकिन मीडिया के लिए इंसान का परिमाणात्मक दुःख-दर्द कोई मायने नहीं रखती। आज की बाजार परस्त मीडिया के लिए मनुष्य का मनुष्य के साथ भेदभाव कोई मुद्दा नहीं है। इसीलिए संदेह होता है कि मीडिया का चरित्र पूंजीवादी होने के साथ-साथ ब्राम्हणवादी भी है। कहना पड़ रहा है कि सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालयों के गठन से काम नहीं चलने वाला है। सरकार ने जिस तरह से अन्ना के खिलाफ इच्छा शक्ति का प्रदर्शन किया या जिस तरह घुटने टेके। ठीक उसी तरह हर क्षेत्र में ब्राम्हणवादी व्यवस्था के प्रच्छन्न प्रभावों को समाप्त करने के लिए इच्छा शक्ति दिखाए तो कोई बात बने। वरना सामाजिक न्याय के नाम पर अन्याय करने वाले बहरूपियों का बोलबाला यूं ही बना रहेगा।
इस लेख के माध्यम से इस ओर भी ध्यान दिलाना चाहता हूं कि कोई भी समाज तभी आगे बढ़ा है जब उस समाज के अन्दर से नेतृत्व उभरा है। ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से पिछड़े और वंचित तबकों की एक कमजोरी रही है वह अपने नेतृत्व को स्वीकारने के बजाय धन, बल और छल के नेतृत्व को सहजता से स्वीकार कर लेता है। उदाहरण के तौर पर पंचायत चुनाओं में जो सीट महिलाओं के लिए या दलितों के लिए सुरक्षित होते हैं वहां महिलाओं के पीछे उनके पति खड़े रहते हैं और पतियों के सर पर किसी सम्पन्न-सम्भ्रांत का हाथ होता है। यानि सशक्तिकरण और सम्मान घूम फिर कर पहले की तरह सम्भ्रांतों के चैखट पर ही पहुंच जाते हैं। ऐसे किसी भी क्षेत्र का दौरा किया जाए तो स्थितियां कमोबेश ऐसी ही मिलेंगी।
अब समय आ चुका है कि मौजूदा दौर में जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में हो रही प्रगति से कदमताल करते हुए गांव-मोहल्ले, स्कूल-काॅलेज और नौकरियों के प्रतिष्ठानों से लेकर सार्वजनिक जीवन के हर उस स्थान पर अदृश्य रूप में होने वाले भेदभाव की पड़ताल की जाए। सड़क से लेकर संसद तक बौद्धिक परिपक्वता के साथ यह बात बताई जाए कि आरक्षण का संबंध नौकरियां प्राप्त करना नहीं बल्कि समतामूलक व्यवस्था के सापेक्ष सम्मान प्राप्त करने का अबतक का सबसे बेहतर उपाय है। सम्मान की लड़ाई अभी अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंची पायी है। पिछड़ों-दलितों ने संवैधानिक रूप से एक सोपान जरूर तय किया है। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति भी दर्ज की है। लेकिन अभी भी पाने को बहुत कुछ बाकी है।

ओ.बी.सी. आरक्षण की समीक्षा के बजाए 4.5 प्रतिशत कोटा अतार्किक

पिछले कुछ दिनों से मुस्लिम आरक्षण पर बहस तेज है। सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में सभी दल यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि इनमें मुसलमानों का कौन कितना बड़ा हमदर्द है। 4.5 प्रतिशत अल्पसंख्यक कोटा के माध्यम से 64 बरस के आजाद भारत के इतिहास में नया अध्याय जोड़ने की कोशिशें जारी हैं। कैबिनेट के इस फैसले को कुछ लोग देश बांटने वाला, कुछ लोग मुस्लिम ध्रुवीकरण, कुछ लोग विशेषकर मुसलमानों के पिछड़ेपन को दूर करने वाला और कुछ लोग पिछड़ों को बांटने वाला फैसला बता रहे हैं। सवाल यह भी है कि 27 प्रतिशत ओ.बी.सी. आरक्षण के अन्दर 4.5 प्रतिशत अल्पसंख्यक कोटा निर्धारित करने वाले फैसले के पीछे कहीं केन्द्र सरकार की सोची समझी चुनावी रणनीति तो नहीं है? मुख्य धारा की पार्टियों से तो ऐसे सवालों की गुंजाइश बनती ही है कि पिछले 64 बरसों में नहीं तो कम से कम मण्डल लागू होने के 18 बरसों के शैक्षिक-सामाजिक विकास के बाद केन्द्र सरकार का इस नतीजे पर पहुंचना क्या तार्किक है? यदि पिछले 18 बरसों की बात करें तो यह सवाल उन छोटी-छोटी क्षेत्रीय पार्टियों पर भी समान रूप से लागू होता है, जिन्हें दलित-पिछड़ा आंदोलनों के राजनीतिक नेतृत्व का सौभाग्य प्राप्त हुआ। गौर तलब है कि संवैधानिक प्राविधान और दलित-पिछड़ा आंदोलन में उभार के बाद भी ओ.बी.सी. में शामिल अल्पसंख्यक वर्ग के लोगों को आरक्षण का लाभ क्यों नहीं मिला। ऐसे में विचार जरूरी है कि अल्पसंख्यक आरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए पिछले दो दशक की उपलब्धियों की समीक्षा की जाए या 4.5 प्रतिशत अलग को कोटे का प्राविधान किया जाए।
ग़ौर तलब है कि इक्कीसवीं सदी की पहली दहाई में दलित-पिछड़ा की शब्दावली में एक नए शब्द “पसमांदा” की वृद्धि हुई। हालांकि कि इसके प्रयास बीसवी सदी के अन्तिम दशक में ही शुरू हो चुके थे। इसका पूरा श्रेय ‘‘मसावात की जंग’’ नामक किताब के लेखक अली अनवर को है। यह किताब मूलतः बिहार के पसमांदा मुसलमानों की शैक्षिक-सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व का शोधपरक चित्र प्रस्तुत करता है। यह किताब देश भर में मुस्लिम समाज में व्याप्त सामाजिक अन्याय और भेदभाव के चरित्र को उजागर करता है। यद्यपि पहले से ही मुस्लिम समाज में जाति स्तरीकरण पर प्रो॰ इम्तियाज़ अहमद जैसे समाज विज्ञानियों के महत्वपूर्ण शोध उपलब्ध हैं। लेकिन ऐसे अध्ययनों को आंदोलन का रूप देने में ‘‘मसावात की जंग’’ का उल्लेखनीय योगदान रहा है। ‘‘मसावात की जंग’’ ने सामाजिक आंदोलन तो खड़ा किया लेकिन अफसोस कि अभी तक यह आंदोलन अपने राजनीतिक लक्ष्यों तक पहुंच नहीं सका।
बहरहाल “मसावात की जंग” (2001) और सच्चर कमेटी की रिपोर्ट (2005) और सामाजिक स्तरीकरण के इतिहास से इस बात को बल मिलता है कि अन्य समाजों की तरह मुसलमानों में भी जाति व्यवस्था का प्रभाव रहा है। पसमांदा मुसलमानों के 75 से 80 प्रतिशत हिस्से को समाज और देश में कभी उचित सम्मान नहीं मिला। यही कारण है कि पसमांदा मुसलमानों को मण्डल कमीशन की संस्तुतियों में ओ.बी.सी. के अन्तर्गत अधिसूचित किया गया। मण्डल और उसके बाद की परिस्थितियों में पसमांदा मुसलमान कम से कम सर उठाने की स्थिति में आया है और अपने अधिकारों के प्रति सचेत होने की प्रक्रिया में है, लेकिन उन्हें आरक्षण का लाभ उस अनुपात में आज तक नहीं मिल सका। मुमकिन है सरकार इस बात से वाकिफ हो और इसी पृष्ठभूमि में 4.5 प्रतिशत कोटे को मंजूरी दी गयी हो। लेकिन सरकार का संदर्भ 1992 के राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग एक्ट की धारा 2 (सी) का है, न कि शैक्षिक और सामाजिक रूप से पिछड़े मुसलमानों या अन्य अल्पसंख्यकों का। सवाल लाजमी है कि पिछड़े मुसलमान जो एक सामान्य भारतीय नागरिक के तौर पर जब 18 बरसों में मण्डल के अन्तर्गत लाभान्वित नहीं हो सके तो चुनावी पिटारे से निकलने वाले 4.5 प्रतिशत कोटे के अन्दर कोटे से कैसे लाभान्वित होंगे। मुस्लिम समाज के जाति स्तरीकरण को देखा जाए तो इस कोटे के माध्यम से पिछड़ेपन की वंचना सहने वाले पिछड़ों और अगड़ेपन के आकंठ में डूबे संभ्रांतों को एक ही पंिक्त में लाकर खड़ा कर देना कहां तक उचित है?
आरक्षण की पृष्ठभूमि, नीति और राजनीति के संदर्भ में यह समय समीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकता है। इसलिए कि विश्लेषण और समीक्षा के बाद उन कारणों का पता चल सकता है कि मण्डल कमीशन लागू होने के बाद मुस्लिम ही नहीं बल्कि हिन्दू पिछड़ी जातियों को भी आरक्षण का पूरा-पूरा लाभ क्यों नहीं मिला? यह भी कि केन्द्र और राज्य की नौकरियों में खाली पड़ी ओ.बी.सी. की सीटों को समय रहते क्यों नहीं भरा जा सका।
उक्त बातें अल्पसंख्यक आरक्षण से संबंधित सरकार की मंशा को संशय के घेरे में ले आती है। यदि राजनीतिक रूप से देखा जाए तो इस फैसले से पिछड़े समाजों में लोकतंत्रीकरण की जो प्रक्रिया चल रही है वह कमजोर हो सकती है। क्योंकि जाति विन्यास में “जिसकी लाठी/उसकी भैंस” वाले अल्पसंख्यक समुदाय के लोग भी 27 प्रतिशत में शामिल कर लिए गए हैं। सर्वाधिक लाभ उन लोगों को मिलने की संभावना है जो पहले से ही संभ्रांत और समृद्ध हैं। खासकर वे लोग जो आरक्षण की मूल भावना और सिद्धान्त का आरम्भ से ही विरोध करते आए हैं। ऐसे में कोटे के अन्दर 4.5 प्रतिशत कोटा का टोटा जातीय दम्भ और सामंती वर्चस्व के दावानल में अल्पसंख्यक पिछड़ों को कुछ और सदियों तक जलाता रहेगा। मेरा मानना है कि आरक्षण की लड़ाई महज शिक्षा और नौकरी की लड़ाई नहीं है। यह लड़ाई समतामूलक समाज के निर्माण और सम्मान की लड़ाई है। इसे इसी रूप में देखा जाना चाहिए।

Wednesday, February 1, 2012

असंतुलित होता बाल लिंग अनुपात और भविष्य की चुनौतियां


"यह बिन्दु विचारणीय है कि कोई माता-पिता अपनी ही सन्तान के साथ दोहरा रवैया क्यों अपनाता है? ऐसे दौर में जबकि शिक्षा और साक्षरता के ग्राफ में लगातार वृद्धि दर्ज की गयी है, तो ऐसे समय में लिंगभेद की घटनाएं भी निरन्तर बढ़ी हैं। यद्यपि शिक्षा के चलते “हम दो-हमारे दो” के साकारात्मक परिणाम जरूर आए हैं। लेकिन पढ़े-लिखे समाजों में भ्रूण हत्या की घटनाओं का बढ़ता ग्राफ लैंगिक भेदभाव की नयी कहानी बयान करता है। जनगणना 2011 के प्रोविजनल आंकड़े हमें और हमारी सोच को सचेत करने के लिए काफी हैं। यदि अब भी हम मान्यताओं और धारणाओं की कैद से बाहर नहीं निकलेंगे और बच्चियों के जन्म से संबंधित पूर्वाग्रहों को समाप्त करने के लिए जागरूक नहीं होंगे तो हमें बीस बरस बाद आने वाले भयावह परिणामों का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा।"


भारतीय समाज में औरतों के साथ भेदभाव कोई नई बात नहीं है। इस विषय पर चर्चा परिचर्चा भी खूब होती है। हमारे देश में तो सरकारों ने महिला सशक्तिकरण के लिए अलग से योजनाओं का क्रियान्वयन भी किया है। यहां तक कि घरेलू हिंसा निरोधक कानून को भी अमल में लाया गया है। लेकिन दुःख की बात है कि महिलाओं के साथ भेदभाव का ग्राफ घटने के बजाय और अधिक बढ़ा है। बाहर से भले ही महिलाओं की स्थिति में सुधार के कुछ तत्व दिखाई दे रहे हों जैसे शिक्षा और नौकरियों में उनकी बढ़ती तादाद वगैरह। जनगणना 2011 में महिला-पुरूष लिंगानुपात में सुधार भी हुआ है लेकिन जब नज़र 0 से 6 वर्ष के बच्चों की आबादी पर पड़ती है तो हमें हैरान होना पड़ता है। क्योंकि इस आयु वर्ग में लिंगानुपात पिछले दस वर्षों में असंतुलित हुआ है। 2011 के आंकड़ों के अनुसार बाल लिंग अनुपात 2001 के 927 प्रति 1000 लड़कों की तुलना में 914 प्रति 1000 लड़के दर्ज किया गया। देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश में यह अनुपात 2001 के 916 से घटकर 899 दर्ज किया गया। जो राष्ट्रीय स्तर पर -1.40 के नाकारात्मक गिरावट से अधिक -1.86 प्रतिशत। इस असंतुलन को पिछले बीस वर्षों के शैक्षिक, सामाजिक, ग्रामीण और शहरी विकास के संदर्भ में रखकर देखा जाए तो पता चलता है कि विकास के नए सोपानों को तय करने के बाद भी लिंगभेद के विषय पर प्रगतिशील सोच विकसित करने में सफलता नहीं मिल सकी है। शायद यही कारण है कि 0 से 6 वर्ष आयु में लडकियों की संख्या कम हुई है।

यहां मकसद सरकारी और गैर सरकारी आकडों की प्रस्तुति नहीं है बल्कि सामाजिक संदर्भों में लड़कियों और महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव की घटनाओं मौजूदा सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में समझना है। विशेषकर उन घटनाओं को जिन्हें समाज भेदभाव मानता ही नहीं है।
पहला उदाहरण उन महिलाओं का जिन्हें घर दहलीज की ज़ीनत समझा जाता है। बेशक 21वीं सदी की दूसरी दहाई में कुछ महिलाओं के नाम जरूर सुने जाते हैं जो उच्च शिक्षा से लेकर व्यापार और राजनीति में अहम भूमिका निभा रही हैं। लेकिन यह सिक्के का एक पहलू है। दूसरा पहलू या तो हम देख नहीं पाते या हमें दिखाया नहीं जाता है। घर के अन्दर रहने वाली औरतों का दर्द सिक्के के इसी पहलू में छिपा होता है। सिक्के का यह पहलू सामाजिक मूल्यों, परंपराओं और संस्कृति के नाम पर छिपाया जाता रहा है।
महिलाओं के शोषण और उन पर होने वाले अत्याचारों को कम करने के लिए प्रीवेन्शन ऑफ डोमेस्टिक वाइलेन्स एक्ट, 2005 जैसा कानून भी प्रवर्तन में है। लेकिन 5 वर्ष बाद भी घरेलू हिंसा की घटनाओं में कोई खास कमी नहीं आई है। विभिन्न रूपों में होने वाला घरेलू हिंसा हर समाज की महिलाओं को झेलना पड़ता है। ये बात अलग है कि यह किसी स्थान पर कम और किसी जगह पर अधिक है। यदि उत्तर प्रदेश की बात करें तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश इस दृष्टि से अधिक संवेदनशील है। सामाजिक स्तरीकरण और धार्मिक मान्यताओं के आधार पर देखा जाए तो हर जाति और धर्म में घरेलू हिंसा किसी न किसी रूप में मौजूद है। जहां तक मुस्लिम समाज का संबंध है तो इस समाज की महिलाओं का जिक्र तलाक, हलाला और परदा से आगे नहीं बढ़ पाता है। बहस का इस दायरे तक सीमित रहना इस बात का प्रमाण है कि सूचना-तकनीक के दौर में शिक्षा, नौकरी और समाज व राजनीति में मुस्लिम महिलाओं की भूमिका काफी सीमित है। इसके कारणों पर विचार करने का पहला दायित्व समुदाय का है। समुदाय चिन्तन करता भी है लेकिन तलाक, हलाला और परदा से आगे नहीं निकल पाता है। इसका अर्थ कदापि यह नहीं है कि अन्य समाजों के लोग इस सवाल पर प्रगतिशील सोच रखते हैं। घरेलू हिंसा के विभिन्न रूपों, माध्यमों और तरीकों पर विभिन्न समुदायों और समाजों के लोगों में मौन सहमति और विलक्षण समानता है। यह समानता लिंग आधारित भेदभाव को बरतने का है। घरेलू हिंसा के विभिन्न स्वरूप प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों ही रूपों में महिला रूपी मनुष्य के अधिकारों के हनन के कारक होते हैं। कैसे संभव होता है कि एक ही छत के नीचे जन्मने वाले मानव जीवों को लैंगिक पहचान के आधार पर जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अवसर उपलब्ध कराए जाते हैं और अवसरों से वंचित रखा जाता है। लड़कों के मामले में अवसरों के तमाम दरवाजे खुले रखे जाते हैं। जो दरवाजे बन्द होते हैं उन्हें भी खोलने के लिए हर प्रयास किए जाते हैं। लेकिन लड़कियों के मामले में अवसरों के सीमित दरवाजे ही खोले जाते हैं। यह सब करता भी मनुष्य है। वह मनुष्य जो अपने बच्चों का सबसे बड़ा शुभचिन्तक होता है।
जाहिर है मां-बाप के फैसलों जिनमें पुरूष प्रधानता होती है, से कोई नवजात शिशु लड़का बना दिया जाता है और कोई लड़की। किसी हद तक वैज्ञानिक प्रगति ने भी सामाजिक जड़ता को बढ़ाया है। वैज्ञानिक प्रगति पुरूष सत्ता की मान्यताओं को कमजोर या खत्म करने में नाकाम रहा है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आज भी समाज मनोवैज्ञानिक स्तर पर पुरूष सत्ता के अनुरूप पुत्र-प्रेम और संतानोत्पत्ति से संबंधित पुराने विचारों से आजाद नहीं हो सका है। पुरूष वर्चस्व अपने आस्तित्व को वंश बढ़ाने के लिए बचाए रखने की कोशिश करता है। इस फैसले में महिलाओं की भी सहमति होती है। क्योंकि वह शिक्षित नहीं होती हैं। क्योंकि उन्हें शिक्षा के अवसरों से वंचित रखा जाता है। अवसरों के अभाव में महिलाएं समाजीकरण की प्रक्रिया से अलग-थलग रह जाती हैं। परिणाम स्वरूप उनकी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक भूमिका घर के रसोई तक सीमित रहती है।
लेकिन महिलाओं को रसोई तक सीमित रखने वाला पुरूष सत्तात्मक समाज यह नहीं सोचता की वह गाहे-बगाहे महिलाओं के श्रम से ही सामाजिक पूंजी खड़ी करता है। उदाहरण स्वरूप किसी के घर पर जब अतिथि आते हैं तो उन्हें चाय-पानी से लेकर स्वादिष्ट भोजन कराने और उनके जूठे बरतनों को साफ करने का दायित्व औरतों का ही होता है। इस काम में 8-10 साल की बच्चियां भी अपनी मां के साथ सहायिका की भूमिका में होती हैं।
यह बिन्दु विचारणीय है कि कोई माता-पिता अपनी ही सन्तान के साथ दोहरा रवैया क्यों अपनाता है? ऐसे दौर में जबकि शिक्षा और साक्षरता के ग्राफ में लगातार वृद्धि दर्ज की गयी है, तो ऐसे समय में लिंगभेद की घटनाएं भी निरन्तर बढ़ी हैं। यद्यपि शिक्षा के चलते “हम दो-हमारे दो” के साकारात्मक परिणाम जरूर आए हैं। लेकिन पढ़े-लिखे समाजों में भ्रूण हत्या की घटनाओं का बढ़ता ग्राफ लैंगिक भेदभाव की नयी कहानी बयान करता है। जनगणना 2011 के प्रोविजनल आंकड़े हमें और हमारी सोच को सचेत करने के लिए काफी हैं। यदि अब भी हम मान्यताओं और धारणाओं की कैद से बाहर नहीं निकलेंगे और बच्चियों के जन्म से संबंधित पूर्वाग्रहों को समाप्त करने के लिए जागरूक नहीं होंगे तो हमें बीस बरस बाद आने वाले भयावह परिणामों का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा। लिंगानुपात में असंतुलन कई पारिवारिक और सामाजिक परिस्थितियों व घटनाओं को जन्म देता है। ज्ञात हो कि पिछले एक दशक में वयस्क लिंगानुपात में कमोबेश बढ़ोत्तरी के बाद भी लिंगभेद का कांटा हमारे मन मस्तिष्क में कहीं फंसा है। इस कांटे को मन से निकालना नितान्त आवश्यक है। अन्यथा 0 से 6 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों में असंतुलित लिंगानुपात बीस बरस बाद न जाने कितने भयावह परिणामों को सामने लाएगा।

31-01-2012

Monday, December 26, 2011

कुछ शब्द लखनऊ पुलिस की तारीफ में


पिछली रात मेरी ट्रेन एक घण्टा बीस मिनट लेट थी। रात 12.20 बजे लखनऊ पहुंचने के बाद चार बाग रेलवे स्टेशन से प्री-पेड आॅटो द्वारा विकास नगर पहुंचा। मां भी साथ थीं। एक रजाई, दो बैग और एक झोला कुल मिलाकर चार सामान थे हम लोगों के साथ। हम लोग रात 1.00 बजे तक विकास नगर पहुंच तो गए लेकिन पैसा देने की जल्दी में एक झोला आॅटो में ही छूट गया। आॅटो वाला भी जल्दी में था। जबतक हमारी आवाज़ उसके कान तक पहुंचती उसके हाथ क्लच और गियर दबा चुके थे। खुर्रम नगर चैराहा और टेढ़ी पुलिया तक चक्कर काटने के बाद भी आॅटो वाला नहीं दिखाई दिया। वापस कमरा पर पहुंचकर प्री-पेड आॅटो सर्विस की भुगतान रसीद के पीछे लिखे फोन नम्बर पर सम्पर्क किया। चार बाग पुलिस कन्ट्रोल रूम का था। जिस व्यक्ति ने मेरा फोन रिसीव किया उन्हें मैंने अपना नाम, पता और मोबाइल नम्बर के अलावा भुगतान रसीद पर अंकित आॅटो का नम्बर और आटो चालक का नाम बताया। मुझे अगली सुबह मुझे चार बाग पुलिस स्टेशन पर आने के लिए कहा गया। 5 मिनट के अन्दर ही मेरे मोबाइल पर फोन करके बताया गया कि बैग खोने की बात प्री-पेड आॅटो पर तैनात व्यक्ति को बता दी गयी है। पता चलने पर मुझे सूचित किया जाएगा। पर ये क्या कि अभी ठीक से रात के दो भी नही ंबजे थे कि वह आॅटो, जिसमें मेरा बैग छूट गया था, वापस आ चुका था।
हम लोग हैरान रह गए कि क्या इतने कम समय में भी कोई विभाग या व्यक्ति किसी समस्या का संज्ञान लेता है। यकीन कीजिए ऐसा ही हुआ। मेरे मकान मालिक की नींद ज़रूर खराब हुई लेकिन पहली बार खाकी की तारीफ में मुझे शब्द ढ़ूंढ़ना पड़ रहा है और शब्द मिल नहीं रहे हैं।
वाक़ई लखनऊ पुलिस की तारीफ में आज बहुत कुछ कहने को जी चाहता है। मैं लखनऊ पुलिस का विशेषकर 25.12.2011 की मध्यरात्रि ड्यूटी पर तैनात उस पुलिस वाले बन्धु, जिनका नाम नहीं पूछ सका, का विशेष रूप से आभार और शुक्रिया अदा करता हंू।
इस घटना ने अबतक पुलिस महकमे के बुरे अनुभवों को भुलाने की वजह दे दी है। फिर भी पुराने अनुभव मेरे लेखन का हिस्सा बन चुके हैं इसलिए किसी न किसी रूप में अभिव्यक्त तो होंगे ही। खासकर इस घटना से आठ दिन पहले वाली घटना जब उसी प्री-पेड काउण्टर पर तैनात महकमे का व्यक्ति ने मुझसे यह कहकर अधिक पैसे की रसीद बनाने की कोशिश की थी कि मेरे साथ लेडिज है फिर भी मैं बहस कर रहा हूं। यह घटना 18.12.2011 की रात 10.25 बजे की है। बहरहाल इस वक्त मैं शिकायत नहीं प्रशंसा के मूड में हूं। एक बार फिर लखनऊ पुलिस को बधाई।
आटो चालक रवि जिसके आटो का नम्बर 5265 है का भी शुक्रिया इस उम्मीद के साथ कि यात्रियों के साथ अच्छा बरताव के लिए किसी आमिर खां के विज्ञापन की जरूरत न पड़े।

Monday, December 19, 2011

मुस्लिम आरक्षण: पसमांदा मुसलमानों पर नज़र


पिछले कुछ महीनों से मुस्लिम आरक्षण बहस का केन्द्रीय विषय बना हुआ है। छोटे-बड़े सभी दलों के नेताओं के बयान आ रहे हैं। बयानों में सच्चर और रंगनाथ की दुहाइयां दी जा रही हैं। कांग्रेसी सांसद सलमान खुर्शीद से लेकर आज़म खां, मुलायम सिंह, मुख्तार अब्बास नकवी जैसे नेता इस सवाल पर काफी गंभीर दिखाई दे रहे हैं। गंभीर हो रहे इस माहौल में तमिलनाडू और आन्ध्र प्रदेश का उद्धरण भी शामिल है, जहां पर सभी मुसलमानों के लिए आरक्षण का प्रावधान है। दक्षिणी राज्यों में मुसलमानों की स्थिति चाहे जैसी हो उत्तर भारत के मुसलमानों में या यूं कहें कि मुसलमानों में जाति स्तरीकरण की बात को सच्चर कमेटी ने स्वीकार किया है। यदि इस कमेटी ने स्वीकार नहीं भी किया होता तो भी इस सच्चाई को ठुकराना मुश्किल है कि मुसलमानों में जो पिछड़े हैं और वो जिनकी स्थिति दलितों के समान है, को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। भेदभाव का शिकार अजलाफ और अरजाल तबका पहले से ही आरक्षण के दायरे में है। आरक्षण के संदर्भ में दो बातें प्रासंगिक हैं। एक तो इस बात की जांच होनी चाहिए कि मण्डल के बावजूद पिछड़े मुसलमानों को उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण का लाभ क्यों नहीं पहुंचा? दूसरी बात यह कि दलित मुसलमानों को अनुसूचित जाति का दर्जा कब मिलेगा?
अल्पसंख्यक समुदाय की समस्याओं से इंकार नहीं है। साम्प्रदायिक आधार पर होने वाले भेदभाव भी पूरा देश अवगत है। लेकिन इस मर्ज की दवा आरक्षण नहीं बल्कि सियासत के मैदान में छुट्टे साँढ़ की तरह घूम रहे उन व्यक्तियों को जेल के अन्दर करना है जो कभी फांसीवादी एजेण्डे के तहत साम्प्रदायिक हिंसा करके अल्पसंख्यक समुदाय में भय पैदा करते हैं। जिसके कारण ईसाई, सिख के साथ-साथ देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय को शिक्षा और नौकरियों के अवसरों से स्वतः वंचित होना पड़ता है। विशेषकर अदृश्य रूप में व्याप्त सांप्रदायिक मानसिकता और इससे जनित हिंसा और परिणामस्वरूप पैदा होने वाली परिस्थिति पर अलग से नीति बनाने की जरूरत है। मुमकिन है आने वाले समय में प्रीवेन्शन आॅफ कम्यूनल वायलेन्स बिल से इस समस्या का कोई समाधान निकल आए। इसलिए आरक्षण के बहस को साम्प्रदायिक समुदाय के आइने में देखना उचित नहीं है। 
मण्डल लागू होने के समय से ही पसमांदा मुसलमान अर्थात अजलाफ और अरजाल ओ.बी.सी. के अन्तर्गत आरक्षण की श्रेणी में शामिल हंै। फिर उसके लिए अलग से आरक्षण की व्यवस्था की जरूरत क्या है? यह सवाल काफी प्रासंगिक है। क्योंकि इस सवाल का जवाब दिए बगैर पसमांदा मुसलमानों को आरक्षण की व्यवस्था बनाने की दिशा में पहल नहीं की जा सकती है। दरअसल आरक्षण का हक रखने वाले पसमांदा मुसलमानों को जिस अनुपात में लाभ पहुंचना चाहिए था, वो अबतक नहीं पहुंच सका है। पिछले बीस वर्षों में देश और दुनिया में बहुत से सामाजिक बदलाव हुए। लेकिन इस अवधि में तुलनात्मक रूप से पसमांदा मुसलमानों की शैक्षिक और सामाजिक स्थिति में कोई खास बदलाव भी नहीं आया। ज़ाहिर है इसके पीछे भेदभाव की मुख्य भूमिका रही है। इसलिए ओ.बी.सी. आरक्षण होने के बाद भी पसमांदा मुसलमान मुख्य धारा से जुड़ नहीं पाया है। यदि 6 प्रतिशत मुस्लिम आरक्षण की व्यवस्था हो जाती है तो इनकी स्थिति यूं ही बनी रहेगी।
चूंकि अगले साल चुनाव है इसलिए खुर्शीद के बयान को चुनावी स्टंट के रूप में भी देखा जा रहा है। सच्चाई चाहे जो हो सलमान ने बतौर मंत्री यहां तक कहा है कि अगले तीन महीनों में मुस्लिम आरक्षण को लागू कर दिया जाएगा। इसके लिए युद्ध स्तर पर कोशिश जारी है। लेकिन ऐसे आरक्षण का क्या तर्क जिससे शासक वर्ग को एक बार फिर से पिछड़ों के शोषण का अधिकार प्राप्त हो जाए। क्या खुर्शीद साहब नहीं जानते कि शैक्षिक और सामाजिक पिछड़ापन ही आरक्षण का संवैधानिक आधार हो सकता है। यह मुद्दा विचारणीय है। क्योंकि इस तरह का कोई भी कदम संघ परिवार जैसी सांप्रदायिक ताकतों के मुस्लिम अपीजमेंट के तर्क को जस्टीफाई करने वाला होगा। दूसरी तरफ आरक्षण के परिप्रेक्ष्य में पसमांदा मुसलमान की स्थिति वैसी ही बनी रहेगी जैसा मंडल के लागू होने से लेकर अबतक रही है। इसकी वजह भी साफ है। इस बात की गारण्टी कौन लेगा कि मुस्लिम समाज के ही चन्द मुट्ठी भर लोग मुस्लिम आरक्षण के नाम पर पसमांदा मुसलमानों का हक नहीं मारेंगे। ग़ौर तलब है कि अबतक चन्द मुट्ठी भर सामन्ती हैसियत रखने वाले मुसलमान ही तमाम मुसलमानों के नाम पर अपने अनुसार राजकाज की गतिविधियां चलाते आए हैं और पसमांदा मुसलमानों के जीवन से संबंधित तमाम फैसले करते आए हैं।
शिल्पकार टाइम्स, 16-31 दिसम्बर 2011

Friday, November 18, 2011

क्या विकास का कोई रास्ता पीरनपुर भी जाता है...?

गलियां...... गलियों में बिखरे कूड़ों के ढे़र....., घर..... घरों में मनुष्य और बकरियों का एक साथ उठना-बैठना, ड्राइंग रूम, बेडरूम, गेस्ट रूम और कीचेन सभी का एक साथ होना....., अपने गांव-घर से अलग लगता है। इस अलगाव में ढे़रों सवाल घूमड़ते हुए बादल की तरह मेरे मन को बेचन करते हैं। सवालों के बीच यह सवाल भी कि “क्या विकास का कोई रास्ता पीरनपुर भी जाता है...?”

जब विकास और संवृद्धि के नए-नए रिकार्ड कायम हो रहे हैं, तो ऐसे में यह सवाल लाज़मी हो जाता है कि लोकतंत्रीकरण और सामाजिक न्याय का ग्राफ कितना ऊपर उठा? केन्द्र और राज्य की दर्जनों योजनाओं का लाभ वंचित समुदाय तक किस हद तक पहुंचा? कम्यूटरीकरण से पारदर्शिता बढ़ी है लेकिन दलितों और मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा विभिन्न विभागों की कम्प्यूटरीकृत सूचियों से गायब है। ऐसी आबादी पर सरकारी अमले की नज़र पड़ती ही नहीं। ग्रामीण तो छोडि़ए शहरी इलाकों में भी ऐसी बस्तियां और मुहल्ले हैं जहां उपभोक्तावाद अपनी उपस्थिति दर्ज कर चुका है लेकिन विकास का नामों निशान तक नहीं है। इस संदर्भ में फतेहपुर जिला के पीरनपुर मोहल्ला में स्थित रिफ्युजी कालोनी के पीछे वाली बस्ती का जि़क्र प्रासंगिक हो जाता है।
फतेहपुर भौगोलिक रूप से इलाहाबाद और कानपुर के बीच स्थित है। फतेहपुर के पूरब में ‘‘पूरब का आॅक्सफोर्ड, इलाहाबाद है तो उत्तर-पश्चिम दिशा में उद्योगों और कारखानों की नगरी कानपुर है। उत्तर दिशा में प्रदेश की राजधानी लखनऊ है 135 किमी॰ की दूरी पर स्थित है। फतेहपुर से इन तीनों ही शहरों के लिए सड़क यातायात की अच्छी सुविधा है। हर आधे घण्टे के अंतराल पर बस मिल जाती है। लेकिन फतेहपुर में कुछ बस्तियां ऐसी भी हैं जहां तक इस जिला के भौगोलिक स्थिति का लाभ नहीं पहुंच पाता। ऐसी बस्तियों के लोग देश और दुनिया की घटनाओं और परिघटनाओं से बेखबर गन्दगी और बदबू में रहने को विवश हैं। कई कालोनियों में बंटे इस मोहल्ला पीरनपुर में एक कालोनी का नाम रिफ्यूजी कालोनी है। इस कालोनी के ठीक पीछे एक बस्ती है। इस बस्ती में मुस्लिम आबादी का बाहुल्य है। मुख्य सड़क से रिफ्यूजी कालोनी होकर बस्ती की ओर जाने वाली गली जहां मुड़ती है वहां से मुस्लिम बाहुल्य बस्ती शुरू हो जाती है। बस्ती में दाखिल होते ही कीचड़ की चादर में लिपटी आर.सी.सी. गलियों का राज खुलने लगता है। मौसम बारिश का हो तो नालियों के मेढ़ों पर चलते समय कभी भी पैर फिसलने और चोट पहुंचने का खतरा बना रहता है। पिछले हफ्ते जिस महिला के पैर में मोच आया था उसकी वजह जल-जमाव ही थी।
आश्चर्य होता है कि रिफ्यूजी कालोनी तक न गन्दगी है और न ही दुर्गन्ध। दुःख होता है कि एक तरफ सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान चल रहा है वहीं पीरनपुर बस्ती कूड़ों से पटा हुआ है। थोड़ी सी बारिश यहां जल-जमाव के लिए काफी है। उसपर से बदबू ऐसी कि खास को तो छोडि़ए आम लोंगों के लिए भी यहां रूकना मुश्किल काम है। जिला मुख्यालय पर स्थित यह बस्ती सड़क, स्वास्थ्य और सफाई आदि योजनाओं/अभियानों के शुरू होने से पहले की कहानी बयान करती है। उस दौर की जब गांव सम्पर्क मार्ग से जुड़े नहीं थे और ग्रामीण जीवन मुख्य धारा के नगरीय जीवन से कटा हुआ था। पीरनपुर इस धारा से आज भी कटा हुआ है। कुछ ऐसे कि मानव विकास के तीनों सूचकांकों पर यहां के लोग धड़ाम से गिर गए से प्रतीत होते हैं। गन्दगी के कारण कालरा, डायरिया, और श्वास संबंधी गंभीर बीमारियां गाहे-बगाहे दस्तक देती रहती हैं। लेकिन इस बस्ती के लोग इस बात से भी बेखबर हैं कि उनके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता क्यों कम है, उनकी बस्तियों की कुछ जवान महिलाएं बेवा क्यों है और बच्चे यतीम क्यों हैं?
दर असल विकास का जो दूसरा सूचकांक है ‘शिक्षा’ वह तो यहां नगण्य है। कहने को प्राथमिक विद्यालय है लेकिन कूड़ों और कीचड़ों के दलदल से घिरे विद्यालय में बच्चों को एम.डी.एम. मिल जाए तो बहुत है। यही हाल हाई स्कूल और इण्टरमीडिएट स्तर की शिक्षा का भी है। कक्षा 5 और 8 तक पढ़ लेना इस बस्ती के बच्चों के लिए बड़ी उपलब्धि है। कक्षा 10 की छात्रा यासमीन के अनुसार उनकी कक्षा और कोर्स क्लास मानीटर के भरोसे ही चलता है। शिकायत करें भी तो किससे सभी मैडम न जाने कहां रहती हैं? तीन-चार सौ रूपए की फीस दे पाना ऐसी लड़कियों के लिए पहाड़ तोड़ने जैसा होता है, जो पढ़ना चाहती हैं। फीस ही नहीं काॅपी-कलम और किताबों पर छाई मंहगाई इनके बचे-खुचे अरमानों पर भी पानी फेर देता है। ऐसी स्थिति पीरनपुर बस्ती की पढ़ाई में दिलचस्पी रखने वाली लड़कियों को शिक्षा के अवसरों से वंचित करने के लिए काफी होती है। ऐसी लडकियां अपने परिवार की आजीविका लिए कढ़ाई का काम सीखती हैं। लेकिन कक्षा आठ के बाद पढ़ाई छोड़ चुकी रूखसाना बताती हैं कि “कढ़ाई का हुनर भी बेकार साबित हो रहा है, क्योंकि उनके लिए काम नहीं है।” यदि उम्र छोटी है तो लड़कियां भी अपने भाईयों के साथ कूड़ा बिनती हैं या फिर अपनी माँ-बहन के साथ झाडू़-बरतन करती हैं।
उक्त संदर्भ में मानव विकास का तीसरा सूचकांक यानि आर्थिक स्थिति भी मुंह चिढ़ाता नज़र आता है। इस सूचकांक पर भी बस्ती की स्थिति असंतोषजनक है। लड़कियों की तरह लड़के भी आजीविका चलाने के लिए काम करते हैं। कोई ऐसा वैसा काम नहीं कि करने बाद हाथ-मुंह धो लिया और हो गया। पूरी बस्ती की आजीविका मुख्यतः कूड़ा कारोबार पर निर्भर है। सुबह होते ही इस बस्ती के बच्चे और बड़े कूड़ा की खोज में निकल जाते हैं और शाम ढ़लने के बाद ही वापस आते हैं। यदि सामाजिक असुरक्षा नहीं होती तो जवान होती लड़कियां भी कढ़ाई के बदले कूड़ा बिनने का ही हुनर सीखतीं। बस्ती में जगह-जगह फैली-बिखरी कूड़े की छोटी-बड़ी बोरियां अपनी दुर्गन्ध से आगन्तुकों को अपनी बेबसी का हाल बताती हैं। हैरानी होती है कि कूड़े के ढे़र पर रहने वाले पीरनपुर वासियों को यह दुर्गन्ध लेश मात्र भी महसूस नहीं होती है। याद आया गज़म्फ़र का उपन्यास “दिव्यवाणी” जो मूलतः उर्दू में लिखा गया है। इस उपन्यास का वह कथानक जिसमें प्रेमी अपनी दलित प्रेमिका को गुलाब की खुशबू से रूबरू कराता है तो उसकी प्रेमिका को गुलाब की खुशबू किसी दुर्गन्ध के समान लगती है। क्योंकि नालियों और बजबजाती गलियों की दुर्गन्ध की आदत ही उसके लिए सुगन्ध होती है। उसके सौन्दर्यबोध की कसौटी पर गुलाब की खुशबू दुर्गन्ध समान होती है। शायद ऐसा इसलिए होता है कि उस लड़की को कभी अवसर ही नहीं मिला कि वो अपनी बस्ती से बाहर के वातावरण और घटनाओं के बारे में तनिक भी सोचे। तो क्या गन्दगी से बजबजाती गलियों की दुर्गन्ध में ही पीरनपुर वासियों का भी सौन्दर्यबोध छुपा हुआ है? यदि ऐसा है तो फिर इसे इस दौर की घटना नहीं बल्कि महापरिघटना कहा जाना चाहिए है। जिसका एक सिरा वैदिक इतिहास से तो दूसरा सिरा समकालीन सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों से जुड़ा है।
पीरनपुर जैसी बस्तियों की कमी नहीं है इस देश में। आमतौर पर यह कहकर मामला टाल दिया जाता है कि जहां मुसलमान रहते हैं वहां के हालात ऐसे ही होते हैं यानि गन्दगी-बदबू और मुसलमानों का चोली-दामन का साथ है। लेकिन यह भी तो मुमकिन है कि जिन मुसलमानों का तादाम्य गन्दगी और बदबू जैसी भ्रान्तियों से जोड़ा जाता है वो मुसलमान ऐसी बस्तियों में रहने के लिए ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से मजबूर हों। सरकारी-गैर सरकारी संसाधनों की बांट जोह रहे हों। सरकारी दफ्तरों की दीवारों पर ढे़रों योजनाओं की लम्बी सूचियां पढ़ी जा सकती हैं। मौजूदा कारपोरेट दौर में बड़े-बड़े होर्डिंग्स भी देखे जा सकते हैं, जिनपर विकास योजनाओं के बारे में स्पष्ट जानकारियां होती हैं। फिर पीरनपुर निवासी सरकारी योजनाओं की पहुंच से वंचित क्यों हैं?
एक बेहतर कल के सपने कौन नहीं देखता। झाड़ू-पोछा और बर्तन-चाकी करके दूसरे के घरो को चमकाने वाली महिलाओं के गन्दगी, कीचड़ और बदबू के बीच रहने के पीछे पहली वजह यह है कि उनकी इतनी क्षमता नहीं है कि स्थान परिवर्तन करके किसी दूसरी बस्ती या मुहल्ला में बस जाएं। दूसरी वजह यह कि कूड़ा बिनना इनके परिवारों की आजीविका का मुख्य साधन है। करें भी तो क्या करें, इनकी बस्ती शहरी क्षेत्र में है और डूडा (District Urban Development Agency) के माध्यम से क्रियान्वित किसी भी योजना की पहुंच से दूर है। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण यह कि उपलब्ध सरकारी योजनाओं का लाभ इन तक नहीं पहुंच पाता। शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई, सड़क, आवास किसी भी योजना तक पीरनपुर जैसी बस्तियों में रहने वाले मुसलमानों की पहुंच नहीं है। 35 वर्षीय नरगिस अपना दुःख व्यक्त करते हुए कहती हैं कि “बड़े-बड़े लोगों का बी.पी.एल. कार्ड बन चुका है लेकिन उनका कार्ड अबतक नहीं बन सका है। तहसील, कचहरी, नगरपालिका जा नहीं सकती। वार्ड सभासद से कई बार कहा। लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं है।” कुछ मामलों में तो इस बस्ती के लोग नागरिकता की बुनियादी पहचान यानि राशन कार्ड के साथ-साथ वोटर कार्ड (मतदाता पहचान पत्र) से भी वंचित हैं।
पीरनपुर से वापस आ चुका हूँ लेकिन मन है कि बार-बार वहीं भागता है। गलियां...... गलियों में बिखरे कूड़ों के ढे़र....., घर..... घरों में मनुष्य और बकरियों का एक साथ उठना-बैठना, ड्राइंग रूम, बेडरूम, गेस्ट रूम और कीचेन सभी का एक साथ होना....., अपने गांव-घर से अलग लगता है। इस अलगाव में ढे़रों सवाल घूमड़ते हुए बादल की तरह मेरे मन को बेचन करते हैं। सवालों के बीच यह सवाल भी कि “क्या विकास का कोई रास्ता पीरनपुर भी जाता है...?”
SHILPKAR TIMES, 16-30 NOVEMBER, 2011

Friday, November 4, 2011

बाज़ार के हाथ परिवार, समाज और देश की खु़शियाँ

पिछले कुछ महीनों से भारत में गरीबी और गरीबी निर्धारित करने वाले मानकों पर बहस तेज है। अर्थशास्त्री एस॰डी॰ तेन्दुलकर समिति की रिपोर्ट के अनुसार भारत में गरीबी दर 37.2 प्रतिशत है। योजना आयोग द्वारा जारी 2006 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में गरीबी दर 28.5 प्रतिशत है। गरीबों की संख्या में 8.7 प्रतिशत की वृद्धि की वजह तेन्दुलकर समिति द्वारा गरीबी मापने के लिए नयी विधि का अपनाया जाना है। बात यहीं खत्म नहीं होती एन॰सी॰ सक्सेना समिति की रिपोर्ट पर विश्वास करें तो यह दर 50 प्रतिशत से भी ऊपर पहुंच सकता है। जाहिर है गरीबी रेखा तय करने की हर युक्ति चाहे प्रति व्यक्ति प्रति दिन पोषण प्राप्ति की हो या प्रति व्यक्ति प्रति दिन आय की हो, निश्चित तौर पर गरीबों की संख्या में वृद्धि हुई है। अर्थव्यवस्था पर नज़र डालें तो आर्थिक विकास दर 7 से 8 अंकों के बीच घट-बढ़ रहा है। अंकों के उतार-चढ़ाव में धन की अपार वर्षा भी हो रही है। राजधानी दिल्ली और लखनऊ में सोना-चाँदी और दूसरे आभूषणों की हजारों टन की बिक्री भारत में गरीबी, इसके मानकों और गरीबों की संख्या पर प्रश्न खड़े कर रहे हैं। लेकिन यह प्रश्न भी अनुत्तरित नहीं रह गया है। क्योंकि ऐसे तथ्य प्रकाश में आ चुके हैं कि 20 प्रतिशत लोगों का ही 80 प्रतिशत संसाधनों पर आधिपत्य है। इसमें भी बाजारपरस्तों की पकड़ कुछ ज़्यादा ही मज़बूत है। शायद ही कोई अखबार या न्यूज़ चैनल हो जो पिछले एक सप्ताह से उपभोग की तरह-तरह के लुभावने विज्ञापनों से धनवर्षा की दावत न दे रहे हों। स्थिति कुछ ऐसी है कि अखबार के फ्रण्ट पेज पर विभिन्न महिला/पुरूष माडलों के मुस्कराते चेहरों और किसी उत्पाद की चमक-दमक में देश-दुनिया की कोई खबर ढ़ूंढ़ना दिक्कत तलब है।
अच्छी बात है पर्वों पर धूम-धाम तो होना ही चाहिए। धनवर्षा का पर्व शहर से लेकर गांव तक हर जगह समान रूप से मनाया जाता है। इस पर्व की मान्यता तो मुसलमानों, पंजाबियों और ईसाइयों आदि अल्पसंख्यक समुदायों में भी बड़े पैमाने पर है। यानि इस पर्व का साम्प्रदायिक सौहार्द्र वाला पक्ष महत्वपूर्ण है। लेकिन क्या इस सवाल पर भी गौर किया जाता है कि हमारे पर्व बाजारवाद की दृष्टि से कैसे होते हैं? मध्यम वर्ग का व्यक्ति बस इतना ही कह पाता है कि मंहगाई ने त्योहारों का मज़ा फीका कर दिया है। निम्न वर्ग को इतनी समझदारी और समझ कहाँ है कि वो कम से कम इतना भी सोच सके। ईद, दशहरा, होली या दीपावली हर पर्व बाजारवाद के लिए मुनाफाखोरी और मिलावटखोरी को बढ़ाने का माध्यम बन चुका है। फिर भी धन की वर्षा आश्चर्य का विषय नहीं है और न ही बाजार के प्रत्यक्ष-परोक्ष प्रभावों पर ध्यान है। क्योंकि संबन्धित खबरें बाजार से निकलकर आती हैं और फिर बाजार में ही समाहित हो जाती हैं। गौर करने की बात यह है कि जो खबरें या अन्य संकल्पनाएं बाजार की कोख से जन्म लेती हैं उन पर देश का कोई कानून लागू नहीं होता। यही कारण है कि बाजार मानवीय संवेदनाओं पर आर्थिक संसाधनों के नियोजन के विपरीत आभूषणों-रत्नों और पटाखों पर पानी की तरह लाखों-करोणों रूपए खर्च करने के लिए प्रेरित कर रहा है। आज परिवार, समाज और देश की खुशिया बाजार के हाथ हैं।
संवृद्धि और विकास का संतुलन देखिए। ग्लोबल आर्थिक संकट के दौर में आर्थिक विकास दर जी॰डी॰पी॰ का 7 प्रतिशत रहने की उम्मीद जताई जा रही है। फिर भी भूखे, वस्त्रविहीन और छत विहीन आबादी बढ़ती जा रही है। जबकि केन्द्र और राज्य स्तर पर रोजगार, स्वास्थ्य और आवास योजनाएं भी चलाई जा रही हैं। बुद्धिजीवियों की बात छोडि़ए खुद एन॰सी॰ सक्सेना की रिपोर्ट देखिए जिसमें स्पष्ट उल्लेख है कि भारत में 50 प्रतिशत से अधिक लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। लेकिन बाज़ारवाद के क्या कहने हैं, सुविधाभोग के उद्देश्य के लिए अधिक खर्च करने का गुण तो कोई बाजारवादियों से सीखे। फिर खर्च करने के लिए अधिक धन संचय भी तो जरूरी है। वरना आधुनिक दौर का कौन बनिया/साहूकार चारा डालेगा। आभूषण से लेकर बाइक, कैमरा, टी॰वी॰, मोबाइल सबकुछ फ्री वाले आॅफर के साथ। इसके बाद भी आत्मिक संतुष्टि न प्राप्त हो तो सरकारी संसाधनों में भी हिस्सेदारी सुनिश्नित करना कोई मुश्किल काम नहीं है। गांधी जी का मुस्काराता चेहरा दफ्तर के किस बाबू को पसंद नहीं! फिर बाबू को मुस्कराते गांधी के चित्र वाले नोट और अपात्रों को बी॰पी॰एल॰/अंत्योदय अन्न योजना कार्ड आदि की सुविधा आसानी से उपलब्ध हो जाती है। एन॰सी॰ सक्सेना अपनी रिपोर्ट में लिखते हैं कि देश में केवल 49.1 प्रतिशत गरीबों के ही बी॰पी॰एल॰/अंत्योदय कार्ड बने हैं। जबकि 17.4 प्रतिशत धनी लोग भी बी॰पी॰एल॰/अंत्योदय कार्ड का लाभ उठा रहे हैं। क्या बात है! बुराई का अन्त करते-करते हम इतने बुरे बन चुके हैं कि ज़रूरतमंदों का हक मारने में थोड़ा भी नहीं हिचकिचाते। जब जरूरतमंद सरकारी विभागों में कार्ड बनवाने की अर्जी देते हैं तो उन्हें यह भरोसा दिलाया जाता है कि ‘‘कार्ड बनने बंद हो चुके हैं, अगले साल फरवरी या मार्च में ही बन पाएंगे।’’ कोई पूछे नीति निर्धारकों और नीति नियंताओं से कि ऐसे दिलासों की समय अवधि के बीच क्या किसी बी॰पी॰एल॰/अंत्योदय कार्ड और वृद्ध/विधवा या विकलांग पेंशन के लिए पात्र व्यक्तियों की आवश्यकताएं ठहर सी जाती हैं?
मजबूत पक्ष यह भी है कि बढ़ती महंगाई, बढ़ता खर्च, अधिक आय की महत्वाकांक्षा विकास दर और मुद्रा स्फीति का घटना-बढ़ना आदि सबकुछ बाजारवादी ताकतों द्वारा संचालित किए जा रहे है। इस प्रक्रिया में हमारी योजनाओं की रूपरेखा तय करने वाली लोकतांत्रिक संस्थाएं भी बाजारवाद के प्रभाव से बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं। तभी तो हक मारने वालों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। दूसरी तरफ गरीबी को परिभाषित करने में भी तमाम तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। 1974 से 1979 के पांचवी पंचवर्षीय योजना का प्रमुख लक्ष्य ही था ‘‘गरीबी हटाना’’। गरीबी ऐसी हटी कि भूख और बेकारी के कारण विस्थापन और आत्महत्याओं का दौर शुरू हो गया। विशेषकर 1991 के बाद संदर्भ देखें तो बात आन्ध्र और महाराष्ट्र के किसानों की हो या उड़ीसा में आम की गुठली और मेंढ़क उबालकर खाने वाले लोगों की हो या फिर बनारस में खून, जमीन और अपने कलेजे के टुकड़ों तक को बेच देने वाले बुनकरों की हो, हर जगह निर्धनता और अभाव का बोलबाला रहा है। फिर भी हमारे देश के नीति निर्धारकों को गरीबों की पहचान और बाजारवाद की यातनाओं का अनुभव नहीं हो पा रहा है।
हजार टन सोना और करोणों के पटाखों के क्रय-विक्रय के इस दौर में गैर बराबरी की भावना पर आधारित बाजारवाद की चुनौतियां कठिन हैं। इन चुनातियों का सामना करना निहत्थों अर्थात गरीबों के लिए और भी कठिन है। समय है कि बाजादपरस्तों की जमात में शामिल होने के बजाए इस दीपावली के अवसर पर दीपों की ऐसी श्रृंखला प्रज्जवलित की जाए जिसका प्रकाश गरीबों-वंचितों तक भी पंहुच सके।
Shilpkar Times, 1-15 November, 2011