Monday, December 26, 2011

कुछ शब्द लखनऊ पुलिस की तारीफ में


पिछली रात मेरी ट्रेन एक घण्टा बीस मिनट लेट थी। रात 12.20 बजे लखनऊ पहुंचने के बाद चार बाग रेलवे स्टेशन से प्री-पेड आॅटो द्वारा विकास नगर पहुंचा। मां भी साथ थीं। एक रजाई, दो बैग और एक झोला कुल मिलाकर चार सामान थे हम लोगों के साथ। हम लोग रात 1.00 बजे तक विकास नगर पहुंच तो गए लेकिन पैसा देने की जल्दी में एक झोला आॅटो में ही छूट गया। आॅटो वाला भी जल्दी में था। जबतक हमारी आवाज़ उसके कान तक पहुंचती उसके हाथ क्लच और गियर दबा चुके थे। खुर्रम नगर चैराहा और टेढ़ी पुलिया तक चक्कर काटने के बाद भी आॅटो वाला नहीं दिखाई दिया। वापस कमरा पर पहुंचकर प्री-पेड आॅटो सर्विस की भुगतान रसीद के पीछे लिखे फोन नम्बर पर सम्पर्क किया। चार बाग पुलिस कन्ट्रोल रूम का था। जिस व्यक्ति ने मेरा फोन रिसीव किया उन्हें मैंने अपना नाम, पता और मोबाइल नम्बर के अलावा भुगतान रसीद पर अंकित आॅटो का नम्बर और आटो चालक का नाम बताया। मुझे अगली सुबह मुझे चार बाग पुलिस स्टेशन पर आने के लिए कहा गया। 5 मिनट के अन्दर ही मेरे मोबाइल पर फोन करके बताया गया कि बैग खोने की बात प्री-पेड आॅटो पर तैनात व्यक्ति को बता दी गयी है। पता चलने पर मुझे सूचित किया जाएगा। पर ये क्या कि अभी ठीक से रात के दो भी नही ंबजे थे कि वह आॅटो, जिसमें मेरा बैग छूट गया था, वापस आ चुका था।
हम लोग हैरान रह गए कि क्या इतने कम समय में भी कोई विभाग या व्यक्ति किसी समस्या का संज्ञान लेता है। यकीन कीजिए ऐसा ही हुआ। मेरे मकान मालिक की नींद ज़रूर खराब हुई लेकिन पहली बार खाकी की तारीफ में मुझे शब्द ढ़ूंढ़ना पड़ रहा है और शब्द मिल नहीं रहे हैं।
वाक़ई लखनऊ पुलिस की तारीफ में आज बहुत कुछ कहने को जी चाहता है। मैं लखनऊ पुलिस का विशेषकर 25.12.2011 की मध्यरात्रि ड्यूटी पर तैनात उस पुलिस वाले बन्धु, जिनका नाम नहीं पूछ सका, का विशेष रूप से आभार और शुक्रिया अदा करता हंू।
इस घटना ने अबतक पुलिस महकमे के बुरे अनुभवों को भुलाने की वजह दे दी है। फिर भी पुराने अनुभव मेरे लेखन का हिस्सा बन चुके हैं इसलिए किसी न किसी रूप में अभिव्यक्त तो होंगे ही। खासकर इस घटना से आठ दिन पहले वाली घटना जब उसी प्री-पेड काउण्टर पर तैनात महकमे का व्यक्ति ने मुझसे यह कहकर अधिक पैसे की रसीद बनाने की कोशिश की थी कि मेरे साथ लेडिज है फिर भी मैं बहस कर रहा हूं। यह घटना 18.12.2011 की रात 10.25 बजे की है। बहरहाल इस वक्त मैं शिकायत नहीं प्रशंसा के मूड में हूं। एक बार फिर लखनऊ पुलिस को बधाई।
आटो चालक रवि जिसके आटो का नम्बर 5265 है का भी शुक्रिया इस उम्मीद के साथ कि यात्रियों के साथ अच्छा बरताव के लिए किसी आमिर खां के विज्ञापन की जरूरत न पड़े।

Monday, December 19, 2011

मुस्लिम आरक्षण: पसमांदा मुसलमानों पर नज़र


पिछले कुछ महीनों से मुस्लिम आरक्षण बहस का केन्द्रीय विषय बना हुआ है। छोटे-बड़े सभी दलों के नेताओं के बयान आ रहे हैं। बयानों में सच्चर और रंगनाथ की दुहाइयां दी जा रही हैं। कांग्रेसी सांसद सलमान खुर्शीद से लेकर आज़म खां, मुलायम सिंह, मुख्तार अब्बास नकवी जैसे नेता इस सवाल पर काफी गंभीर दिखाई दे रहे हैं। गंभीर हो रहे इस माहौल में तमिलनाडू और आन्ध्र प्रदेश का उद्धरण भी शामिल है, जहां पर सभी मुसलमानों के लिए आरक्षण का प्रावधान है। दक्षिणी राज्यों में मुसलमानों की स्थिति चाहे जैसी हो उत्तर भारत के मुसलमानों में या यूं कहें कि मुसलमानों में जाति स्तरीकरण की बात को सच्चर कमेटी ने स्वीकार किया है। यदि इस कमेटी ने स्वीकार नहीं भी किया होता तो भी इस सच्चाई को ठुकराना मुश्किल है कि मुसलमानों में जो पिछड़े हैं और वो जिनकी स्थिति दलितों के समान है, को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। भेदभाव का शिकार अजलाफ और अरजाल तबका पहले से ही आरक्षण के दायरे में है। आरक्षण के संदर्भ में दो बातें प्रासंगिक हैं। एक तो इस बात की जांच होनी चाहिए कि मण्डल के बावजूद पिछड़े मुसलमानों को उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण का लाभ क्यों नहीं पहुंचा? दूसरी बात यह कि दलित मुसलमानों को अनुसूचित जाति का दर्जा कब मिलेगा?
अल्पसंख्यक समुदाय की समस्याओं से इंकार नहीं है। साम्प्रदायिक आधार पर होने वाले भेदभाव भी पूरा देश अवगत है। लेकिन इस मर्ज की दवा आरक्षण नहीं बल्कि सियासत के मैदान में छुट्टे साँढ़ की तरह घूम रहे उन व्यक्तियों को जेल के अन्दर करना है जो कभी फांसीवादी एजेण्डे के तहत साम्प्रदायिक हिंसा करके अल्पसंख्यक समुदाय में भय पैदा करते हैं। जिसके कारण ईसाई, सिख के साथ-साथ देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय को शिक्षा और नौकरियों के अवसरों से स्वतः वंचित होना पड़ता है। विशेषकर अदृश्य रूप में व्याप्त सांप्रदायिक मानसिकता और इससे जनित हिंसा और परिणामस्वरूप पैदा होने वाली परिस्थिति पर अलग से नीति बनाने की जरूरत है। मुमकिन है आने वाले समय में प्रीवेन्शन आॅफ कम्यूनल वायलेन्स बिल से इस समस्या का कोई समाधान निकल आए। इसलिए आरक्षण के बहस को साम्प्रदायिक समुदाय के आइने में देखना उचित नहीं है। 
मण्डल लागू होने के समय से ही पसमांदा मुसलमान अर्थात अजलाफ और अरजाल ओ.बी.सी. के अन्तर्गत आरक्षण की श्रेणी में शामिल हंै। फिर उसके लिए अलग से आरक्षण की व्यवस्था की जरूरत क्या है? यह सवाल काफी प्रासंगिक है। क्योंकि इस सवाल का जवाब दिए बगैर पसमांदा मुसलमानों को आरक्षण की व्यवस्था बनाने की दिशा में पहल नहीं की जा सकती है। दरअसल आरक्षण का हक रखने वाले पसमांदा मुसलमानों को जिस अनुपात में लाभ पहुंचना चाहिए था, वो अबतक नहीं पहुंच सका है। पिछले बीस वर्षों में देश और दुनिया में बहुत से सामाजिक बदलाव हुए। लेकिन इस अवधि में तुलनात्मक रूप से पसमांदा मुसलमानों की शैक्षिक और सामाजिक स्थिति में कोई खास बदलाव भी नहीं आया। ज़ाहिर है इसके पीछे भेदभाव की मुख्य भूमिका रही है। इसलिए ओ.बी.सी. आरक्षण होने के बाद भी पसमांदा मुसलमान मुख्य धारा से जुड़ नहीं पाया है। यदि 6 प्रतिशत मुस्लिम आरक्षण की व्यवस्था हो जाती है तो इनकी स्थिति यूं ही बनी रहेगी।
चूंकि अगले साल चुनाव है इसलिए खुर्शीद के बयान को चुनावी स्टंट के रूप में भी देखा जा रहा है। सच्चाई चाहे जो हो सलमान ने बतौर मंत्री यहां तक कहा है कि अगले तीन महीनों में मुस्लिम आरक्षण को लागू कर दिया जाएगा। इसके लिए युद्ध स्तर पर कोशिश जारी है। लेकिन ऐसे आरक्षण का क्या तर्क जिससे शासक वर्ग को एक बार फिर से पिछड़ों के शोषण का अधिकार प्राप्त हो जाए। क्या खुर्शीद साहब नहीं जानते कि शैक्षिक और सामाजिक पिछड़ापन ही आरक्षण का संवैधानिक आधार हो सकता है। यह मुद्दा विचारणीय है। क्योंकि इस तरह का कोई भी कदम संघ परिवार जैसी सांप्रदायिक ताकतों के मुस्लिम अपीजमेंट के तर्क को जस्टीफाई करने वाला होगा। दूसरी तरफ आरक्षण के परिप्रेक्ष्य में पसमांदा मुसलमान की स्थिति वैसी ही बनी रहेगी जैसा मंडल के लागू होने से लेकर अबतक रही है। इसकी वजह भी साफ है। इस बात की गारण्टी कौन लेगा कि मुस्लिम समाज के ही चन्द मुट्ठी भर लोग मुस्लिम आरक्षण के नाम पर पसमांदा मुसलमानों का हक नहीं मारेंगे। ग़ौर तलब है कि अबतक चन्द मुट्ठी भर सामन्ती हैसियत रखने वाले मुसलमान ही तमाम मुसलमानों के नाम पर अपने अनुसार राजकाज की गतिविधियां चलाते आए हैं और पसमांदा मुसलमानों के जीवन से संबंधित तमाम फैसले करते आए हैं।
शिल्पकार टाइम्स, 16-31 दिसम्बर 2011

Friday, November 18, 2011

क्या विकास का कोई रास्ता पीरनपुर भी जाता है...?

गलियां...... गलियों में बिखरे कूड़ों के ढे़र....., घर..... घरों में मनुष्य और बकरियों का एक साथ उठना-बैठना, ड्राइंग रूम, बेडरूम, गेस्ट रूम और कीचेन सभी का एक साथ होना....., अपने गांव-घर से अलग लगता है। इस अलगाव में ढे़रों सवाल घूमड़ते हुए बादल की तरह मेरे मन को बेचन करते हैं। सवालों के बीच यह सवाल भी कि “क्या विकास का कोई रास्ता पीरनपुर भी जाता है...?”

जब विकास और संवृद्धि के नए-नए रिकार्ड कायम हो रहे हैं, तो ऐसे में यह सवाल लाज़मी हो जाता है कि लोकतंत्रीकरण और सामाजिक न्याय का ग्राफ कितना ऊपर उठा? केन्द्र और राज्य की दर्जनों योजनाओं का लाभ वंचित समुदाय तक किस हद तक पहुंचा? कम्यूटरीकरण से पारदर्शिता बढ़ी है लेकिन दलितों और मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा विभिन्न विभागों की कम्प्यूटरीकृत सूचियों से गायब है। ऐसी आबादी पर सरकारी अमले की नज़र पड़ती ही नहीं। ग्रामीण तो छोडि़ए शहरी इलाकों में भी ऐसी बस्तियां और मुहल्ले हैं जहां उपभोक्तावाद अपनी उपस्थिति दर्ज कर चुका है लेकिन विकास का नामों निशान तक नहीं है। इस संदर्भ में फतेहपुर जिला के पीरनपुर मोहल्ला में स्थित रिफ्युजी कालोनी के पीछे वाली बस्ती का जि़क्र प्रासंगिक हो जाता है।
फतेहपुर भौगोलिक रूप से इलाहाबाद और कानपुर के बीच स्थित है। फतेहपुर के पूरब में ‘‘पूरब का आॅक्सफोर्ड, इलाहाबाद है तो उत्तर-पश्चिम दिशा में उद्योगों और कारखानों की नगरी कानपुर है। उत्तर दिशा में प्रदेश की राजधानी लखनऊ है 135 किमी॰ की दूरी पर स्थित है। फतेहपुर से इन तीनों ही शहरों के लिए सड़क यातायात की अच्छी सुविधा है। हर आधे घण्टे के अंतराल पर बस मिल जाती है। लेकिन फतेहपुर में कुछ बस्तियां ऐसी भी हैं जहां तक इस जिला के भौगोलिक स्थिति का लाभ नहीं पहुंच पाता। ऐसी बस्तियों के लोग देश और दुनिया की घटनाओं और परिघटनाओं से बेखबर गन्दगी और बदबू में रहने को विवश हैं। कई कालोनियों में बंटे इस मोहल्ला पीरनपुर में एक कालोनी का नाम रिफ्यूजी कालोनी है। इस कालोनी के ठीक पीछे एक बस्ती है। इस बस्ती में मुस्लिम आबादी का बाहुल्य है। मुख्य सड़क से रिफ्यूजी कालोनी होकर बस्ती की ओर जाने वाली गली जहां मुड़ती है वहां से मुस्लिम बाहुल्य बस्ती शुरू हो जाती है। बस्ती में दाखिल होते ही कीचड़ की चादर में लिपटी आर.सी.सी. गलियों का राज खुलने लगता है। मौसम बारिश का हो तो नालियों के मेढ़ों पर चलते समय कभी भी पैर फिसलने और चोट पहुंचने का खतरा बना रहता है। पिछले हफ्ते जिस महिला के पैर में मोच आया था उसकी वजह जल-जमाव ही थी।
आश्चर्य होता है कि रिफ्यूजी कालोनी तक न गन्दगी है और न ही दुर्गन्ध। दुःख होता है कि एक तरफ सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान चल रहा है वहीं पीरनपुर बस्ती कूड़ों से पटा हुआ है। थोड़ी सी बारिश यहां जल-जमाव के लिए काफी है। उसपर से बदबू ऐसी कि खास को तो छोडि़ए आम लोंगों के लिए भी यहां रूकना मुश्किल काम है। जिला मुख्यालय पर स्थित यह बस्ती सड़क, स्वास्थ्य और सफाई आदि योजनाओं/अभियानों के शुरू होने से पहले की कहानी बयान करती है। उस दौर की जब गांव सम्पर्क मार्ग से जुड़े नहीं थे और ग्रामीण जीवन मुख्य धारा के नगरीय जीवन से कटा हुआ था। पीरनपुर इस धारा से आज भी कटा हुआ है। कुछ ऐसे कि मानव विकास के तीनों सूचकांकों पर यहां के लोग धड़ाम से गिर गए से प्रतीत होते हैं। गन्दगी के कारण कालरा, डायरिया, और श्वास संबंधी गंभीर बीमारियां गाहे-बगाहे दस्तक देती रहती हैं। लेकिन इस बस्ती के लोग इस बात से भी बेखबर हैं कि उनके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता क्यों कम है, उनकी बस्तियों की कुछ जवान महिलाएं बेवा क्यों है और बच्चे यतीम क्यों हैं?
दर असल विकास का जो दूसरा सूचकांक है ‘शिक्षा’ वह तो यहां नगण्य है। कहने को प्राथमिक विद्यालय है लेकिन कूड़ों और कीचड़ों के दलदल से घिरे विद्यालय में बच्चों को एम.डी.एम. मिल जाए तो बहुत है। यही हाल हाई स्कूल और इण्टरमीडिएट स्तर की शिक्षा का भी है। कक्षा 5 और 8 तक पढ़ लेना इस बस्ती के बच्चों के लिए बड़ी उपलब्धि है। कक्षा 10 की छात्रा यासमीन के अनुसार उनकी कक्षा और कोर्स क्लास मानीटर के भरोसे ही चलता है। शिकायत करें भी तो किससे सभी मैडम न जाने कहां रहती हैं? तीन-चार सौ रूपए की फीस दे पाना ऐसी लड़कियों के लिए पहाड़ तोड़ने जैसा होता है, जो पढ़ना चाहती हैं। फीस ही नहीं काॅपी-कलम और किताबों पर छाई मंहगाई इनके बचे-खुचे अरमानों पर भी पानी फेर देता है। ऐसी स्थिति पीरनपुर बस्ती की पढ़ाई में दिलचस्पी रखने वाली लड़कियों को शिक्षा के अवसरों से वंचित करने के लिए काफी होती है। ऐसी लडकियां अपने परिवार की आजीविका लिए कढ़ाई का काम सीखती हैं। लेकिन कक्षा आठ के बाद पढ़ाई छोड़ चुकी रूखसाना बताती हैं कि “कढ़ाई का हुनर भी बेकार साबित हो रहा है, क्योंकि उनके लिए काम नहीं है।” यदि उम्र छोटी है तो लड़कियां भी अपने भाईयों के साथ कूड़ा बिनती हैं या फिर अपनी माँ-बहन के साथ झाडू़-बरतन करती हैं।
उक्त संदर्भ में मानव विकास का तीसरा सूचकांक यानि आर्थिक स्थिति भी मुंह चिढ़ाता नज़र आता है। इस सूचकांक पर भी बस्ती की स्थिति असंतोषजनक है। लड़कियों की तरह लड़के भी आजीविका चलाने के लिए काम करते हैं। कोई ऐसा वैसा काम नहीं कि करने बाद हाथ-मुंह धो लिया और हो गया। पूरी बस्ती की आजीविका मुख्यतः कूड़ा कारोबार पर निर्भर है। सुबह होते ही इस बस्ती के बच्चे और बड़े कूड़ा की खोज में निकल जाते हैं और शाम ढ़लने के बाद ही वापस आते हैं। यदि सामाजिक असुरक्षा नहीं होती तो जवान होती लड़कियां भी कढ़ाई के बदले कूड़ा बिनने का ही हुनर सीखतीं। बस्ती में जगह-जगह फैली-बिखरी कूड़े की छोटी-बड़ी बोरियां अपनी दुर्गन्ध से आगन्तुकों को अपनी बेबसी का हाल बताती हैं। हैरानी होती है कि कूड़े के ढे़र पर रहने वाले पीरनपुर वासियों को यह दुर्गन्ध लेश मात्र भी महसूस नहीं होती है। याद आया गज़म्फ़र का उपन्यास “दिव्यवाणी” जो मूलतः उर्दू में लिखा गया है। इस उपन्यास का वह कथानक जिसमें प्रेमी अपनी दलित प्रेमिका को गुलाब की खुशबू से रूबरू कराता है तो उसकी प्रेमिका को गुलाब की खुशबू किसी दुर्गन्ध के समान लगती है। क्योंकि नालियों और बजबजाती गलियों की दुर्गन्ध की आदत ही उसके लिए सुगन्ध होती है। उसके सौन्दर्यबोध की कसौटी पर गुलाब की खुशबू दुर्गन्ध समान होती है। शायद ऐसा इसलिए होता है कि उस लड़की को कभी अवसर ही नहीं मिला कि वो अपनी बस्ती से बाहर के वातावरण और घटनाओं के बारे में तनिक भी सोचे। तो क्या गन्दगी से बजबजाती गलियों की दुर्गन्ध में ही पीरनपुर वासियों का भी सौन्दर्यबोध छुपा हुआ है? यदि ऐसा है तो फिर इसे इस दौर की घटना नहीं बल्कि महापरिघटना कहा जाना चाहिए है। जिसका एक सिरा वैदिक इतिहास से तो दूसरा सिरा समकालीन सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों से जुड़ा है।
पीरनपुर जैसी बस्तियों की कमी नहीं है इस देश में। आमतौर पर यह कहकर मामला टाल दिया जाता है कि जहां मुसलमान रहते हैं वहां के हालात ऐसे ही होते हैं यानि गन्दगी-बदबू और मुसलमानों का चोली-दामन का साथ है। लेकिन यह भी तो मुमकिन है कि जिन मुसलमानों का तादाम्य गन्दगी और बदबू जैसी भ्रान्तियों से जोड़ा जाता है वो मुसलमान ऐसी बस्तियों में रहने के लिए ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से मजबूर हों। सरकारी-गैर सरकारी संसाधनों की बांट जोह रहे हों। सरकारी दफ्तरों की दीवारों पर ढे़रों योजनाओं की लम्बी सूचियां पढ़ी जा सकती हैं। मौजूदा कारपोरेट दौर में बड़े-बड़े होर्डिंग्स भी देखे जा सकते हैं, जिनपर विकास योजनाओं के बारे में स्पष्ट जानकारियां होती हैं। फिर पीरनपुर निवासी सरकारी योजनाओं की पहुंच से वंचित क्यों हैं?
एक बेहतर कल के सपने कौन नहीं देखता। झाड़ू-पोछा और बर्तन-चाकी करके दूसरे के घरो को चमकाने वाली महिलाओं के गन्दगी, कीचड़ और बदबू के बीच रहने के पीछे पहली वजह यह है कि उनकी इतनी क्षमता नहीं है कि स्थान परिवर्तन करके किसी दूसरी बस्ती या मुहल्ला में बस जाएं। दूसरी वजह यह कि कूड़ा बिनना इनके परिवारों की आजीविका का मुख्य साधन है। करें भी तो क्या करें, इनकी बस्ती शहरी क्षेत्र में है और डूडा (District Urban Development Agency) के माध्यम से क्रियान्वित किसी भी योजना की पहुंच से दूर है। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण यह कि उपलब्ध सरकारी योजनाओं का लाभ इन तक नहीं पहुंच पाता। शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई, सड़क, आवास किसी भी योजना तक पीरनपुर जैसी बस्तियों में रहने वाले मुसलमानों की पहुंच नहीं है। 35 वर्षीय नरगिस अपना दुःख व्यक्त करते हुए कहती हैं कि “बड़े-बड़े लोगों का बी.पी.एल. कार्ड बन चुका है लेकिन उनका कार्ड अबतक नहीं बन सका है। तहसील, कचहरी, नगरपालिका जा नहीं सकती। वार्ड सभासद से कई बार कहा। लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं है।” कुछ मामलों में तो इस बस्ती के लोग नागरिकता की बुनियादी पहचान यानि राशन कार्ड के साथ-साथ वोटर कार्ड (मतदाता पहचान पत्र) से भी वंचित हैं।
पीरनपुर से वापस आ चुका हूँ लेकिन मन है कि बार-बार वहीं भागता है। गलियां...... गलियों में बिखरे कूड़ों के ढे़र....., घर..... घरों में मनुष्य और बकरियों का एक साथ उठना-बैठना, ड्राइंग रूम, बेडरूम, गेस्ट रूम और कीचेन सभी का एक साथ होना....., अपने गांव-घर से अलग लगता है। इस अलगाव में ढे़रों सवाल घूमड़ते हुए बादल की तरह मेरे मन को बेचन करते हैं। सवालों के बीच यह सवाल भी कि “क्या विकास का कोई रास्ता पीरनपुर भी जाता है...?”
SHILPKAR TIMES, 16-30 NOVEMBER, 2011

Friday, November 4, 2011

बाज़ार के हाथ परिवार, समाज और देश की खु़शियाँ

पिछले कुछ महीनों से भारत में गरीबी और गरीबी निर्धारित करने वाले मानकों पर बहस तेज है। अर्थशास्त्री एस॰डी॰ तेन्दुलकर समिति की रिपोर्ट के अनुसार भारत में गरीबी दर 37.2 प्रतिशत है। योजना आयोग द्वारा जारी 2006 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में गरीबी दर 28.5 प्रतिशत है। गरीबों की संख्या में 8.7 प्रतिशत की वृद्धि की वजह तेन्दुलकर समिति द्वारा गरीबी मापने के लिए नयी विधि का अपनाया जाना है। बात यहीं खत्म नहीं होती एन॰सी॰ सक्सेना समिति की रिपोर्ट पर विश्वास करें तो यह दर 50 प्रतिशत से भी ऊपर पहुंच सकता है। जाहिर है गरीबी रेखा तय करने की हर युक्ति चाहे प्रति व्यक्ति प्रति दिन पोषण प्राप्ति की हो या प्रति व्यक्ति प्रति दिन आय की हो, निश्चित तौर पर गरीबों की संख्या में वृद्धि हुई है। अर्थव्यवस्था पर नज़र डालें तो आर्थिक विकास दर 7 से 8 अंकों के बीच घट-बढ़ रहा है। अंकों के उतार-चढ़ाव में धन की अपार वर्षा भी हो रही है। राजधानी दिल्ली और लखनऊ में सोना-चाँदी और दूसरे आभूषणों की हजारों टन की बिक्री भारत में गरीबी, इसके मानकों और गरीबों की संख्या पर प्रश्न खड़े कर रहे हैं। लेकिन यह प्रश्न भी अनुत्तरित नहीं रह गया है। क्योंकि ऐसे तथ्य प्रकाश में आ चुके हैं कि 20 प्रतिशत लोगों का ही 80 प्रतिशत संसाधनों पर आधिपत्य है। इसमें भी बाजारपरस्तों की पकड़ कुछ ज़्यादा ही मज़बूत है। शायद ही कोई अखबार या न्यूज़ चैनल हो जो पिछले एक सप्ताह से उपभोग की तरह-तरह के लुभावने विज्ञापनों से धनवर्षा की दावत न दे रहे हों। स्थिति कुछ ऐसी है कि अखबार के फ्रण्ट पेज पर विभिन्न महिला/पुरूष माडलों के मुस्कराते चेहरों और किसी उत्पाद की चमक-दमक में देश-दुनिया की कोई खबर ढ़ूंढ़ना दिक्कत तलब है।
अच्छी बात है पर्वों पर धूम-धाम तो होना ही चाहिए। धनवर्षा का पर्व शहर से लेकर गांव तक हर जगह समान रूप से मनाया जाता है। इस पर्व की मान्यता तो मुसलमानों, पंजाबियों और ईसाइयों आदि अल्पसंख्यक समुदायों में भी बड़े पैमाने पर है। यानि इस पर्व का साम्प्रदायिक सौहार्द्र वाला पक्ष महत्वपूर्ण है। लेकिन क्या इस सवाल पर भी गौर किया जाता है कि हमारे पर्व बाजारवाद की दृष्टि से कैसे होते हैं? मध्यम वर्ग का व्यक्ति बस इतना ही कह पाता है कि मंहगाई ने त्योहारों का मज़ा फीका कर दिया है। निम्न वर्ग को इतनी समझदारी और समझ कहाँ है कि वो कम से कम इतना भी सोच सके। ईद, दशहरा, होली या दीपावली हर पर्व बाजारवाद के लिए मुनाफाखोरी और मिलावटखोरी को बढ़ाने का माध्यम बन चुका है। फिर भी धन की वर्षा आश्चर्य का विषय नहीं है और न ही बाजार के प्रत्यक्ष-परोक्ष प्रभावों पर ध्यान है। क्योंकि संबन्धित खबरें बाजार से निकलकर आती हैं और फिर बाजार में ही समाहित हो जाती हैं। गौर करने की बात यह है कि जो खबरें या अन्य संकल्पनाएं बाजार की कोख से जन्म लेती हैं उन पर देश का कोई कानून लागू नहीं होता। यही कारण है कि बाजार मानवीय संवेदनाओं पर आर्थिक संसाधनों के नियोजन के विपरीत आभूषणों-रत्नों और पटाखों पर पानी की तरह लाखों-करोणों रूपए खर्च करने के लिए प्रेरित कर रहा है। आज परिवार, समाज और देश की खुशिया बाजार के हाथ हैं।
संवृद्धि और विकास का संतुलन देखिए। ग्लोबल आर्थिक संकट के दौर में आर्थिक विकास दर जी॰डी॰पी॰ का 7 प्रतिशत रहने की उम्मीद जताई जा रही है। फिर भी भूखे, वस्त्रविहीन और छत विहीन आबादी बढ़ती जा रही है। जबकि केन्द्र और राज्य स्तर पर रोजगार, स्वास्थ्य और आवास योजनाएं भी चलाई जा रही हैं। बुद्धिजीवियों की बात छोडि़ए खुद एन॰सी॰ सक्सेना की रिपोर्ट देखिए जिसमें स्पष्ट उल्लेख है कि भारत में 50 प्रतिशत से अधिक लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। लेकिन बाज़ारवाद के क्या कहने हैं, सुविधाभोग के उद्देश्य के लिए अधिक खर्च करने का गुण तो कोई बाजारवादियों से सीखे। फिर खर्च करने के लिए अधिक धन संचय भी तो जरूरी है। वरना आधुनिक दौर का कौन बनिया/साहूकार चारा डालेगा। आभूषण से लेकर बाइक, कैमरा, टी॰वी॰, मोबाइल सबकुछ फ्री वाले आॅफर के साथ। इसके बाद भी आत्मिक संतुष्टि न प्राप्त हो तो सरकारी संसाधनों में भी हिस्सेदारी सुनिश्नित करना कोई मुश्किल काम नहीं है। गांधी जी का मुस्काराता चेहरा दफ्तर के किस बाबू को पसंद नहीं! फिर बाबू को मुस्कराते गांधी के चित्र वाले नोट और अपात्रों को बी॰पी॰एल॰/अंत्योदय अन्न योजना कार्ड आदि की सुविधा आसानी से उपलब्ध हो जाती है। एन॰सी॰ सक्सेना अपनी रिपोर्ट में लिखते हैं कि देश में केवल 49.1 प्रतिशत गरीबों के ही बी॰पी॰एल॰/अंत्योदय कार्ड बने हैं। जबकि 17.4 प्रतिशत धनी लोग भी बी॰पी॰एल॰/अंत्योदय कार्ड का लाभ उठा रहे हैं। क्या बात है! बुराई का अन्त करते-करते हम इतने बुरे बन चुके हैं कि ज़रूरतमंदों का हक मारने में थोड़ा भी नहीं हिचकिचाते। जब जरूरतमंद सरकारी विभागों में कार्ड बनवाने की अर्जी देते हैं तो उन्हें यह भरोसा दिलाया जाता है कि ‘‘कार्ड बनने बंद हो चुके हैं, अगले साल फरवरी या मार्च में ही बन पाएंगे।’’ कोई पूछे नीति निर्धारकों और नीति नियंताओं से कि ऐसे दिलासों की समय अवधि के बीच क्या किसी बी॰पी॰एल॰/अंत्योदय कार्ड और वृद्ध/विधवा या विकलांग पेंशन के लिए पात्र व्यक्तियों की आवश्यकताएं ठहर सी जाती हैं?
मजबूत पक्ष यह भी है कि बढ़ती महंगाई, बढ़ता खर्च, अधिक आय की महत्वाकांक्षा विकास दर और मुद्रा स्फीति का घटना-बढ़ना आदि सबकुछ बाजारवादी ताकतों द्वारा संचालित किए जा रहे है। इस प्रक्रिया में हमारी योजनाओं की रूपरेखा तय करने वाली लोकतांत्रिक संस्थाएं भी बाजारवाद के प्रभाव से बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं। तभी तो हक मारने वालों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। दूसरी तरफ गरीबी को परिभाषित करने में भी तमाम तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। 1974 से 1979 के पांचवी पंचवर्षीय योजना का प्रमुख लक्ष्य ही था ‘‘गरीबी हटाना’’। गरीबी ऐसी हटी कि भूख और बेकारी के कारण विस्थापन और आत्महत्याओं का दौर शुरू हो गया। विशेषकर 1991 के बाद संदर्भ देखें तो बात आन्ध्र और महाराष्ट्र के किसानों की हो या उड़ीसा में आम की गुठली और मेंढ़क उबालकर खाने वाले लोगों की हो या फिर बनारस में खून, जमीन और अपने कलेजे के टुकड़ों तक को बेच देने वाले बुनकरों की हो, हर जगह निर्धनता और अभाव का बोलबाला रहा है। फिर भी हमारे देश के नीति निर्धारकों को गरीबों की पहचान और बाजारवाद की यातनाओं का अनुभव नहीं हो पा रहा है।
हजार टन सोना और करोणों के पटाखों के क्रय-विक्रय के इस दौर में गैर बराबरी की भावना पर आधारित बाजारवाद की चुनौतियां कठिन हैं। इन चुनातियों का सामना करना निहत्थों अर्थात गरीबों के लिए और भी कठिन है। समय है कि बाजादपरस्तों की जमात में शामिल होने के बजाए इस दीपावली के अवसर पर दीपों की ऐसी श्रृंखला प्रज्जवलित की जाए जिसका प्रकाश गरीबों-वंचितों तक भी पंहुच सके।
Shilpkar Times, 1-15 November, 2011

Thursday, October 20, 2011

ये कौन है जो हवाओं का रूख बदलता है!

यह परिस्थितियां निराश करने वाली हैं कि एक महिला अपने अधिकारों की प्राप्ति और मूलभूत समस्याओं के निदान के बजाए मोबाइल की इच्छा रखती है। इसमें सरकार और उसकी नीतियों की बड़ी भूमिका है, विशेषकर उन नीतियों का जो जनता को उभोक्ता से आगे कुछ समझता ही नहीं।

पिछले दिनों पश्चिमी उ॰प्र॰ के सहारनपुर जिला स्थित बेहट तहसील के एक ऐसे गांव में जाने का अवसर मिला जिसकी पहचान न तो गांव की है और न ही कस्बे की है। जीवन स्तर के आधार पर फूल काॅलोनी नामक इस गांव की महिलाओं के साथ बैठक की। बैठक के दौरान उपस्थित महिलाओं से उनकी समस्याओं की जानकारी ली। बातचीत के दौरान बिजली, पानी, मकान, स्कूल जैसी कई समस्याओं से रूबरू हुआ, जिनका सामना काॅलोनी के लोगों को करनी पड़ती है।
ध्यान दिलाना चाहता हूं कि बस्ती और गांव के बीच अटके हुए फूलपुर काॅलोनी तक वो सारे संसाधन पहुंच चुके हैं जो नव उदारवादी, बाजारवादी और विनेवेशवादी नीतियों से प्रेरित हैं। जैसे इनमें मोबाइल सर्वप्रमुख है। जीवन का अभिन्न अंग बन चुका मोबाइल वंचितों और पिछड़ों के लिए भी अपरिहार्य हो चुका है। मुझे हैरानी तब हुई जब काॅलोनी की एक महिला ने बताया कि उसकी सबसे बड़ी समस्या मोबाइल का न होना है। मैंने धैर्य के साथ उस महिला की सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि के बारे में बात की। पता चला कि उस महिला के समक्ष भी आजीविका, स्वास्थ्य, बिजली, पानी, स्वच्छता, घर, और बच्चों के लिए स्कूल की समस्या है। विकास का माॅडल देखिए कि इन संसाधनों से वंचित एक महिला के लिए मोबाइल कितना महत्वपूर्ण हो चुका है। हो भी क्यों नहीं! जब हमारे दूरसंचार मंत्री ही चाहते हैं कि भारत दूरसंचार के लिए एक हब बन जाए। इससे पहले तिहाड़ की हवा खा रहे पूर्व पंत्री डी॰ राजा ने भी मोबाइल को गांव-गांव के व्यक्ति-व्यक्ति तक मोबाइल पहंुचाने की बात कही थी। 
बहरहाल पिछले दिनों राष्ट्रीय दूरसंचार नीति, 2011 के लक्ष्य बताते हुए उन्होंने “एक देश-एक लाइसेन्स” की बात कही। (Draft National Telecom Policy 2011 aims for 'one nation-one licence'; targets full MNP and free roaming. Sibal also said that he wants India to become a hub for telecommunication. "Draft NTP targets broadband on demand," http://ibnlive.in.com/news/new-telecom-policy-makes-roaming-free-sibal/191779-3.html) जिसका मुख्य उद्देश्य दूरसंचार क्षेत्र को निवेश के अनुकूल बनाना है। माननीय मंत्री महदोय ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच डिजिटल खाई को पाटना दूसरा मकसद बताया है। ज्ञात हो कि दूरसंचार क्षेत्र में पहले से ही 74 से 100 प्रतिशत की प्रत्यक्ष विदेशी निवेश जारी है। फिर “एक देश-एक लाइसेन्स” का मतलब क्या है। क्या इतना अनुकूलन गांव और शहर के बीच की डिजिटल खाई को पाटने में सहायक नहीं साबित हुई है। पिछले दो दशक के अनुभव तो हमें यही बताते हैं कि अनुकूलन उपलब्ध करवाने वाली नीति न सिर्फ निवेशकों के लिए बल्कि 2जी के दलालों और माफियाओं के लिए वरदान साबित हुई है। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति रोटी के बदले मोबाइल को महत्व दे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
बहरहाल अच्छी बात यह है कि “एक देश-एक लाइसेन्स” जैसे पंचमार्क में एकता के पुट का आभास होता है। वही एकता जिसके दम पर देश की आज़ादी की लड़ाइयां लड़ी गयीं। वही एकता जिसका उल्लेख संविधान निर्माताओं ने संविधान में किया है। फिर संविधान में समानता की बात भी तो कही गयी है। क्या दूरसंचार के संदर्भ में “एक देश-एक लाइसेन्स” की बात से समानता का उद्देश्य भी पूरा होता है? ऊपर जिस महिला की प्राथमिक आवश्यकता का जिक्र किया गया है क्या उसकी जरूरत पूरी हो सकती है?
जरूरत पूरी हो या न हो, यक्ष प्रश्न यह है कि जरूरतों के निर्धारण का अधिकार किसे है? सरकार, समाज, व्यक्ति या फिर किसी निवेशक को! इस तरह के प्रश्न अपनी प्रासंगिकता ढ़ूढ़ रहे हैं जिनकी बदौलत करोणों लोग मूलभूत समस्याओं के समाधान के बजाय मोबाइल जैसी बेतार संचार यंत्र की अभिलाषा में सुबह-शाम गुजार रहे हैं। फिर तो इनतक इस तरह के यंत्र पहुंचने ही चाहिए। पहुच भी रहे हैं। देखिए भाव कितना गिर चुका है मोबाइल बाजार का। एक हजार रूपए के बजट में अच्छे ब्राण्ड का अच्छा मोबाइल गांव और शहर के बीच अपना आस्तित्व और स्तर की खोज में संघर्षरत्त नागरिकों की पहुंच के अन्दर है। लेकिन उस महिला को देखिए। क्या उसके लिए एक हजार की रकम भी जुटा पाना मुमकिन नहीं है? शायद नहीं! तभी तो उसके पास मोबाइल नहीं है। लेकिन इच्छाएं तो उसकी अपनी हैं। सो उसने ज़ाहिर किया कि उसकी पहली प्राथमिकता मोबाइल है। कहने का तात्पर्य यह भी नहीं है कि अन्य सभी लोग जिनकी इच्छा ज़ाहिर नहीं होती वो लाज़मी तौर पर मोबाइल के उपभोक्ता हैं। मैं तो सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि “ये कौन है जो हवाओं के रूख बदलता है?” जो इच्छाएं हमारी हैं उस पर किसी और का राज कैसे चलता है? कौन है जो हमें विवश करता है कि हम हमारी मूलभूत समस्याओं को छोड़कर पहले मोबाइल जैसी किसी वस्तु की प्राप्ति के लिए संघर्ष करें। क्या मोबाइल प्राप्ति से उक्त महिला जैसी लाखों-करोणों व्यक्तियों की आजीविका का समाधान हो सकता है? क्या उनके बच्चों की शिक्षा की उचित व्यवस्था हो सकती है? क्या उनके मुहल्ले में फैली गन्दगी और स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं का निदान हो सकता है? क्या उनके छत और दरवाजा विहीन घरों को मुकम्मल तौर पर घर का दरजा प्राप्त हो सकता है? किसी भी व्यक्ति के लिए इन सवालों का जवाब मुश्किल नहीं है। ज़ाहिर है कि हमारी इच्छाओं को हमारी सरकारें पूंजीपरस्त निवेशकों के हाथों सौंपने का काम कर रही हैं। निवेश के लिए अनुकूल नीति बनाने के ध्येय में जनता महज उपभोक्ता बनकर रह जाती है। दूसरी तरफ निवेशानुकूल नीतियों में पब्लिक रिड्रेसल होने के बाद भीं आम जनता की इच्छाओं और महत्वाकांक्षाओं को आसमान की बुलन्दियों पर पहुंचाने के तमाम बिन्दु होते हैं। कहना होगा कि संचार क्रान्ति ने बेतार संचार के माध्यम से संवाद की नयी सुविधाएं उपलब्ध करायी हैं। लेकिन ज़मीन पर रहने वाले भोले-भाले लोगों की ज़मीनी समस्याओं के लिए कुछ खास नहीं किया।
योजनाओं-परियोजनाओं की लम्बी फेहरिस्त में देश में जो कुछ हो रहा है, उसका खामियाजा वंचितों को ही भुगतना पड़ रहा है। क्योंकि योजनाओं की अर्हता और पात्रता वंचितों को ध्यान में रखकर ही बनाएं जाते हैं। यह परिस्थितियां निराश करने वाली हैं कि एक महिला अपने अधिकारों की प्राप्ति और मूलभूत समस्याओं के निदान के बजाए मोबाइल की इच्छा रखती है। इसमें सरकार और उसकी नीतियों की बड़ी भूमिका है, विशेषकर उन नीतियों का जो जनता को उभोक्ता से आगे कुछ समझता ही नहीं। यही वजह है कि वंचित समाज का एक बड़ा हिस्सा अपनी दैनिक आवश्यकताओं और लोकप्रिय आवश्यकताओं के बीच फर्क को समझ नहीं पा रहा है। इन परिस्थितियों को विडम्बना भी नहीं कहा जा सकता है क्योंकि वंचित समाज तक शिक्षा और जागरूगता पहुंचने से पहले ही बेतार संचार के विविध यंत्र अपनी चमक-दमक के साथ पहंुचा दिए जाते हैं। फिर इच्छाएं उसी रूप में, उसी गति से परवान चढ़ती हैं जैसे-जैसे फ्री काल्स और फ्री रोमिंग के पुरोधा चाहते हैं। इस प्रक्रिया में एकता, समानता और स्वतंत्रता का मूल दर्श बहुत पीछे रह जाता है।
PUBLISHED IN SHILPKAR_TIMES_16-31_October_2011

Tuesday, October 11, 2011

विकल्प तलाशता हाशिए का मीडिया

"भूमण्डलीकरण की शब्दावली में यह दौर क्वालिटी और सर्विस का है। दुनिया भर में विशेषकर तीसरी दुनिया के देशों में इस नाम का ढ़ोल बज रहा है। इस नाम पर बाजारवाद पिछले दो दशकों से हमारे देश में क्वालिटी और सर्विस के नाम पर लोगों को ठगता आ रहा है। हाशिए की मीडिया को विकल्पहीनता की ओर ले जाने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। जितना बड़ा निवेश, उतनी बड़ी खबर। दुर्भाग्य है कि इस पूंजी प्रायोजित मीडिया की दुनिया में मानवीय संवेदनाओं को तार-तार होते हुए हम नहीं देख पा रहे हैं।..."
मीडिया हमेशा से संचार और संवाद का प्रभावी माध्यम रहा है। कागज के अविष्कार से पहले पत्थर के शिलालेख, ताड़ के पत्ते और ताम्रपत्र मीडिया के प्रचलित माध्यम रहे हैं। समय, समाज और सत्ता परिवर्तन तथा विकास के स्थापित होते नए पड़ावों पर कागज और प्रिन्टिंग प्रेस के अविष्कार ने मीडिया को नयी पहचान दी। मीडिया का रंग-रूप और चरित्र लगातार बदलता रहा। राजाज्ञाओं और फरमानों के संचार वाली मीडिया का जन रूप भी सामने आया। मीडिया के विस्तार में ऐसा समय भी आया जब पूरा विश्व संचार क्रान्ति से रूबरू हुआ। एक बटन दबाया नहीं कि असंख्य पन्ने और संदेश दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंच जाते हैं। लेकिन मीडिया के विस्तार यात्रा में कुछ बातें ऐसी हैं जो पीछे छूटती गई हैं। जैसे, जिस प्रिन्ट मीडिया का महत्व कम होना, जिसकी बदौलत समकालीन मीडिया के दूसरे रूपों का विकास हुआ, प्रस्तुति के स्तर पर जन विरोधी विषयों और विधियों का प्रयोग करना आदि। भूमण्डलीकरण के प्रत्यक्ष और परोक्ष हस्तक्षेप से पिछले दो दशकों में मीडिया का चरित्र बुरी तरह प्रभावित हुआ है। चन्द बड़े घरानों को छोड़ दिया जाए तो मीडिया का बड़ा हिस्सा हाशिए पर पहुंच चुका है।
मौजूदा दौर में मीडिया खासकर इलेक्ट्राॅनिक मीडिया की चर्चा जोरों पर है। हो भी क्यों न एक क्लिक में चैनल बदल जाते हैं, एक क्लिक में संदेश सात समुंदर पार पहुच जाते हैं। इसी को ग्लोबल वल्र्ड भी कहा जा रहा है। जहां सबकुछ एक कमरे बैठकर संचालित किया जाता है। काबिले गौर है कि आम तौर पर मीडिया से अभिप्राय समाचार पत्र और समाचार चैनलों से लगाया जाता है। जबकि मीडिया अपने विस्तृत अर्थों में वह सब है जिसके माध्यम से लिखित, मौखिक या दृश्य रूप में संवाद और संचार होता है। चिट्ठी-पत्री और रेडियो बीते जमाने की बातें लगती हैं, जिसका स्थान एस.एम.एस. और एम.एम.रेडियो ने लिया है। अखबार और पत्र-पत्रिकाओं की संख्या बढ़ी है, लेकिन इसके सापेक्ष बाजार की चुनौतियां भी बढ़ी हैं। बाजार के रवैये ने जन मानस में संवादहीनता और संवेदनहीनता को बढ़ाया है। यही कारण है कि आज कानटेन्ट से अधिक सर्कुलेशन पर ध्यान दिया जा रहा है। क्या छापें, कैसे छापें कि सर्कुलेशन बढ़ जाए। बाजारवाद ने प्रिन्ट मीडिया को इस दिशा में बहुत आगे पहुंचा दिया है। कल तक मीडिया के जो समूह औसत क्षमता रखते थे और जिन्होंने भूमण्डलीकरण के मंत्र को वेद और कुरान मानकर निवेशवादियों से दोस्ती कर ली। आज वही समूह बड़े मीडिया घरानों में शुमार किए जाते हैं। जिन्होंने बाजारवाद के साथ दोस्ती से इंकार कर दिया वो मीडिया समूह कमजोर पड़ गए और हाशिए की मीडिया बन कर रह गए। इनके अखबार और पत्र-पत्रिकाओं के पास न तो चमक-दमक है और न ही सर्कुलेशन बढ़ाने का कोई नुस्खा। ऐसा संभव भी नहीं है कि अमृत बाजार के इतिहास को दोहराया जाए। क्योंकि अंग्रेजों की आर्थिक गुलामी और अमेरिकी चैधराहट निदेशित ॅज्व्ए प्डथ् और ॅठ की आर्थिक गुलामी में बड़ा फर्क है। इन संस्थाओं की छत्रछाया में मीडिया की जो विकास गाथा लिखी जा रही है उसमें खबर लाने-बनाने की कला बदल चुकी, रिपोर्टिंग और आलेख के आवरण नए अर्थ तलाश रहे हैं। एक पूरी की पूरी संस्कृति ने जीवन के अन्य क्षेत्रों की तरह मीडिया को भी अपने पूंजीवादी आवरण से घेर रखा है। इस आवरण के बाहर की खबरों का कोई मोल नहीं रह गया है, ऐसा तथाकथित मुख्य धारा की मीडिया के काम-काज से प्रतीत होता है। पूंजीवादी मीडिया जब जैसी खबर लिख या सुना दे, उसकी प्रमाणिकता पर कोई प्रश्न नहीं है। जबकि सच्चाई यह है कि मीडिया के छोटे-छोटे समूह, जो दरअसल मीडिया कर्मी और पाठक वर्ग दोनों ही स्तरों पर संख्या में अधिक हैं, की पहचान ‘‘हाशिए की मीडिया’’ तक सीमित है।
इन्हें मैं हाशिए की मीडिया कहना इसलिए बेहतर समझता हूं क्योंकि मेरी इस छोटी सी समझ में वैकल्पिक मीडिया की अवधारणा भी निहित है। संख्या बल की दृष्टि से हाशिए की मीडिया चन्द निवेशवादी पूंजीपति घरानों की मीडिया से अधिक मजबूत है। पाठक वर्ग अधिकतर वही हैं जिनका ताल्लुक समाज के निचले और पिछड़े तबके से है। सवाल यह भी है कि मीडिया पर एकछत्र राज करने वाले चन्द लोग शेष जनता की बातें न लिखकर भी उसी जनसमूह में बड़ा कद और पहचान कैसे रखते है? कहीं सामाजिक न्याय का तो कहीं महिला अधिकारों का और कहीं दोहरी नागरिकता और पहचान की समस्याओं से जूझने वाले मीडिया समूह विकल्पहीन क्यों हैं? अब तो शिक्षा, साक्षरता और जागरूकता भी पहले से बढ़ चुकी है।
ऐसा प्रतीत होता है कि तमाम छोटी-बड़ी उपलब्धियों के बाद भी सामंती, ब्राम्हणवादी और पूंजीवादी बंधनों की जकड़ ढ़ीली नहीं हो सकी हैं। शायद इसी वजह से हाशिए की मीडिया संपादक, संवाददाता, लेखक और पाठक किसी भी रूप में अपनी पहचान नहीं बना पा रही है।
भूमण्डलीकरण की शब्दावली में यह दौर क्वालिटी और सर्विस का है। दुनिया भर में विशेषकर तीसरी दुनिया के देशों में इस नाम का ढ़ोल बज रहा है। इस नाम पर बाजारवाद पिछले दो दशकों से हमारे देश में क्वालिटी और सर्विस के नाम पर लोगों को ठगता आ रहा है। हाशिए की मीडिया को विकल्पहीनता की ओर ले जाने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। जितना बड़ा निवेश, उतनी बड़ी खबर। दुर्भाग्य है कि इस पूंजी प्रायोजित मीडिया की दुनिया में मानवीय संवेदनाओं को तार-तार होते हुए हम नहीं देख पा रहे हैं।
पिछले दिनों अन्ना आन्दोलन के विस्तार में हिन्दुस्तान के तमाम गांवों को भी शामिल हुआ बताया गया लेकिन पिछले एक महीने में यू.पी. के कम से कम 15 गांव के भ्रमण के दौरान एक व्यक्ति नहीं मिला जो अन्ना को जानता हो। कहने का मतलब यह कि पूंजी आधारित मीडिया का विस्तार और सीमाएं उतनी ही हैं जहां तक सैटेलाइट और बिजली की पहुंच है। जबकि हाशिए की मीडिया के सामने सारा आकाश खुला पड़ा है।
समय आ चुका है कि हाशिए की मीडिया विकल्पहीनता के भंवर से खुद को बाहर निकाले। इससे न सिर्फ हाशिए की मीडिया की अपनी पहचान बनेगी बल्कि निवेश आधारित पूंजीपरस्त मीडिया के वास्तविक चरित्र को भी समझा जा सकेगा। हाशिए की मीडिया को बताना होगा कि ‘‘हम जिन चुनौतियों का सामना करके दुर्गम क्षेत्रों से समाचार लाते हैं या पहुंचाते हैं, अब किसी पूंजीवादी मीडिया घराने के लिए नहीं करेंगे।’’ रही बात क्वालिटी और सर्विस की तो इस तथ्य से कबतक लुका-छिपी का खेल खेला जाता रहेगा कि तथाकथित मुख्य धारा के किसी भी मीडिया घराने की क्वालिटी और सर्विस हाशिए के मीडिया कर्मी के कन्धों पर ही टिकी है। जो कन्धा शोषक मीडिया समूहों के भार को वहन करके सर्विस और गुणवत्ता बनाए रख सकता है, वह कन्धा अपने समाज और देश के लिए क्या वैकल्पिक मीडिया के भार को नहीं उठा सकता? ये बातें परिसंकल्पनात्मक लग सकती हैं लेकिन वास्तविकता के धरातल पर देखा जाए तो बहुत ही व्यावहारिक हैं। यदि हाशिए की मीडिया के लोग वैकल्पिक मीडिया को खड़ा करने में सफल हो जाते हैं तो निश्चित तौर पर मीडिया जगत को एकाधिकारवादी, अधिनायकवादी चरित्र के कुप्रभावों से बचाया जा सकता है। ऐसी पहल जरूरी है क्योंकि मनोरंजन और समाचार के नाम पर कुछ भी किसी भी रूप में छापने, प्रकाशित और प्रसारित करने के चोर रास्तों को बन्द होना ही चाहिए।
PUBLISHED IN SHILPKAR_TIMES_1-15_October_2011

Sunday, September 4, 2011

ये वो सुबह तो नहीं .......


मीडिया घराना समर्पित भाव से आंदोलन के साथ याराना निभा रहा है। आंदोलन को “क्रान्ति” के नाम से महिमामंडित भी किया जा रहा है। टी.वी. पर दिख रही भीड़ को देखकर ऐसा लगता है कि यह भीड़ किसी भी आंदोलन को क्रान्ति के चरण में पहुंचाने के लिए काफी है। जब क्रान्ति की बात होती है तो फ्रांस और रूस के अलावा तीसरा नाम जुबां पर आता ही नहीं। अच्छा है विश्व इतिहास के पन्नों में भारत का नाम भी क्रान्ति होने वाले देशों की श्रेणी में शामिल हो जाएगा। लेकिन भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम जो अब आंदोलन बन चुका है और जो मीडिया की नज़र में क्रान्ति की चैखट तक पहुंच चुका है पर संशय भी व्यक्त किया जाने लगा है। कोई इसे कारपोरेट घराने का प्रायोजित आंदोलन बता रहा है तो कोई इस आंदोलन के अगुवा को सवर्णवादी बता रहा है। मीडिया के अनुसार इस आंदोलन के समक्ष सरकार घुटने टेकती नजर आ रही है। विरोध और सपोर्ट के सुरों के बीच बात अन्ना और अनशन पर आकर रूक सी गयी है। अन्ना समर्थक “मैं अन्ना हूँ” के नारे लगा रहे हैं और जो नहीं लगा रहे हैं उनमें से कुछ लोकपाल को स्टैंडिंग कमेटी में ले जाने की बात कर रहे हैं। इधर अन्ना दल (सिविल सोसाइटी) अड़े हैं कि बिल पेश करने से कम पर वो अनशन नहीं तोड़ेंगे। इन्हीं बातों के साथ सड़को पर चलती-फिरती भीड़ और आन्दोलन बन चुके अन्ना पर बहस जारी है।
मीडिया में बार-बार दिखाई जा रही तस्वीरों को देखकर सहज ही यकीन होता है कि अन्ना वास्तव में अन्ना नहीं रहे, अब वो आंधी बन चुके हैं और क्रान्ति का दरवाजा खटखटाया जा रहे हैं। पिछले दिनों के उनके बयान से भी ऐसा प्रतीत होता है कि यह आंधी कहीं यूपीए गठबंधन को उखाड़ न फेंके। भीड़ की अपनी ताकत होती है। अगर भीड़ सत्ता प्रतिष्ठानों पर जन दबाव बनाने के लिए हो तो इसकी सार्थतकता निश्चित तौर पर साबित होती है। और अगर उन्मादी है तो इसकी निरर्थकता भी सामने आ जाती है। बात वैचारिक धरातल की है कि भीड़ जिस वैचारिक धरातल पर खड़ी है वह धरातल कितनी मज़बूत और टिकाउ है?
भ्रष्टाचार हमारे देश की गंभीर समस्या बन चुकी है। इससे मुक्ति का सपना देखना आज़ादी के सपने देखने से कम नहीं है। ऐसे में यदि अन्ना युवाओं के रोल माॅडल बन चुके हैं तो यह इस समय की बड़ी उपलब्धि कही जानी चाहिए। क्योंकि किसी काॅमन समस्या के लिए काॅमन प्लेटफार्म पर इकट्ठा होना आज के दौर में चमत्कारिक है। जून से लेकर इस अगस्त के आखिरी पखवारे तक अन्ना के समर्थकों की संख्या लगातार बढ़ी है। समर्थकों की बढ़ती संख्या को देखकर सहज उम्मीद भी बढ़ती है कि क्या हमारा देश क्रान्ति के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है? यदि ऐसा है तो यह शुभ संकेत है, सिंगुर और नन्दीग्राम से लेकर भट्टा पारसौल जैसे स्थानों पर बसने वाले लोगों के लिए जहां कारपोरेट वल्र्ड को पहले तो खुली लूट की छूट दी गयी और फिर आन्दोलनकारियों का दमन किया गया। अभी उड़ीसा में क्या हो रहा है। पास्को के साथ सरकार क्या गुल खिला रही है? क़ाबिले गौर है कि आर्थिक विकास के लिए सुधारों की बयार चलाने वाले हमारे प्रधानमंत्री ने अपने पिछले कार्यकाल के समय स्वयं सुधारों को मानवीय रूख ;भ्नउंद ंिबमद्ध देने की बात कही थी। यानि 1991 में उन्होंने जिन सुधारों को हरी झण्डी दिखाई थी वो कभी मानवीय थे ही नहीं। इसके विरोध में भी 1990 के दशक से ही आन्दोलन चल रहे हैं इस देश में। लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं है। निवेश और विदेशी निवेश आए दिन बढ़ता ही जा रहा है। पंूजीपती खेल रहे हैं और बाकी जनता मूक दर्शक। क्योंकि खेलने का अधिकार तो आर्थिक गुलामी की जंजीरों में कैद होता गया है एक के बाद एक। जिसके पास पूंजी बल्कि बड़ी पूंजी होगी वही खेलेगा। खेलने वाला हमारे स्टेट में कहीं रियल स्टेट खेल रहा है और कहीं माॅल-माल (शापिंग) खेल रहा है। इस खेल में मंहगाई कब दो अंकों में पहुंच गयी पता ही नहीं चला। बहरहाल, 90 के दशक में साम्प्रदायिकता ने नए सिरे से सर उठाया। 2002 में राज्य प्रायोजित दंगे कराए गए। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के समर्थक संघियों के खिलाफ आंदोलन का इतिहास अभी जारी है। 1990 के दशक की तीसरी महत्वपूर्ण घटना मण्डल कमीशन की अनुशंसाओं का लागू किया जाना था। सामाजिक न्याय का सवाल एक बार फिर बहस का मुद्दा बना। यह सवाल अभी भी समाज को उद्वेलित कर रहा है और सामाजिक न्याय का आन्दोलन अपने प्रकार और विस्तार में जारी है। आए दिन हत्या, लूट और बलात्कार की खबरें अखबारों की सुर्खियां बनती हैं। इसके खिलाफ भी लोग लड़ रहे हैं। उत्तर-पूर्व हो या कश्मीर या फिर गुजरात हर जगह मानवाधिकारों का हनन हुआ है। इसके खिलाफ भी आंदोलन जारी हैं इस देश में। इरोम शर्मीला का अनशन और कुछ वर्ष पूर्व उत्तर-पूर्व में महिलाओं का नग्न विरोध-प्रदर्शन बहुत पुराना नहीं हुआ है।
जाहिर है पिछले दो दशकों का इतिहास आंदोलनों से भरा पड़ा है। कुछ तो कमी रही होगी जो ये आंदोलन अन्ना के आंदोलन का रूप नहीं ले सके। कमी अगुवा की तो होती ही है। कई बार साथ चलने वालों की भी कमी होती है। बहस यह नहीं है कि अन्ना का आंदोलन जिस जमीन पर खड़ा है वह जमीन उर्वर है कि बंजर। सवाल यह है कि अन्ना के आन्दोलन को क्यों न देश भर में चल रहे अन्य आन्दोलनों से जोड़ जाए। अभी जो मोमेन्टम बना हुआ है और जिस तरह से सड़कों पर (कम से कम नगरों में) जनता का हुजूम देखा जा रहा है ऐसी स्थिति में यदि सिविल सोसाइटी देश के उन आन्दोलनों से भी जुड़ जाए जिसे मीडिया ने अक्सर नज़र अंदाज़ किया है, तो सोने पे सुहागा हो जाए।
भ्रष्टाचार अभी की सबसे बड़ी समस्या है। इसके अलावा और भी समस्याएं हैं जो अपने आप में गंभीर हैं। सबसे बड़ी समस्या लोकतांत्रिक प्रक्रिया का अनुपालन न होना। किन्हीं अर्थों में यही भ्रष्टाचार है। पिछले दिनों एक अखबार (अमर उजाला, फिरोजाबाद, 22 अगस्त, 2011) में खबर छपी थी। जिसमें टोपी विक्रेता मयंक जैन कहते हैं कि “वैसे तो यह टोपी पांच रूपए में मिल जाती है, लेकिन आंदोलन के कारण डिमांड अधिक है इसलिए दस रूपया की मिल रही है।” खबर में लिखा था कि 60 रूपए का तिरंगा झण्डा 120 रूपए तक में बेचा गया। आश्चर्य की बात है कि खरीदार वही थे जिन्हें अन्ना समर्थन में जाकर नारे लगाने थे और कैन्डिल जलाने थे। एक्सप्रेस बज पर लूना देवन की रिपोर्ट भी काबिले गौर है। इस रिपोर्ट के अनुसार बंगलोर शहर के एक सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं कि “उन्होंने 2000 झण्डों का आर्डर दिया था और उन्हें सामान्य लागत मूल्य से भुगतान करना पड़ा।” (लिंक देखें http://expressbuzz.com/cities/bangalore/anna-movement-triggers-flags-sale/305965.html ”Gearing up for supporting the cause we had ordered for about 2,000 cotton flags and we had to pay double than the normal price” a city based social activist said.”)
चिन्तनीय है कि जो व्यक्ति भ्रष्टाचार का विरोध करने की तैयारी कर रहा है वही व्यक्ति एक व्यक्ति के नाम पर (जो युवाओं का आदर्श बन गया बताया जा रहा है) लागत से अधिक पैसे देता है। मुमकिन है कि जिस तिरंगा को 60 के बदले 120 में खरीदा गया उसकी भावनात्मक आवश्यकता उससे कहीं अधिक किसी आम आदमी को रही हो और वह उस तिरंगा को प्राप्त नहीं कर सका हो क्योंकि उसके पास दोगूनी कीमत अदा करने के लिए पैसे नहीं रहे हों। इसीलिए कहना पड़ रहा है कि ऊपर से चलकर नीचे आने वाले भ्रष्टाचार की अपनी सीमा है और नीचे से चलकर ऊपर जाने वाले भ्रष्टाचार की अपनी सीमा और अपना रूप है। ऊपर से नीचे की ओर प्रवाहित भ्रष्टाचार पर मैंने अपने आलेख “भ्रष्टाचार से निर्णायक लड़ाई”( देखें 16-30 जून का शिल्पकार टाइम्स, नई दिल्ली ) में विस्तार से चर्चा की है। बात करते हैं नीचे से ऊपर को जाने वाले भ्रष्टाचार की। याद रहे कि यह भ्रष्टाचार हमारे रगों में दौड़ रहा है। बी.पी.एल. बनवाना हो तो संभ्रान्तों की कतार आगे रहती है, वंचित छूट जाता है। राष्ट्र ध्वज तिरंगा खरीदना हो तो 60 के बदले 120 रूपए अदा करने वाला बढ़के लपक लेता है, कमजोर और दबा-कुचला अपनी भावनाओं को अपने सीने में दफन करके रह जाता है। सबसे भ्रष्ट कचहरी और इसमें कार्य करने वाला हर छोटा-बड़ा पदाधिकारी है। हर काम में जनता बीस से पचास रूपए जो न्यूनतम है देने को तैयार है। क्यूं भई? इसलिए कि हमें जल्दी रहती है। हम अपना काम समय से पहले और अपनी बारी का इंतजार कर रहे बाकी लोगों से पहले चाहते हैं। यह भी चाहते हैं कि औपचारिकता न निभानी पड़े।
मौजूदा हालात में पहले मुर्गी या अण्डा वाले सवाल में न उलझते हुए इस बिन्दु पर विचार-मन्थन और व्यावहारिक प्रयास शुरू किए जाने की ज़रूरत है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में जो छोटे-छोटे आंदोलन हैं वो भी भ्रष्टाचार विरोधी इस आंदोलन से जुड़ जाए। तभी इस आंदोलन में प्रत्येक नागरिक की भागीदारी सुनिश्चित हो सकेगी। फिर दोहरा रहा हूँ कि यह समय निर्णायक हो सकता है, कैन्डिल लाइट प्रोसेसन क्रान्ति के मशालों से प्रज्जवलित हो सकती यदि यह आंदोलन अपने प्रसार सीमा में हर क्षेत्र, हर समुदाय और हर वर्ग की समस्याओं को समाहित कर ले। वरना फैज की नज़्म “ये वो सुबह तो नहीं जिसकी आरज़ू लेकर/चले थे यार की मिल जाएगी कहीं न कहीं” एक बार फिर प्रासंगिक हो उठेगा।

PUBLISHED IN SHILPKAR_TIMES_1-15_SEPTEMBER_2011