Wednesday, October 24, 2012

बुनकरों के ज़मीनी यथार्थ


 इस पूरे दौर में बुनकरों का न केवल जीवन स्तर बद से बदतर हुआ है बल्कि कइयों को तो खून, जमीन और अपने कलेजे के टुकड़ों तक को बेचना पड़ा। जहां इससे भी बात नहीं बनी वहां आत्महत्याओं का दौर चला। पांच बरस पहले बनारस के लोहता और बजरडीहा की घटनाएं इन्हीं परिस्थितियों और घटनाओं की गवाह हैं।

पिछले साल नवम्बर में बुनकरों के कर्ज माफी की 6234 करोण रूपए की योजना की घोषणा की गयी। इसमें 3884 करोण रूपए बुनकर समितियों और व्यक्तिगत बुनकरों के संस्थागत ऋणमाफी के लिए आवंटित किया गया है। शेष 2350 करोण की राशि 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 6 चरणों में बुनकरों के उत्थान हेतु खर्च किया जाएगा। माना जा रहा है कि इस पैकेज के तहत कुल 13 लाख बुनकरों को लाभ पहुंचेगा। अकेले पूर्वी उत्तर प्रदेश के करीब 11000 से अधिक बुनकर लाभान्वित होंगे। उद्योग और वाणिज्य मंत्री के अनुसार इस योजना से व्यक्तिगत बुनकरों के अलावा 15000 बुनकरों की कोआपरेटिव समितियों को मदद पहुंचेगा। 
ज्ञात हो कि पूर्वांचल के वाराणसी, मऊ, गाजीपुर, आजमगढ़, मिर्जापुर, भदोही आदि जिलों में आबादी का एक बड़ा हिस्सा बुनकर मज़दूर है। इनकी आजीविका का मुख्य साधन कपड़ों और कालीन की बुनाई है। पिछले दो दशकों से इन बुनकरों को व्यापार में मंदी की मार झेलना पड़ रहा हैं। विशेषकर आर्थिक उदारीकरण, मुक्त बाज़ार व्यवस्था के कारण एक तरफ जहां चाइनीज फैब्रिक्स और सिल्क के रूप में अन्तर्राष्ट्रीय चुनौतियां खड़ी हुई हैं तो दूसरी तरफ सूरत की चिप एण्ड बेस्ट साडि़यों ने बुनकरों के लिए आन्तरिक खतरा पैदा किया है। इस पूरे दौर में बुनकरों का न केवल जीवन स्तर बद से बदतर हुआ है बल्कि कइयों को तो खून, जमीन और अपने कलेजे के टुकड़ों तक को बेचना पड़ा। जहां इससे भी बात नहीं बनी वहां आत्महत्याओं का दौर चला। पांच बरस पहले बनारस के लोहता और बजरडीहा की घटनाएं इन्हीं परिस्थितियों और घटनाओं की गवाह हैं। व्यापार में कुछ उतार-चढ़ाव के बाद भी बुनकरों की यथा स्थिति बनी हुई है। परिस्थितिवश बहुतेरे बुनकर संस्थागत कर्जदार हैं। बल्कि ऐसे बुनकरों की तादाद अधिक है जो कर्ज के स्थानीय ढ़ांचे में फंसे हुए हैं। जाहिर है केन्द्र सरकार के ऋण माफी का पैकज आम कर्जदार बुनकरों को राहत प्रदान नहीं करेगा। 
मालूम हो कि भारत जैसे कल्याणकारी राज्य में सरकारी एजेन्सी के माध्यम से कर्ज की व्यवस्था गरीबों-वंचितों की आजीविका सहायता के तौर पर महत्वपूर्ण माना गया है। अब मामला साड़ी बुनकरों का हो, कालीन बुनकरों का हो या जरदोजी का काम करने वाली मजदूर महिलाओं का हो, अहम सवाल यह है कि इन दस्तकारों की पहुंच सरकार द्वारा चलायी जा रही योजनाओं तक किस हद तक है? बुनकरों से बात करने पर पता चलता है कि ऋण माफी की योजना उनके लिए दूर की कौड़ी है। गांव रसूलपुर के मेराज अंसारी कहते हैं कि "जब ऋण ही नहीं मिलता तो ऋणमाफी कैसी ?" मेराज जैसे ढ़ेरों बुनकर हैं जो ऋण लेने के लिए पात्र ही नहीं होते। क्योंकि इनके पास या तो राशन कार्ड नहीं होता या फिर बैंक में खाता नहीं खुल पाता। बनारस के बुनकर कालोनी के साबित अंसारी की बातों पर यक़ीन करें तो "जो बुनकर कर्ज प्राप्त करने की पात्रता रखते हैं उन्हें बैंक वाले डिफाल्टर समझते है। इसलिए ऐसे बुनकर भी ऋण प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं। जो सहकारी समितियां हैं उनकी संख्या बस इतनी है कि इनके नाम पर कोई भी करोणों का पैकेज घोषित कर आम बुनकरों को राहत के झूठे सपने दिखाकर वोट की सियासत आसानी से कर लेता है।" ऋणग्रस्त बुनकरों में उनकी संख्या अधिक है जो अपनी दैनिक आवश्यकताओं को स्थानीय ऋणदाताओं से कर्ज लेकर पूरा करते हैं। ऐसा भी होता है कि उनके श्रम से पूंजी खड़ी करने वाला मध्यस्थ उनके पारिश्रमिक के भुगतान में 4-6 माह विलम्ब करता है। यदि बुनकरों को बाजार तक सीधे पहंुच सुलभ हो जाता तो समय पर उचित पारिश्रमिक सुनिश्चित हो पाता और वो बुनकर जो सरकारी एजेन्सियों से ऋण प्राप्त कर अपनी आजीविका के साधन को मजबूती नहीं दे पाते, उनका सही मायनों में भला हो जाता।
बहरहाल, ऋण माफी की रकम पर भी विचार जरूरी है। पैकेज के अनुसार पात्र बुनकरों के 50000.00 रूपए तक के ऋण माफ किए जाएंगे। सवाल यह है कि यदि यह पैकेज लागू हो जाए, तो भी उन बुनकरों का क्या होगा जो पाचास हजार से अधिक राशि के कर्जदार हैं। एक उदाहरण पूर्वांचल के उस जिला से जहां कर्जदार बुनकरों की संख्या सवार्धिक बतायी जा रही है। ग़ाजीपुर जिला का गंगौली गांव राही मासूम रज़ा की जन्म भूमि के रूप में तो जाना जाता है। लेकिन इस गांव के बुनकरों का दर्द शायद ही कभी मीडिया और बुद्धिजीवियों के बीच चर्चा-परिचर्चा का विषय बनता है। देखना यह है कि दर्जनों योजनाओं की भीड़ में ऋण माफी की योजना इस गांव के बुनकरों को किस रूप में राहत पहुंचा पाएगा। बात सिर्फ एक गांव की नहीं बल्कि पूरे पूर्वांचल के बुनकरों का है।
जाहिर है, कर्ज माफी पैकेज के बारे में उद्योग और वाणिज्य मंत्री ने विधान सभा चुनावों से पहले जो बयान दिया था उससे आम बुनकरों का भला होता नहीं दिख रहा है। यदि सही मायनों में केन्द्र और राज्य सरकारों को बुनकरों की फिक्र है तो इन्हें बुनकरों की रोजमर्रा समस्याओं को समझना होगा और तदनुरूप नीतिगत स्तर पर योजनाओं में सुधार करनी होगी। ताकि बुनकरों तक योजनाओं की पहुंच को संभव बनाया जा सके। वरना बुनकरों के लिए ऋण माफी या उनके कल्याण से संबंधित अन्य योजनाओं के क्रियान्वयन में कोई भी नीतिगत भूल या कमी न सिर्फ योजनाओं की असफलता का कारण बनेगा बल्कि नीति निर्धारकों को बुनकरों के जमीनी यथार्थ से दूर भी करेगा।

इंकलाबी नज़र, 13 अप्रैल 2012

Saturday, September 22, 2012

खुदरा बाज़ार में एफडीआई: कठिन सुधारों की कठिन मार

"खुदरा बाजार में एफडीआई महज सरकार की असफलता को नहीं दर्शाता है बल्कि विपक्ष में बैठे उन तमाम दलों की सियासी समझदारी पर भी सवालिया निशान है जो इस देश के गरीब, नौजवान, किसान, मज़दूर, दलित, पिछड़े और पसमांदा अवाम के हक की बात करते हैं। कहना होगा कि यह असफलता उन कारोबारियों की भी है जिन्होंने बतौर मतदाता अपने लोकतांत्रिक दायित्वों के निर्वहन में बार-बार कोताही की है।"

खुदरा बाज़ार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को मंजूरी के फैसले को मुद्रा स्फीति में सुधार, रोजगार के नए अवसरों का सृजन और देश में विदेशी मुद्रा के प्रवाह में वृद्धि आदि कारणों से उचित बताया जा रहा है। दूसरी तरफ विरोधी खेमा इस फैसले को खुदरा बाजार पर विदेशी प्रभुत्व के बढ़ते प्रभाव के रूप में देख रहे हैं। ये बात और है कि विभिन्न दल क्षेत्रीय राजनीतिक ज़रूरतों के मद्दे नज़र इस फैसले का समर्थन और विरोध कर रहे हैं। खुदरा व्यापार में एफडीआई से असहमति की अभिव्यक्ति से कुछ बातें स्पष्ट हैं। जैसे, खुदरा कारोबारियों का आस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। ठीक वैसे ही जैसे कि मुक्त बाजार नीति के चलते छोटे-छोटे घरेलू उद्योगों का हाल हुआ है। इसमें बनारसी साड़ी से लेकर अलीगढ़ के ताला उद्योग सभी शामिल हैं। तथ्य यह है कि अगर नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के दूरगामी परिणामों को समझने में 20 वर्षों से अधिक समय लगा तो क्या यह समझा जाए कि खुदरा बाजर में एफडीआई के परिणामों को समझने में भी लगभग इतना ही समय लगेगा। यदि ऐसा होता है तो आने वाले दो दशकों में खुदरा कारोबार में एफडीआई के कूप्रभावों को झेलने के लिए हमें तैयार रहना चाहिए। इन प्रभावों में एक यह होगा कि खुदरा बाज़ार के कारोबारियों की वैयक्तिक व्यावसायिक पहचान और आस्तित्व समाप्त हो जाएगा। इस वास्तविकता को दोबारा साबित करने की ज़रूरत भी नहीं है क्योंकि पिछले कुछ एक दशकों में शापिंग  माल कल्चर के अंधाधुंध प्रसार ने पहले ही व्यावसायिक आज़ादी को शापिंग माल कल्चर के रास्ते बाज़ारपरस्त पूंजीपतियों के यहां गिरवी हो चुकी है। अब बारी छोटे शहरों-कस्बों और गांव-देहातों की है। देखने और सुनने में शापिंग माॅल का कल्चर बेहद अच्छा और सुखद लगता है। लेकिन पांच की तरबूज तीस में बिकने के बाद भी जब तरबूज पैदा करने वाले किसानों की जेब में उचित पैसा नहीं पहुँचता तो सवाल लाज़मी तौर पर उठता है कि एफडीआई के रास्ते कितने किसानों और कितने दुकानदारों का भला होगा?
रही बात नौकरियों के अवसर सृजन का तो इस संभावना से इंकार मुश्किल है कि जो कारोबारी छोटी पूंजी से कारोबार कर रहे हैं क्या वो आने वाले समय में एफडीआई के बड़ी पूंजी के चंगुल में नहीं फंसेगे। बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है वाला मुहावरा सटिक बैठता है। इस संभावना से इसलिए भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है क्योंकि आर्थिक सुधारों की एक बुनियादी शर्त प्रतिस्पर्धा को बढ़ाना और बढ़े हुए प्रतिस्पर्धी माहौल में गुणवत्ता को बनाए रखना है। प्रतिस्पर्धा अच्छी बात है लेकिन बड़ी मछली और छोटी मछली के बीच प्रतिस्पर्धा क्या समतामूलक सिद्धांतों की अनदेखी नहीं है?
ज़ाहिर है जब प्रतिस्पर्धा समानता के मूलभूत सिद्धांतों को धता-बता कर होगी तो बड़ी मछली छोटी-छोटी मछलियों को एक-एक करके निगलती जाएगी। बताना नहीं है कि खुदरा कारोबारियों की स्थिति छोटी-छोटी मछलियों की सी है। जब बड़ी पूंजी का दखल उनके कारोबार की चौखट पर दस्तक देगा तो किसी तरह अपनी दुकान और घर-परिवार चलाने वाले छोटे कारोबारियों की लाइफ लाइन ही छिन जाएगी। चमक-दमक वाली गुणवत्ता की प्रतिस्पर्धा में बने रहने का दबाव ऐसे दुकानदारों पर पहाड़ बन कर टूट पड़ेगा। छोटी पूंजी की स्थिति छोटी मछली की होती है। इसलिए ऐसे कारोबारी मालिक से नौकर की स्थिति में आ जाएंगे। अर्थात नौकरियां निश्चित रूप से बढ़ेंगी। लेकिन यह सब व्यावसायिक स्वंतंत्रता को गिरवी रखवाने के बाद होगा।
समकालीन राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि सरकार अपने फैसले पर पुनर्विचार करने जा रही है। जो क्षेत्रीय पार्टियां विरोध का स्वर बुलन्द कर रही हैं उनके पास एफडीआई के विरोध का तात्कालिक तर्क तो है लेकिन एफडीआई जैसे तमाम फैसलों की तह तक जाने का साहस नहीं है। शायद इन्हें भी पता है कि ऐसे जनविरोधी फैसलों के तार आर्थिक सुधारों से जुड़े हैं। यह बात किसी से छुपी नहीं रह गयी है कि सुधारों के मोर्चे पर सूबाई सियासत की धार पर केन्द्र में मज़बूत स्थिति रखने वाली पार्टियां अपने ही घर में किस तरह नाकाम हुई हैं।
कहना पड़ रहा है कि खुदरा बाजार में एफडीआई महज सरकार की असफलता को नहीं दर्शाता है बल्कि विपक्ष में बैठे उन तमाम दलों की सियासी समझदारी पर भी सवालिया निशान है जो इस देश के गरीब, नौजवान, किसान, मज़दूर, दलित, पिछड़े और पसमांदा अवाम के हक की बात करते हैं। कहना होगा कि यह असफलता उन कारोबारियों की भी है जिन्होंने बतौर मतदाता अपने लोकतांत्रिक दायित्वों के निर्वहन में बार-बार कोताही की है। चूंकि सभी दल अभी से 2014 के चुनावी दंगल में उतरने की तैयारी में हैं तो जनता को भी इस दंगल में दो-दो हाथ करने के लिए कमर कस लेना चाहिए। यह समय देश की राजनीति और अर्थव्यव्यस्था के लिए संकट का समय है। इसका समाधान तभी निकलेगा जब उबी हुई और उकताई हुई जनता अपना विकल्प खुद सामने लाएगी। वरना आर्थिक संवृद्धि के नाम पर प्रधानमंत्री के कठिन सुधारों की कठिन मार झेलने के लिए तैयार रहना होगा।

कैनविज टाइम्स, 22 सितम्बर 2012

Wednesday, September 12, 2012

भत्ता तोड़ देगा युवाओं का मनोबल

"   बेरोजगारी भत्ता सुनने में जितना अच्छा और आकर्षक लग रहा है, उतना ही खतरनाक है। इसलिए नहीं कि आर्थिक सहायता में कोई बुराई है। बल्कि इसलिए कि 1000 रूपए की राहत कहीं आने वाले समय में युवाओं ही नहीं बल्कि समाज के हर निम्न मध्यम वर्गीय और वंचित तबके के परिवारों के लिए गले की फांस न बन जाए। गंभीरता से गौर किया जाए तो यह योजना समाज को इसी दिशा में ले जाने वाली है....".

9 सितम्बर को प्रदेश के मुख्यमंत्री के हाथों बेरोजगारी भत्ता का चेक प्राप्त करते हुए अर्ह् बेरोजगार खुशी से फूले नहीं समा रहे थे। दूसरी तरफ कई सारे विश्लेषकों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को प्रदेश सरकार की इस योजना को मूर्त रूप देने पर दुःखी होते देखा गया। देखना होगा कि 1000 रूपए के भत्ते का प्रदेश और प्रदेश के युवाओं के लिए क्या मायने हैं। गौर तलब है कि पिछली बार जब युवा मुख्यमंत्री के पिता जी सत्ता की बागडोर संभाल रहे थे तो उस समय पहली बार यह प्रयोग किया गया था। तब भत्ता की राशि 500 रूपए थी। उस समय भी रोजगार दफ़्तरों से लेकर बैंकों में युवा छात्र-छात्राओं की लम्बी-लम्बी कतारें देखी गयी थीं। फोटो स्टेट की दुकानों पर बेकारों को जोश व खरोश से आवश्यक दस्तावेजों की फोटो काॅपी कराते देखा गया था। रोज़गार दफ़्तरों पर लगने वाली भीड़ और अब चेक प्राप्त करते हुए उनकी खुशी को देखकर बेकारी की परिथितियों का सहज अंदाजा होता है। लेकिन चेक प्राप्त करने वाले बेरोजगारों की इस भीड़ की भी अपनी प्राथमिकता है। जो महज 500 से 1000 रूपए तक सिमित है। सियासी पार्टियों और हमारे नेताओं में तो इतनी इच्छा शक्ति नहीं है कि वो रोजगार और बेरोजगार भत्ता में अन्तर बताएं। यदि अन्तर बताएंगे तो नौजवानों के मन में नौकरी की चाह पैदा होगी। राजव्यवस्था और सत्ता की दशा और दिशा पर सवाल पैदा होंगे। जो धरना-प्रदर्शन का रूप भी ले सकते हैं। अच्छा है इन्हें 1000 में उलझाए रखा जाए। भरी जवानी में उलझे हुओं को उलझाना ही तो शासक वर्ग की उलझनों का सुलझना बन चुका है।

कहना पड़ रहा है कि बेरोजगारी भत्ता सुनने में जितना अच्छा और आकर्षक लग रहा है, उतना ही खतरनाक है। इसलिए नहीं कि आर्थिक सहायता में कोई बुराई है। बल्कि इसलिए कि 1000 रूपए की राहत कहीं आने वाले समय में युवाओं ही नहीं बल्कि समाज के हर निम्न मध्यम वर्गीय और वंचित तबके के परिवारों के लिए गले की फांस न बन जाए। गंभीरता से गौर किया जाए तो यह योजना समाज को इसी दिशा में ले जाने वाली है। वो ऐसे कि 35 वर्ष की आयु काम-काज की आयु होती है। इस आयु वर्ग के नौजवानों में नई ऊर्जा, नई उमंग और नया उत्साह होता है। जब जवानी के इस उम्र में किसी को बैठे-बिठाए बेरोजगारी भत्ता मिलने लगेगा तो इससे उस व्यक्ति का सीखा हुआ स्किल (हुनर/क्षमता) स्थिर हो जाएगी। यानि जो युवा कम्प्युटर आॅपरेट करने में प्रवीण है, उसे सही समय पर इस क्षेत्र में अवसर नहीं मिलने या बेरोजगरी भत्ता का सहारा मिलने से वो भत्ता प्राप्त होने की अवधि तक सीखे हुए हुनर को व्यवहार में करने और इसमें परिवर्धन करने से वंचित रह जाएगा। ऐसे में यदि किसी कारणवश भत्ता बंद होता है, तो वह क्षमता विहीन युवा रह जाएगा। जिसे आज के प्रतिस्पर्धी दौर में कोई भी सरकारी या गैर-सरकारी अमला अपनी प्राथमिकता में रखना नहीं चाहेगा। अच्छा होता कि प्रदेश के युवाओं के लिए 1000 रूपए के बेरोजगारी भत्ता के बजाए कम से कम 999 रूपए के रोजगार की व्यवस्था की जाती।

बेरोजगारी भत्ता से भी अच्छा और आकर्षक टैबलेट और लैपटाप की योजना है। शिक्षा और साक्षरता में विकास की कई सीढि़यां चढ़ने के बाद भी गांव-कस्बे के लोग अभी तक टैबलेट को दवा ही समझ पा रहे थे। भला हो सूचना क्रान्ति का जिसके चलते गंवई जीवन जीने वाले लोग न सिर्फ टैबलेट नामक इलेक्ट्राॅनिक यंत्र के बारे में जागरूक हो रहे हैं बल्कि यह यंत्र उनके सपनों में आकार लेने लगा है। सपनों का होना अच्छी बात है। पाश ने भी कहा था “सबसे बुरा होता है सपनों का मर जाना...”। लेकिन उन सपनों का क्या जो आर्थिक क्रिया-कलापों (सीधा कहें तो बाजारवाद) को बढ़ाने के नाम पर थोपा जा रहा हो। आज के फेसबुकिया दौर में प्रदेश के बच्चों को टैबलेट और लैपटाप देने की योजना ऐसे सपनों को पैदा व जवान करने की योजना है।

कौन नहीं जानता कि प्रदेश के हाई स्कूल और इण्टरमीडिएट कालेजों में ऐसे अध्यापकों की कमी है जो हमारे बच्चों को कोचिंग के शोषक व्यवस्था से मुक्त करा सकें। सवाल यह भी है कि असमान प्रतिस्पर्धा के चलते जिन बच्चों का मनोबल टूट जाता है और प्रतिवर्ष जो बच्चे आत्महत्या करते हैं, वैसे बच्चों को टैबलेट और लैपटाप किस तरह राहत पहंुचाएगा। यदि टैबलेट और लैपटाप की उपयोगिता को स्वीकार कर भी लिया जाए तो इन यंत्रों के मेन्टीनेन्स (रख-रखाव) और बिजली की सप्लाई आदि ज़रूरतों को पूरा करने की गारण्टी कौन लेगा। क्या हम दावे के साथ कह सकने की स्थिति में हैं कि हमारे प्रदेश के गरीब बच्चों के घरों तक बिजली पहुंच पाती है या उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी है कि वो लैपटाप या टैबलेट से संबंधित अन्य ज़रूरतों को पूरा कर पाने में सक्षम हैं? शायद नहीं! फिर ऐसे में प्रदेश के बच्चों को प्राइमरी से लेकर उच्च शिक्षा व्यवस्था का ऐसा ढ़ांचा चाहिए जिसमें न तो कोचिंग की ज़रूरत हो और न ही मुफ़्त टैबलेट या लैपटाप की। कहना नहीं है कि प्रदेश की नयी पीढ़ी के छात्र-छात्राओं की आवश्यकताओं की प्राथमिकता सूची तैयार करके उनकी शिक्षा और रोजगार के अवसर सृजित करना बेरोजगारी भत्ता, टैबलेट और लैपटाप के निःशुल्क वितरण से बेहतर होता।

कैनविज़  टाइम्स, १२ सितम्बर २०१२

Friday, August 17, 2012

मुस्लिम बच्चों की शिक्षा

मदरसों के भ्रम जाल में फंस कर मुस्लिम बच्चों की शैक्षिक वंचना से नज़र चुराना शिक्षा के क्षेत्र में अब तक प्राप्त उपलब्धियों को मुंह चिढ़ाता है। ऐसा नहीं है कि मुसलमान अपने बच्चों को तालीम नहीं देना चाहते हैं।......
यदि सच्चर कमेटी की रिपोर्ट की बात करें तो 7-16 आयु वर्ग में स्कूल जाने वाले कुल मुस्लिम बच्चों में महज 4 प्रतिशत बच्चे ही बुनियादी शिक्षा के लिए मदरसों पर निर्भर हैं। जबकि 30 प्रतिशत प्राइवेट स्कूलों तथा शेष 66 प्रतिशत सरकारी स्कूलों पर निर्भर हैं। दूसरी ओर स्कूल जाने वाले कुल मुस्लिम बच्चों में 25 प्रतिशत बच्चे या तो ड्राॅपआउट बच्चे हैं या फिर स्कूल जाने के किसी भी अवसर से वंचित हैं। 

आबादी की दृष्टि से पश्चिमी उत्तर प्रदेश स्थित मेरठ, मुजफ़्फ़रनगर और सहारनपुर आदि जिले देश के उन 50 जिलों में है जहां मुस्लिम आबादी का अनुपात 30 प्रतिशत या इससे अधिक है। इन शहरों में कई मुहल्ले तो ऐसे हैं जहां मुसलमानों का ही बाहुल्य है। बात करते हैं सहारनपुर की जो परंपरागत काष्ठ उद्योग के लिए जाना जाता है। पिछले कुछ सालों से यहां होजरी उद्योग भी काफी फल-फूल रहा है। इस जिला के शहरी क्षेत्र में रहने वाले मुसलमानों की आजीविका मुख्यतः इन्हीं दो उद्योगों पर ही निर्भर है। देश और दुनिया में अपनी कला का डंका बजाने वाले यहां के कलाकारों विशेषकर मुसलमानों में बेरोजगारी नज़र नहीं आती है। लेकिन सम्पन्न दिखाई देने वाले यहां के मुसलमानों के जीवन के कई ऐसे पहलू हैं जो हमें नयी तस्वीर दिखाते हैं।

दरअसल सहारनपुर के काष्ठ उद्योग में काम करने वालों की जमात में वो लोग भी शामिल हैं जो रिटायरमेन्ट की उम्र से काफी आगे निकल चुके हैं। वो मासूम बच्चे भी जो काम करने के लिए निम्नतम आयु की पात्रता नहीं रखने के बाद भी आजीविका की जिम्मेदारी उठाते है। और वो महिलाएं भी जो इन उद्योगों में फिनिशिंग वर्क के सहारे अपने घर-परिवार के लिए आजीविका जुटाती हैं। वर्क कल्चर तो यहां के हर गली-चैराहे पर दिखाई पड़ता है। लेकिन साक्षरता की बात आती है तो यहां मुस्लिम साक्षरता दर लुढ़की हुई नज़र आती है। वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार इस जिला में मुस्लिम साक्षरता दर 47.64 प्रतिशत है, जो जिला, राज्य और देश तीनों ही स्तर के औसत साक्षरता दर से काफी कम है। उसमें भी महिलाओं में साक्षरता दर का प्रतिशत 38.43 है जो 55.56 प्रतिशत मुस्लिम पुरूष साक्षरता दर से 17.13 अंक प्रतिशत कम है। एक तरफ जहां ग्रामीण क्षेत्रों में मुस्लिम साक्षरता दर 45.02 प्रतिशत के हताशाजनक स्थिति में है वहीं दूसरी तरफ शहरी क्षेत्रों में भी मुस्लिम साक्षरता दर की स्थिति अच्छी नहीं है। सहारनपुर के शहरी क्षेत्रों में मुस्लिम साक्षरता दर 52.61 प्रतिशत है। मुस्लिम समाज में साक्षरता की दयनीय स्थिति को देखते हुए इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि इस जिला में मुस्लिम आबादी का आधा हिस्सा निरक्षर और अशिक्षित है। सवाल यह है कि जो जिला उद्योग-धन्धे में देश ही नहीं विदेशों में भी जाना जाता है, उस जिला में मुसलमानों की ऐसी स्थिति क्यों है?

आम तौर पर जागरूकता और चेतना का अभाव निरक्षरता के लिए जिम्मेदार कारक माना जाता है। लेकिन पिछले कुछ बरसों से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर, मुजफ़्फ़रनगर और मेरठ जैसे जिलों की यात्रा से मुस्लिम समाज के बारे में कुछ नए तथ्य और सत्य को समझने का अवसर मिला है। देश के मुसलमानों के बारे में कायम यह धारणा इस जिला के मुसलमानों पर भी लागू होता है जो मुसलमानों को संकीर्ण सोच वाला समुदाय मानता है। लेकिन ज़मीनी हक़ीकत इस इस बात को झुठलाते हैं कि स्कूलों में मुस्लिम बच्चों की कम होती संख्या समुदाय के संकीर्ण सोच के कारण है। जहां तक मदरसों का संबंध है तो निश्चित तौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इनकी तादाद तुलनात्मक रूप से अधिक है और मुख्यतः ये दीनी यानि धार्मिक शिक्षा के केन्द्र हैं। लेकिन ऐसे मदरसों की संख्या भी कम नहीं है जो सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त हैं। यदि सच्चर कमेटी की रिपोर्ट की बात करें तो 7-16 आयु वर्ग में स्कूल जाने वाले कुल मुस्लिम बच्चों में महज 4 प्रतिशत बच्चे ही बुनियादी शिक्षा के लिए मदरसों पर निर्भर हैं। जबकि 30 प्रतिशत प्राइवेट स्कूलों तथा शेष 66 प्रतिशत सरकारी स्कूलों पर निर्भर हैं। दूसरी ओर स्कूल जाने वाले कुल मुस्लिम बच्चों में 25 प्रतिशत बच्चे या तो ड्राॅपआउट बच्चे हैं या फिर स्कूल जाने के किसी भी अवसर से वंचित हैं।

ज़ाहिर है मदरसों के भ्रम जाल में फंस कर मुस्लिम बच्चों की शैक्षिक वंचना से नज़र चुराना शिक्षा के क्षेत्र में अब तक प्राप्त उपलब्धियों को मुंह चिढ़ाता है। ऐसा नहीं है कि मुसलमान अपने बच्चों को तालीम नहीं देना चाहते हैं। पिछले दिनों सहारनपुर के मुस्लिम बाहुल्य बस्तियों पक्का बाग, खाता खेड़ी और नूर बस्ती के लोगों विशेषकर महिलाओं से सीधी बातचीत के दौरान बच्चों की शिक्षा के प्रति उनकी ललक महसूस किया। लेकिन मीडिया वालों के लिए इमराना और गुडि़या जैसी खबरें इकट्ठी करने की रेलमपेल में शिक्षा जैसी बुनियादी मुद्दा पीछे छूट जाता है। बहरहाल सहारनपुर की शहरी बस्तियों में कई जगह तो सरकारी स्कूल ही नहीं हैं। नूर बस्ती ऐसे ही मुहल्लों में एक है। जहां है वहां स्कूल के भवन और अध्यापकों से लेकर शैक्षिक वातावरण आदि की स्थिति संतोषजनक नहीं है। ऐसे में मुस्लिम बच्चों की स्कूल से दूरी कोई अचरज की बात नहीं है।

बहरहाल, ऐसे स्कूल भी हैं जहां अध्यापकों के व्यवहार से मुस्लिम बच्चों का मनोबल टूटता है और स्कूल से उनका मोह भंग हो जाता है। उदाहरण के तौर पर सहारनपुर के ही सुढ़ौली कदीम ब्लाॅक के उन बच्चों को देखें जिन्हें बाल्यावस्था में भेदभाव के कारण स्कूल जाने के अवसर से वंचित होना पड़ता है। इस ब्लाॅक में मुस्लिम महिलाओं और बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता नाज़मा बताती हैं कि “नए शैक्षिक सत्र में जब वो कुछ मुस्लिम बच्चों के दाखिले के लिए स्कूल गयीं तो स्कूल प्रबन्धन की तरफ से उन बच्चों के दाखिला संबंधी औपचारिकता पूरा करने के बजाय खु़द उनकी सामाजिक भूमिका पर सवाल उठाते हुए यह कहा गया कि वो सिर्फ मुस्लिम बच्चों का ही दाखिला क्यों करा रही हैं। उन्होंने अपने समाजिक कार्यों और टार्गेट ग्रुप के बारे बताया कि जब प्रधानमंत्री द्वारा गठित उच्चस्तरीय सच्चर समिति ने इस बात को माना है कि स्कूल जाने वाले 25 प्रतिशत बच्चे स्कूलों से बाहर हैं, तो इस दिशा में काम करने में ग़लत क्या है।”

नाज़मा का यह अनुभव इस सच्चाई से परदा उठाता है कि स्कूलों में मुस्लिम बच्चों के साथ भेदभाव होता है। जिसके चलते वो सरकारी स्कूल नहीं जाना चाहते हैं। बादशाही बाग की समाज सेविका रानी मिर्जा की बातों पर यकीन करें तो “भेदभाव का आलम यह है कि मुस्लिम बच्चों को चिन्हित करके उनसे स्कूल परिसर में झाड़ू लगवाया जाता है। यही नहीं उनसे मध्यान्ह्य भोजन की व्यवस्था में भी काम लिया जाता है।” नाज़मा और रानी जैसी समाज सेविकाओं का यह अनुभव आए दिन अखबारों में छपने वाली उन खबरों और तस्वीरों से साम्य रखता है जिसमें बच्चों द्वारा विशेषकर दलित समुदाय के बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है। लेकिन मानव विकास के शैक्षिक सूचकांक पर मुस्लिम समाज की बदहाली का यह चित्र शायद ही किसी अखबार और रिपोर्टर के लिए कोई महत्व रखता है। समझा जा सकता है कि मौजूदा दौर में मानव विकास के सूचकांक पर मुसलमान किस पायदान पर हैं। इन परिस्थितियों के कारण ही एक तरफ जहां मुस्लिम बच्चों का मनोबल टूटता है, वहीं दूसरी तरफ उनकी शिक्षा या तो मदरसा तक सिमित रह जाती है या फिर वे शिक्षा के किसी भी अवसर से वंचित रह जाते हैं। यही बच्चे खेतों-खलिहानों से लेकर ढ़ाबा और काष्ठ व होजरी उद्योग में नज़र आते हैं।

अचरज की बात तो यह है कि बाल अधिकारिता से संबंधित तमाम सरकारी विभागों को सर्व शिक्षा अभियान के दौरान मुस्लिम समाज का यह चित्र दिखाई नहीं देता है। कहना पड़ रहा है कि ऐसे परिवेश में यदि प्रधानमंत्री का पन्द्रह की जगह तीस सूत्री कार्यक्रम भी होता तो उसके परिणाम भी इसी तरह निराशाजनक होते जैसा कि पन्द्रह सूत्री कार्यक्रम के हैं। ज़रूरी हो जाता है कि योजनाओं को बनाने और क्रियान्वयन से पहले समुदाय स्तर की रूकावटों को दूर करने की इमानदार कोशिश की जाए।

कैनविज टाइम्स, 17 अगस्त 2012

Wednesday, August 1, 2012

निवेश आधारित मीडिया की दशा और दिशा


पिछले कुछ वर्षों में खासकर इलेक्ट्राॅनिक मीडिया में ऐसी प्रस्तुतियों को प्रधानता प्राप्त हुई है जो निवेश और मुनाफा के सिद्धांतों पर आधारित हैं। चूंकि मीडिया भी एक तरह का साहित्य है और साहित्य समाज का दर्पण कहा जाता है। लेहाजा यह मानना होगा कि मीडिया में भी जो कुछ दिखाया जा रहा है वह हमारे समाज का सच है। लेकिन मीडिया की प्रस्तुतियों को सिर्फ साहित्य के दायरे तक सिमित करके नहीं देखा जा सकता है। क्योंकि मीडिया मनोरंजन के साथ-साथ संवाद का असरदार माध्यम भी है और लोकतंत्र के चैथे स्तंभ के रूप में इसकी अपनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी होती हैं। मौजूदा दौर में तो इलेक्ट्राॅनिक मीडिया समय की तंगी का सस्ता और आसान विकल्प भी है। देखा जाए तो पिछले बीस बरसों में मीडिया बदलाव के बड़े दौर से गुज़रा है। बदलाव के इन दो दशकों में मीडिया विशेषकर इलेक्ट्राॅनिक मीडिया की जो नयी पहचान बनी है, उसे निवेश, टी.आर.पी. और मुनाफा से अलग करके नहीं देखा जा सकता है।
निवेश आमंत्रित करना अर्थव्यवस्था के प्राथमिक उद्देश्यों में है। क्योंकि इसका संबंध आर्थिक विकास की दर से बताया जाता है। इस दृष्टि से मीडिया निवेश आमंत्रित करने और निवेशकों दोनों के लिए एक ऐसा क्षेत्र है जहां कम समय में अधिक मुनाफा का संयोग प्रबल है। सरकार उच्च विकास दर हासिल करने के लिए अधिक से अधिक निवेश चाहती है तो वहीं दूसरी तरफ देसी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अधिक से अधिक मुनाफा प्राप्त करने के लिए अधिकाधिक निवेश की करने को लालायित हैं। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि बाजारवादी व्यवस्था में “अधिक निवेश और अधिक मुनाफा” के फार्मुला पर काम करता है। 1991 के बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था की दशा और दिशा में जो बदलाव सामने आए हैं, उससे सरकार और कल्याणकारी राज्य की अवधारणा ही बदल गयी है। जिसके चलते मनोरंजन चैनलों की प्रस्तुतियों में समाज के गंभीर मुद्दों को उपभोग करने वाली ऐसी वस्तु के रूप में परोसा जाना संभव हुआ है जिसे देखने वालों की संख्या निरन्तर बढ़ी है। ऐसे मनोरंजक प्रस्तुतियों को देखने वाले दर्शकों की संख्या में वृद्धि का सीधा संबध टी.आर.पी. से है। टी.आर.पी. में वृद्धि का मतलब है अधिक विज्ञापन और अधिक मुनाफा। ज़ाहिर है, निवेश, टी.आर.पी. और मुनाफा रंजित मनोरंजक सीरियलों में किसी गंभीर सामाजिक समस्या की प्रस्तुति और समस्या के समाधान की संभावनाएं निरन्तर कम होती गयी हैं। पिछले दिनों देश में गिरते शिशु लिंगानुपात, दहेज और बच्चों के साथ यौनाचार जैसे मुद्दों पर एक चैनल ने “सत्यमेव जयते” शुरू किया जिसके एंकर आमिर खान को प्रस्तुति के एवज में करोणों-करोण का भुगतान किया जा रहा है। “सत्यमेव जयते” या ऐसे अन्य सीरियलों/रियालिटी शो की प्रस्तुति के मुद्दों से कोई विरोध नहीं है। लेकिन देखना होगा कि क्या समाज के गंभीर मुद्दों को मीडिया के केन्द्र में लाने और समाज को जागरूक करने के लिए सेलेब्रिटि का होना अनिवार्य और अपरिहार्य हैं? क्या ऐसे मुद्दों पर समाज को चेतित करने में ज़मीनी सतह पर काम करने वाले लोगों की कोई भूमिका नहीं रही है? दरअसल सेलेब्रिटी द्वारा प्रस्तुति का संबंध भी मीडिया के निवेशवादी माॅडल से है। यह संबंध निवेश, टी.आर.पी. प्रस्तुति, प्रसारण और दर्शक हर स्तर पर है। ऐसे कार्यक्रमों के स्क्रिप्ट राइटर, एडिटर, प्रस्तुतकर्ता और इन्हें देखने वाले तथा टिप्पणी करने वाले सभी उसी क्लास से आते हैं जो मुनाफा आधारित सुविधाभोगी जीवन में विश्वास करते हैं। यही वजह है कि जमीनी कार्यकर्ताओं को उनके तमाम संघर्षों के बाद भी न तो उन्हें उचित मानदेय/पारिश्रमिक मिल पाता है और न ही ख्याति। मीडिया का यही रूप नागवार है।
आज की मीडिया निवेश के दम पर मुख्य धारा की मीडिया को परिभाषित कर रही है। प्रस्तुति के विषय, तौर तरीके और दर्शक की संख्या तय कर रही है। कुछ कहिए तो एक मिथक जनता पर थोप कर खुद को आर्थिक दोहन के इल्जाम से बरी भी कर लेती है। सवाल लाज़मी है कि आर्थिक दोहन के पूरे प्रकरण में मीडिया का एकतरफा प्रभाव कैसे संभव हो पाता है। दरअसल सैटेलाइट चैनलों के माध्यम से एक ही समय में लाखों-करोड़ों परिवारों और व्यक्तियों तक पहुंचना तो मुमकिन है। लेकिन लाखों-करोणों व्यक्तियों के लिए एक क्लिक में अपनी शिकायतों को सही जगह पहुंचाना संभव नहीं है। बहरहाल, सैटेलाइट चैनलों पर शिकायत करने के लिए http://www.nbanewdelhi.com/ फ्लैश किया जा रहा है। ताकि किसी कार्यक्रम में किसी भी तरह की आपत्ति हो तो दर्शक इस वेव साइट पर आॅन लाइन शिकायत कर सकें। लेकिन इस साइट पर जो आॅब्जेक्टिव दिए गए हैं उनमें निवेशवादी मीडिया इंडस्ट्री के हित रक्षण का ध्येय अधिक प्रभावी जान पड़ता है। दूसरी तरफ कानूनी कार्यवाही के लिए न जो जनता के पास पैसे हैं और न ही इतना समय कि वो मनोरंजन के आर्थिक दोहन की गतिविधियों के विरोध में व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर कोई कानूनी हस्तक्षेप करे। खासकर ऐसे में जबकि कमरतोड़ महंगाई और आजीविका के लिए अधिक से अधिक संसाधन जुटाने का वैश्विक संकट दिनों-दिन गहराता जा रहा हो। “सोने की जेब और लोहे के पैर” वाली कहावत प्रासंगिक जान पड़ता, है जो पूंजीपरस्त मीडिया घरानों के पास ही है। लोकतंत्र में सभी को आज़ादी का समान हक है। शायद यही वजह है कि यदि चैनलों को प्रस्तुति के तौर-तरीकों की आज़ादी है तो वहीं दूसरी तरफ दर्शकों को चैनलों पर दिखाए गए किसी कार्यक्रम के खिलाफ शिकायत की आज़ादी भी है। लेकिन कहना होगा कि लोकतांत्रिक आज़ादी की सीमा तय करने में आर्थिक सुधारों पर आधारित निवेश की भूमिका लगातार बढ़ी है। जिसकी वजह से बड़ी और मज़बूत आज़ादी के सामने छोटी और कमज़ोर आज़ादी को दम तोड़ना पड़ रहा है।
जाहिर है मीडिया के नए ताने-बाने और तौर-तरीकों को स्वाभाविक स्वीकृति आर्थिक सुधारों के मीडिया पर पड़ने वाले प्रभावों में सबसे अहम है। ऐसे में तथाकथित मुख्य धारा की मीडिया की भूमिका निवेश के अनुरूप तय होना भी स्वाभाविक है। समाज के किसी ज्वलंत मुद्दे का अर्थपूर्ण होना या महत्वहीन होने में इस स्वाभाविकता की बड़ी भूमिका है। इस स्वाभाविकता के चलते ही न तो ज़मीनी समस्याओं को प्रमुखता मिल पाती है और ज़मीनी स्तर पर काम करने वाली हाशिए की आवाज़ों को यथा सम्मान मिल पाता है।


कैनविज टाइम्स, 27 जून 2012

Monday, May 28, 2012

आर्थिक सुधारों की विवशता है मूल्य वृद्धि

पेट्रोल की कीमतों में की जाने वाली वृद्धि को पेट्रोलियम मंत्री ने अर्थव्यवस्था के दीर्घकालिक हित के लिए उचित फैसला बताया तो वहीं दूसरी तरफ बढ़ी कीमतों का ठीकरा राज्य सरकारों के सर फोड़ते हुए यही भी कहा गया कि यदि राज्य सरकारें करों में कमी करें तो पेट्रोल सस्ता हो सकता है। तीसरी ओर छुटपुट विरोध-प्रदर्शनों को छोड़ दें तो  मूल्य वृद्धि की खबरें प्रसारित होते ही बाइक और कार सवार उपभोक्ताओं को पेट्रोल पम्पों की ओर कूच करते देखा गया ताकि वो अधिक से अधिक ईंधन संरक्षित कर सकें। यह पहली बार नहीं है कि ईंधन में वृद्धि की गयी है। बल्कि पिछले कुछ बरसों में कभी वैश्विक बाजार में प्रति बैरल पेट्रोलियम ईंधन की कीमतों में वृद्धि तो कभी वैश्विक मंदी को संदर्भित करके ईंधन में वृद्धि की जाती रही है। पेट्रोल कीमतों में हालिया वृद्धि के पीछे सबसे बड़ा तर्क यह दिया जा रहा है कि अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए वृद्धि जरूरी थी।

जहां तक भारतीय अर्थव्यवस्था की बात है तो 1991 में इसे राजकोषीय घाटा और मुद्रा स्फीति के संकट से बचाना सबसे बड़ी चुनौती थी। इस निमित्त भूमण्डलीकरण को सबसे अच्छा विकल्प मानकर आर्थिक सुधारों की नीति अपनायी गयी। आर्थिक सुधारों की राह पर पग रखते हुए यह कहा गया था कि इस नीति के बदौलत आने वाले समय में अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होगी। लेकिन पिछले दो दशकों के अनुभव बताते हैं कि अर्थव्यवस्था में कमोबेश उतार-चढ़ाव को छोड़ दिया जाए तो इसके नाकारात्मक परिणाम ही अधिक रहे हैं। यह बात अलग है कि संवृद्धि को ही सम्पूर्ण विकास मानने वाले अर्थशास्त्रियों और विश्लेषकों की नज़र में देश पहले से खुशहाल और समृद्ध हुआ है। लेकिन सामाजिक संदर्भों में देखा जाए तो अमीरी और गरीबी की खाई पहले से कहीं अधिक बढ़ी है। दूसरी तरफ मंहगाई कब एक से दो अंकों में पहुंच जाती है इसका पता आम जनता को नहीं होता। जाहिर है पेट्रोल कीमतों में लगातार वृद्धि को सही ठहराने के लिए एक बार फिर 1991 जैसे ही तर्कों का सहारा लिया जा रहा है कि आने वाले समय में देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। एक आम नागरिक की हैसियत से इस सवाल को आपके बीच रखना चाहता हूं कि वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि से अर्थव्यवस्था को यदि वास्तव में मजबूती मिलती है और समाज के हर तबके तक विकास की धारा पहुंचती है तो कहना नहीं होगा कि पिछले दो दशक में तमाम वस्तुओं की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। लेकिन दुःखद है कि मंहगाई ही अर्थव्यवस्था की मजबूती की शर्त है तो आसमान छूती मंहगाई के इस दौर में भी देश की अर्थव्यवस्था आखिर क्यों संकटों से घिरी हुई है?

गौर तलब है कि राज्य सरकारों को करों में कमी करके मूल्य वृद्धि से राहत दिलाने का तर्क देकर न सिर्फ वृद्धि से ध्यान हटाने की कोशिश हो रही है बल्कि मूल्य वृद्धि के फैसले को वापस लेने के सरोकार की संभावनाओं को भी सिरे से नकारा जा रहा है। पूरी बहस इस बिन्दु पर केन्द्रित है कि यदि राज्य सरकारें चाहें तो पेट्रोलियम ईंधन पर करों में कमी करके पेट्रोल कीमतों को कम कर सकते हैं। ध्यान देना होगा कि एक तरफ केन्द्र सरकार मुक्त बाजार के सिंद्धांतों या यूं कहें कि आर्थिक सुधारों की विवशता के कारण तेल कम्पनियों पर नियंत्रण समाप्त करने की दिशा में अग्रसर है वहीं दूसरी तरफ वृद्धि के फैसले खुद करके राज्य सरकारों को अपने करों में कमी करने का सुझाव भी दे रही है। निश्चित तौर पर पेट्रोलियम उत्पादों पर राज्य द्वारा वैट की दर कम किए जाने की भी जरूरत है। लेकिन यह भी तय होना चाहिए कि इस कमी के बाद पेट्रोल जैसे ईंधन उचित मूल्य पर उपलब्ध होने लगेंगे?

पेट्रोलियम कंपनियों का हाल यह है कि ये नियंत्रणहीनता और मुनाफा चाहती हैं। अर्थशास्त्रीय शब्दावली में कहा जाए तो हानि की स्थिति में कोई भी व्यापारिक प्रतिष्ठान अधिक दिनों तक सेवा नहीं दे सकता है। लेकिन मुक्त बाजार के सिद्धांतों के अनुरूप लिया जाने वाला हर फैसला मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति को न सिर्फ बढ़ावा दे रहा है बल्कि आम जनता तक संसाधनों की पहुंच में रूकावट पैदा कर रहा है। इस बात को इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि जब-जब पेट्रोल या डीजल जैसे ईंधनों में वृद्धि होती है इसका प्रभाव यातायात किराया पर भी पड़ता है। विशेषकर गांव से कस्बों और कस्बों को शहरों से जोड़ने वाले यातायात पर। अनुमानतः 20 किमी की यात्रा के लिए एक आम व्यक्ति को कम से कम 20 रूपए का भुगतान करना पड़ता है। वो भी वैसे स्थानों पर जहां नियमित रूप से यातायात संसाधन उपलब्ध हैं।

कुछ बातें मीडिया की भी हो जाए। मीडिया को पेट्रोल पम्पों पर कार सवारों और बाइक सवारों की भीड़ आसानी से नजर आ जाती है। लेकिन बसों और रेलगाडि़यों की भीड़ जो हर दिन हर बस और रेलगाड़ी में जानवरों की मानिन्द सफर करती है, उस भीड़ की ओर कैमरा घुमाना और प्रसारण दिक्कत तलब काम होता है। कहना नहीं है कि ईंधन की कीमतों में वृद्धि यातायात संसाधनों की सिमित सुलभता जैसी स्थिति में यातायात संकट को अधिक गहराने वाला फैसला है। ऐसे में यदि कोई गरीब यदि समय रहते इलाज के लिए अस्पताल न पहुंच पाने के कारण दम तोड़ दे तो हैरानी की बात नहीं। कोई आम व्यक्ति अपने किसी प्रिय संबंधी या शुभचिंतक का कुशलक्षेम पूछने दस-बीस किमी की यात्रा न कर पाए तो भी हैरान होने की ज़रूरत नहीं है। क्योंकि अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए इनकी भावनाओं की अवहेलना और त्याग आवश्यक है। पेट्रोल पम्पों पर भीड़ लगाकर टंकी फुल करवाने वालों का क्या! वो तो क्षणिक राहत प्राप्त करने के अभ्यस्त हो चुके हैं। विरोध-प्रदर्शन तो बस राजनीतिक क्षमता प्रदर्शन तक सिमित होकर रह गया है। वरना संसद में बैठ प्रतिनिधियों से आंख चुराकर किसी भी सरकार के लिए जनविरोधी फैसले लेना आसान काम नहीं है।

कैनविज टाइम्स, 29 मई, 2012

Monday, May 7, 2012

निजी विद्यालयों में सीट आरक्षण के मायने

उच्चतम न्यायालय ने एक फैसले मेें निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 को सही ठहराते हुए सहायता प्राप्त और गैर-सहायता प्राप्त निजी स्कूलों के साथ-साथ सहायता प्राप्त अल्पसंखयक विद्यालयों में भी दाखिले में समाज के कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीट आरक्षित करने संबंधी प्रावधान को उचित बताया है। ज्ञात हो कि निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के कुछ प्रावधानों पर बहस होती रही है। इनमें अल्पसंख्यक विद्यालयों को इस कानून के दायरे में लाना और निजी विद्यालयों में अधिनियम को प्रभावी ढ़ंग से लागू कराना आदि प्रमुख मुद्दे रहे हैं। शिक्षा का अधिकार अधिनियम और सुप्रीम कोर्ट के हालया फैसले के आलोक में यह देखना होगा कि निजी विद्यालयों में सीट आरक्षण के जरिए समाज के कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों का किस प्रकार और किस हद तक भला हो पाता है?
सीट आरक्षण के प्रावधान को यदि राष्ट्रीय संदर्भ देखा जाए तो सातवें अखिल भारतीय शिक्षा सर्वेक्षण के अनुसार प्राथमिक स्तर पर देश के महज 11.24 प्रतिशत निजी विद्यालय ही इस दायरे में आते है। जिनमें 3.62 प्रतिशत सहायता प्राप्त एवं 7.62 प्रतिशत गैर-सहायता प्राप्त निजी विद्यालय हैं। जबकि 88.73 प्रतिशत प्राथमिक विद्यालय सरकार या स्थानीय निकायों द्वारा संचालित किए जाते हैं। ऐसे में सीट आरक्षण के मामले पर संदेह लाज़मी है। कहीं ऐसा तो नहीं कि इस बहाने निजी विद्यालयों की साख को मजबूत करने की कोशिश की जा रही है, ताकि मध्यम वर्ग की आकांक्षाओं की पूर्ति हो सके। यानि एक पन दो काज। 88.73 प्रतिशत विद्यालयों में शिक्षा के संसाधनों को बेहतर बनाने और उनके सुचारू संचालन के बजाए 11.24 प्रतिशत निजी विद्यालयों पर ध्यान केन्द्रित करना कहीं न कहीं सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की जिम्मेदारियों से सरकार के विमुख होने का संकेतक है।
बहरहाल निजी स्कूलों के आस्तित्व और मौजूदा दौर की शिक्षण व्यवस्था में उनकी भूमिका को नकारा भी नहीं जा सकता है। खासकर केरल जैसे राज्यों में जहां 58.50 प्रतिशत सहायता प्राप्त तथा 2.07 गैर-सहायता प्राप्त निजी विद्यालय हैं। इस राज्य में सरकारी और स्थानीय निकायों द्वारा संचालित विद्यालय क्रमशः 38.04 और 1.37 प्रतिशत है। केरल दक्षिण भारतीय राज्य है और वहां साक्षरता की दर भी सर्वाधिक है। वहां के संदर्भों के साथ इस विषय पर अलग से बात की जा सकती है। फिलहाल बात करते हैं उत्तर प्रदेश की, जहां सहायता प्राप्त निजी विद्यालयों की संख्या 2.33 प्रतिशत और गैर-सहायता प्राप्त निजी विद्यालयों की संख्या 20.62 प्रतिशत है। ज़ाहिर है देश के सबसे बड़े राज्य में प्राथमिक शिक्षा में निजी विद्यालयों की संख्या और भूमिका दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। शायद यही वजह है राज्य के निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीट आरक्षण का मामला महत्वपूर्ण है।
जब संख्या और भूमिका महत्वपूर्ण है तो फिर यह भी समझने की जरूरत है कि निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत आरक्षित सीटों पर प्रवेश पाने वाले बच्चों की कमजोरी और वंचना को परिभाषित कैसे किया जाएगा। यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि निजी स्कूलों की फीस में काफी विविधता है। प्रदेश में पचास रूपए से लेकर ढ़ाई तीन हजार प्रति माह वाले स्कूल आस्तित्व में हैं। तय करना होगा कि 50 रूपए फीस का भुगतान करने वाले परिवारों के लिए सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर एवं वंचित होने के क्या मायने हैं और पचास-सौ से लेकर ढ़ाई-तीन हजार रूपए भुगतान करने वाले परिवारों के लिए सामाजिक वंचना क्या होती है? यदि सैनिकों के बच्चों की शिक्षा पर केन्द्र सरकार द्वारा की जाने वाली मासिक राशि के भुगतान की बात करें तो यह राशि प्रति बच्चा लगभग 1000 रूपए है। यदि इसे माॅडल बनाया जाए तो फिर इसमें संशय नहीं कि 1000 से अधिक राशि के फीस वाले निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत कमजोर और वंचित परिवारों के बच्चों का स्वतः बहिष्करण कोई नहीं रोक सकता। शिक्षा का अधिकार कानून में उल्लेख है कि सरकार द्वारा निर्धारित राशि अथवा स्कूल की फीस जो भी कम हो उतनी राशि वापस की जाएगी। इस युक्ति को बी.पी.एल. से जोड़ कर भी देखा जा सकता है। क्योंकि सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े परिवारों को चिन्हित करने के लिए संभावित मानक के तौर पर या तो बी.पी.एल. परिवारों को पात्रता दी जाय या पात्रता के लिए आय की सीमा निर्धारित की जाए। चूंकि बी.पी.एल. कार्ड को लेकर पहले ही धोखाधड़ी की ढ़ेरों प्रकरण प्रकाश में आ चुके हैं। कई मामले तो ऐसे भी हैं जिनमें अपात्र परिवारों को बी.पी.एल. कार्ड जारी किए गए हैं। अनाज, तेल और 30000 हजार रूपए के मुफ्त इलाज के लिए जो लोग निर्धनों और वंचितों का हक मारने से जरा भी नहीं हिचकते, संभव है ऐसे लोग नामी विद्यालयों में कमजोर और वंचित का रूप धारण कर अपने अपने बच्चों का दाखिला कराने की हिमाक़त करें। याद रहे कि जब नब्बे के दशक में मंडल के तहत ओ.बी.सी. आरक्षण लागू हुआ था तो हमारे जागरूक होते समाज में ऐसे प्रकरण सामने आए थे, जहां देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों और सरकारी नौकरियों में फर्जी प्रमाण पत्र के माध्यम से बहुतेरे लोगों ने आरक्षण का लाभ प्राप्त किया था।
शिक्षा विकास की कुंजी है। मौजूदा प्रतिस्पर्धी माहौल में गुणवत्तापरक शिक्षा दिलाना हर माता-पिता का सपना है। होना भी चाहिए। लेकिन जिस तेजी से शिक्षा का व्यवसायीकरण हुआ है, उससे जागरूक-चेतित लोगों की निर्भरता निजी विद्यालयों पर बढ़ी है। दुःख की बात है कि जागरूक और चेतित लोगों में कम ही ऐसे हैं जिनकी मानसिकता में परिमाणात्मक बदलाव आया है। यहां तो सारा खेल नम्बर वन का बना दिया गया है। शिक्षा में सीखो-सीखो के बजाय मुनाफा-मुनाफा का खेल खेला जा रहा है। मुनाफा के खेल ने शिक्षण व्यवस्था में वर्गीय चरित्र को ही विकसित किया है। इसी वजह से इस बात को बल मिलता है कि कोई निजी विद्यालय जो वर्गीय चरित्र के सिद्धांतों पर स्थापित और विकसित हुआ है, वो आसानी से समाज के कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों को व्यवहार रूप में अपनाना नहीं चाहेगा। मौजूदा हालात को देखते हुए जरूरी है कि निजी विद्यालय प्रबंधन की संवेदना को जगाया जाए। तभी शिक्षा का अधिकार कानून का प्रभावी क्रियान्वयन संभव हो सकेगा और 25 प्रतिशत सीट आरक्षित करने संबंधी प्रावधान के साकारात्मक परिणाम भी आ सकेंगे।
22 अप्रैल 2012, कैनविज टाइम्स लखनऊ