Wednesday, May 15, 2013

समीक्षा - महिलाओं के अधिकार और मुस्लिम समाज

करीब डेढ़ साल पहले एक्शनएड, लखनऊ और सेन्टर फार हारमोनी एण्ड पीस, वाराणसी के सौजन्य से डा॰ असग़र अली इंजीनियर की किताब Rights of Women and Muslim Society के हिन्दी अनुवाद “महिलाओं के अधिकार और मुस्लिम समाज” को पढ़ने का अवसर मिला था। इस दौरान मैंने हिन्दी अनुवाद का संपादन भी किया और एक संक्षिप्त समीक्षा भी लिखी जो प्रकाशित नहीं हो सकी थी। हिन्दी-उर्दू मीडिया/सोशल मीडिया के दोस्त चाहें तो यह समीक्षा अपने यहां प्रकाशित कर सकते हैं।

मौजूदा दौर में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों पर जो लेखक, बुद्धिजीवी, समाज विज्ञानी और पत्रकार अपनी लेखनी के माध्यम से समाज में जागरूकता और चेतना फैलाने का काम कर रहे हैं उनमें एक महत्वपूर्ण नाम डा॰ असग़र अली इंजीनियर का है। डा॰ इंजीनियर सेन्टर फार स्टडी आफ सोसाइटी एण्ड सेक्युलरिज्म के माध्यम से अपने विचार समाज तक पहुंचाते रहे हैं। अब तक डा॰ इंजीनियर द्वारा लिखी और संपादित 65 से अधिक किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। किताबों की इस कड़ी में Rights of Women and Muslim Society (महिलाओं के अधिकार और मुस्लिम समाज) इस दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है कि यह किताब हमें ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के बारे में न सिर्फ जानकारी देती है बल्कि जागरूक और सचेत भी करती है। इस पुस्तक में डा॰ इंजीनियर ने मुस्लिम समाज के परिप्रेक्ष्य में महिलाओं के अधिकारों पर विस्तार से प्रकाश डाला है। इस पुस्तक में इस्लाम के अविर्भाव से पहले और बाद के अरबी समाज में महिलाओं की स्थिति का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करने के साथ-साथ कुरान की आयतों को संदर्भित करके महिलाओं के अधिकारों के बारे जानकारी दी गयी है। इस किताब के माध्यम से इस्लाम और मुसलमान के फर्क को भी स्पष्ट करने की कोशिश की गयी है। यह बताने की कोशिश की गयी है कि किन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कारणों के चलते मुस्लिम महिलाओं के बारे तरह-तरह के धारणाएं स्थापित हुईं और उन्हें सामाजिक वैधता प्रदान की गयी।
डा॰ इंजीनियर का मानना है कि इस्लामिक देश महिला-पुरूष समानता के प्रति रूढि़वादी हैं। लैंगिक न्याय सुनिश्चित करने में इस्लामी दुनिया काफी पीछे है। उनके अनुसार कुरान में महिलाओं को पुरूषों के बराबर अधिकार का उल्लेख है, लेकिन उलेमा वर्ग के फतवों के कारण लैंगिक न्याय सुनिश्चित नहीं हो पा रहा है। डा॰ इंजीनियर ने इस किताब के माध्यम से बताने की कोशिश की है कि महिलाओं के प्रति मुस्लिम समाज का भेदभाव परक व्यवहार के लिए कुरान नहीं बल्कि शरीयत/हदीस (इस्लामी कानून) के रूप में इसकी अलग-अलग व्याख्याएं जिम्मेदार हैं। हिजाब (परदा), श्रृंगार, बीबी को मारना-पीटना, महिलाओं को अर्धसाक्षी मानना, उत्तराधिकार में उनका हिस्सा, शादी, तलाक और हलाला आदि मुस्लिम महिलाओं से संबंधित निजी कानूनों पर यह किताब एक तार्किक बहस प्रस्तुत करता है।
विभिन्न मुद्दों पर विचार संप्रेषण में लेखक ने उदारवादी नज़रया अपनाया है। लेखक ने विवादित मुद्दों से खुद को अलग रखते हुए कुरान में उल्लिखित महिला अधिकारों की ओर ध्यान दिलाने की कोशिश की है। लेखक ने शादी और तलाक जैसे मामलों में कुरान की व्याख्या में सामंती और पुरूष सत्तात्मक सोच को प्रभावी कारण माना है। उनके अनुसार अहदिसों के ज़रिए महिला अधिकारों को कर्तव्य आधारित कर दिया गया है। इसी संदर्भ में डा॰ इंजीनियर अशरफ थानवी (बहिश्ति जे़वर के लेखक/संपादक) के विचारों का विरोध करते भी दिखते हैं।
किताब के अन्तिम भाग में लेखक ने समकालीन मुस्लिम दुनिया में महिलाओं की शैक्षिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। किताब के इस अध्याय में मिश्र व अन्य मुस्लिम देशों में पश्चिमी साम्राज्यवादी ताकतों के हस्तक्षेप और महिला सशक्तीकरण की राह में उदारवादी मुस्लिम नेतृत्व की बात की गयी है। किताब के इस हिस्से में मुस्लिम दुनिया में महिलाओं के शैक्षिक व आर्थिक पिछड़ापन के साथ रूढ़ीवादी मौलवियों और सामंती जमींदारों के बीच गठबंधन को जिम्मेदार बताया गया है। समकालीन वैश्विक चुनौतियों के संदर्भ में सऊदी अरब, खाड़ी और अफगानिस्तान में महिलाओं की दयनीय स्थिति के कारणों में अमेरिकी प्रभुत्व और मुल्ला वर्ग की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया गया है। इस क्रम में लेखक ने मोरक्को और ट्यूनिशिया को उन देशों की श्रेणी में रखा है जहां किसी हद तक महिलाओं को मौलिक अधिकार की प्राप्ति हुई है। लेकिन कुवैत में महिला अधिकारों की बहाली का मुख्य कारण इराक के विरूद्ध संघर्ष में एकजुटता कायम करना बताया है। दुनिया के विभिन्न मुस्लिम देशों में हो रहे बदलावों के बीच लेखक आशा व्यक्त करते हैं कि महिलाएं आवाज़ उठा रही हैं और उनके हालात बदल रहे हैं।
बहरहाल, यह किताब पूर्व इस्लामी समाज-संस्कृति और इस्लाम के अविर्भाव के बाद की सामाजिक-सांस्कृतिक उतार-चढ़ाव के अध्ययन की अपील करता है। लेखक का मंतव्य है कि इस किताब से कुरान की व्याख्याओं पर सही राय कायम करके महिला अधिकारों और बराबरी की मूल भावना को समझा जाए। ताकि मुस्लिम महिलाओं के बारे में पहले से स्थापित मिथक, पूर्वाग्रह और दुराग्रह को समाप्त किया जा सके। लेखक धर्मनिरपेक्ष कानूनों के प्रवर्तन को दीर्घकालीक कार्य बताते हुए बीच का रास्ता अपनाते हुए शरीयत कानूनों को संहिताबद्ध करने की बात पर बल देते हैं, ताकि शादी, तलाक, उत्तराधिकार, तलाक के मामले में बच्चों की अभिरक्षा, विवाह की स्थिरता व तलाक के बाद भरण-पोषण को विधिक रूप प्रदान किया जा सके।
आशा है यह किताब आने वाले समय में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों पर होने वाली बहस को नई दिशा प्रदान करेगा।

Monday, January 21, 2013

सवाल आधी दुनिया के अधिकार का


जिम्मेदारी बनती है उस नेतृत्व की जो आम जनता की भागीदारी वाले आंदोलनों की भावना को समझे और राजनीतिक चेतना के विकास में मददगार की भूमिका अदा करे। कुछ ऐसे कि खुद को गैर राजनीतिक बताने वाले या लोकतांत्रिक चुनावी प्रक्रिया से खुद को बाहर रखने वाले लोगों का राजनीति से अलगाव समाप्त हो सके और वो खुलकर राजनीतिक गतिविधियों में अपनी भूमिका का निर्वहन करने लगें। ऐसा इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि हमारी संसदीय प्रक्रिया में तमाम चीजें राजनीति से ही तय होती है। ...
दिल्ली गैंग रेप की घटना दिसम्बर के आखिरी दो हफ्तों तक प्रमुखता से मीडिया में छाई रही है। मीडिया से इतर सामाजिक स्तर पर भी देश के विभिन्न हिस्सों में हजारों की संख्या में लोगों को बैनर-पोस्टर के साथ सड़कों पर देखा गया। एक माह पुरानी सामूहिक बलात्कार के दोषियों को कोई फांसी की सूली पर चढ़ाने की मांग कर रहा है तो कोई फास्ट ट्रैक अदालतों में मुकदमें की सुनवाई की ज़रूरत बता रहा है। अधिवक्ताओं का एक बड़ा समूह आरोपियों के पक्ष में किसी भी वकील द्वारा पैरवी नहीं होने देने की वकालत कर रहा है। न्याय के प्राकृतिक सिद्धान्तों के हिस्से के तौर पर किसी भी आरोपी को “एमिकस क्यूरी” के तहत सरकारी वकील की सुविधा का भी अधिवक्ताओं ने विरोध किया है। बहरहाल, पिछले दिनों इण्डिया गेट से शुरू हुए विरोध-प्रदर्शनों की लहर की तीव्रता को मीडिया की आंखों से देश भर में फैलता हुआ देखा गया। संवेदना के सागर में राजनीतिक दलों और राजनेताओं को भी डूबते-उतराते देखा गया। लेकिन लैंगिक भेदभाव और मुहावरा बन चुके हर बीस मिनट में एक बलात्कार की घटना को अपने सियासी एजेण्डा का हिस्सा बनाने के सवाल पर शिक्षा से लेकर संसद तक महिला आरक्षण विधेयक का राग अलापने वाले राजनेताओं की चुप्पी से एक बार फिर साफ हो गया है कि इनकी संवेदना महिला आरक्षण की सियासत तक सीमित है। पितृ सत्ता और पूंजी सत्ता की चुनौतियां इनके लिए कोई खास मायने नहीं रखती हैं।

गौर तलब है कि दिल्ली गैंग रेप पर संवेदना के कैंडल लाइट जलाने वाले आंदोलनकारी साथियों का जोश अभी ठण्डा भी नहीं पड़ा था कि दक्षिणपंथी खेमे से महिला विरोधी बयानों की घिसी-पिटी श्रृंखला जारी करने से परहेज नहीं किया गया। महिलाओं के बारे में वो तमाम बातें और मिथक एक बार फिर से दोहराए जा रहे हैं, जिन्हें लिंगभेद के आधार पर सभ्यता के विकास के किसी न किसी पड़ाव पर संस्थागत रूप दिया गया है। ऐतिहासिक रूप से लिंगभेद जनित सामाजिक पिछड़ेपन का दंश झेलने वाली महिलाओं के लिए ड्रेस कोड के हिमायतियों की भावनाएं इस कदर फूट रही हैं कि उन्हें यह कहने में भी संकोच और शर्म का एहसास नहीं हो रहा है कि “रात में लक्जरी बस में बैठने की ज़रूरत क्या थी?” 16 दिसम्बर 2012 के यौन उत्पीड़न की घटना से जन्मे आन्दोलन के दौरान सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के समर्थक और वेलेण्टाइन डे जैसे कुछ एक अवसरों पर पौरूषता का प्रदर्शन करने वाले समान नागरिक संहिता के ठेकेदारों को भी संवेदना से तार-तार होते देखा गया। लेकिन जब समस्या के मूल जड़ पर वार करने की बात होती है तो यही लोग संवेदनहीन हो जाते हैं। कहना होगा कि जब तक महिलाओं के खिलाफ गर्भ से शुरू होने वाले भेदभाव को राजनीतिक एजेण्डे में केन्द्रीय महत्व नहीं मिलेगा तब तक बेटियों के साथ अत्याचार किसी न किसी रूप में जारी रहेगा।

चूंकि राजकाज और सामाजिक आचार तय करने में राजनीति और नेतृत्व दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। दिल्ली गैंग रेप की घटना ने एक बार फिर देश की राजनीति और नेतृत्व को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है। ज़रूरी है कि उन चोटी के राजनेताओं, चाहे वो पुरूष हों या महिला, दोनों के इरादों और उनके व उनकी पार्टी के राजनीतिक एजेण्डे की पड़ताल की जाए कि वो किस हद तक महिला-पुरूष की साक्षी दुनिया की आधी आबादी को न्याय दिलाने के पक्ष में खड़े हैं। ऐसा इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि सड़क से संसद तक आंसू बहाने वाले ऐसे नेता दलगत एजेण्डा से ऊपर उठने का साहस नहीं कर पा रहे हैं। हमारे नेता कठोर से कठोर कानून बनाने की बात तो करते हैं लेकिन किसी भी कानून के प्रभावी क्रियान्वयन की धज्जियां उड़ाने वालों को प्रश्रय देना नहीं भूलते। इसे पिछले दो दशकीय राजनीति के अपराधीकरण और अपराध के राजनीतिकरण के रूप में भी देखा जाना चाहिए, जो समग्र राजनीतिक परिदृश्य को मजबूर और लाचार बनाती है। शायद यह बड़ी वजह है कि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के खिलाफ हिंसा को जन्म देने और बनाए रखने वाले तमाम कारक समाप्त होने के बजाए और अधिक उग्र और क्रूर रूप में सामने आ रहे हैं। महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा की घटनाओं में कनविक्शन रेट का कम होना ऐसी ही मजबूरी और लाचारी की दास्तान बयान करती है।

बहरहाल, मौजूदा हालात ऐसे हैं कि जिसे देखो वही देश की बात कर रहा है। क्या इससे पहले देश नहीं था और क्या इसके बाद देश बचेगा नहीं। बेशक देश शर्मसार हुआ है, लेकिन यह पहली बार नहीं है। जितना हमने-आपने सुना और देखा, उतना तो ज़रूर हुआ है। अपराध और राजनीति के गठजोड़ ने न्याय और समानता की राह में बाधाएं भी खड़ी की हैं। अपराध और राजनीति के गठजोड़ को पोषण प्रदान करने वाली गैर बराबरी के सिद्धान्तों पर खड़ी भूमण्डलीकरण की नीतियां पितृसत्तात्मक मूल्य और परम्परा को भी मज़बूत कर रही हैं। लिहाजा यौन उत्पीड़न की घटनाओं को निजीकरण और विनिवेश से जोड़कर देखने और समझने की भी जरूरत है। विशेषकर उन तर्कों और तार्किक व्यक्तियों के लिए जो यह समझते हैं कि अगर बस में वो दोनों नहीं चढ़ते तो उनके साथ ऐसा नहीं होता। निजीकरण और विनिवेश की बात उन लोगों को भी समझ में आनी चाहिए जो यह कहते फिर रहे हैं कि वह बस चार्टर बस थी, इसलिए ऐसा हुआ। इन लोगों को ही देश मान लिया जाय तो भी ज़ाहिर है सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की सेवाओं पर जनता का विश्वास अभी बाकी है। फिर सवाल यह है कि लोगों का वह हुजूम, जो फांसी से नीचे की बात ही नहीं करता, देश और दुनिया के संदर्भ में निजिकरण, विनिवेश और भूमण्डलीकरण की नीतियों का विरोध क्यों नहीं करता?

दिल्ली में जन्तर-मन्तर से लेकर इंडिया गेट तक के विरोध प्रदर्शनों में शामिल लोगों में आम लोगों ने बड़े पैमाने पर भाग लिया।  यह भी कहा गया कि इनमें अधिकतर का किसी राजनीतिक संगठन या पार्टी से कोई संबंध नहीं था। कहा जा सकता है कि सामूहिक बलात्कार से उपजा आंदोलन आम जनता की सहभागिता वाला आंदोलन था। यह आन्दोलन अन्ना और केजरीवाल के आंदोलन के बरखिलाफ महिलाओं के यौन उत्पीड़न और हिंसा के विरोध में जारी मौजूदा आंदोलन के जनवादी चरित्र को उजागर करता है। लेकिन दूसरी तरफ दिसम्बर 2012 और जनवरी 2013 के इंडिया गेट और जन्तर-मन्तर के आंदोलन से यह भी पता चलता है कि वे लोग जो इस आंदोलन का हिस्सा नहीं रहे उन्हें दरअसल चमकीली राजनीति और पिकनिक के एहसास वाला विरोध-प्रदर्शन अधिक रास आता है। खासकर उन लोगों के लिए जो राजनीति से खुद को अलग-थलग रखते रहे हैं। अगर यक़ीन न हो तो पिछले दो लोकसभा और विधान सभा के चुनावों में ऐसे लागों की मतदाता के रूप में भागीदारी का प्रतिशत का संज्ञान लिया जा सकता है।

ज़ाहिर है ये वही लोग हैं जो शहरीकरण की मौजूदा प्रक्रिया में पूंजीवाद अनुप्राणित विकास की उध्र्वाधर रूपरेखा तय करने से लेकर नव उदारवादी सुधारों से प्रेरित हर उस कदम को मौन सहमति देने वालों में शामिल रहे हैं। फिर शहर तो शहर है। इतना कुछ होने के बाद भी शायद शहर का एकाकीपन इन पर भारी नहीं पड़ रहा है। दाद के हक़दार हैं वो तमाम लोग जिन्होंने देर से ही सही, अपनों के नुकसान के डर से ही सही, परदेस में असुरक्षा के चलते ही सही, मशाल जुलूस के बजाए कैंडिल लाइट के ज़रिए ही सही, प्रतिरोध की मशाल को जलाए रखने की जिम्मेदारी उठाई है। अच्छा होता कि ऐसे आन्दोलनों के सहारे सुख-सुविधा और उपभोग की वैतरणी पार करने वाले भी “ले मशाले चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के...” का हिस्सा बनते।

मौजूदा हालात में जिम्मेदारी बनती है उस नेतृत्व की जो आम जनता की भागीदारी वाले आंदोलनों की भावना को समझे और राजनीतिक चेतना के विकास में मददगार की भूमिका अदा करे। कुछ ऐसे कि खुद को गैर राजनीतिक बताने वाले या लोकतांत्रिक चुनावी प्रक्रिया से खुद को बाहर रखने वाले लोगों का राजनीति से अलगाव समाप्त हो सके और वो खुलकर राजनीतिक गतिविधियों में अपनी भूमिका का निर्वहन करने लगें। ऐसा इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि हमारी संसदीय प्रक्रिया में तमाम चीजें राजनीति से ही तय होती है। राजनीति में आधी आबादी का आनुपातिक प्रतिनिधित्व जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी महिलाओं के लिए लोकतांत्रिक स्थान बनाएगा। समाज बदलाव के उस स्पर्श को छूकर महसूस कर सकेगा कि बेटियां हिंसा और आबरूरेज़ी के लिए पैदा नहीं होती हैं बल्कि समाज और देश के विभिन्न क्रिया कलापों में इनकी भी समान भागीदारी और हिस्सेदारी है।

                                                       कैनविज टाइम्स, 19 जनवरी 2013                               

Wednesday, October 24, 2012

बुनकरों के ज़मीनी यथार्थ


 इस पूरे दौर में बुनकरों का न केवल जीवन स्तर बद से बदतर हुआ है बल्कि कइयों को तो खून, जमीन और अपने कलेजे के टुकड़ों तक को बेचना पड़ा। जहां इससे भी बात नहीं बनी वहां आत्महत्याओं का दौर चला। पांच बरस पहले बनारस के लोहता और बजरडीहा की घटनाएं इन्हीं परिस्थितियों और घटनाओं की गवाह हैं।

पिछले साल नवम्बर में बुनकरों के कर्ज माफी की 6234 करोण रूपए की योजना की घोषणा की गयी। इसमें 3884 करोण रूपए बुनकर समितियों और व्यक्तिगत बुनकरों के संस्थागत ऋणमाफी के लिए आवंटित किया गया है। शेष 2350 करोण की राशि 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 6 चरणों में बुनकरों के उत्थान हेतु खर्च किया जाएगा। माना जा रहा है कि इस पैकेज के तहत कुल 13 लाख बुनकरों को लाभ पहुंचेगा। अकेले पूर्वी उत्तर प्रदेश के करीब 11000 से अधिक बुनकर लाभान्वित होंगे। उद्योग और वाणिज्य मंत्री के अनुसार इस योजना से व्यक्तिगत बुनकरों के अलावा 15000 बुनकरों की कोआपरेटिव समितियों को मदद पहुंचेगा। 
ज्ञात हो कि पूर्वांचल के वाराणसी, मऊ, गाजीपुर, आजमगढ़, मिर्जापुर, भदोही आदि जिलों में आबादी का एक बड़ा हिस्सा बुनकर मज़दूर है। इनकी आजीविका का मुख्य साधन कपड़ों और कालीन की बुनाई है। पिछले दो दशकों से इन बुनकरों को व्यापार में मंदी की मार झेलना पड़ रहा हैं। विशेषकर आर्थिक उदारीकरण, मुक्त बाज़ार व्यवस्था के कारण एक तरफ जहां चाइनीज फैब्रिक्स और सिल्क के रूप में अन्तर्राष्ट्रीय चुनौतियां खड़ी हुई हैं तो दूसरी तरफ सूरत की चिप एण्ड बेस्ट साडि़यों ने बुनकरों के लिए आन्तरिक खतरा पैदा किया है। इस पूरे दौर में बुनकरों का न केवल जीवन स्तर बद से बदतर हुआ है बल्कि कइयों को तो खून, जमीन और अपने कलेजे के टुकड़ों तक को बेचना पड़ा। जहां इससे भी बात नहीं बनी वहां आत्महत्याओं का दौर चला। पांच बरस पहले बनारस के लोहता और बजरडीहा की घटनाएं इन्हीं परिस्थितियों और घटनाओं की गवाह हैं। व्यापार में कुछ उतार-चढ़ाव के बाद भी बुनकरों की यथा स्थिति बनी हुई है। परिस्थितिवश बहुतेरे बुनकर संस्थागत कर्जदार हैं। बल्कि ऐसे बुनकरों की तादाद अधिक है जो कर्ज के स्थानीय ढ़ांचे में फंसे हुए हैं। जाहिर है केन्द्र सरकार के ऋण माफी का पैकज आम कर्जदार बुनकरों को राहत प्रदान नहीं करेगा। 
मालूम हो कि भारत जैसे कल्याणकारी राज्य में सरकारी एजेन्सी के माध्यम से कर्ज की व्यवस्था गरीबों-वंचितों की आजीविका सहायता के तौर पर महत्वपूर्ण माना गया है। अब मामला साड़ी बुनकरों का हो, कालीन बुनकरों का हो या जरदोजी का काम करने वाली मजदूर महिलाओं का हो, अहम सवाल यह है कि इन दस्तकारों की पहुंच सरकार द्वारा चलायी जा रही योजनाओं तक किस हद तक है? बुनकरों से बात करने पर पता चलता है कि ऋण माफी की योजना उनके लिए दूर की कौड़ी है। गांव रसूलपुर के मेराज अंसारी कहते हैं कि "जब ऋण ही नहीं मिलता तो ऋणमाफी कैसी ?" मेराज जैसे ढ़ेरों बुनकर हैं जो ऋण लेने के लिए पात्र ही नहीं होते। क्योंकि इनके पास या तो राशन कार्ड नहीं होता या फिर बैंक में खाता नहीं खुल पाता। बनारस के बुनकर कालोनी के साबित अंसारी की बातों पर यक़ीन करें तो "जो बुनकर कर्ज प्राप्त करने की पात्रता रखते हैं उन्हें बैंक वाले डिफाल्टर समझते है। इसलिए ऐसे बुनकर भी ऋण प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं। जो सहकारी समितियां हैं उनकी संख्या बस इतनी है कि इनके नाम पर कोई भी करोणों का पैकेज घोषित कर आम बुनकरों को राहत के झूठे सपने दिखाकर वोट की सियासत आसानी से कर लेता है।" ऋणग्रस्त बुनकरों में उनकी संख्या अधिक है जो अपनी दैनिक आवश्यकताओं को स्थानीय ऋणदाताओं से कर्ज लेकर पूरा करते हैं। ऐसा भी होता है कि उनके श्रम से पूंजी खड़ी करने वाला मध्यस्थ उनके पारिश्रमिक के भुगतान में 4-6 माह विलम्ब करता है। यदि बुनकरों को बाजार तक सीधे पहंुच सुलभ हो जाता तो समय पर उचित पारिश्रमिक सुनिश्चित हो पाता और वो बुनकर जो सरकारी एजेन्सियों से ऋण प्राप्त कर अपनी आजीविका के साधन को मजबूती नहीं दे पाते, उनका सही मायनों में भला हो जाता।
बहरहाल, ऋण माफी की रकम पर भी विचार जरूरी है। पैकेज के अनुसार पात्र बुनकरों के 50000.00 रूपए तक के ऋण माफ किए जाएंगे। सवाल यह है कि यदि यह पैकेज लागू हो जाए, तो भी उन बुनकरों का क्या होगा जो पाचास हजार से अधिक राशि के कर्जदार हैं। एक उदाहरण पूर्वांचल के उस जिला से जहां कर्जदार बुनकरों की संख्या सवार्धिक बतायी जा रही है। ग़ाजीपुर जिला का गंगौली गांव राही मासूम रज़ा की जन्म भूमि के रूप में तो जाना जाता है। लेकिन इस गांव के बुनकरों का दर्द शायद ही कभी मीडिया और बुद्धिजीवियों के बीच चर्चा-परिचर्चा का विषय बनता है। देखना यह है कि दर्जनों योजनाओं की भीड़ में ऋण माफी की योजना इस गांव के बुनकरों को किस रूप में राहत पहुंचा पाएगा। बात सिर्फ एक गांव की नहीं बल्कि पूरे पूर्वांचल के बुनकरों का है।
जाहिर है, कर्ज माफी पैकेज के बारे में उद्योग और वाणिज्य मंत्री ने विधान सभा चुनावों से पहले जो बयान दिया था उससे आम बुनकरों का भला होता नहीं दिख रहा है। यदि सही मायनों में केन्द्र और राज्य सरकारों को बुनकरों की फिक्र है तो इन्हें बुनकरों की रोजमर्रा समस्याओं को समझना होगा और तदनुरूप नीतिगत स्तर पर योजनाओं में सुधार करनी होगी। ताकि बुनकरों तक योजनाओं की पहुंच को संभव बनाया जा सके। वरना बुनकरों के लिए ऋण माफी या उनके कल्याण से संबंधित अन्य योजनाओं के क्रियान्वयन में कोई भी नीतिगत भूल या कमी न सिर्फ योजनाओं की असफलता का कारण बनेगा बल्कि नीति निर्धारकों को बुनकरों के जमीनी यथार्थ से दूर भी करेगा।

इंकलाबी नज़र, 13 अप्रैल 2012

Saturday, September 22, 2012

खुदरा बाज़ार में एफडीआई: कठिन सुधारों की कठिन मार

"खुदरा बाजार में एफडीआई महज सरकार की असफलता को नहीं दर्शाता है बल्कि विपक्ष में बैठे उन तमाम दलों की सियासी समझदारी पर भी सवालिया निशान है जो इस देश के गरीब, नौजवान, किसान, मज़दूर, दलित, पिछड़े और पसमांदा अवाम के हक की बात करते हैं। कहना होगा कि यह असफलता उन कारोबारियों की भी है जिन्होंने बतौर मतदाता अपने लोकतांत्रिक दायित्वों के निर्वहन में बार-बार कोताही की है।"

खुदरा बाज़ार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को मंजूरी के फैसले को मुद्रा स्फीति में सुधार, रोजगार के नए अवसरों का सृजन और देश में विदेशी मुद्रा के प्रवाह में वृद्धि आदि कारणों से उचित बताया जा रहा है। दूसरी तरफ विरोधी खेमा इस फैसले को खुदरा बाजार पर विदेशी प्रभुत्व के बढ़ते प्रभाव के रूप में देख रहे हैं। ये बात और है कि विभिन्न दल क्षेत्रीय राजनीतिक ज़रूरतों के मद्दे नज़र इस फैसले का समर्थन और विरोध कर रहे हैं। खुदरा व्यापार में एफडीआई से असहमति की अभिव्यक्ति से कुछ बातें स्पष्ट हैं। जैसे, खुदरा कारोबारियों का आस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। ठीक वैसे ही जैसे कि मुक्त बाजार नीति के चलते छोटे-छोटे घरेलू उद्योगों का हाल हुआ है। इसमें बनारसी साड़ी से लेकर अलीगढ़ के ताला उद्योग सभी शामिल हैं। तथ्य यह है कि अगर नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के दूरगामी परिणामों को समझने में 20 वर्षों से अधिक समय लगा तो क्या यह समझा जाए कि खुदरा बाजर में एफडीआई के परिणामों को समझने में भी लगभग इतना ही समय लगेगा। यदि ऐसा होता है तो आने वाले दो दशकों में खुदरा कारोबार में एफडीआई के कूप्रभावों को झेलने के लिए हमें तैयार रहना चाहिए। इन प्रभावों में एक यह होगा कि खुदरा बाज़ार के कारोबारियों की वैयक्तिक व्यावसायिक पहचान और आस्तित्व समाप्त हो जाएगा। इस वास्तविकता को दोबारा साबित करने की ज़रूरत भी नहीं है क्योंकि पिछले कुछ एक दशकों में शापिंग  माल कल्चर के अंधाधुंध प्रसार ने पहले ही व्यावसायिक आज़ादी को शापिंग माल कल्चर के रास्ते बाज़ारपरस्त पूंजीपतियों के यहां गिरवी हो चुकी है। अब बारी छोटे शहरों-कस्बों और गांव-देहातों की है। देखने और सुनने में शापिंग माॅल का कल्चर बेहद अच्छा और सुखद लगता है। लेकिन पांच की तरबूज तीस में बिकने के बाद भी जब तरबूज पैदा करने वाले किसानों की जेब में उचित पैसा नहीं पहुँचता तो सवाल लाज़मी तौर पर उठता है कि एफडीआई के रास्ते कितने किसानों और कितने दुकानदारों का भला होगा?
रही बात नौकरियों के अवसर सृजन का तो इस संभावना से इंकार मुश्किल है कि जो कारोबारी छोटी पूंजी से कारोबार कर रहे हैं क्या वो आने वाले समय में एफडीआई के बड़ी पूंजी के चंगुल में नहीं फंसेगे। बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है वाला मुहावरा सटिक बैठता है। इस संभावना से इसलिए भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है क्योंकि आर्थिक सुधारों की एक बुनियादी शर्त प्रतिस्पर्धा को बढ़ाना और बढ़े हुए प्रतिस्पर्धी माहौल में गुणवत्ता को बनाए रखना है। प्रतिस्पर्धा अच्छी बात है लेकिन बड़ी मछली और छोटी मछली के बीच प्रतिस्पर्धा क्या समतामूलक सिद्धांतों की अनदेखी नहीं है?
ज़ाहिर है जब प्रतिस्पर्धा समानता के मूलभूत सिद्धांतों को धता-बता कर होगी तो बड़ी मछली छोटी-छोटी मछलियों को एक-एक करके निगलती जाएगी। बताना नहीं है कि खुदरा कारोबारियों की स्थिति छोटी-छोटी मछलियों की सी है। जब बड़ी पूंजी का दखल उनके कारोबार की चौखट पर दस्तक देगा तो किसी तरह अपनी दुकान और घर-परिवार चलाने वाले छोटे कारोबारियों की लाइफ लाइन ही छिन जाएगी। चमक-दमक वाली गुणवत्ता की प्रतिस्पर्धा में बने रहने का दबाव ऐसे दुकानदारों पर पहाड़ बन कर टूट पड़ेगा। छोटी पूंजी की स्थिति छोटी मछली की होती है। इसलिए ऐसे कारोबारी मालिक से नौकर की स्थिति में आ जाएंगे। अर्थात नौकरियां निश्चित रूप से बढ़ेंगी। लेकिन यह सब व्यावसायिक स्वंतंत्रता को गिरवी रखवाने के बाद होगा।
समकालीन राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए ऐसा नहीं लगता कि सरकार अपने फैसले पर पुनर्विचार करने जा रही है। जो क्षेत्रीय पार्टियां विरोध का स्वर बुलन्द कर रही हैं उनके पास एफडीआई के विरोध का तात्कालिक तर्क तो है लेकिन एफडीआई जैसे तमाम फैसलों की तह तक जाने का साहस नहीं है। शायद इन्हें भी पता है कि ऐसे जनविरोधी फैसलों के तार आर्थिक सुधारों से जुड़े हैं। यह बात किसी से छुपी नहीं रह गयी है कि सुधारों के मोर्चे पर सूबाई सियासत की धार पर केन्द्र में मज़बूत स्थिति रखने वाली पार्टियां अपने ही घर में किस तरह नाकाम हुई हैं।
कहना पड़ रहा है कि खुदरा बाजार में एफडीआई महज सरकार की असफलता को नहीं दर्शाता है बल्कि विपक्ष में बैठे उन तमाम दलों की सियासी समझदारी पर भी सवालिया निशान है जो इस देश के गरीब, नौजवान, किसान, मज़दूर, दलित, पिछड़े और पसमांदा अवाम के हक की बात करते हैं। कहना होगा कि यह असफलता उन कारोबारियों की भी है जिन्होंने बतौर मतदाता अपने लोकतांत्रिक दायित्वों के निर्वहन में बार-बार कोताही की है। चूंकि सभी दल अभी से 2014 के चुनावी दंगल में उतरने की तैयारी में हैं तो जनता को भी इस दंगल में दो-दो हाथ करने के लिए कमर कस लेना चाहिए। यह समय देश की राजनीति और अर्थव्यव्यस्था के लिए संकट का समय है। इसका समाधान तभी निकलेगा जब उबी हुई और उकताई हुई जनता अपना विकल्प खुद सामने लाएगी। वरना आर्थिक संवृद्धि के नाम पर प्रधानमंत्री के कठिन सुधारों की कठिन मार झेलने के लिए तैयार रहना होगा।

कैनविज टाइम्स, 22 सितम्बर 2012

Wednesday, September 12, 2012

भत्ता तोड़ देगा युवाओं का मनोबल

"   बेरोजगारी भत्ता सुनने में जितना अच्छा और आकर्षक लग रहा है, उतना ही खतरनाक है। इसलिए नहीं कि आर्थिक सहायता में कोई बुराई है। बल्कि इसलिए कि 1000 रूपए की राहत कहीं आने वाले समय में युवाओं ही नहीं बल्कि समाज के हर निम्न मध्यम वर्गीय और वंचित तबके के परिवारों के लिए गले की फांस न बन जाए। गंभीरता से गौर किया जाए तो यह योजना समाज को इसी दिशा में ले जाने वाली है....".

9 सितम्बर को प्रदेश के मुख्यमंत्री के हाथों बेरोजगारी भत्ता का चेक प्राप्त करते हुए अर्ह् बेरोजगार खुशी से फूले नहीं समा रहे थे। दूसरी तरफ कई सारे विश्लेषकों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को प्रदेश सरकार की इस योजना को मूर्त रूप देने पर दुःखी होते देखा गया। देखना होगा कि 1000 रूपए के भत्ते का प्रदेश और प्रदेश के युवाओं के लिए क्या मायने हैं। गौर तलब है कि पिछली बार जब युवा मुख्यमंत्री के पिता जी सत्ता की बागडोर संभाल रहे थे तो उस समय पहली बार यह प्रयोग किया गया था। तब भत्ता की राशि 500 रूपए थी। उस समय भी रोजगार दफ़्तरों से लेकर बैंकों में युवा छात्र-छात्राओं की लम्बी-लम्बी कतारें देखी गयी थीं। फोटो स्टेट की दुकानों पर बेकारों को जोश व खरोश से आवश्यक दस्तावेजों की फोटो काॅपी कराते देखा गया था। रोज़गार दफ़्तरों पर लगने वाली भीड़ और अब चेक प्राप्त करते हुए उनकी खुशी को देखकर बेकारी की परिथितियों का सहज अंदाजा होता है। लेकिन चेक प्राप्त करने वाले बेरोजगारों की इस भीड़ की भी अपनी प्राथमिकता है। जो महज 500 से 1000 रूपए तक सिमित है। सियासी पार्टियों और हमारे नेताओं में तो इतनी इच्छा शक्ति नहीं है कि वो रोजगार और बेरोजगार भत्ता में अन्तर बताएं। यदि अन्तर बताएंगे तो नौजवानों के मन में नौकरी की चाह पैदा होगी। राजव्यवस्था और सत्ता की दशा और दिशा पर सवाल पैदा होंगे। जो धरना-प्रदर्शन का रूप भी ले सकते हैं। अच्छा है इन्हें 1000 में उलझाए रखा जाए। भरी जवानी में उलझे हुओं को उलझाना ही तो शासक वर्ग की उलझनों का सुलझना बन चुका है।

कहना पड़ रहा है कि बेरोजगारी भत्ता सुनने में जितना अच्छा और आकर्षक लग रहा है, उतना ही खतरनाक है। इसलिए नहीं कि आर्थिक सहायता में कोई बुराई है। बल्कि इसलिए कि 1000 रूपए की राहत कहीं आने वाले समय में युवाओं ही नहीं बल्कि समाज के हर निम्न मध्यम वर्गीय और वंचित तबके के परिवारों के लिए गले की फांस न बन जाए। गंभीरता से गौर किया जाए तो यह योजना समाज को इसी दिशा में ले जाने वाली है। वो ऐसे कि 35 वर्ष की आयु काम-काज की आयु होती है। इस आयु वर्ग के नौजवानों में नई ऊर्जा, नई उमंग और नया उत्साह होता है। जब जवानी के इस उम्र में किसी को बैठे-बिठाए बेरोजगारी भत्ता मिलने लगेगा तो इससे उस व्यक्ति का सीखा हुआ स्किल (हुनर/क्षमता) स्थिर हो जाएगी। यानि जो युवा कम्प्युटर आॅपरेट करने में प्रवीण है, उसे सही समय पर इस क्षेत्र में अवसर नहीं मिलने या बेरोजगरी भत्ता का सहारा मिलने से वो भत्ता प्राप्त होने की अवधि तक सीखे हुए हुनर को व्यवहार में करने और इसमें परिवर्धन करने से वंचित रह जाएगा। ऐसे में यदि किसी कारणवश भत्ता बंद होता है, तो वह क्षमता विहीन युवा रह जाएगा। जिसे आज के प्रतिस्पर्धी दौर में कोई भी सरकारी या गैर-सरकारी अमला अपनी प्राथमिकता में रखना नहीं चाहेगा। अच्छा होता कि प्रदेश के युवाओं के लिए 1000 रूपए के बेरोजगारी भत्ता के बजाए कम से कम 999 रूपए के रोजगार की व्यवस्था की जाती।

बेरोजगारी भत्ता से भी अच्छा और आकर्षक टैबलेट और लैपटाप की योजना है। शिक्षा और साक्षरता में विकास की कई सीढि़यां चढ़ने के बाद भी गांव-कस्बे के लोग अभी तक टैबलेट को दवा ही समझ पा रहे थे। भला हो सूचना क्रान्ति का जिसके चलते गंवई जीवन जीने वाले लोग न सिर्फ टैबलेट नामक इलेक्ट्राॅनिक यंत्र के बारे में जागरूक हो रहे हैं बल्कि यह यंत्र उनके सपनों में आकार लेने लगा है। सपनों का होना अच्छी बात है। पाश ने भी कहा था “सबसे बुरा होता है सपनों का मर जाना...”। लेकिन उन सपनों का क्या जो आर्थिक क्रिया-कलापों (सीधा कहें तो बाजारवाद) को बढ़ाने के नाम पर थोपा जा रहा हो। आज के फेसबुकिया दौर में प्रदेश के बच्चों को टैबलेट और लैपटाप देने की योजना ऐसे सपनों को पैदा व जवान करने की योजना है।

कौन नहीं जानता कि प्रदेश के हाई स्कूल और इण्टरमीडिएट कालेजों में ऐसे अध्यापकों की कमी है जो हमारे बच्चों को कोचिंग के शोषक व्यवस्था से मुक्त करा सकें। सवाल यह भी है कि असमान प्रतिस्पर्धा के चलते जिन बच्चों का मनोबल टूट जाता है और प्रतिवर्ष जो बच्चे आत्महत्या करते हैं, वैसे बच्चों को टैबलेट और लैपटाप किस तरह राहत पहंुचाएगा। यदि टैबलेट और लैपटाप की उपयोगिता को स्वीकार कर भी लिया जाए तो इन यंत्रों के मेन्टीनेन्स (रख-रखाव) और बिजली की सप्लाई आदि ज़रूरतों को पूरा करने की गारण्टी कौन लेगा। क्या हम दावे के साथ कह सकने की स्थिति में हैं कि हमारे प्रदेश के गरीब बच्चों के घरों तक बिजली पहुंच पाती है या उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी है कि वो लैपटाप या टैबलेट से संबंधित अन्य ज़रूरतों को पूरा कर पाने में सक्षम हैं? शायद नहीं! फिर ऐसे में प्रदेश के बच्चों को प्राइमरी से लेकर उच्च शिक्षा व्यवस्था का ऐसा ढ़ांचा चाहिए जिसमें न तो कोचिंग की ज़रूरत हो और न ही मुफ़्त टैबलेट या लैपटाप की। कहना नहीं है कि प्रदेश की नयी पीढ़ी के छात्र-छात्राओं की आवश्यकताओं की प्राथमिकता सूची तैयार करके उनकी शिक्षा और रोजगार के अवसर सृजित करना बेरोजगारी भत्ता, टैबलेट और लैपटाप के निःशुल्क वितरण से बेहतर होता।

कैनविज़  टाइम्स, १२ सितम्बर २०१२

Friday, August 17, 2012

मुस्लिम बच्चों की शिक्षा

मदरसों के भ्रम जाल में फंस कर मुस्लिम बच्चों की शैक्षिक वंचना से नज़र चुराना शिक्षा के क्षेत्र में अब तक प्राप्त उपलब्धियों को मुंह चिढ़ाता है। ऐसा नहीं है कि मुसलमान अपने बच्चों को तालीम नहीं देना चाहते हैं।......
यदि सच्चर कमेटी की रिपोर्ट की बात करें तो 7-16 आयु वर्ग में स्कूल जाने वाले कुल मुस्लिम बच्चों में महज 4 प्रतिशत बच्चे ही बुनियादी शिक्षा के लिए मदरसों पर निर्भर हैं। जबकि 30 प्रतिशत प्राइवेट स्कूलों तथा शेष 66 प्रतिशत सरकारी स्कूलों पर निर्भर हैं। दूसरी ओर स्कूल जाने वाले कुल मुस्लिम बच्चों में 25 प्रतिशत बच्चे या तो ड्राॅपआउट बच्चे हैं या फिर स्कूल जाने के किसी भी अवसर से वंचित हैं। 

आबादी की दृष्टि से पश्चिमी उत्तर प्रदेश स्थित मेरठ, मुजफ़्फ़रनगर और सहारनपुर आदि जिले देश के उन 50 जिलों में है जहां मुस्लिम आबादी का अनुपात 30 प्रतिशत या इससे अधिक है। इन शहरों में कई मुहल्ले तो ऐसे हैं जहां मुसलमानों का ही बाहुल्य है। बात करते हैं सहारनपुर की जो परंपरागत काष्ठ उद्योग के लिए जाना जाता है। पिछले कुछ सालों से यहां होजरी उद्योग भी काफी फल-फूल रहा है। इस जिला के शहरी क्षेत्र में रहने वाले मुसलमानों की आजीविका मुख्यतः इन्हीं दो उद्योगों पर ही निर्भर है। देश और दुनिया में अपनी कला का डंका बजाने वाले यहां के कलाकारों विशेषकर मुसलमानों में बेरोजगारी नज़र नहीं आती है। लेकिन सम्पन्न दिखाई देने वाले यहां के मुसलमानों के जीवन के कई ऐसे पहलू हैं जो हमें नयी तस्वीर दिखाते हैं।

दरअसल सहारनपुर के काष्ठ उद्योग में काम करने वालों की जमात में वो लोग भी शामिल हैं जो रिटायरमेन्ट की उम्र से काफी आगे निकल चुके हैं। वो मासूम बच्चे भी जो काम करने के लिए निम्नतम आयु की पात्रता नहीं रखने के बाद भी आजीविका की जिम्मेदारी उठाते है। और वो महिलाएं भी जो इन उद्योगों में फिनिशिंग वर्क के सहारे अपने घर-परिवार के लिए आजीविका जुटाती हैं। वर्क कल्चर तो यहां के हर गली-चैराहे पर दिखाई पड़ता है। लेकिन साक्षरता की बात आती है तो यहां मुस्लिम साक्षरता दर लुढ़की हुई नज़र आती है। वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार इस जिला में मुस्लिम साक्षरता दर 47.64 प्रतिशत है, जो जिला, राज्य और देश तीनों ही स्तर के औसत साक्षरता दर से काफी कम है। उसमें भी महिलाओं में साक्षरता दर का प्रतिशत 38.43 है जो 55.56 प्रतिशत मुस्लिम पुरूष साक्षरता दर से 17.13 अंक प्रतिशत कम है। एक तरफ जहां ग्रामीण क्षेत्रों में मुस्लिम साक्षरता दर 45.02 प्रतिशत के हताशाजनक स्थिति में है वहीं दूसरी तरफ शहरी क्षेत्रों में भी मुस्लिम साक्षरता दर की स्थिति अच्छी नहीं है। सहारनपुर के शहरी क्षेत्रों में मुस्लिम साक्षरता दर 52.61 प्रतिशत है। मुस्लिम समाज में साक्षरता की दयनीय स्थिति को देखते हुए इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि इस जिला में मुस्लिम आबादी का आधा हिस्सा निरक्षर और अशिक्षित है। सवाल यह है कि जो जिला उद्योग-धन्धे में देश ही नहीं विदेशों में भी जाना जाता है, उस जिला में मुसलमानों की ऐसी स्थिति क्यों है?

आम तौर पर जागरूकता और चेतना का अभाव निरक्षरता के लिए जिम्मेदार कारक माना जाता है। लेकिन पिछले कुछ बरसों से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर, मुजफ़्फ़रनगर और मेरठ जैसे जिलों की यात्रा से मुस्लिम समाज के बारे में कुछ नए तथ्य और सत्य को समझने का अवसर मिला है। देश के मुसलमानों के बारे में कायम यह धारणा इस जिला के मुसलमानों पर भी लागू होता है जो मुसलमानों को संकीर्ण सोच वाला समुदाय मानता है। लेकिन ज़मीनी हक़ीकत इस इस बात को झुठलाते हैं कि स्कूलों में मुस्लिम बच्चों की कम होती संख्या समुदाय के संकीर्ण सोच के कारण है। जहां तक मदरसों का संबंध है तो निश्चित तौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इनकी तादाद तुलनात्मक रूप से अधिक है और मुख्यतः ये दीनी यानि धार्मिक शिक्षा के केन्द्र हैं। लेकिन ऐसे मदरसों की संख्या भी कम नहीं है जो सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त हैं। यदि सच्चर कमेटी की रिपोर्ट की बात करें तो 7-16 आयु वर्ग में स्कूल जाने वाले कुल मुस्लिम बच्चों में महज 4 प्रतिशत बच्चे ही बुनियादी शिक्षा के लिए मदरसों पर निर्भर हैं। जबकि 30 प्रतिशत प्राइवेट स्कूलों तथा शेष 66 प्रतिशत सरकारी स्कूलों पर निर्भर हैं। दूसरी ओर स्कूल जाने वाले कुल मुस्लिम बच्चों में 25 प्रतिशत बच्चे या तो ड्राॅपआउट बच्चे हैं या फिर स्कूल जाने के किसी भी अवसर से वंचित हैं।

ज़ाहिर है मदरसों के भ्रम जाल में फंस कर मुस्लिम बच्चों की शैक्षिक वंचना से नज़र चुराना शिक्षा के क्षेत्र में अब तक प्राप्त उपलब्धियों को मुंह चिढ़ाता है। ऐसा नहीं है कि मुसलमान अपने बच्चों को तालीम नहीं देना चाहते हैं। पिछले दिनों सहारनपुर के मुस्लिम बाहुल्य बस्तियों पक्का बाग, खाता खेड़ी और नूर बस्ती के लोगों विशेषकर महिलाओं से सीधी बातचीत के दौरान बच्चों की शिक्षा के प्रति उनकी ललक महसूस किया। लेकिन मीडिया वालों के लिए इमराना और गुडि़या जैसी खबरें इकट्ठी करने की रेलमपेल में शिक्षा जैसी बुनियादी मुद्दा पीछे छूट जाता है। बहरहाल सहारनपुर की शहरी बस्तियों में कई जगह तो सरकारी स्कूल ही नहीं हैं। नूर बस्ती ऐसे ही मुहल्लों में एक है। जहां है वहां स्कूल के भवन और अध्यापकों से लेकर शैक्षिक वातावरण आदि की स्थिति संतोषजनक नहीं है। ऐसे में मुस्लिम बच्चों की स्कूल से दूरी कोई अचरज की बात नहीं है।

बहरहाल, ऐसे स्कूल भी हैं जहां अध्यापकों के व्यवहार से मुस्लिम बच्चों का मनोबल टूटता है और स्कूल से उनका मोह भंग हो जाता है। उदाहरण के तौर पर सहारनपुर के ही सुढ़ौली कदीम ब्लाॅक के उन बच्चों को देखें जिन्हें बाल्यावस्था में भेदभाव के कारण स्कूल जाने के अवसर से वंचित होना पड़ता है। इस ब्लाॅक में मुस्लिम महिलाओं और बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता नाज़मा बताती हैं कि “नए शैक्षिक सत्र में जब वो कुछ मुस्लिम बच्चों के दाखिले के लिए स्कूल गयीं तो स्कूल प्रबन्धन की तरफ से उन बच्चों के दाखिला संबंधी औपचारिकता पूरा करने के बजाय खु़द उनकी सामाजिक भूमिका पर सवाल उठाते हुए यह कहा गया कि वो सिर्फ मुस्लिम बच्चों का ही दाखिला क्यों करा रही हैं। उन्होंने अपने समाजिक कार्यों और टार्गेट ग्रुप के बारे बताया कि जब प्रधानमंत्री द्वारा गठित उच्चस्तरीय सच्चर समिति ने इस बात को माना है कि स्कूल जाने वाले 25 प्रतिशत बच्चे स्कूलों से बाहर हैं, तो इस दिशा में काम करने में ग़लत क्या है।”

नाज़मा का यह अनुभव इस सच्चाई से परदा उठाता है कि स्कूलों में मुस्लिम बच्चों के साथ भेदभाव होता है। जिसके चलते वो सरकारी स्कूल नहीं जाना चाहते हैं। बादशाही बाग की समाज सेविका रानी मिर्जा की बातों पर यकीन करें तो “भेदभाव का आलम यह है कि मुस्लिम बच्चों को चिन्हित करके उनसे स्कूल परिसर में झाड़ू लगवाया जाता है। यही नहीं उनसे मध्यान्ह्य भोजन की व्यवस्था में भी काम लिया जाता है।” नाज़मा और रानी जैसी समाज सेविकाओं का यह अनुभव आए दिन अखबारों में छपने वाली उन खबरों और तस्वीरों से साम्य रखता है जिसमें बच्चों द्वारा विशेषकर दलित समुदाय के बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है। लेकिन मानव विकास के शैक्षिक सूचकांक पर मुस्लिम समाज की बदहाली का यह चित्र शायद ही किसी अखबार और रिपोर्टर के लिए कोई महत्व रखता है। समझा जा सकता है कि मौजूदा दौर में मानव विकास के सूचकांक पर मुसलमान किस पायदान पर हैं। इन परिस्थितियों के कारण ही एक तरफ जहां मुस्लिम बच्चों का मनोबल टूटता है, वहीं दूसरी तरफ उनकी शिक्षा या तो मदरसा तक सिमित रह जाती है या फिर वे शिक्षा के किसी भी अवसर से वंचित रह जाते हैं। यही बच्चे खेतों-खलिहानों से लेकर ढ़ाबा और काष्ठ व होजरी उद्योग में नज़र आते हैं।

अचरज की बात तो यह है कि बाल अधिकारिता से संबंधित तमाम सरकारी विभागों को सर्व शिक्षा अभियान के दौरान मुस्लिम समाज का यह चित्र दिखाई नहीं देता है। कहना पड़ रहा है कि ऐसे परिवेश में यदि प्रधानमंत्री का पन्द्रह की जगह तीस सूत्री कार्यक्रम भी होता तो उसके परिणाम भी इसी तरह निराशाजनक होते जैसा कि पन्द्रह सूत्री कार्यक्रम के हैं। ज़रूरी हो जाता है कि योजनाओं को बनाने और क्रियान्वयन से पहले समुदाय स्तर की रूकावटों को दूर करने की इमानदार कोशिश की जाए।

कैनविज टाइम्स, 17 अगस्त 2012

Wednesday, August 1, 2012

निवेश आधारित मीडिया की दशा और दिशा


पिछले कुछ वर्षों में खासकर इलेक्ट्राॅनिक मीडिया में ऐसी प्रस्तुतियों को प्रधानता प्राप्त हुई है जो निवेश और मुनाफा के सिद्धांतों पर आधारित हैं। चूंकि मीडिया भी एक तरह का साहित्य है और साहित्य समाज का दर्पण कहा जाता है। लेहाजा यह मानना होगा कि मीडिया में भी जो कुछ दिखाया जा रहा है वह हमारे समाज का सच है। लेकिन मीडिया की प्रस्तुतियों को सिर्फ साहित्य के दायरे तक सिमित करके नहीं देखा जा सकता है। क्योंकि मीडिया मनोरंजन के साथ-साथ संवाद का असरदार माध्यम भी है और लोकतंत्र के चैथे स्तंभ के रूप में इसकी अपनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी होती हैं। मौजूदा दौर में तो इलेक्ट्राॅनिक मीडिया समय की तंगी का सस्ता और आसान विकल्प भी है। देखा जाए तो पिछले बीस बरसों में मीडिया बदलाव के बड़े दौर से गुज़रा है। बदलाव के इन दो दशकों में मीडिया विशेषकर इलेक्ट्राॅनिक मीडिया की जो नयी पहचान बनी है, उसे निवेश, टी.आर.पी. और मुनाफा से अलग करके नहीं देखा जा सकता है।
निवेश आमंत्रित करना अर्थव्यवस्था के प्राथमिक उद्देश्यों में है। क्योंकि इसका संबंध आर्थिक विकास की दर से बताया जाता है। इस दृष्टि से मीडिया निवेश आमंत्रित करने और निवेशकों दोनों के लिए एक ऐसा क्षेत्र है जहां कम समय में अधिक मुनाफा का संयोग प्रबल है। सरकार उच्च विकास दर हासिल करने के लिए अधिक से अधिक निवेश चाहती है तो वहीं दूसरी तरफ देसी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अधिक से अधिक मुनाफा प्राप्त करने के लिए अधिकाधिक निवेश की करने को लालायित हैं। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि बाजारवादी व्यवस्था में “अधिक निवेश और अधिक मुनाफा” के फार्मुला पर काम करता है। 1991 के बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था की दशा और दिशा में जो बदलाव सामने आए हैं, उससे सरकार और कल्याणकारी राज्य की अवधारणा ही बदल गयी है। जिसके चलते मनोरंजन चैनलों की प्रस्तुतियों में समाज के गंभीर मुद्दों को उपभोग करने वाली ऐसी वस्तु के रूप में परोसा जाना संभव हुआ है जिसे देखने वालों की संख्या निरन्तर बढ़ी है। ऐसे मनोरंजक प्रस्तुतियों को देखने वाले दर्शकों की संख्या में वृद्धि का सीधा संबध टी.आर.पी. से है। टी.आर.पी. में वृद्धि का मतलब है अधिक विज्ञापन और अधिक मुनाफा। ज़ाहिर है, निवेश, टी.आर.पी. और मुनाफा रंजित मनोरंजक सीरियलों में किसी गंभीर सामाजिक समस्या की प्रस्तुति और समस्या के समाधान की संभावनाएं निरन्तर कम होती गयी हैं। पिछले दिनों देश में गिरते शिशु लिंगानुपात, दहेज और बच्चों के साथ यौनाचार जैसे मुद्दों पर एक चैनल ने “सत्यमेव जयते” शुरू किया जिसके एंकर आमिर खान को प्रस्तुति के एवज में करोणों-करोण का भुगतान किया जा रहा है। “सत्यमेव जयते” या ऐसे अन्य सीरियलों/रियालिटी शो की प्रस्तुति के मुद्दों से कोई विरोध नहीं है। लेकिन देखना होगा कि क्या समाज के गंभीर मुद्दों को मीडिया के केन्द्र में लाने और समाज को जागरूक करने के लिए सेलेब्रिटि का होना अनिवार्य और अपरिहार्य हैं? क्या ऐसे मुद्दों पर समाज को चेतित करने में ज़मीनी सतह पर काम करने वाले लोगों की कोई भूमिका नहीं रही है? दरअसल सेलेब्रिटी द्वारा प्रस्तुति का संबंध भी मीडिया के निवेशवादी माॅडल से है। यह संबंध निवेश, टी.आर.पी. प्रस्तुति, प्रसारण और दर्शक हर स्तर पर है। ऐसे कार्यक्रमों के स्क्रिप्ट राइटर, एडिटर, प्रस्तुतकर्ता और इन्हें देखने वाले तथा टिप्पणी करने वाले सभी उसी क्लास से आते हैं जो मुनाफा आधारित सुविधाभोगी जीवन में विश्वास करते हैं। यही वजह है कि जमीनी कार्यकर्ताओं को उनके तमाम संघर्षों के बाद भी न तो उन्हें उचित मानदेय/पारिश्रमिक मिल पाता है और न ही ख्याति। मीडिया का यही रूप नागवार है।
आज की मीडिया निवेश के दम पर मुख्य धारा की मीडिया को परिभाषित कर रही है। प्रस्तुति के विषय, तौर तरीके और दर्शक की संख्या तय कर रही है। कुछ कहिए तो एक मिथक जनता पर थोप कर खुद को आर्थिक दोहन के इल्जाम से बरी भी कर लेती है। सवाल लाज़मी है कि आर्थिक दोहन के पूरे प्रकरण में मीडिया का एकतरफा प्रभाव कैसे संभव हो पाता है। दरअसल सैटेलाइट चैनलों के माध्यम से एक ही समय में लाखों-करोड़ों परिवारों और व्यक्तियों तक पहुंचना तो मुमकिन है। लेकिन लाखों-करोणों व्यक्तियों के लिए एक क्लिक में अपनी शिकायतों को सही जगह पहुंचाना संभव नहीं है। बहरहाल, सैटेलाइट चैनलों पर शिकायत करने के लिए http://www.nbanewdelhi.com/ फ्लैश किया जा रहा है। ताकि किसी कार्यक्रम में किसी भी तरह की आपत्ति हो तो दर्शक इस वेव साइट पर आॅन लाइन शिकायत कर सकें। लेकिन इस साइट पर जो आॅब्जेक्टिव दिए गए हैं उनमें निवेशवादी मीडिया इंडस्ट्री के हित रक्षण का ध्येय अधिक प्रभावी जान पड़ता है। दूसरी तरफ कानूनी कार्यवाही के लिए न जो जनता के पास पैसे हैं और न ही इतना समय कि वो मनोरंजन के आर्थिक दोहन की गतिविधियों के विरोध में व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर कोई कानूनी हस्तक्षेप करे। खासकर ऐसे में जबकि कमरतोड़ महंगाई और आजीविका के लिए अधिक से अधिक संसाधन जुटाने का वैश्विक संकट दिनों-दिन गहराता जा रहा हो। “सोने की जेब और लोहे के पैर” वाली कहावत प्रासंगिक जान पड़ता, है जो पूंजीपरस्त मीडिया घरानों के पास ही है। लोकतंत्र में सभी को आज़ादी का समान हक है। शायद यही वजह है कि यदि चैनलों को प्रस्तुति के तौर-तरीकों की आज़ादी है तो वहीं दूसरी तरफ दर्शकों को चैनलों पर दिखाए गए किसी कार्यक्रम के खिलाफ शिकायत की आज़ादी भी है। लेकिन कहना होगा कि लोकतांत्रिक आज़ादी की सीमा तय करने में आर्थिक सुधारों पर आधारित निवेश की भूमिका लगातार बढ़ी है। जिसकी वजह से बड़ी और मज़बूत आज़ादी के सामने छोटी और कमज़ोर आज़ादी को दम तोड़ना पड़ रहा है।
जाहिर है मीडिया के नए ताने-बाने और तौर-तरीकों को स्वाभाविक स्वीकृति आर्थिक सुधारों के मीडिया पर पड़ने वाले प्रभावों में सबसे अहम है। ऐसे में तथाकथित मुख्य धारा की मीडिया की भूमिका निवेश के अनुरूप तय होना भी स्वाभाविक है। समाज के किसी ज्वलंत मुद्दे का अर्थपूर्ण होना या महत्वहीन होने में इस स्वाभाविकता की बड़ी भूमिका है। इस स्वाभाविकता के चलते ही न तो ज़मीनी समस्याओं को प्रमुखता मिल पाती है और ज़मीनी स्तर पर काम करने वाली हाशिए की आवाज़ों को यथा सम्मान मिल पाता है।


कैनविज टाइम्स, 27 जून 2012