Sunday, June 19, 2016

पलायन का मिथक और ध्रुवीकरण की राजनीति


पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शामली स्थित कैराना से कथित तौर पर 346 हिन्दू परिवारों के पलायन पर सियासत गरम है। कैराना शामली जिला का मुस्लिम बाहुल्य वाला कस्बा है। जहां हिन्दू और मुस्लिम आबादी का अनुपात क्रमशः 18.34 और 80.76 प्रतिशत है। पिछले दिनों यहां से पलायन की तथाकथित घटना का रहस्योद्घाटन सांसद हुकुम सिंह ने किया। मुमकिन है सांसद हुकुम सिंह की बात में दम हो। लेकिन जिस तरह से मीडिया में खबरें आ रही हैं और जिस तरह तथाकथित पलायन को कश्मीरी पंडितों के पलायन से जोड़कर प्रस्तुत करने की कोशिश की जा रही है, उससे जाहिर होता है कि पलायन एक संवेदनशील सामाजिक-आर्थिक मुद्दा नहीं बल्कि संघ परिवार द्वारा खड़ा किया जाने वाला एक मिथक है। ऐसा मिथक जिसे अगामी विधान सभा चुनाव के पहले जनमत निर्माण के लिए राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा सके। इतिहास और वर्तमान का संदर्भ लिया जाए तो देश और दुनिया के विभिन्न हिस्सों और समाजों व समुदायों में हर दौर में अलग-अलग कारणों से पलायन का रूझान रहा है। लेहाजा कैराना के मामले में पलायन और इसके के विभिन्न पक्षों की अनदेखी नहीं की जा सकती।


पलायन दरअसल एक ऐसी समस्या है जिसकी जड़ें आमतौर पर गरीबी, बेरोजगारी और भुखमरी में छिपी होती हैं। इतिहास में ऐसा भी हुआ है कि बहुधा जातियों और समुदायों ने सामंती शोषण, दमन और अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने की बजाय पलायन का विकल्प चुनना बेहतर समझा। यही कारण है कि देश के कई हिस्सों में पीढ़ी दर पीढ़ी पलायन होता रहा है। उदाहरण के तौर पर यदि पूर्वी उत्तर प्रदेश की बात करें तो गाज़ीपुर, बलिया और मऊ आदि जिलों में दो-तीन पीढ़ी पहले से ही पलायन का रूझान दिखाई देता है। कुछ गांव तो ऐसे हैं जहां घर-घर से लोग बंगाल गए, वहां पर स्थाई रूप से रहने लगे। उनके बाद की पीढ़ी रोजगार और आजीविका के अवसरों की तलाश में पलायन करना पड़ा। मेरे कई मित्र हैं जो अपने पैतृक गांव-कस्बा से अपना कारोबार बंद करके हाल-फिलहाल में बंगाल और असम गए है। पिछले दिनों एक फ्रांसीसी रिसर्चर कमेली बुआ से मुलाकात हुई। कमेली बुआ उत्तर प्रदेश और बिहार से पश्चिम बंगाल को होने वाले पलायन पर शोध कर रही हैं। उनके साथ विभिन्न गांवों का दौरा करने के बाद पलायन के कई अनछुए पहलुओं को करीब से समझने का अवसर मिला। पलायन वर्ग और जाति के आधार पर भी है और समुदाय के आधार पर भी है। पलायन का एक महत्वपूर्ण कारण स्थानीय संसाधनों में सहभागिता का न होना भी है। गांव वासियों से बातचीत के दौरान यही भी प्रकाश में आया कि पलायन के पीछे कई बार समाज का सामंती ढ़ांचा और इस पर आधारित शोषण, दमन और अत्याचार इस कद्र प्रछन्न होता है कि इस कारण से होने वाले पलायन की न तो पहचान हो पाती है और न ही इसकी आवाज समाज और सत्ता के विकेन्द्रित प्रतिष्ठानों तक पहुँच पाती है। जाहिर है पलायन अपने वृहद् सन्दर्भ में आर्थिक और सामजिक दोनों ही कारणों से होता रहा है।

इतिहास गवाह है कि पलायन इच्छित और अनिच्छित दोनों ही स्वरूपों में हुआ है। हुकुम सिंह या यूं कहें कि संघ परिवार के लोग जिस पलायन की बात कर रहे हैं वो पालयन अनिच्छित किस्म की है। लेकिन एक सवाल है। हुकुम सिंह की चिठ्टी पर सुनवाई में इतनी शीघ्रता और आतुरता क्यों है। उनके समकक्ष अन्य सांसद भी तो जनता के जमीनी मुद्दों और समस्याओं को अपनी चिट्ठियों के माध्यम से संसद और विधान मंडलों में उठाते रहे हैं। फिर हुकुम सिंह का हुक्म सर आँखों पर क्यों? संदेह की और भी वजहें हो सकती हैं जैसे कि उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष 2017 में विधान सभा चुनाव होना है। हर पांच साल पर होने वाले चुनाव की पूर्व संध्या पर आम जनता का बल लोकतान्त्रिक संस्थाओं की नुमाइन्दगी का दम-खम भरने वालों और इनमें दखल रखने वाले राजनेताओं व सियासी पार्टियों पर भारी पड़ता है। इसमें पक्ष और विपक्ष दोनों ही शामिल हैं। एक के सामने अपनी पद और प्रतिष्ठा को बचाने की तो दूसरे के समक्ष अपनी प्रतिष्ठा स्थापित करने की चुनौती होती है। पार्टियों की आपसी चुनौतियों के बीच आम मतदाता ही सबसे बलवान होता है। उत्तर प्रदेश में सपा, भाजपा की स्थिति कुछ ऐसी ही है। एक सत्ता में है तो दूसरी पार्टी सत्ता प्राप्त करने की लालसा रखती है। इन दोनों की बीच में आम जनता वो धुरी है जिसका वोट इन्हें हर कीमत पर चाहिए।

बेशक आम जनता और मतदाता हर हाल में अपना सामजिक, आर्थिक और वैयक्तिक प्रगति चाहता है। आम मतदाताओं की इस इच्छा में ही उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका के मूलभूत प्रश्न छुपे होते हैं। जिसे अक्सर राजनीतिक पार्टियां अपने चुनावी एजेण्डे में उठाती रही हैं। मगर अफसोस कि विकास का एजेण्डा पेश करने वाली पार्टियों के कामकाज पर कैराना जैसे शहर सवाल बन कर खड़े हो जाते हैं। यदि साक्षरता के सूचकांक पर कैराना के विकास की बात करें तो 2011 की जनगणना के अनुसार कैराना में साक्षरता की दर 59.76 प्रतिशत दर्ज की गयी जो प्रदेश के 67.68 प्रतिशत और देश के 74.04 प्रतिशत के राष्ट्रीय औसत से भी कम है। यदि सिर्फ कैराना शहर की साक्षरता की बात करें तो यहां 47.23 प्रतिशत व्यक्ति ही साक्षर हैं। कैराना शहर में पुरूष और महिला साक्षरता की दर (क्रमशः 55.16 और 38.24 प्रतिशत) न सिर्फ उत्तर प्रदेश की औसत साक्षरता की दर से कम है बल्कि शामली, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर और मेरठ आदि शहरों की औसत साक्षरता दर से काफी कम है। साक्षरता दर में यह कमी इस बात का संकेतक है कि यह शहर बरसों से उपेक्षित रहा है। जो लोग पलायन का मिथक खड़ा करने में लगे हुए हैं उनकी राजनीति पर कैराना शहर की साक्षरता दर गंभीर सवाल बनकर खड़ा हो जाता है। सवाल लाज़मी है कि कैराना साक्षरता के सूचकांक पर औंधे मुंह क्यों गिरा पड़ा है? दिलचस्प बात यह है कि कैराना से शामली, सहारनपुर, मुज़फ्फरनगर, मेरठ और देश की राजधानी नई दिल्ली सभी शहर करीब हैं। इन शहरों में साक्षरता दर प्रदेश और देश के औसत साक्षरता दर से अधिक है। कैराना जिस जिले का तहसील है उस जिले में भी साक्षरता दर 71 प्रतिशत से अधिक है। सवाल धर्म निरपेक्षता के तमाम अलमबरदारों से भी है कि हुकुम सिंह जैसे सांप्रदायिक राजनीतिज्ञ अल्पसंख्यक बाहुल्य वाले क्षेत्र में जन प्रतिनिधि कैसे चुने जाते हैं? सवाल हुकुम सिंह जी से भी है कि वो कैसे जन प्रतिनिधि हैं, जो साक्षरता की बुरी स्थिति को न तो चिन्हित नहीं कर पाए और न ही यहां के लोगों को साक्षर बनाने हेतु कोई सार्थक कोशिश कर पाए। संदेह जायज है कि एक जन प्रतिनिधि के तौर पर सांसद हुकुम सिंह अपनी असफलताओं का ठीकरा पहले सांप्रदायिक आधार पर पलायन और फिर कानून व्यवस्था के चलते पलायन जैसे बहाने बनाकर राज्य सरकार के सर पर फोड़ना चाहते हैं। सात बार विधायक और उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री रह चुके मोदी लहर में सांसद बने हुकुम सिंह जी को पलायन के मिथक की जरूरत इसलिए पड़ी कि वो जनहित के एजेण्डा पर फेल हो चुके हैं। अगर हुकुम सिंह के विधायक और फिर सांसद रहते स्थानीय गुण्डों और माफियों का प्रभाव बढ़ा है तो इससे हुकुम सिंह की राजनीतिक गैर मौजूदगी भी जाहिर है। अच्छा होता कि वो अपने संसदीय क्षेत्र के गुण्डों-माफियाओं की सूची तैयार कर उनके खिलाफ कार्यवाही सुनिश्चित कराने के लिए कुछ साकारात्मक प्रयास किए होते। सांसद जी को पलायन पर शोध करना ही था तो बुंदेलखंड चले गए होते जहां पर विभिन्न कारणों से न सिर्फ किसानों, गरीबों और मज़दूरों को पलायन करना पड़ा है बल्कि आत्म हत्या के लिए भी मजबूर होना पड़ा है। यदि हिन्दू पलायन की वकालत कर रहे लोग विशेषकर सांसद हुकुम सिंह कभी बिहार जाते या यहां से दिल्ली, मुम्बई, सूरत, अहमदाबाद और हैदराबाद की ओर जाने वाली रेलगाड़ियों में एक के ऊपर एक लदे हुए सवारियों को यात्रा करते देखने का समय निकालते तो पलायन का दर्द शायद महसूस कर पाते।

अगर समय रहते उन्होंने ऐसा कोई प्रतीमान स्थापित किया होता तो उन्हें संघ की विषैली सांप्रदायिक एजेण्डे से इतर विकास के एजेण्डे पर सियासी माहौल बनाने का विकल्प खुला होता। लेकिन नहीं, कांग्रेस से अपनी राजनीति शुरू करने वाले हुकुम सिंह को संघ का एजेण्डा अधिक पसंद था। सो वो पलायन का मिथक खड़ा करने में लग गए। लगभग चार दशक का राजनीति का अनुभव रखने वाले हुकुम सिंह के अनुभव से उनके अपने ही संसदीय क्षेत्र के कैराना की साक्षरता दर की सूची कैसे छूट गयी। शायद संघ से नजदिकियों ने उन्हें सांप्रदायिक और फांसीवादी एजेण्डे का कायल बना दिया तभी तो उन्होंने साक्षरता की स्थिति सुधारने के बजाए पलायन का मिथक खड़ा करने के लिए तर्क की जगह कुतर्क कर रहे हैं।

तर्क का क्या है, तर्क मानव प्रवृत्ति का हिस्सा भी होता है और बहुधा मनुष्य तर्क गढ़ने की प्रवृत्ति में माहिर भी होते हैं। तर्क का होना वैज्ञानिकता और स्वाभाविकता का परिचायक होता है। लेकिन तर्क गढ़ने के पीछे कोई न कोई उद्देश्य या लक्ष्य छुपा होता है, जो नाकारात्मक होता है और जिसे आम तौर पर प्रकट नहीं होने दिया जाता है। गढ़े हुए तर्कों से जो परिणाम फलीभूत होते हैं वही प्रकट होते हैं। प्रकट परिणामों की प्रस्तुति सत्य और तथ्य की तरह की जाती है ताकि जनमानस इन्हें मानकर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करे। कैराना में पलायन के पीछे जो कारण संघ परिवार द्वारा बताए जा रहे हैं, उसके पीछे भी यही उद्देश्य प्रतीत होता है कि वहां की जनता धार्मिक पहचान के आधार पर दो स्पष्ट समूहों में बंट जाए। फिर भी यह बात गले से नीचे नहीं उतरती कि ऐसी जगह जहां दो समुदायों की आबादी का अनुपात 80.14 और 19.86 प्रतिशत है, वहां पर धार्मिक पहचान के आधार पर समुदायों के विभाजन का लाभ किस तरह अल्पसंख्यक आबादी के नुमाइंदों या पार्टियों को मिल सकता है? 

दरअसल कैराना मामले को प्रदेश और देशव्यापी स्तर पर होने वाले धु्रवीकरण की राजनीति से जोड़कर देखे जाने की ज़रूरत है। यदि एक बार धार्मिक पहचान के आधार पर पलायन का मिथक स्थापित करने में सांप्रदायिक ताकतों को सफलता मिल जाती है, तो ये ताकतें इस मिथक के बल पर पूरे देश में सांप्रदायिक वैमनस्व और दंगों का माहौल बनाने की हर संभव कोशिश करेंगे। ताकि अधिक से अधिक लोग हिन्दू और मुस्लिम पहचान को प्राथमिकता देते हुए वोट करें। इतिहास में दो दशक पीछे देखें तो संघ परिवार की यह मंशा और स्पष्ट हो जाती है। नब्बे के दशक में “जय श्री राम” का मिथक कुछ इसी तरह खड़ा किया गया। फिर देशभर में यात्रा, सभा और भाषणों के माध्यम से मिथकों को जनमानस की चेतना का हिस्सा बनाकर उन्हें आंदोलित किया गया। परिणाम स्वरूप शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका जैसे मूलभूत सवालों को मंदिर-मस्जिद, हिन्दू-मुस्लिम के मुद्दे ने आच्छादित कर लिया। इस पूरे समय में सिर्फ और सिर्फ सांप्रदायिक ताकतें फायदे में रहीं न कि आम जनता। वो जनता जो अलग-अलग धार्मिक, सामुदायिक, जातीय, लैंगिक और क्षेत्रीय पहचान रखने के बाद भी एक ही सड़क पर चलने, एक ही बाज़ार से अपनी दैनिक ज़रूरतों को पूरा करने और एक ही सामाजिक ताना-बाना में रहकर अन्तर्सामाजिक संबंधों का निर्वहन करने का आदी रही हो। एक समय ऐसा भी आया जब “जय श्री राम” का मिथक टूटा और सांप्रदायिक ताकतों की हार हुई। लेकिन यह भी सत्य है कि ये ताकतें हमारे देश के किसी न किसी हिस्से में हर दशक में कोई न कोई बड़ा सांप्रदायिक दंगा को अंजाम देने में सफल रही हैं। 1992, 2002 और 2013 के सांप्रदायिक दंगे इस बात की दलील हैं। ज़ाहिर है पलायन की सियासत के पीछे असल मकसद पलायन की स्थिति और कारणों का सही आंकलन कर पलायन करने वाले परिवारों तक राहत पहुंचाना नहीं बल्कि हिन्दू पलायन का मिथक खड़ा करके सांप्रदायिक उन्माद का माहौल बनाना है।

बहरहाल, संघ परिवार ने कैराना में पलायन का मिथक खड़ा करने के चक्कर में पलायन पर बहस व मुबाहसे की नई संभवनाएं पैदा की हैं। दर असल पलायन एक ऐसी प्रवृत्ति है जो जिसके पीछे गरीबी, रोजगार, आजीविका, सामंती/जातीय दमन आदि कारणों के अलावा सांप्रदायिक दंगा भी निहित होता है। लेकिन सांसद हुकुम सिंह का बार-बार अपने बयान का बदलना और अन्य जांच एजंसियों की रिपोर्ट के प्रकाश में यह बात स्पष्ट हो जाती है कि कैराना जैसे तमाम गांव-कस्बे जहां विकास के एजेण्डे को लागू करने में राजनेता और पर्टियां असफल रही हैं, वहां सांप्रदायिक उन्माद का माहौल बनाना चाहती हैं। ताकि जनता अपने-अपने धर्म और धार्मिक पहचान को बचाने की राजनीति में आमने-सामने खड़ी हो जाए और इस तरह धु्रवीकरण की सियासत खड़ी की जा सके, जिसे 2017 के चुनाव से पहले पूरा करने का सपना सांप्रदायिक ताकतों ने देखा है।

Friday, February 19, 2016

जे॰एन॰यू॰: महज अनुभव नहीं लोकतंत्र का दर्शन

Published in JNU Souvenir AAJ 2010

जे॰एन॰यू॰ के अनुभव लिखने की कोशिश कर रहा हूँ। समझ नहीं आता कि अनुभवों के बिखरे संसार को किस तरह एक जगह इकट्ठा करूँ। हाॅस्टल के रूम और मेस से लेकर एड ब्लाॅक और लाइब्रेरी होते हुए स्कूल बिल्डिंग तो कभी ढ़ाबा, के॰सी॰, टेफला और पीएसआर की चढ़ाई का चित्र आँखों के सामने किसी चलचित्र की भाँति घूम रहा है। जे॰एन॰यू॰ में पहला दिन, क्लासमेट्स से परिचय, पहली क्लास, कांपते हाथों से पहली बार सेमीनार पेपर पढ़ना, थरथराते होंठों से प्रश्नों के उत्तर देना, एंडसेम के लिए दिन-दिन भर लाइब्रेरी में बैठे रहना और लाइब्रेरी के पीछे चट्टानों पर बैठकर हाथों में चाय के प्याले लिए दोस्तों के संग घंटों देश और दुनिया की चर्चाओं और परिचर्चाओं में दिमाग खपाना, कभी खाने की गुणवत्ता के लिए तो कभी मेस बिल और हाॅस्टल में सैनिटेशन के लिए हो हंगामा करना और कभी एड ब्लाॅक पर धरना-प्रदर्शन में शामिल होना वगैरह किसी भी छात्र के अनुभव संसार में एक नया अध्याय जोड़ने के लिए काफी होता है। 9.30 बजे के समय को तो शायद ही कोई छात्र भूल सकता है। दुनिया में अलग-अलग हिस्सों में इस समय पर चाहे जो भी होता हो। लेकिन जे॰एन॰यू॰ में यह समय किसी पब्लिक मीटिंग या टाॅर्च लाइट प्रोसेशन का होता है। इस बात को समझना बाहर वालों के लिए कठिन हो सकता है कि इतनी सारी एक्टीविटीज़ किस तरह से संभव होता है। लेकिन मैं अपने अनुभव के आधार पर इस बात का श्रेय इस विश्वविद्यालय के प्रोग्रेसिव और डेमोक्रेटिक वातावरण को देता हूँ। एक ऐसा वातावरण जो यहाँ की कम्यूनिटी लाइफ को ठोस आधार प्रदान करता है। यहाँ के छात्र-छात्राओं को उस दुनिया के बारे अवगत कराता है, जहाँ मानवीय मूल्यों, श्रेष्ठ परम्पराओं और विचारों का सम्मान होता है, जहाँ हक और इंसाफ के लिए आवाज़ बुलंद करने का हौसला मिलता है।


सबसे पहले झेलम हाॅस्टल की बात करूंगा। 1998 में जब मैं जे॰एन॰यू॰ आया तो उस समय यहाँ हाॅस्टल की समस्या चल रही थी। इस समस्या के समाधान के लिए स्टूडेन्ट्स आर्गनाइजेशन्स एड ब्लाॅक पर लगातार धरना प्रदर्शन कर रहे थे। रात में मेस टेबल पर पैम्फलेट्स आ जाते थे। बताना चाहता हूँ कि पैम्फलेट्स की परम्परा इस विश्वविद्यालय में ऐसी रही है जैसे दाल में नमक। जिस दिन डिनर के समय पैम्फलेट्स नहीं आते उस दिन भोजन में कोई कमी सी महसूस होती है। दरअसल छात्र-छात्राओं के एक हाथ में भोजन का निवाला होता है तो दूसरे हाथ में पैम्फलेट होता है। कितना खाना है या कितना खाया से ज्यादा महत्वपूर्ण पैम्फलेट पढ़ना होता है। फिर मेस टेबल पर अगली सुबह, दोपहर और शाम बहस का न ख़त्म होने वाला सिलसिला। कहना चाहता हूँ पैम्फलेट्स निश्चित तौर पर हमें वाहय जगत से जोड़ने में महत्वपूर्ण कड़ी होते थे। किसी समाचार पत्र की तरह। लेकिन ये महज समाचार पत्र नहीं होते थे बल्कि छात्र-छात्राओं की संवेदना को जगाने का सशक्त माध्यम भी होते थे। 

पैम्फ्लेट के माध्यम से छात्र समुदाय तक न सिर्फ देश दुनिया की अद्यतन सूचनाएं आसानी से पहुंच जाती हैं

बल्कि जे॰एन॰यू॰ में छपने वाले पैम्फ्लेट्स समकालीन राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक घटनाक्रम के प्रति छात्र-छात्राओं को सेन्सटाइज़ करने में भी महत्वपूर्ण होते हैं। पैम्फ्लेट्स की परम्परा हमें कई बार इतिहास में थोड़ा पीछे भी ले जाती है। आज़ादी से पहले की उस परंपरा से जोड़ती है जिसकी बुनियाद खुदीराम बोस, भगत सिंह और लाजपत जैसों के हाथों पड़ी थी। 1947 में भारत के आज़ाद होने के बाद आज 21वीं सदी के दूसरे दशक तक का सफर ढ़ेर-सारे राजनीतिक उतार-चढ़ाव और सामाजिक, आर्थिक, तकनीकी और सांस्कृतिक बदलावों से भरा पड़ा है। भूमण्डलीकरण और इससे जनित मानवीय जीवन की चुनौतियां भी बढ़ी हैं। संचार और तकनीकी क्रांति ने हमारे लिए नित नई मशीनें और माध्यम पैदा किये हैं, जिनका उपयोग आज पूरा विश्व कर रहा है। बदलते-बदलते हम आज इतना बदल चुके हैं कि हमारे हाथ से क़लम फिसल सा गया है। कलम का सिपाही अब हम अपने बच्चों को कलम पकड़ना नहीं सिखाते। हमारी उंगलियां कम्प्यूटर के कीबोर्ड पर थिरकती हैं। निश्चित तौर पर विद्युतीय तारों और संकेतों द्वारा अध्ययन-अध्यापन के क्षेत्र में भी आसानियां पैदा हुई हैं। लेकिन यह भी सत्य है कि इसने लेखन की परंपरागत विधियों से खिलवाड़ भी किया है। क्षण भर में किसी संदेश को एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक पहुंचाना संभव है। लेकिन संवेदनाओं के टूटते-बिखरते संसार को बचाना मुश्किल होता जा रहा है। इस संदर्भ में जे॰एन॰यू॰ के पैम्फ्लेट्स महज छात्र समुदाय के राजनीतिक सोच की अभिव्यक्ति भर नहीं होते बल्कि एक संवेदनायुक्त और संवादयुक्त समाज के निर्माण और विकास के सशक्त माध्यम होते हैं। यदि देखा जाय तो तेजी से बदलते वैश्विक परिस्थितियों में एक अहम चुनौती बढ़ती हुई संवादहीनता और संवेदनहीनता है।

जे॰एन॰यू॰ के असाइनमेन्ट्स यहाँ के छात्र-छात्राओं को हाॅस्टल से स्कूल और स्कूल से लाइब्रेरी तक खूब दौड़ाते हैं। लाइब्रेरी में बैठकर असाइइनमेन्ट्स को पूरा करना कठिन कार्य होता है। लेकिन पैम्फ्लेट्स इस कठिन कार्य को असान बनाने में मददगार होते हंै। पढ़ने की आदत हो या लिखने की कला दोनों ही दृष्टि से पैम्फ्लेट्स हमारी सहायता करते हैं। पैम्फ्लेट्स से जुड़ी एक रोचक बात जो इस वक्त याद आ रही है, बताता हूँ। जब मैं 1998 ई॰ में पहली बार एक असाइनमेन्ट (टर्म पेपर) लिख रहा था तो मेरे एक सीनियर ने बताया कि ‘‘वो तो पैम्फ्लेट्स के पीछे के खाली हिस्से पर ही अपना असाइनमेन्ट लिख लिया करते हैं।’’ मैंने हैरानी से उनसे पूछा कि ‘‘फिर फेयर करते होंगे।’’ उन्होंने बताया कि ‘‘नहीं पैम्फ्लेट पर ही फेयर करते हैं।’’ कहना चाहता हूँ कि जे॰एन॰यू॰ से पहले और न ही बाद में अबतक कोई ऐसी जगह देखी जहां इतनी अद्भुत बातें होती हों। इसे विश्वविद्यालय में व्याप्त आर्थिक विविधता का नाम दिया जाना चाहिए। जिसकी वजह से गरीब घरों से आने वाले छात्र-छात्राओं द्वारा पैम्फ्लेट्स के उपयोग पर टीचर्स नाराज़ नहीं बल्कि ख़ुश होते हैं। और इससे कहीं अधिक ख़ुशी की बात इस तरह की तरकीबों की खोज कर विभिन्न वस्तुओं की उपयोगिता को बढ़ाने पर होती है।

हास्टल और कैन्टीन्स से लेकर एड ब्लाॅक, लाइब्रेरी और स्कूल बिल्डिंग्स हर जगह हाथों से बनाए गए पोस्टर अनायास ही हमारा ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हैं। ये पोस्टर कोई आम पोस्टर नहीं होते थे। पोस्टरों के तीन पक्षों पर ध्यान दिलाना चाहता हूँ, जिसके प्रभाव से शायद ही कोई अछूता रहता है। पहला यह कि संवाद करते ये पोस्टर छात्रों-छात्राओं में देश-दुनिया की समस्याओं के प्रति बौद्धिक समझदारी विकसित करते हैं। दूसरा यह कि इन पोस्टरों में जो रचनात्मकता होती है वो किसी प्रेस से छपी पोस्टर में मिलना मुश्किल है। तीसरा यह कि पोस्टर वर्कशाप उन छात्र-छात्राओं की रचनात्मक प्रतिभा को उभारने का अवसर प्रदान करता है जो अबतक किन्हीं कारणों से ऐसे अवसरों से वंचित रह गए होते हैं। 

वर्कशाप सिर्फ पोस्टरों के ही नहीं होते हैं बल्कि इस विश्वविद्यालय में ड्रामा क्लब, म्यूजिक क्लब, लिट्रेरी क्लब और यूनेस्को क्लब के वर्कशाप भी हुआ करते हैं। ये वर्कशाप भी नये-पुराने विद्यार्थियों में एक हेल्दी संवाद स्थापित करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि इन क्लबों का प्रतिनिधित्व लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए प्रतिनिधि ही करते हैं। किसी विश्वविद्यालय में ऐसी छोटी-छोटी लोकतांत्रिक संस्थाओं का आस्तित्व सिर्फ औपचारिकता नहीं होती बल्कि इन संस्थाओं के तत्वाधान में समय-समय पर आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में छात्र-छात्राओं और टीचर्स की बड़ी संख्या में उपस्थिति संवाद की डोर को और मजबूत करती है।

सच कहूँ तो जे॰एन॰यू॰ की न केवल भौगोलिक स्थिति विलक्षण है बल्कि इस विश्वविद्यालय की ढ़ेरों परंपराएं अपने आप में अद्भुत हैं, जो देश और दुनिया को आइना दिखाते हैं। इस विश्वविद्यालय की लोकतांत्रिक परंपरा देश और दुनिया के समक्ष आदर्श प्रस्तुत करते हैं। संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित समानता, स्वतंत्रता, न्याय, पंथनिरपेक्षता और समाजवाद की मूल भावना यहाँ के शैक्षिक और सामुदायिक जीवन का अभिन्न अंग हैं। इस विश्वविद्यालय में सीनियर और जूनियर स्टूडेन्ट्स में कोई भेद नहीं। कम से कम मैं जितने समय तक यहाँ छात्र रहा तबतक किसी की रैगिंग नहीं देखी। बी॰ए॰, एम॰ए॰, एम॰फिल॰ और पी॰एच॰डी॰ हर कोर्स में पढ़ने वाले छात्र-छात्रा एक साथ भोजन करते हुए, बात करते हुए और योजनाएं बनाते हुए देखे जा सकते हैं। आपस में इस तरह का साहचर्य सीखने के नए अवसर प्रदान करता है न कि सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में किसी तरह की बाधा उत्पन्न करता है। गौरतलब है कि इलाहाबाद, बी॰एच॰यू॰, ए॰एम॰यू॰ और डी॰यू॰ इस मामले में बिल्कुल अलग हैं। बहरहाल झेलम मेस की एक छोटी सी घटना का जिक्र करूंगा। मैं अभी नवागन्तुक छात्र था। भोजन करने के पश्चात वाटर कूलर में ही हाथ धोने लगा। मुझे यह पता नहीं था कि इस टैंक का प्रयोजन पानी पीना था न कि हाथ धोना। हाॅस्टल के एक सीनियर ने मुझे बताया कि हाथ वाश बेसिन में धोते हैं। मुझे उनकी बातें बुरी नहीं लगीं। मैंने सीखा कि पानी पीने की जगह कुल्ली नहीं करते। इससे कहीं अधिक यह सीखा कि किसी भी गलत बात को रोकने के लिए हौसले की जरूरत होती है।

जाति, धर्म और समुदाय भारतीय समाज के विशिष्ट लक्षण हैं। अरावली की श्रेणियों, जिसे दिल्ली रीज़ कहा जाता है, पर अवस्थित इस विश्वविद्यालय में भेदभाव के संस्थागत ढ़ांचे नहीं हैं जिस प्रकार से हमारी सामाजिक व्यवस्था में पाए जाते हैं। समानता महज छात्रों-छात्रों और छात्राओं-छात्राओं तक सीमित नहीं बल्कि रात्रि के दो बजे जे॰एन॰यू॰ की कटीली झाडि़यों से होकर हाॅस्टल से लाइब्रेरी और स्कूल आॅफ लाइफ साइंसेज तक लड़कियों का बेरोक-टोक, बेखौफ आना-जाना स्वतंत्रता और समानता का आदर्श प्रस्तुत करता है। इसी संदर्भ में GSCASH भी प्रासंगिक हो जाता है। ज्ञात हो कि सुप्रीम कोर्ट के निदेशानुसार GSCASH जैसी संस्था की स्थापना देशव्यापी स्तर पर करना सरकार का भी लक्ष्य है लेकिन जे॰एन॰यू॰ को छोड़कर शायद ही कोई स्थान या संस्थान ऐसा है जहाँ लिंग आधारित भेदभाव और शोषण को रोकने के लिए व्यक्ति को सेंसटाइज़ करने जैसी कोई युक्ति प्रभावी ढ़ंग से लागू है। किसी भी समाज या समुदाय में हर तरह के लोगों का होना लाज़मी है। सो जे॰एन॰यू॰ भी इस विविधता का गवाह है। बात उस समय की है जब मैं झेलम हाॅस्टल का प्रेसीडेन्ट चुना गया था। हाॅस्टल प्रेसीडेन्ट की तमाम जिम्मेदारियों में एक अहम काम Annual Hostel Day Celebration (हाॅस्टल नाईट) को सफलतापूर्वक
सम्पन्न कराना होता है। जे॰एन॰यू॰ प्रशासन पिछले कई वर्षों से इस प्रयास में था कि सभी हाॅस्टल्स को मिलाकर एक समेकित कार्यक्रम हो। इसके पीछे प्रशासन की सबसे बड़ी दलील लड़कियों को Tease करने (छेड़ने) की बढ़ती हुई घटनाएं थीं। इस विषय पर सभी छात्रावासों के अध्यक्ष और छात्र संघ तथा डीन के बीच मीटींग हुई और नतीजा यह निकला कि सभी प्रतिनिधि मिलकर Self Vigilance की Team बनाएंगे और इस तरह की घटनाओं को होने से रोकने में प्रशासन की मदद करेंगे। हम सभी ने हाॅस्टल नाइट का वैयक्तिक सुख त्यागकर इस बात को साबित किया कि सेक्सुअल हरासमेंट को रोकने के लिए किसी सामाजिक समागम को समाप्त नहीं किया जाना चाहिए। बल्कि ऐसे आयोजनों को और उत्साह से करके यह संदेश देना चाहिए सामाजिक समागम लोगों को जोड़ने के लिए होता है न कि तोड़ने के लिए। वैसे भी हमें पढ़ाई पूरी करने के बाद एक बार फिर उसी समाज में वापस जाना है जहाँ सेक्सुअल हरासमेंट की घटनाएं बडें पैमाने पर घटित होती हैं। इसलिए छात्र-छात्राओं को सेन्सटाइज करना ही देश और समाज के दीर्घकालिक हित में है।

वर्ष 1991 भारत में आर्थिक सुधारों के नाम रहा तो 1992 बाबरी मस्जिद के विध्वंश के कारण इतिहास में दर्ज हुआ। इन वर्षाें में मैं इलाहाबाद में सी॰ए॰वी॰ इण्टर काॅलेज में छात्र था। इसी दौरान मैंने सुना था कि जे॰एन॰यू॰ से पढ़ाई करने के बाद 10000-15000 तक की नौकरी तुरंत मिल जाती है। रोजगार हर हाल में जरूरी है। 1986 की नई शिक्षा नीति में भी व्यवसायपरक शिक्षा के प्रसार पर जोर दिया गया है और नई आर्थिक नीतियों के चलते शिक्षा में निजी क्षेत्र का हस्तक्षेप बढ़ा है। पिछले बीस बरस में व्यवसाय के नए अवसर अवश्य सृजित हुए हैं लेकिन आर्थिक सुधारों से जनित शिक्षा के बाज़ारीकरण के अनुभव हमें ये भी बताते हैं कि फिस्कल डिफीसिट को संभालने में शिक्षा की मूल भावना और उद्देश्यों की अवहेलना भी हुई है। बेलगाम फीस वृद्धि और सेल्फ फाइनेंस्ड कोर्सेज के कारण आम छात्र शिक्षा के अनेक अवसरों से वंचित है।

मौजूदा परिस्थितियों में जे॰एन॰यू॰ जैसे विश्वविद्यालय का आस्तित्व उम्मीद की किरण दिखाता है। इस विश्वविद्यालय की एडमिशन पाॅलिशी और लोकतांत्रिक परंपरा कुछ ऐसी है कि यहाँ समाज के हर तबके और हर वर्ग के छात्र-छात्रा अपनी योग्यता के आधार पर प्रवेश पाते हैं। यहाँ छात्र-छात्रा विश्वविद्यालय में उपलब्ध संसाधनों तक लिंग, जाति, धर्म या क्षेत्र के आधार पर होने वाले भेदभाव के बिना ही अपनी पहुंच रखते हैं। निजी तौर पर मैं कह सकता हूँ कि मैंने जे॰एन॰यू॰ को इसके उच्च शिक्षा की गुणात्मक विशेषताओं से ही नहीं बल्कि इससे कहीं अधिक इसकी लोकतांत्रिक परंपराओं के कारण समझ पाता हूँ। दरअसल यह विश्वविद्यालय शिक्षा का बेहतर माहौल तो देता ही है साथ में आगामी जीवन के लिए ऐसी लीडरशिप के बीज तत्व तैयार करता है जो अन्य विश्वविद्यालय में अप्राप्य है। मूलाधिकारों की बात हो या फिर मूल कत्र्तव्यों की या भारत के कल्याणकारी राज्य होने की, संविधान के हर उपबन्ध को यहाँ व्यवहार रूप में देखा, समझा और महसूस किया जा सकता है।

कल्याणकारी राज्य से एक बात याद आई। 1998-2000 के समय में जे॰एन॰यू॰ का डीन कार्यालय ‘‘डीन आॅफ स्टूडेन्ट्स वेलफेयर’’ कहलाता था। लेकिन बाद के समय में ‘‘वेलफेयर’’ शब्द तिरोहित कर दिया गया। और डीन कार्यालय ‘‘डीन आॅफ स्टूडेन्ट्स’’ बन कर रह गया। मेरे कहने का अर्थ यह है कि शायद ऐसा नए आर्थिक सुधारों के दबाव में हुआ हो। इसी तरह पिछले तीन-चार बरसों में कैम्पस सुन्दरीकरण और मरम्मत के नाम पर विनीर्माण के जो काम हुए और किए जा रहे हैं, उनमें भी वेलफेयर कम बल्कि विकास के नए प्रतिमानों को छूने की कोशिश अधिक दिखती है। शायद सादगीयुक्त कुर्ता और झोले में सुन्दरता देखने-परखने वाले छात्रों की पहचान भी मिटती जा रही है। इनफार्मेशन-टेक्नोलाॅजी की धूप-छावँ में जवान होती नययी पीढ़ी जे॰एन॰यू॰ को नए आयाम दे रही है।

ज़ाहिर है प्रगतिशील और बुद्धिजीवियों का विश्वविद्यालय जे॰एन॰यू॰ भी आज भूमण्डलीकरण जनित चुनौतियों से दो-चार है। जिन छात्र आंदोलनों के बल पर देश के युवा नाज करते थे, ऊर्जा प्राप्त करते थे, आज वहाँ भी छात्र संघ पर प्रतिबंध है। 2007 में NDTV की रिपोर्टर अमृता प्रधान ने जब मुझसे लिंगदोह कमीशन की संस्तुतियों के जे॰एन॰यू॰ में लागू करने की संभावना के बारे में मेरे विचार जानने चाहे थे तो उस समय मैंने कहा था कि संभव है, देश के दूसरे विश्वविद्यालयों में इस कमीशन की संस्तुतियों के अनुरूप छात्र संघों के चुनाव होने लगें। लेकिन जे॰एन॰यू॰ के छात्र संघ के कार्यप्रणाली और कार्यशैली को देखते इसे लागू करना संभव नहीं होगा। तीन-चार बरस बाद अब सोचता हूँ कि मैं कितना गलत था। लिंगदोह की संस्तुतियों के अनरूप चुनाव कराना तो दूर की बात यहाँ तो पूरा का पूरा छात्र संघ ही प्रतिबंधित है। इसे मैं ट्रेजडी कहूंगा। एक ऐसी ट्रजडी जो सिर्फ जे॰एन॰यू॰ की नहीं बल्कि समूचे देश के विश्वविद्यालयों और युवाओं की ट्रेजडी है। 

जे॰एन॰यू॰ की मौजूदा स्थिति चिन्ताजनक और निराशाजनक है जरूर लेकिन प्रोफेसर आनंद कुमार की बातों पर यकीन करें तो जब सारे रास्ते बंद हो गए हों तो ऐसे में इतिहास में थोड़ा पीछे देखना चाहिए। वहीं से नयी ऊर्जा और स्फूर्ति प्राप्त होती है। इस संदर्भ में सन् 2005 का नेशले आउटलेट के खिलाफ छात्र आंदोलन हमें रास्ता दिखाता प्रतीत होता है कि किस तरह इस देश में तेजी से बढ़ते काॅरपोरेट प्रभाव को धूल चटाया जाय। याद आते हैं वो दिन जब कैम्पस के छात्र बिना वैचारिक और राजनीक भेदभाव के बड़ी तादाद में नेशले आउटलेट के विरोध में चल रहे आंदोलन का हिस्सा बने थे। और कारपोरेट वल्र्ड को संदेश दिया था कि हम उत्पाद का उपभोग करेंगे न कि उपभोक्तावादी संस्कृति का अनुकरण करेंगे। नेशले को अपना आउटलेट हटाना पड़ा था। जे॰एन॰यू॰ सीख देता है कि किस प्रकार वैश्विक संदर्भों में काॅरपोरेट विश्व द्वारा प्रायोजित उपभोक्तावादी संस्कृति से खुद को अक्षुण्य रखते हुए विकास की नई मंजिलों तक पहुंच जाए।

बहरहाल ये घटनाएं मेरे लिए इसलिए खास हैं क्योंकि कि राजनीतिक रूप से अलग-अलग खेमों में बंटे छात्र समुदाय का काॅमन इश्श्ूज़ के लिए काॅमन प्लेटफार्म पर आना जे॰एन॰यू॰ की विलक्षण विशेषता रही है। इस बात को मैं दावे के साथ इस लिए भी लिख पा रहा हूँ क्योंकि मैंने चंदू पर बनी फिल्म में देखा था कि चंदू के लिए आंदोलनरत्त छात्र-छात्राओं में वो चेहरे भी शामिल थे जो उनसे राजनीतिक सहमति नहीं रखते थे।

मैं समझता हूँ कि झेलम छात्रावास और इसके तत्वाधान में आयोजित होने वाले चाट महासम्मेलन के जिक्र के बिना मेरे अनुभव का यह हिस्सा अधूरा रहेगा। जे॰एन॰यू॰ विशेषकर झेलम मेस की ढे़र सारी चर्चाओं-परिचर्चाओं में एक प्रमुख विषय चाट परंपरा का होता है। जिसका अभिप्राय अपनी विद्वतापूर्ण बातों को पूरे विस्तार से कहने से है। प्रवेश के समय जब कोई छात्र हाॅस्टल में आता है और यदि कम समय में ही छात्रावासियों के साथ घुल-मिल जाता है तो पुराने छात्रावासी यह कहते नहीं थकते हैं कि डीन आॅफिस में बैठे श्री गुलाटी इनकी चाट झमताओं को देखते हुए ही पेरियार, कावेरी या अन्य छात्रावास के आग्रह को ठुकराकर इन्हें झेलम भेजा है। झेलम छात्रावास की कुछ शब्दावलियां जो याद रह गयीं हैं। किसी नवागन्तुक के लिए आपस में छात्र कुछ इस लहजे में बात करते हैं ‘‘आज ही गिरे हैं’’ (यानि आज ही आए हैं), ‘‘कहाँ विलुप्त हो गए थे सर’’ (अर्थात कहाँ चले गए थे) वगैरह।
झेलमवासी इन शब्दावलियों को चाट भाषा का नाम देते हैं। चाट भाषा जाकर जुड़ती है होली की पूर्व संध्या पर आयोजित होने वाले चाट महासम्मेलन से। वरिष्ठ छात्रों से पता चलता है कि चाट महासम्मेलन की परंपरा आज से करीब एक दशक पूर्व शुरू हुई थी। इस परंपरा की स्थापना का श्रेय भारतीय भाषा केन्द्र के शोध छात्र डा॰ हरिओम का है जो संप्रति कानपुर के जिलाधिकारी हैं। धन्य हो डा॰ साहब, बीड़ी-सिगरेट और गंगा ढ़ाबा का नशा क्या पहले से ही कम था!, जो यहाँ के छात्र समुदाय को चाट महासम्मेलन का वार्षिक नशा पकड़ा दिया। प्रत्येक वर्ष होने वाले इस आयोजन में मुझे 1999 में एक दर्शक छात्र के रूप में भाग लेने का मौका मिला। झेलम मेस दर्शकों से खचाखच भरा था। प्रोफेसर पुरूषोत्तम अग्रवाल मुख्य अतिथि की कुर्सी को शुशोभित कर रहे थे। गद्य और काव्य में रूचि रखने वाले अपनी रचनात्मक क्षमताओं का भरपूर प्रदर्शन कर रहे थे। लेकिन झेलम के निवासी कवि हृदय भरत प्रसाद त्रिपाठी को मंच से उतरना पड़ा था। पी॰एच॰डी॰ पूरा करने के बाद भरत जी को उत्तरपूर्व में लैक्चरशिप
का पद मिला लेकिन शोध छात्र रहते वो कभी मंच से अपनी कविताओं का वाचन नहीं कर सके। 1999 के चाट सम्मेलन की एक मजेदार बात यह भी है कि सभी छात्र-छात्रा चाट महानुभावों को सुन और देखकर आनंदित हो रहे थे। लेकिन सैंकड़ों की भीड़ (जो बढ़ते-बढ़ते अब हजारों मेें लगती है) में मुख्य अतिथि अग्रवाल सर का चेहरा क्रोध से फटा जान पड़ता था। सम्मेलन की समाप्ति पर उन्होंने छात्रों के लिए दो शब्द में ढ़ेरों उपदेश दिए थे। सतलज छात्रावास के वार्डेन और भारतीय भाषा केन्द्र में लैक्चरर होने के बाद भी उन्हें देर तक देखने की तमन्ना एन॰डी॰टी॰वी॰ पर ही पूरी होती थी। संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य मनोनित होने के बाद यह अवसर भी जाता रहा है।

चाट सम्मेलन का आने वाले दिनों में इतना विस्तार हुआ कि यह आयोजन चाट सम्मेलन से महासम्मेलन कहा जाने लगा। इसका आयोजन झलेम हाॅस्टल के मेस से बाहर बैडमिन्टन कोर्ट पर होने लगा। 2004-05 में जब मैं हाॅस्टल प्रसीडेन्ट था, उस वर्ष इसका आयोजन हाॅस्टल के अन्दर अवस्थित उस गड्ढे़ में हुआ जिसकी गड्ढ़े के रूप में कोई उपयोगिता नहीं थी। इसी वर्ष इस गड्ढे़ को चाटलीला मैदान कहा गया। इसी वर्ष पहली बार झेलम चाट सम्मेलन का मीडिया वालों ने लाइव कवरेज भी किया।

बहरहाल झेलम मेस और बैडमिन्टन कोर्ट से होता हुआ यह महासम्मेलन झेलम लाॅन तक पहुंच चुका है। जे॰एन॰यू॰ में इस तरह के आयोजन की सफलता यही है कि यह आयोजन देश के किसी भी हिस्से में होने वाले होली की हुड़दंग से अलग होता है। किसी पर व्यक्तिगत छींटाकशी से दूर यह महासम्मेलन हास्य के गुब्बारों में संवेदना के इन्द्रधनुषीय रंग लिए होता है।

संप्रति मैं जे॰एन॰यू॰ के फिल्टर वाटर और झेलम के स्वादिष्ट भोजन से दूर पूर्वांचल के गाज़ीपुर जिला के ग्रामीण क्षेत्र में बाल हृदय की गहराइयों को समझने की कोशिश कर रहा हूँ। जे॰एन॰यू॰ से भौगोलिक दूरी है जरूर लेकिन खुशी और सन्तुष्टि इस बात की है कि जे॰एन॰यू॰ के अनुभव पग-पग पर काम आते हैं। फेसबुक पर जब गंगा के माध्यम से अपने अनुभव लिखने की सूचना मिली तो यादें ताज़ा हो उठीं। अब जबकि यादों को शब्दों और वाक्यों के माध्यम से लिखने की कोशिश कर रहा हूँ तो ऐसा महसूस कर रहा हूँ कि ढे़र सारे चट्टान, चट्टानों पर स्थित ढ़ाबे, ओपेन थिएटर, कटीली झाडि़यों वाले पेड़-पौधे विशेषकर अमलताश के फूल, सतलज से काॅवेरी के बीच के अजीब खुशबू वाले वृक्ष, ढे़रों पगडंडियां और लाल रंग की इमारतें और इन पगडंडियों तथा इमारतों में घूमते फिरते प्रगतिशील विचारों की श्रृंखला, टीचर्स का दोस्ताना व्यवहार, 9.30 बजे की गंगा ढ़ाबा से ताप्ती तक के जुलूस, थेसिस जमा करने का प्रेसर और हिलटाॅप की चढ़ाई, 615 से मुनिरका, बेर सराय, वसंत विहार और सरोजनी मार्केट की यात्रा वगैरह चित्र यहीं कहीं आस-पास ही बिखरे हैं। ये चित्र मुझे एक विश्वविद्यालय की भौगोलिक अवस्थिति और शिक्षण व्यवस्था की तस्वीर नहीं दिखाते बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था का दर्शन कराते हैं।

नोट: यदि किसी को JNU AAJ की २०१० में प्रकाशित पत्रिका का पीडीएफ कॉपी चाहिए तो अपना E-mail address निचे लिखे पता पर भेजें. आज की २०१० की प्रस्तुति में और भी दोस्तों की प्रकाशित रचनायें पढ़ी जा सकती हैं.
vaseemakhtar@gmail.com

Monday, October 19, 2015

ताकि समावेशी विकास का मार्ग प्रशस्त हो सके

यूँ तो मऊ पिछले 20 बरसों से आना-जाना है। लेकिन आज पहली बार तालीमी बेदारी के हवाले से रघुनाथ पुरा जाना हुआ। रास्ते में हाफिज़ नियाज़ साहब ने बताया कि रघुनाथ पुरा को आबाद हुए कोई बीस बरस हुए हैं। रघुनाथ पुरा की गलियों को देखकर आज बनारस की गलियों की तंगी की याद भी ताज़ा हो गयी। हालांकि रघुनाथ पुरा की गलियां बनारस की गलियों से थोड़ी चैड़ी ज़रूर हैं लेकिन लम्बाई और हर दस-बीस कदम पर मोड़ बनारस की बुनकर बस्तियों की भूलभुलैया जैसी ही हैं। रघुनाथ पुरा की गलियों में बसने वाले बुनकरों की जि़न्दगी कमोबेश वैसी ही हैं, जैसी कि बनारस की बुनकर बस्तियों या लोहता के धन्नीपुर नयी बस्ती की। इसलिए इन गलियों को बुनकर बस्ती के नाम से भी मनसूब किया जा सकता है। जहां जि़न्दगी ताना-बाना की उलझनों में कुछ इस तरह उलझी हुई है कि सुलझने का नाम ही नहीं लेती। कारोबार के उतार-चढ़ाव ने कईयों को चाय और पान की दुकानों पर पहुंचा दिया है और बहुतों को चाय-पान की दुकान से आजीविका चलाने का सपना दिखाया है। बहुत से घरों के नौजवानों को भीवण्डी, अहमदाबाद, सूरत और हैदराबाद के साथ-साथ सऊदी जाने के लिए मजबूर किया है। बुनकरों की गलियों में पसरा सन्नाटा इस बात की गवाही देता है कि बच्चे, बड़े, बूढ़े और महिलाएं सभी अपने घरों में ताना-बाना में उलझी अपनी जि़न्दगानी की उलझनों को सुलझाने में मसरूफ हैं।
ज़फरूल जैसे नौजवानों से मुलाक़ात एक बार फिर से हाशिए की जि़न्दगी जी रहे गरीब-वंचित बुनकरों के रोज़मर्रा जि़न्दगी पर अज़-सरे-नौ ग़ौर व फिक्र के लिए आमादा करता है। ज़फरूल साहब मऊ के उन कारोबारियों में हैं, जो कारोबार के साथ-साथ अपने भाई-बहनों ही नहीं बल्कि अपने पड़ोसियों और समाज के तमाम ज़रूरतमन्दों के लिए कुछ करने का जज़्बा रखते हैं। उनके परिवार में तालीम की शमा रौशन हो चुकी है और वो इस रोशनी को अपने मोआशरे के और घरों तक पहुंचाना चाहते हैं। खु़द ज़फरूल साहब की एक बहन एम.बी.बी.एस. और दो भाई बी.टेक. की पढ़ाई कर रहे हैं।
ज़फरूल साहब से मऊ के मौजूदा हालात पर गुफ्तगू हुई। उन्होंने गरीबों, पिछड़ों और खासकर मऊ के बुनकरों की ज़मीनी सच्चाई से रूबरू कराया। बताया कि उनके शहर में कई बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें वक्त रहते सही गाइडेन्स न मिल पाने की वजह से चाय की दुकानों पर काम करके अपने परिवार की आजीविका चलाना पड़ रहा है। अल्पसंख्यकों के कल्याण से संबंधित योजनाओं की पहुंच न तो इन बच्चों तक हो पायी है और न ही ऐसे बच्चे इस तरह के कल्याणकारी योजनाओं तक पहुच पाते हैं।
बातचीत से यह अंदाज़ा होता है कि अगर हुकूमत के नीति निर्धारण में मऊ के अवाम की बुनियादी ज़रूरतों का सही आकलन शामिल कर लिया जाए तो किसी हद तक बुनकरों के पेशे और उनके बच्चों की तालीम और रोजगार की समस्या दूर की जा सकती है। इस बात पर भी चर्चा हुई कि तालीमी बेदारी जैसी मुहिम के तहत हर जिले में एक कम्यूनिटी रिसोर्स सेन्टर स्थापित किया जाए और तालीम से बेखबर लोगों की ज़मीनी हक़ीक़त जानने और उन्हें जागरूक करने के लिए राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर शोध केन्द्र की स्थापना की जाए। रिसोर्स सेन्टर का काम कम्यूनिटी के बच्चों को उनके तालीम में हर संभव कोशिश करना है। जबकि तरफ शोध केन्द्र के माध्यम से कम्यूनिटी स्तर पर शोध करके हाशिए पर खड़े लोगों की बुनियादी ज़रूरतों का आंकलन किया जाएगा और शोध की रिपोर्ट इस दिशा में समझ रखने वाले व काम करने वाले तमाम व्यक्तियों, समूहों और संगठनों के साथ साझा करने के साथ-साथ राज्य और केन्द्र सरकार के पास इस उम्मीद के साथ भेजी जाए कि समुदाय और इसकी शैक्षिक, सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक ज़रूरतों के मुताबिक नीतियां बनायी जाएं। ताकि समावेशी विकास का मार्ग प्रशस्त हो सके।

Thursday, June 26, 2014

खरा उतरने का समय

दुनिया भर में बनारस की अलग पहचान रही है। यहां की धार्मिक संस्कृति और साड़ियों की कारीगरी हमेशा से देश और दुनिया के लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते रहे हैं। लेकिन मंदिरों, गलियों और बुनकरों की इस नगरी को करीब से देखने और समझने करने का अवसर कम ही लोगों को नसीब होता है। कई बार ऐसा भी होता है कि करीब के लोग, यहां तक कि बनारस में ही रहते हुए बहुत से लोग सुबह-ए-बनारस और परंपरागत साड़ियों पर की जाने वाली बुनकरों की कारीगरी को देखने, समझने और महसूस करने से महरूम रह जाते हैं। ऐसे समय में यदि चुनावी नफ़ा-नुक़सान से अलग बनारस को नए प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र के तौर पर देखा जाए तो यहां के लोगों में बेहतरी की नयी उम्मीदें ज़रूर नज़र आती हैं।

बनारस के लोग जिन समस्याओं से दो-चार रहे हैं, उनमें बिजली आपूर्ति सर्व प्रमुख है। खासकर जब मई-जून में पारा चढ़ता है और बिजली की आपूर्ति प्रभावित होती है, तो बिजली की समस्या हर जु़बान की कहानी बन जाती है। ऐसे में यदि शासन की ओर से 24 घंटे बिजली आपूर्ति के बाबत कोई पहल की जा रही है तो उम्मीद की नयी किरण का रौशन होना स्वाभाविक है। काबिले ज़िक्र है प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने कि 2 जून को बिजली के लिए रोते-बिलखते शहर बनारस में 24 घंटे बिजली की आपूर्ति का आदेश जारी किया। बेशक इसे मोदी इफेक्ट के रूप में देखा जाना चाहिए। क्योंकि बनारस अब प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र बन चुका है। फिर भी धन्नीपुर के निसार अंसारी को जैसे लागों को लगता है कि 24 घंटे बिजली की आपूर्ति जैसी कोई भी घोषणा तब तक बेमानी हैं, जब तक कि खंभों और तारों की स्थिति ठीक नहीं हो जाती है। दालमंडी में इलेक्ट्राॅनिक्स के दुकानदार फहीम भाई की बातों पर यक़ीन करें तो 24 घंटे अबाध बिजली की आपूर्ति कम से कम आज की तारीख में मुमकिन नहीं है। कारण बताते हुए फहीम भाई बताते हैं कि जर्जर हो चुके बिजली के तारों और ट्रांसफार्मर के सहारे इस काम को अंजाम तक नहीं पहुंचाया जा सकता। यदि ऐसी कोशिश होती भी है तो किसी तरह लोड उठा रहे ट्रांसफार्मर अपनी क्षमता से अधिक लोड नहीं झेल सकते। नतीजा यह होगा कि तारों के टूटने और ट्रांसफार्मर के जलने की घटनाएं बढ़ेंगी। बनारस जैसे तंग और घने शहर में इतनी बड़ी संख्या में ट्रांसफार्मर बदलना या मरम्मत करवाना बिजली विभाग के लिए मुश्किल काम होगा। ज़ाहिर है 24 घंटे बिजली की आपूर्ति तब तक मुमकिन नहीं, जब तक खंभों पर उलझन की तरह उलझे हुए तार बदले नहीं जाते।

अब बनारस की पहचान कबीर और ताना-बाना से कम, बल्कि गंगा और मोदी से अधिक होने लगी है। फहीम भाई इलेक्ट्राॅनिक्स की दुकान वाले, लक्ष्मन व मो॰ इस्माइल जैसे रिक्शा चालकों के अलावा इश्तियाक़ अंसारी जैसे कारीगरों को कभी कबीर के बारे में पढ़ने-सुनने का अवसर नहीं मिला, लेकिन हालिया चुनाव से पहले की मोदी वाली लहर और सुनामी को इन जैसों ने खूब महसूस किया। अब तो हवा का रूख भी इधर का ही हो चुका है। मोदी जी शपथ ग्रहण कर चुके हैं और गंगा मइया को दुरूस्त रखने, इसे पर्यटन और यातायात माध्यम के रूप में विकसित करने और इसके पानी से बिजली बनाने आदि के लिए मंत्रीस्तरीय कवायद भी शुरू हो चुकी है। ऐसे में अगर चुनाव के दौरान मोदी विरोधी रहे बहुत से बनारसियों का अकीदा चुनाव बाद मोदी मय होने लगा है, जो इसमें चैंकने की बात नहीं है। इश्तियाक अंसारी जैसे नौजवानों पर नए प्रधानमंत्री के कामकाज की शैली का असर ज़रूर देखा जा सकता है। उनके मुताबिक यदि बिजली की आपूर्ति 24 घंटे होने लगे तो यहां के बुनकर महिला-पुरूष और बच्चों को लगातार कई-कई रात जागकर साड़ियों का ताना-बाना ठीक करने में अपनी नींदे नहीं गंवानी पड़ेंगी। औसत काम दिन में ही पूरा हो जाया करेगा। यह बात क़ाबिले ज़िक्र है कि बनारस के बुनकरों को रातों में लगातार जागकर साड़ी का ताना-बाना ठीक करना होता है, ताकि उनकी ज़िन्दगी का ताना-बाना ठीक रहे। यही वजह है कि कठिन परिस्थितियों में ज़िन्दगी गुज़र-बसर करने वाले बुनकर अपनी स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी ज़रूरतों को नज़र अंदाज़ करके दूसरों के तन के लिए खूबसूरत लिबास तैयार करते हैं। ऐसी कठिन परिस्थिति में बिजली की अनियमित आपूर्ति से बुनकर परिवारों की स्वास्थ्य और शिक्षा के साथ-साथ उनकी आजीविका का परंपरागत विकल्प भी बुरी तरह प्रभावित होता है।

बुनकर बस्तियों का हाल यह है कि जैसे ही बिजली आती है, ये बस्तियां गुलज़ार हो उठती हैं, जैसे ज़िन्दगी पटरी पर दौड़ने लगती है। दूसरी ओर बिजली कटते ही इन मुहल्लों में मातमी सन्नाटा छा जाता है। पेशे से अध्यापिका नासरीन बताती हैं कि तंग गलियों से प्रतिदिन होकर गुजरना, काॅलेज पहुंचना छात्र जीवन में हर दिन नयी चुनौती हुआ करती थी। जब चुनौतियों का सामना करने का हौसला किया तो ज़िन्दगी में नए रंगों और उमंगों के दिन आए। बेशक नासरीन की ज़िन्दगी में अच्छे दिनों की शुरूआत करीब दस बरस पहले हो चुकी थी। लेकिन जो नहीं बदला, वो तंग गलियों में प्रतिदिन कई मन कूड़ों के ढ़ेर की मौजूदगी। हालांकि सफाई कर्मियों को गाहे-बगाहे गलियों की नालियों को साफ करते देखा जा सकता है लेकिन नासरीन जैसी महिलाओं को यह नाकाफी लगता है। कहती हैं कि अगर गंगा मइया की सफाई और शुद्धिकरण के साथ-साथ प्रधानमंत्री जी की नज़र हमारी गलियों पर भी पड़ती तो बनारस की सुंदरता को चार चांद लग जाती। नासरीन को मालूम है कि गलियां स्थानीय निकायों का विषय है। इसीलिए वो इन निकायों में भी मोदी इफेक्ट देखना चाहती हैं। ताकि नदी और जल प्रबंधन की तरह गलियों के लिए कोई ठोस और प्रभावी गार्बेज मैनेजमेन्ट का उपाय ढ़ूंढ़ा जा सके।

कहना नहीं होगा कि बुनकरों की ज़िन्दगी न सिर्फ काम के बोझ तले दबी हुई है बल्कि ध्वनि और वायु प्रदूषण ने इनके स्वास्थ्य को बुरी तरह नुकसान पहंुचाया है। बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं से इनकी वंचना की कहानी किसी से छिपी नहीं है। समय पर उचित इलाज की सुविधा न मिल पाने की वजह से बहुत से बुनकरों को तो बेवक्त ही मौत का शिकार होना पड़ता है। दुःख की बात तो यह है कि दस्तकार फोटा पहचान पत्र और बुनकर स्वास्थ्य बीमा योजना जैसी सुविधा भी इनकी ज़िन्दगी में कोई खास बदलाव नहीं ला सके हैं।

बनारस जितना बड़ा शहर है, यहां की गलियां उतनी ही तंग हैं। गर्मी और हवा के गरमा-गरम थपेड़ों को झेलते-झेलते शाम के सात बज चुके होते हैं। बीएचयू से कैण्ट के लिए आॅटो में सवार हुआ तो सारथी के रूप में ज्ञानचन्द्र सोनकर से मुलाक़ात हुई। दुर्गाकुण्ड पर उन्होंने जिस वृद्ध व्यक्ति को आॅटो से ड्राप किया, उससे किराए के पैसे नहीं लिए। पूछने पर ज्ञानचन्द्र ने बताया कि वो बूढ़े व्यक्तियों और पढ़ने वाले बच्चों से किराए के पैसे नहीं लेते। क्षण भर के लिए ऐसा लगा कि समाजशास्त्र और सोशल वर्क में बड़ी-बड़ी डिग्रियां लेने के बाद भी जिन मानवीय गुणों और नागरिक जिम्मेदारियों का बोध नयी पीढ़ी के बच्चों को नहीं हो पा रहा है, वह बोध मूल्य के रूप में ज्ञानचन्द्र जैसे आॅटो चालकों के अन्दर कूट-कूट कर भरा है। बहरहाल, ज्ञानचन्द्र की थकी हुई आंखें उनकी अधूरी रातों की पूरी कहानी बयान कर रही होती हैं। उनके घर तक बिजली की पहुंच ज़रूर है, लेकिन बिजली उनके घर पहुंचती रात में एक बजे बाद है। दिन भर आॅटो चलाने के बाद जब घर पहुंचते हैं, तो ज्ञानचन्द्र को रात एक बजे तक बिजली का इंतेजार करना पड़ता है। लेकिन ज्ञानचन्द्र जैसे बनारस के आॅटो चालक इस बात से बेख़बर हैं कि बिजली का होना उनके स्वास्थ्य और आजीविका के लिए क्या मायने रखती है।

बनारस में ऐसे आॅटो चालकों की संख्या कम नहीं जो ज्ञानचन्द्र सोनकर की तरह पिछले बीस बरसों या इससे भी अधिक समय से आॅटो चलाकर अपने परिवार की आजीविका चला रहे हैं। लेकिन अब तक उनके पास अपना एक अदद आॅटो नहीं हो पाया है। ज्ञानचन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री चुने जाने पर अच्छा महसूस कर रहे हैं। लेकिन इनके पास इस सवाल का जवाब नहीं कि बीस साल के अथक परिश्रम के बाद भी इनके पास अपना खुद का आॅटो क्यों नहीं है? यह कहना बेमानी नहीं कि ज्ञानचन्द्र जैसे बनारस के आॅटो चालकों के पास जब तक अपना आॅटो नहीं हो जाता, लक्षमन और मु॰ इस्माइल जैसे रिक्शा चालकों को मुनासिब मेहनताना नहीं मिलने लगता, फहीम भाई जैसे इलेक्ट्राॅनिक्स के दुकानदारों और बुनकर बस्तियों तक नियमित रूप से बिजली नहीं पहुंचने लगती, तब तक इनके जीवन में अच्छे दिनों की शुरूआत हो ही नहीं सकती है।

बेशक गलियों की तंगी को दूर करना नामुमकिन है। लेकिन गंगा सफाई और घाटों की मरम्मत के सापेक्ष बनारस की गलियों के लिए विशेष सफाई प्रबंधन की योजना तो बनायी ही जा सकती है। मोदी के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद बनारस में कामकाज की गति देखकर यहां के लागों में नयी अपेक्षाएं जन्मी हैं। अवाम के जमात में वो भी शामिल हैं जो पहले से “अबकी बार/मोदी सरकार” की रट लगा रहे थे और वो लोग भी हैं जो शपथ ग्रहण के बाद मोदी इफेक्ट से अछूते नहीं रहे हैं। जिन्हें मालूम है कि मोदी संघ के समर्पित सिपाही हैं और राजनाथ सिंह के शब्दों में नयी सरकार सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के एजेण्डे के इर्द-गिर्द काम करेगी। ऐसे लागों में वरूणा नदी के दोनों तरफ विकास की एक समान तस्वीर देखने की अपेक्षा, बजरडीहा की गलियों की दुर्दशा ठीक करने की अपेक्षा, लोहता और धन्नीपुर जैसी ग्रामीण बस्तियों के ऊपर हाई टेंशन तारों के ख़तरों से जनता को महफूज़ रखने की अपेक्षा जगी है। बावजूद इसके कि इन लोगों को यह भी पता है कि मोदी के दामन पर 2002 के गुजरात नरसंहारों के खूनी दाग़ हैं। बावजूद इसके इनका अक़ीदा है कि न्याय, अन्याय से और पुरस्कार, दण्ड से बेहतर होता है। जाम और भीड़ से जूझते शहर बनारस के लोगों की उम्मीदों पर मोदी को खरा उतरने का यह अच्छा समय है।

जनसत्ता, 22 जून, 2014
http://epaper.jansatta.com/292406/Jansatta.com/Jansatta-Hindi-22062014#page/15/1

किशोरावस्था की चुनौतियां और हम

बाल्यावस्था से किशोरावस्था की ओर बढ़ते बच्चों के समक्ष न सिर्फ संख्यात्मक और परिमाणात्मक शैक्षिक चुनौतियां होती हैं बल्कि उन्हें शारीरिक, संवेगात्मक, सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक बदलावों के दौर से गुज़रना होता है। अभिभावक या अध्यापक/अध्यापिका की भूमिका में हम कई बार तानाशाह की भूमिका निभाने लगते हैं। कुछ ऐसा करने की कोशिशें आम होती हैं कि कहीं बच्चा बिगड़ न जाए, गलत रास्ते पर न चला जाए आदि-आदि। इसलिए सुबह नींद खुलते ही हम अपने शब्दों का चाबुक बाल मनोविज्ञान की पीठ पर चलाने लगते हैं। यह प्रक्रिया तब तक जारी रहती है, जब तक कि बच्चा थक हार कर सो न जाए।

अगर देखा जाए तो कई मामलों में हमारा समाज बदला है, मूल्य और परंपराओं में बदलाव परिलक्षित हुए हैं। नयी शिक्षा नीति अपनाते-अपनाते हमने स्कूल के पाठ्यक्रम से लेकर स्कूल भूवन, ड्रेस और फीस आदि को नए प्रकार के शैक्षिक बदलाव का मानक बनाया है। यह भी हुआ है कि शारीरिक दण्ड को लेकर हमारा समाज मानसिक स्तर पर बदलाव के दौर से गुजरा है। बेटियों को पढ़ाना पहले सपना हुआ करता था, लेकिन अब ज़माने को बदलता हुआ देखा जा सकता है। अब हमारी बेटियां जिन पगडंडियों पर पैदल भी नहीं चल पाती थी, अब उन्हीं पगडंडियों पर साइकिल की घंटियां ट्रिनट्रिनाते अल सुबह मीलों दूर स्कूल-काॅलेज और ट्यूशन पढ़ने जाती हैं। इतना सारा बदलाव हुआ, लेकिन न जाने ऐसा क्या है कि हमारा समाज और इसका मिजाज़ किशोरावस्था के बच्चों के स्वाभाविक विकास को बार-बार नियंत्रित और संचालित करना चाहता है?

यह बात काबिले गौर है कि किशोर होते बच्चे अपने समय की छोटी-बड़ी पीढ़ियों में कई मायनों में अधिक मुश्किल दौर में होते हैं। फिर स्कूल हो या घर हर जगह वो निगाहों की धूरी हुआ करते हैं। दर असल इस अवस्था में इन्हें जिन संवेगों से होकर गुजरना पड़ता है उसमें बड़ी ऊर्जा होती है। आयु संबंधी हारमोनल सेक्रेशन बार-बार खुली फिज़ा की खुली हवा में घुलमिल जाने की कोशिश करती है। इस वजह से कई बार हमारे बच्चे वो सब कर गुजरते हैं, जिसकी उम्मीद हमें नहीं होती। हमें आश्चर्य इसलिए भी होता है, क्योंकि हम उनके साथ संरक्षक दोस्त के बजाए सांस्कृतिक पुुलिसिया का सा बरताव करते हैं। स्कूल के संदर्भ में कक्षा पांच के बाद यानि 10-12 वर्ष की आयु से बच्चों में किशोरावस्था के लक्षण उभरने लगते हैं तथा जिसके 19वें बरस तक जारी रहने की संभावना होती है। यह वह अवस्था होती है जब बच्चों में शारीरिक और मनोवैज्ञानिक बदलाव बिजली की गति से होते हैं। इन बदलावों को विकास की संज्ञा देना उचित प्रतीत होता है। विकास के इस दौर से लड़के और लड़कियों दोनों को ही गुजरना होता है। यह जीवन का वह हिस्सा होता है जब बच्चों में किसी भी कार्य या बात के लिए आत्मविश्वास की भावना निरन्तर बढ़ती जाती है। लेकिन ध्यान रखना होता है कि बच्चों का आत्मविश्वास नितान्त ही असंगठित और बिखरा हुआ होता है। नए-नए प्रयोग करना यानि अपने मन की जिज्ञासाओं और आस-पास के वातावरण की घटनाओं को रहस्य मानकर उनसे परदा हटाने की कोशिशें उसके व्यक्तित्व विकास का स्वाभाविक हिस्सा होती हैं। लेकिन उसके मानसिक संवेगों में अस्थिरता उसका बराबर पीछा करती रहती है। ऐसे बच्चे घर और गांव-मुहल्ले से लेकर स्कूल-काॅलेज तक हर जगह अपनी श्रेष्ठता के झण्डे बुलन्द करना चाहते हैं। इस उम्र में बच्चों में सुनने के बजाय कहने की प्रवृत्ति अधिक होती है। देखने और समझने के बजाए दिखाने और समझाने की प्रवृत्ति होती है। कई बार यह प्रवृत्ति उन्हें स्थान और समय की सीमा से बाहर ले जाती है। इन्हें बोध नहीं होता कि किसी बात को किसी से कहने या साझा करने का उचित समय कब है और कब नहीं है। इसी तरह किशोरावस्था में बच्चों को समय का भी ध्यान नहीं रहता है। वो किस भी समय अपने इच्छित बात को मनवाने या काम को पूरा करवाने की ज़िद कर बैठते हैं। हालांकि अक्सर माता-पिता या अभिभावक ऐसी परिस्थितियों में डांटना और पिटाई एक मात्र समाधान मानते हैं। लेकिन ऐसे माता-पिता या अभिभावक को यह समझना होगा कि उपर्युक्त उल्लिखित बदलावों के साथ इन्हें खु़द को भी बदलने की आवश्यकता है।

हम अपने बच्चों में बदलाव तो चाहते हैं, खासकर तब जबकि हर बच्चे का मन और शरीर दोनों ही बदलाव के संक्रमण काल में होता है। एक सामान्य बच्चे के समक्ष जो चुनौतियां होती हैं, उन्हें अभिभावक समझने से कोशिश नहीं करते हैं। दर असल हम अच्छे मूल्यों की स्थापना और विकास से जुड़ी हुई अपनी हार्दिक इच्छा/सपना बच्चों के मन-मस्तिष्क पर थोपते रहते हैं। इस थोपने में बच्चों के अंदर लोकतांत्रिक मूल्यों के विकास की संभावनाएं समाप्त होने लगती हैं और दूसरी तरफ बच्चे संशय का शिकार हाने लगते है। वो भावनात्मक संवेगों की ऐसी सवारी गाड़ी पर सवार होते हैं, जहां नए-नए प्रयोग, कठिन परिस्थितियों में दुष्कर कार्यों को करने की चुनौती, छोटी-छोटी बात पर वाद-विवाद और सबसे महत्वपूर्ण लैंगिक आकर्षण का होना सामान्य बात होती है। लेकिन इन सबमें जो मूल्य होते हैं, उन मूल्यों में न तो स्थायित्व होता है और न ही अनुभव की भट्टी में पका हुआ सौन्दर्यबोध।

कोई भी बच्चा अपने माता-पिता का प्रिय बच्चा होता है। उसमें कुछ खूबियां जन्मजात ज़रूर होती हैं लेकिन ज़्यादातर का विकास हमारे परिवेश में होता है। किसी भी बच्चे का परिवेश मुख्य रूप से घर, स्कूल और समाज से बनता है। इसलिए इन तीन स्थानों पर जो भी सामाजिक ईकाइयां आस्तित्व में होती हैं, उनका उचित ढ़ंग से कार्य करना बच्चों के हित में होता है। ऐसा ज़रूरी भी है, क्योंकि किशोरावस्था में बच्चों के मन को समझना और फिर उसके मनोबल व उत्साह को बढ़ना न सिर्फ उसके कैरियर के लिए अच्छा होता है बल्कि समाज निर्माण व देश के विकास के लिए भी ज़रूरी है।

इन्क़िलाबी नज़र
शनिवार, 14 जून, 2014

Wednesday, June 25, 2014

अच्छे दिनों की शुरूआत और चुनौतियां

मोदी बतौर प्रधानमंत्री भारतीय अवाम के एजेण्डा पर किस सहजता से काम कर पाते हैं? खासकर सामाजिक न्याय और धर्म निरपेक्षता के संवैधानिक संकल्पों को आगे बढ़ाने में उनकी पहलकदमी क्या होगी? इस सवाल पर इसलिए भी गौर करने की ज़रूरत है, क्योंकि मोदी का संबंध राजनीति के जिस घराने से है, उस घर में समाज के विभिन्न वर्गों एवं समुदायों से लेकर स्त्रियों तक के लिए मनुवादी विचारों से प्रेरित आचार संहिता लागू करने में विश्वास रहा है।


नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने और कैबिनेट के गठन के बाद हर तरफ अच्छे दिन आने की बातें आम हैं। वाकई “अबकी बार/मोदी सरकार” और “अच्छे दिन आने वाले हैं” की मुहिम सफल हुई है। अबकी बार यह भी हुआ है कि पिछले कई संसदीय चुनावों के बाद ऐसा जनादेश आया है जिसमें एक गठबंधन को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ है। दूसरी तरफ कांग्रेस को भाजपा के 285 के मुकाबिले महज 48 सीट पर ही संतोष करना पड़ा है। यदि बंगाल और तमिलनाडु जैसे कुछ राज्यों को छोड़ दें तो क्षेत्रीय दलों विशेषकर वो जिनका यू.पी., बिहार और झारखण्ड की राजनीति में पिछले दो दशकों से खास असर रहा है, को भी हाशिए पर पहुंचना पड़ा है। देखना यह है कि चुनाव प्रचार के दौरान जिस तरह से मोदी ने सक्रिय रहकर पूरे माहौल को अपने पक्ष में किया और जिस तरह मोदी लहर और सुनामी के रूप में उभरे या उभारे गए हैं, वह मोदी बतौर प्रधानमंत्री भारतीय अवाम के एजेण्डा पर किस सहजता से काम कर पाते हैं? खासकर सामाजिक न्याय और धर्म निरपेक्षता के संवैधानिक संकल्पों को आगे बढ़ाने में उनकी पहलकदमी क्या होगी? इस सवाल पर इसलिए भी गौर करने की ज़रूरत है, क्योंकि मोदी का संबंध राजनीति के जिस घराने से है, उस घर में समाज के विभिन्न वर्गों एवं समुदायों से लेकर स्त्रियों तक के लिए मनुवादी विचारों से प्रेरित आचार संहिता लागू करने में विश्वास रहा है।
गौर तलब है कि मतगणना वाले दिन एनडीए को पूर्ण बहुमत की तरफ बढ़ते देख राजनाथ सिंह ने प्रेस वार्ता के दौरान कहा कि इस बार के चुनाव में जाति और धर्म के बंधन टूट गए हैं। उन्होंनेे “जस्टिस फाॅर आॅल और अपीजमेन्ट फाॅर नाॅन” की बात की। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी पार्टी “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” के एजेण्डे पर खड़ी हुई थी और सरकार बनने के बाद इसी के इर्द-गिर्द काम करेगी। बीजेपी के पार्टी अध्यक्ष द्वारा संघ परिवार के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रतिबद्धता को दोहराना स्वाभाविक है। लेकिन यह विचार का विषय है कि एक समय में दो अलग-अलग मत या बातें एक साथ कैसे आगे बढ़ सकती हैं? गृहमंत्री का कार्यभार संभाल चुके राजनाथ सिंह का चुनाव नतीजों के दिन वाला बयान कुछ ऐसा है।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और जस्टिस फाॅर आॅल दोनों बातें एक साथ इसलिए भी मुमकिन नहीं है क्योंकि जब हम सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करते हैं तो समान नागरिक संहिता जैसा संवेदनशील मुद्दा स्वतः सामने आ जाता है। अगर देश और संविधान की बात करें तो भारत जैसे देश की सामाजिक, सामुदायिक और सांस्कृतिक विविधता को समाप्त करके समान नागरिक संहिता को थोपना न्यायोचित नहीं। यानि अन्यायपरक ढ़ंग से ही ऐसी किसी संहिता को लागू किया जा सकना मुमकिन है। ऐसे में पार्टी अध्यक्ष श्री राजनाथ सिंह की बातें कम से कम उन लोगों को गुमराह करने वाली हैं जिनका संबंध समाज के पिछड़े और वंचित तबके से रहा है, खासकर वो समुदाय जो ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से मुख्य धारा के विकास से दूर रहे हैं और जिन्हें सामाजिक न्याय की सबसे अधिक ज़रूरत रही है। समान नागरिक संहिता का मामला ऐसा है कि यदि किसी व्यक्ति को पैन्ट-शर्ट पसन्द है तो उसे कुर्ता-पाजामा पहनने के लिए मजबूर होना पड़े। ज़ाहिर है ऐसी कोई भी नीति देश की सामाजिक व सामुदायिक विविधता को अक्षुण्य बनाए रखने में बाधक होगी। वैसे भी नयी सरकार के लिए समान नागरिक संहिता जैसा कोई कदम उठाना आसान काम नहीं होगा। 

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद दरअसल संघ परिवार का एजेण्डा रहा है। 90 के दशक में जब बीजेपी का पहली बार देश व्यापी स्तर पर उभार हुआ था, उस वक्त भी यह एजेण्डा उनके साथ था। यह एजेण्डा बीजेपी ने उस समय भी अपने साथ रखा जब श्री अटल बिहारी बाजपेयी प्रधानमंत्री बने। लेकिन इस एजेण्डा पर अमल कर पाना बाजपेयी जी की सरकार के लिए भी नामुमकिन ही रहा। अब जब बीजेपी खुद 282 सीटों के साथ बहुमत के लिए ज़रूरी 272 का लक्ष्य हासिल कर चुकी है तो भी संसद के दूसरे सदन यानि राज्य सभा और विभिन्न राज्यों में प्रतिनिधित्व को देखकर ऐसा नहीं लगता कि बीजेपी संघ परिवार के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद या हिन्दुत्वादी एजेण्डे को मूर्त रूप दे पाने में सफल हो पाएगी। बेशक संविधान के नीति निदेशक तत्व वाले अध्याय में समान नागरिक संहिता की बात कही गयी है। लेकिन यह भी कहा गया है कि राज्य अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा भी करेगा। फिर सरकार बदलते ही भारत-पाक, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और अनुच्छेद 370 जैसे मुद्दों पर माहौल में गरमी पैदा करने का मकसद क्या है? दर असल इस ऐजेण्डा के दो मायने हैं। एक यह कि इसे हिन्दू समुदाय के समक्ष ऐसी रूमानी रात की तरह पेश किया जाता रहा है जिसकी कोई सुबह ही नहीं है। दूसरी तरफ इस ऐजेण्डा के सहारे विभिन्न समुदायों के अंदर डर और खौफ की भावना भरते रहना एक लम्बी रणनीति का हिस्सा रहा है। ताकि यह भावना धीरे-धीरे हर किसी को यह कहने के लिए मानसिक तौर पर तैयार कर ले कि हां रेगिस्तान में वो जो दूर दिख रहा है वह पानी है। फिर यह समझना मुश्किल नहीं है कि ऐसे ही भ्रम का नाम ही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है। जो सिर्फ एक के लिए नहीं बल्कि दोनों समुदायों के सामाजिक, आर्थिक और बौद्धिक विकास को प्रभावित कर रहा है। यहां तक कि अवाम का एजेण्डा कहीं पीछे छूटता नज़र आ रहा है।

ज़ाहिर है उक्त परिस्थितियों में न्याय कर पाने के संवैधातिक रास्ते तो आगे भी खुले रहेंगे। लेकिन सास्कृतिक राष्ट्रवाद के एजेण्डा को आगे बढ़ाने का मतलब संविधान की भावना को ठेस पहुंचाने जैसा होगा। ऐसे में दूसरी तरफ अगर मोदी जी इस मोर्चे पर काम न कर पाएं तो यह संघ को असंतुष्ट करने जैसा होगा। ठीक उसी तरह जैसे बाजपेयी जी के साथ हुआ था। फिर भी कहना होगा कि समय ने मोदी जी के हाथ में एक बड़ा अवसर सौंपा है। यदि वो चाहें तो न्याय की दिशा में पहलकदमी करते हुए न सिर्फ आम जनता तक अपनी पहुंच मजबूत बना सकते हैं बल्कि ऐसा करने से अवाम के एजेण्डा से ध्यान भटकाने के इल्ज़ाम से भी बरी रहेंगे।

इन्क़िलाबी नज़र
वृहस्पतिवार, 5 जून, 2014

Thursday, December 19, 2013

आहत लोगों तक राहत की क़वायद

"दंगा पीडि़तों के लिए राज्य सरकार की ओर से उठाए जाने वाले कदम क़ाबिले तारीफ़ हैं। विशेषकर मृतक आश्रितों को अविलम्ब नौकरी और बेघर होने वालों का एकमुश्त आर्थिक सहायता। लेकिन दंगों के इल्ज़ाम की पीड़ा झेल रही सपा सरकार के ये काम बेमानी प्रतीत होते हैं। शाकिर भाई जैसे लोग बताते हैं कि जिन लोगों को मुआवजा मिला उन्हें जिला प्रशासन की तरफ से यह निदेश भी मिला है कि वो बेघरों की तरह न रहें। लेहाज़ा मुआवजा प्राप्त करने वाले बेघरों को अपना टेन्टनुमा घर राहत शिविरों से हटाकर किसी स्थानीय व्यक्ति के घर में ले जाना पड़ा है।"

पिछले कुछ दिनों से उत्तर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में शान्ति और सौहार्द्रय स्थापना की कवायद ज़ोरों पर
है। विशेषकर बुद्धिजीवी, सामाजसेवी और नागरिक संगठन फिल्म शो, नुक्कड़ नाटक, धरना-जुलूस से लेकर बौद्धिक परिचार्चाओं के आयोजन में व्यस्त हैं। इन तैयारियों के पीछे संदर्भ पिछले लगभग बीस माह में प्रदेश भर में होने वाली सांप्रदायिक हिंसा और दंगा है। ज़ाहिर है ऐसे संदर्भ में सभी समाज सेवियों, संस्थाओं और नागरिक संगठनों के साथ-साथ सरकारी मोहकमों आदि का मक़सद एक ही हो सकता है,, शान्ति और सौहार्द्रय के लिए लोगों को संवेदित और संगठित करना। ऐसे कार्यक्रमों और आयोजनों का महत्व तब और अधिक बढ़ जाता है जब 6 दिसम्बर की तिथि नज़दीक हो। ज्ञात हो कि पिछले इक्कीस बरसों से यह तिथि हर साल समकालीन इतिहास की एक बड़ी घटना के ज़ख़्मों को ताज़ा करती रही है। हालांकि आधुनिक भारत के इतिहास में 6 दिसम्बर बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर के महापरिनिर्वाण दिवस की तिथि भी है। लेकिन हर साल यह तिथि बाबरी मस्जिद और राम जन्म भूमि विवाद से जुड़ी घटनाओं के चलते चर्चा-परिचर्चा का केन्द्र बिन्दु होती है। इस तिथि को अयोध्या और फैज़ाबाद से लेकर राजधानी दिल्ली तक एक से बढ़कर एक कार्यक्रमों का आयोजन और इन आयोजनों में धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में जनमत बनाने की अपील का होना इस बात का संकेतक है कि अभी भी धर्मनिरपेक्षता और पंथनिरपेक्षता के संवैधानिक लक्ष्य 66 वर्ष के लम्बे लोकतांत्रिक अनुभव के बाद भी अधूरे हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो गुजरात, असम और उत्तर प्रदेश आदि राज्य एक के बाद एक सांप्रदायिक दंगों के प्रयोगशाला नहीं बनते। यही वजह है कि सांप्रदायिकता का सवाल रोजी-रोटी और आजीविका के सवालों पर भारी पड़ने लगता है। परिणाम स्वरूप व्यक्ति का धार्मिक पहचान उसके नागरिक पहचान पर प्रमुखता प्राप्त कर लेता है।

ज्ञात हो कि मुज़फ़्फ़रनगर और शामली के विभिन्न गांवों में होने वाले दंगा की वजह से पिछले दिनों हज़ारों लोगों को अपना घर छोड़कर राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी थी। जो ग्रामीण बेघर हुए हैं, वो मूलतः मज़दूर हैं जो जाट समुदाय की खेतों पर काम करके या ईंट भट्टों पर काम करके अपने परिवार की आजीविका चलाते थे। बहुत से परिवारों में फेरी करके आजीविका अर्जित करने वाले व्यक्ति तो पंजाब, कश्मीर, हिमांचल, राजस्थान से लेकर दक्षिण भारत के केरल तक जाया करते थे। लेकिन जबसे दंगा हुआ है तबसे ये लोग राहत शिविरों में रह रहे हैं। दंगा पीडि़तों के लिए राज्य सरकार की ओर से उठाए जाने वाले कदम क़ाबिले तारीफ़ हैं। विशेषकर मृतक आश्रितों को अविलम्ब नौकरी और बेघर होने वालों का एकमुश्त आर्थिक सहायता। लेकिन दंगों के इल्ज़ाम की पीड़ा झेल रही सपा सरकार के ये काम बेमानी प्रतीत होते हैं। शाकिर भाई जैसे लोग बताते हैं कि जिन लोगों को मुआवजा मिला उन्हें जिला प्रशासन की तरफ से यह निदेश भी मिला है कि वो बेघरों की तरह न रहें। लेहाज़ा मुआवजा प्राप्त करने वाले बेघरों को अपना टेन्टनुमा घर राहत शिविरों से हटाकर किसी स्थानीय व्यक्ति के घर में ले जाना पड़ा है। लेकिन हारून भाई उन लोगों में हैं जिनके
परिवार का नाम 1800 लाभार्थियों की लिस्ट में दर्ज होने से रह गया है। ज्ञात हो 27 अक्टूबर को प्रदेश सरकार ने मुआवजा की घोषणा की थी। जिनमें कुल 1800 लाभार्थियों को चिन्हित करके 5-5 लाख प्रति परिवार का मुआवजा दिया जाना तय किया गया था। हारून भाई जैसे तमाम लोग हैं जो आम तौर पर दूसरे राज्यों में जाकर कपड़ों की फेरी करके अपने परिवार की आजीविका चलाते हैं। लेकिन जबसे दंगा हुआ है, तबसे वो राहत शिविरों में अपने-अपने परिवारों के साथ सरकारी मदद की बांट जोह रहे हैं। ऐसे में सवाल लाज़मी है कि हारून जैसे हजारों परिवारों की मदद किस प्रकार संभव हो सकेगी?

बहरहाल, जिन लोगों को मुआवजा मिल चुका है, उनके लिए सबसे बड़ा संकट यह है कि इतने कम समय में वो कैसे और कहां ज़मीन लें। बिल्डरों के प्रचार-प्रसार और दंगा पीडि़तों की बातों का संज्ञान लिया जाए तो मुआवजे की घोषणा के बाद मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में ज़मीन की क़ीमतों में लगभग दोगुने से तीगुने की वृद्धि हुई है। शाहपुर में ही शमशान स्थल के ठीक बगल में जो प्लाॅटिंग पहले हज़ार-बारह सौ रूपए प्रति गज के हिसाब से की गयी थी, राज्य सरकार द्वारा मुआवजा की घोषणा के बाद 3100 रूपए प्रति गज से भी अधिक हो गयी। ऐसे में मुआवजा प्राप्त करने वाले परिवारों पर चैतरफा दबाव बना हुआ है कि आखिर वो करें तो क्या करें? एक तरफ सरकारी अमला मुआवजा के बदले कैम्प वाली जगह से हटने के लिए प्रेरित कर रहा है तो वहीं दूसरी तरफ अचानक से ज़मीन की बढ़ी हुई कीमत ने इन्हें सोचने पर मजबूर किया है कि यदि वो मुआवजे में प्राप्त पैसे का नियोजन ज़मीन ख़रीदने में कर देंगे,
तो ख़रीदी गयी ज़मीन पर मकान बनाने के लिए पैसों का इन्तेज़ाम कहां से होगा। इससे इतर पीडि़त लाभार्थी जिस मनोवैज्ञानिक उहापोह की स्थिति में हैं, उससे इस बात की भी संभावना है कि मुआवजा की रक़म इधर-उधर के कामों में खर्च न हो जाए। अगर ऐसा हुआ तो ऐसे पीडि़त परिवारों के ज़ख़्मों पर मरहम लगाना और भी दुभर हो जाएगा। शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका जैसे मानव विकास के तीन प्रमुख सूचकांकों पर दंगा पीडि़त अगामी कई दशकों तक लगातार लुढ़कते जाएंगे। ठीक उसी तरह जैसे आज़ादी के बाद अब तक लुढ़कते रहे हैं। जिसका उल्लेख सच्चर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में विस्तार पूर्वक किया है।

ऐसे में राज्य सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। हालांकि 5-5 लाख की एकमुश्त आर्थिक सहायता तत्काल राहत प्रदान करने वाला कदम प्रतीत होता है। लेकिन इस तरह की लक्षित आर्थिक सहायता में स्थायित्व के पुट का न होना चिन्ता की बात है। अच्छा होता कि सरकार की ओर से विभिन्न गांवों से पलायन करके राहत शिविरों में रहने वाले लोगों के नुकसान की भरपायी करते हुए ऐसे पीडि़तों की आजीविका सुनिश्चित करने के लिए इन्हें कृषि योग्य भूमि आवंटित की जाती। इसके साथ-साथ दंगे में शामिल दोषियों की गिरफ़्तारी और फाॅस्ट टैªक अदालतों की व्यवस्था करके सजा भी ज़रूरी है। इसके समानान्तर दोनों समुदायों के बीच बातचीत शुरू कराना भी राज्य सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारियों में शामिल होना चाहिए। तभी दंगा पीडि़तों के ज़ख्मों पर सही अर्थों में मरहम लगाया जा सकेगा और तभी जाकर मुज़फ़्फ़रनगर अपने पुराने रंग में लौट सकेगा। उस रंग में, जिसमें मुज़फ्फ़रनगर को मुहब्बतनगर के नाम से भी जाना-पुकारा जाता है।

कैनविज टाइम्स, 6 दिसम्बर 2013