Wednesday, September 12, 2012

भत्ता तोड़ देगा युवाओं का मनोबल

"   बेरोजगारी भत्ता सुनने में जितना अच्छा और आकर्षक लग रहा है, उतना ही खतरनाक है। इसलिए नहीं कि आर्थिक सहायता में कोई बुराई है। बल्कि इसलिए कि 1000 रूपए की राहत कहीं आने वाले समय में युवाओं ही नहीं बल्कि समाज के हर निम्न मध्यम वर्गीय और वंचित तबके के परिवारों के लिए गले की फांस न बन जाए। गंभीरता से गौर किया जाए तो यह योजना समाज को इसी दिशा में ले जाने वाली है....".

9 सितम्बर को प्रदेश के मुख्यमंत्री के हाथों बेरोजगारी भत्ता का चेक प्राप्त करते हुए अर्ह् बेरोजगार खुशी से फूले नहीं समा रहे थे। दूसरी तरफ कई सारे विश्लेषकों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को प्रदेश सरकार की इस योजना को मूर्त रूप देने पर दुःखी होते देखा गया। देखना होगा कि 1000 रूपए के भत्ते का प्रदेश और प्रदेश के युवाओं के लिए क्या मायने हैं। गौर तलब है कि पिछली बार जब युवा मुख्यमंत्री के पिता जी सत्ता की बागडोर संभाल रहे थे तो उस समय पहली बार यह प्रयोग किया गया था। तब भत्ता की राशि 500 रूपए थी। उस समय भी रोजगार दफ़्तरों से लेकर बैंकों में युवा छात्र-छात्राओं की लम्बी-लम्बी कतारें देखी गयी थीं। फोटो स्टेट की दुकानों पर बेकारों को जोश व खरोश से आवश्यक दस्तावेजों की फोटो काॅपी कराते देखा गया था। रोज़गार दफ़्तरों पर लगने वाली भीड़ और अब चेक प्राप्त करते हुए उनकी खुशी को देखकर बेकारी की परिथितियों का सहज अंदाजा होता है। लेकिन चेक प्राप्त करने वाले बेरोजगारों की इस भीड़ की भी अपनी प्राथमिकता है। जो महज 500 से 1000 रूपए तक सिमित है। सियासी पार्टियों और हमारे नेताओं में तो इतनी इच्छा शक्ति नहीं है कि वो रोजगार और बेरोजगार भत्ता में अन्तर बताएं। यदि अन्तर बताएंगे तो नौजवानों के मन में नौकरी की चाह पैदा होगी। राजव्यवस्था और सत्ता की दशा और दिशा पर सवाल पैदा होंगे। जो धरना-प्रदर्शन का रूप भी ले सकते हैं। अच्छा है इन्हें 1000 में उलझाए रखा जाए। भरी जवानी में उलझे हुओं को उलझाना ही तो शासक वर्ग की उलझनों का सुलझना बन चुका है।

कहना पड़ रहा है कि बेरोजगारी भत्ता सुनने में जितना अच्छा और आकर्षक लग रहा है, उतना ही खतरनाक है। इसलिए नहीं कि आर्थिक सहायता में कोई बुराई है। बल्कि इसलिए कि 1000 रूपए की राहत कहीं आने वाले समय में युवाओं ही नहीं बल्कि समाज के हर निम्न मध्यम वर्गीय और वंचित तबके के परिवारों के लिए गले की फांस न बन जाए। गंभीरता से गौर किया जाए तो यह योजना समाज को इसी दिशा में ले जाने वाली है। वो ऐसे कि 35 वर्ष की आयु काम-काज की आयु होती है। इस आयु वर्ग के नौजवानों में नई ऊर्जा, नई उमंग और नया उत्साह होता है। जब जवानी के इस उम्र में किसी को बैठे-बिठाए बेरोजगारी भत्ता मिलने लगेगा तो इससे उस व्यक्ति का सीखा हुआ स्किल (हुनर/क्षमता) स्थिर हो जाएगी। यानि जो युवा कम्प्युटर आॅपरेट करने में प्रवीण है, उसे सही समय पर इस क्षेत्र में अवसर नहीं मिलने या बेरोजगरी भत्ता का सहारा मिलने से वो भत्ता प्राप्त होने की अवधि तक सीखे हुए हुनर को व्यवहार में करने और इसमें परिवर्धन करने से वंचित रह जाएगा। ऐसे में यदि किसी कारणवश भत्ता बंद होता है, तो वह क्षमता विहीन युवा रह जाएगा। जिसे आज के प्रतिस्पर्धी दौर में कोई भी सरकारी या गैर-सरकारी अमला अपनी प्राथमिकता में रखना नहीं चाहेगा। अच्छा होता कि प्रदेश के युवाओं के लिए 1000 रूपए के बेरोजगारी भत्ता के बजाए कम से कम 999 रूपए के रोजगार की व्यवस्था की जाती।

बेरोजगारी भत्ता से भी अच्छा और आकर्षक टैबलेट और लैपटाप की योजना है। शिक्षा और साक्षरता में विकास की कई सीढि़यां चढ़ने के बाद भी गांव-कस्बे के लोग अभी तक टैबलेट को दवा ही समझ पा रहे थे। भला हो सूचना क्रान्ति का जिसके चलते गंवई जीवन जीने वाले लोग न सिर्फ टैबलेट नामक इलेक्ट्राॅनिक यंत्र के बारे में जागरूक हो रहे हैं बल्कि यह यंत्र उनके सपनों में आकार लेने लगा है। सपनों का होना अच्छी बात है। पाश ने भी कहा था “सबसे बुरा होता है सपनों का मर जाना...”। लेकिन उन सपनों का क्या जो आर्थिक क्रिया-कलापों (सीधा कहें तो बाजारवाद) को बढ़ाने के नाम पर थोपा जा रहा हो। आज के फेसबुकिया दौर में प्रदेश के बच्चों को टैबलेट और लैपटाप देने की योजना ऐसे सपनों को पैदा व जवान करने की योजना है।

कौन नहीं जानता कि प्रदेश के हाई स्कूल और इण्टरमीडिएट कालेजों में ऐसे अध्यापकों की कमी है जो हमारे बच्चों को कोचिंग के शोषक व्यवस्था से मुक्त करा सकें। सवाल यह भी है कि असमान प्रतिस्पर्धा के चलते जिन बच्चों का मनोबल टूट जाता है और प्रतिवर्ष जो बच्चे आत्महत्या करते हैं, वैसे बच्चों को टैबलेट और लैपटाप किस तरह राहत पहंुचाएगा। यदि टैबलेट और लैपटाप की उपयोगिता को स्वीकार कर भी लिया जाए तो इन यंत्रों के मेन्टीनेन्स (रख-रखाव) और बिजली की सप्लाई आदि ज़रूरतों को पूरा करने की गारण्टी कौन लेगा। क्या हम दावे के साथ कह सकने की स्थिति में हैं कि हमारे प्रदेश के गरीब बच्चों के घरों तक बिजली पहुंच पाती है या उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी है कि वो लैपटाप या टैबलेट से संबंधित अन्य ज़रूरतों को पूरा कर पाने में सक्षम हैं? शायद नहीं! फिर ऐसे में प्रदेश के बच्चों को प्राइमरी से लेकर उच्च शिक्षा व्यवस्था का ऐसा ढ़ांचा चाहिए जिसमें न तो कोचिंग की ज़रूरत हो और न ही मुफ़्त टैबलेट या लैपटाप की। कहना नहीं है कि प्रदेश की नयी पीढ़ी के छात्र-छात्राओं की आवश्यकताओं की प्राथमिकता सूची तैयार करके उनकी शिक्षा और रोजगार के अवसर सृजित करना बेरोजगारी भत्ता, टैबलेट और लैपटाप के निःशुल्क वितरण से बेहतर होता।

कैनविज़  टाइम्स, १२ सितम्बर २०१२

Friday, August 17, 2012

मुस्लिम बच्चों की शिक्षा

मदरसों के भ्रम जाल में फंस कर मुस्लिम बच्चों की शैक्षिक वंचना से नज़र चुराना शिक्षा के क्षेत्र में अब तक प्राप्त उपलब्धियों को मुंह चिढ़ाता है। ऐसा नहीं है कि मुसलमान अपने बच्चों को तालीम नहीं देना चाहते हैं।......
यदि सच्चर कमेटी की रिपोर्ट की बात करें तो 7-16 आयु वर्ग में स्कूल जाने वाले कुल मुस्लिम बच्चों में महज 4 प्रतिशत बच्चे ही बुनियादी शिक्षा के लिए मदरसों पर निर्भर हैं। जबकि 30 प्रतिशत प्राइवेट स्कूलों तथा शेष 66 प्रतिशत सरकारी स्कूलों पर निर्भर हैं। दूसरी ओर स्कूल जाने वाले कुल मुस्लिम बच्चों में 25 प्रतिशत बच्चे या तो ड्राॅपआउट बच्चे हैं या फिर स्कूल जाने के किसी भी अवसर से वंचित हैं। 

बादी की दृष्टि से पश्चिमी उत्तर प्रदेश स्थित मेरठ, मुजफ़्फ़रनगर और सहारनपुर आदि जिले देश के उन 50 जिलों में है जहां मुस्लिम आबादी का अनुपात 30 प्रतिशत या इससे अधिक है। इन शहरों में कई मुहल्ले तो ऐसे हैं जहां मुसलमानों का ही बाहुल्य है। बात करते हैं सहारनपुर की जो परंपरागत काष्ठ उद्योग के लिए जाना जाता है। पिछले कुछ सालों से यहां होजरी उद्योग भी काफी फल-फूल रहा है। इस जिला के शहरी क्षेत्र में रहने वाले मुसलमानों की आजीविका मुख्यतः इन्हीं दो उद्योगों पर ही निर्भर है। देश और दुनिया में अपनी कला का डंका बजाने वाले यहां के कलाकारों विशेषकर मुसलमानों में बेरोजगारी नज़र नहीं आती है। लेकिन सम्पन्न दिखाई देने वाले यहां के मुसलमानों के जीवन के कई ऐसे पहलू हैं जो हमें नयी तस्वीर दिखाते हैं।

दरअसल सहारनपुर के काष्ठ उद्योग में काम करने वालों की जमात में वो लोग भी शामिल हैं जो रिटायरमेन्ट की उम्र से काफी आगे निकल चुके हैं। वो मासूम बच्चे भी जो काम करने के लिए निम्नतम आयु की पात्रता नहीं रखने के बाद भी आजीविका की जिम्मेदारी उठाते है। और वो महिलाएं भी जो इन उद्योगों में फिनिशिंग वर्क के सहारे अपने घर-परिवार के लिए आजीविका जुटाती हैं। वर्क कल्चर तो यहां के हर गली-चैराहे पर दिखाई पड़ता है। लेकिन साक्षरता की बात आती है तो यहां मुस्लिम साक्षरता दर लुढ़की हुई नज़र आती है। वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार इस जिला में मुस्लिम साक्षरता दर 47.64 प्रतिशत है, जो जिला, राज्य और देश तीनों ही स्तर के औसत साक्षरता दर से काफी कम है। उसमें भी महिलाओं में साक्षरता दर का प्रतिशत 38.43 है जो 55.56 प्रतिशत मुस्लिम पुरूष साक्षरता दर से 17.13 अंक प्रतिशत कम है। एक तरफ जहां ग्रामीण क्षेत्रों में मुस्लिम साक्षरता दर 45.02 प्रतिशत के हताशाजनक स्थिति में है वहीं दूसरी तरफ शहरी क्षेत्रों में भी मुस्लिम साक्षरता दर की स्थिति अच्छी नहीं है। सहारनपुर के शहरी क्षेत्रों में मुस्लिम साक्षरता दर 52.61 प्रतिशत है। मुस्लिम समाज में साक्षरता की दयनीय स्थिति को देखते हुए इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि इस जिला में मुस्लिम आबादी का आधा हिस्सा निरक्षर और अशिक्षित है। सवाल यह है कि जो जिला उद्योग-धन्धे में देश ही नहीं विदेशों में भी जाना जाता है, उस जिला में मुसलमानों की ऐसी स्थिति क्यों है?

आम तौर पर जागरूकता और चेतना का अभाव निरक्षरता के लिए जिम्मेदार कारक माना जाता है। लेकिन पिछले कुछ बरसों से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर, मुजफ़्फ़रनगर और मेरठ जैसे जिलों की यात्रा से मुस्लिम समाज के बारे में कुछ नए तथ्य और सत्य को समझने का अवसर मिला है। देश के मुसलमानों के बारे में कायम यह धारणा इस जिला के मुसलमानों पर भी लागू होता है जो मुसलमानों को संकीर्ण सोच वाला समुदाय मानता है। लेकिन ज़मीनी हक़ीकत इस इस बात को झुठलाते हैं कि स्कूलों में मुस्लिम बच्चों की कम होती संख्या समुदाय के संकीर्ण सोच के कारण है। जहां तक मदरसों का संबंध है तो निश्चित तौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इनकी तादाद तुलनात्मक रूप से अधिक है और मुख्यतः ये दीनी यानि धार्मिक शिक्षा के केन्द्र हैं। लेकिन ऐसे मदरसों की संख्या भी कम नहीं है जो सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त हैं। यदि सच्चर कमेटी की रिपोर्ट की बात करें तो 7-16 आयु वर्ग में स्कूल जाने वाले कुल मुस्लिम बच्चों में महज 4 प्रतिशत बच्चे ही बुनियादी शिक्षा के लिए मदरसों पर निर्भर हैं। जबकि 30 प्रतिशत प्राइवेट स्कूलों तथा शेष 66 प्रतिशत सरकारी स्कूलों पर निर्भर हैं। दूसरी ओर स्कूल जाने वाले कुल मुस्लिम बच्चों में 25 प्रतिशत बच्चे या तो ड्राॅपआउट बच्चे हैं या फिर स्कूल जाने के किसी भी अवसर से वंचित हैं।

ज़ाहिर है मदरसों के भ्रम जाल में फंस कर मुस्लिम बच्चों की शैक्षिक वंचना से नज़र चुराना शिक्षा के क्षेत्र में अब तक प्राप्त उपलब्धियों को मुंह चिढ़ाता है। ऐसा नहीं है कि मुसलमान अपने बच्चों को तालीम नहीं देना चाहते हैं। पिछले दिनों सहारनपुर के मुस्लिम बाहुल्य बस्तियों पक्का बाग, खाता खेड़ी और नूर बस्ती के लोगों विशेषकर महिलाओं से सीधी बातचीत के दौरान बच्चों की शिक्षा के प्रति उनकी ललक महसूस किया। लेकिन मीडिया वालों के लिए इमराना और गुडि़या जैसी खबरें इकट्ठी करने की रेलमपेल में शिक्षा जैसी बुनियादी मुद्दा पीछे छूट जाता है। बहरहाल सहारनपुर की शहरी बस्तियों में कई जगह तो सरकारी स्कूल ही नहीं हैं। नूर बस्ती ऐसे ही मुहल्लों में एक है। जहां है वहां स्कूल के भवन और अध्यापकों से लेकर शैक्षिक वातावरण आदि की स्थिति संतोषजनक नहीं है। ऐसे में मुस्लिम बच्चों की स्कूल से दूरी कोई अचरज की बात नहीं है।

बहरहाल, ऐसे स्कूल भी हैं जहां अध्यापकों के व्यवहार से मुस्लिम बच्चों का मनोबल टूटता है और स्कूल से उनका मोह भंग हो जाता है। उदाहरण के तौर पर सहारनपुर के ही सुढ़ौली कदीम ब्लाॅक के उन बच्चों को देखें जिन्हें बाल्यावस्था में भेदभाव के कारण स्कूल जाने के अवसर से वंचित होना पड़ता है। इस ब्लाॅक में मुस्लिम महिलाओं और बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता नाज़मा बताती हैं कि “नए शैक्षिक सत्र में जब वो कुछ मुस्लिम बच्चों के दाखिले के लिए स्कूल गयीं तो स्कूल प्रबन्धन की तरफ से उन बच्चों के दाखिला संबंधी औपचारिकता पूरा करने के बजाय खु़द उनकी सामाजिक भूमिका पर सवाल उठाते हुए यह कहा गया कि वो सिर्फ मुस्लिम बच्चों का ही दाखिला क्यों करा रही हैं। उन्होंने अपने समाजिक कार्यों और टार्गेट ग्रुप के बारे बताया कि जब प्रधानमंत्री द्वारा गठित उच्चस्तरीय सच्चर समिति ने इस बात को माना है कि स्कूल जाने वाले 25 प्रतिशत बच्चे स्कूलों से बाहर हैं, तो इस दिशा में काम करने में ग़लत क्या है।”

नाज़मा का यह अनुभव इस सच्चाई से परदा उठाता है कि स्कूलों में मुस्लिम बच्चों के साथ भेदभाव होता है। जिसके चलते वो सरकारी स्कूल नहीं जाना चाहते हैं। बादशाही बाग की समाज सेविका रानी मिर्जा की बातों पर यकीन करें तो “भेदभाव का आलम यह है कि मुस्लिम बच्चों को चिन्हित करके उनसे स्कूल परिसर में झाड़ू लगवाया जाता है। यही नहीं उनसे मध्यान्ह्य भोजन की व्यवस्था में भी काम लिया जाता है।” नाज़मा और रानी जैसी समाज सेविकाओं का यह अनुभव आए दिन अखबारों में छपने वाली उन खबरों और तस्वीरों से साम्य रखता है जिसमें बच्चों द्वारा विशेषकर दलित समुदाय के बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है। लेकिन मानव विकास के शैक्षिक सूचकांक पर मुस्लिम समाज की बदहाली का यह चित्र शायद ही किसी अखबार और रिपोर्टर के लिए कोई महत्व रखता है। समझा जा सकता है कि मौजूदा दौर में मानव विकास के सूचकांक पर मुसलमान किस पायदान पर हैं। इन परिस्थितियों के कारण ही एक तरफ जहां मुस्लिम बच्चों का मनोबल टूटता है, वहीं दूसरी तरफ उनकी शिक्षा या तो मदरसा तक सिमित रह जाती है या फिर वे शिक्षा के किसी भी अवसर से वंचित रह जाते हैं। यही बच्चे खेतों-खलिहानों से लेकर ढ़ाबा और काष्ठ व होजरी उद्योग में नज़र आते हैं।

अचरज की बात तो यह है कि बाल अधिकारिता से संबंधित तमाम सरकारी विभागों को सर्व शिक्षा अभियान के दौरान मुस्लिम समाज का यह चित्र दिखाई नहीं देता है। कहना पड़ रहा है कि ऐसे परिवेश में यदि प्रधानमंत्री का पन्द्रह की जगह तीस सूत्री कार्यक्रम भी होता तो उसके परिणाम भी इसी तरह निराशाजनक होते जैसा कि पन्द्रह सूत्री कार्यक्रम के हैं। ज़रूरी हो जाता है कि योजनाओं को बनाने और क्रियान्वयन से पहले समुदाय स्तर की रूकावटों को दूर करने की इमानदार कोशिश की जाए।

कैनविज टाइम्स, 17 अगस्त 2012

Wednesday, August 1, 2012

निवेश आधारित मीडिया की दशा और दिशा


पिछले कुछ वर्षों में खासकर इलेक्ट्राॅनिक मीडिया में ऐसी प्रस्तुतियों को प्रधानता प्राप्त हुई है जो निवेश और मुनाफा के सिद्धांतों पर आधारित हैं। चूंकि मीडिया भी एक तरह का साहित्य है और साहित्य समाज का दर्पण कहा जाता है। लेहाजा यह मानना होगा कि मीडिया में भी जो कुछ दिखाया जा रहा है वह हमारे समाज का सच है। लेकिन मीडिया की प्रस्तुतियों को सिर्फ साहित्य के दायरे तक सिमित करके नहीं देखा जा सकता है। क्योंकि मीडिया मनोरंजन के साथ-साथ संवाद का असरदार माध्यम भी है और लोकतंत्र के चैथे स्तंभ के रूप में इसकी अपनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी होती हैं। मौजूदा दौर में तो इलेक्ट्राॅनिक मीडिया समय की तंगी का सस्ता और आसान विकल्प भी है। देखा जाए तो पिछले बीस बरसों में मीडिया बदलाव के बड़े दौर से गुज़रा है। बदलाव के इन दो दशकों में मीडिया विशेषकर इलेक्ट्राॅनिक मीडिया की जो नयी पहचान बनी है, उसे निवेश, टी.आर.पी. और मुनाफा से अलग करके नहीं देखा जा सकता है।
निवेश आमंत्रित करना अर्थव्यवस्था के प्राथमिक उद्देश्यों में है। क्योंकि इसका संबंध आर्थिक विकास की दर से बताया जाता है। इस दृष्टि से मीडिया निवेश आमंत्रित करने और निवेशकों दोनों के लिए एक ऐसा क्षेत्र है जहां कम समय में अधिक मुनाफा का संयोग प्रबल है। सरकार उच्च विकास दर हासिल करने के लिए अधिक से अधिक निवेश चाहती है तो वहीं दूसरी तरफ देसी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अधिक से अधिक मुनाफा प्राप्त करने के लिए अधिकाधिक निवेश की करने को लालायित हैं। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि बाजारवादी व्यवस्था में “अधिक निवेश और अधिक मुनाफा” के फार्मुला पर काम करता है। 1991 के बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था की दशा और दिशा में जो बदलाव सामने आए हैं, उससे सरकार और कल्याणकारी राज्य की अवधारणा ही बदल गयी है। जिसके चलते मनोरंजन चैनलों की प्रस्तुतियों में समाज के गंभीर मुद्दों को उपभोग करने वाली ऐसी वस्तु के रूप में परोसा जाना संभव हुआ है जिसे देखने वालों की संख्या निरन्तर बढ़ी है। ऐसे मनोरंजक प्रस्तुतियों को देखने वाले दर्शकों की संख्या में वृद्धि का सीधा संबध टी.आर.पी. से है। टी.आर.पी. में वृद्धि का मतलब है अधिक विज्ञापन और अधिक मुनाफा। ज़ाहिर है, निवेश, टी.आर.पी. और मुनाफा रंजित मनोरंजक सीरियलों में किसी गंभीर सामाजिक समस्या की प्रस्तुति और समस्या के समाधान की संभावनाएं निरन्तर कम होती गयी हैं। पिछले दिनों देश में गिरते शिशु लिंगानुपात, दहेज और बच्चों के साथ यौनाचार जैसे मुद्दों पर एक चैनल ने “सत्यमेव जयते” शुरू किया जिसके एंकर आमिर खान को प्रस्तुति के एवज में करोणों-करोण का भुगतान किया जा रहा है। “सत्यमेव जयते” या ऐसे अन्य सीरियलों/रियालिटी शो की प्रस्तुति के मुद्दों से कोई विरोध नहीं है। लेकिन देखना होगा कि क्या समाज के गंभीर मुद्दों को मीडिया के केन्द्र में लाने और समाज को जागरूक करने के लिए सेलेब्रिटि का होना अनिवार्य और अपरिहार्य हैं? क्या ऐसे मुद्दों पर समाज को चेतित करने में ज़मीनी सतह पर काम करने वाले लोगों की कोई भूमिका नहीं रही है? दरअसल सेलेब्रिटी द्वारा प्रस्तुति का संबंध भी मीडिया के निवेशवादी माॅडल से है। यह संबंध निवेश, टी.आर.पी. प्रस्तुति, प्रसारण और दर्शक हर स्तर पर है। ऐसे कार्यक्रमों के स्क्रिप्ट राइटर, एडिटर, प्रस्तुतकर्ता और इन्हें देखने वाले तथा टिप्पणी करने वाले सभी उसी क्लास से आते हैं जो मुनाफा आधारित सुविधाभोगी जीवन में विश्वास करते हैं। यही वजह है कि जमीनी कार्यकर्ताओं को उनके तमाम संघर्षों के बाद भी न तो उन्हें उचित मानदेय/पारिश्रमिक मिल पाता है और न ही ख्याति। मीडिया का यही रूप नागवार है।
आज की मीडिया निवेश के दम पर मुख्य धारा की मीडिया को परिभाषित कर रही है। प्रस्तुति के विषय, तौर तरीके और दर्शक की संख्या तय कर रही है। कुछ कहिए तो एक मिथक जनता पर थोप कर खुद को आर्थिक दोहन के इल्जाम से बरी भी कर लेती है। सवाल लाज़मी है कि आर्थिक दोहन के पूरे प्रकरण में मीडिया का एकतरफा प्रभाव कैसे संभव हो पाता है। दरअसल सैटेलाइट चैनलों के माध्यम से एक ही समय में लाखों-करोड़ों परिवारों और व्यक्तियों तक पहुंचना तो मुमकिन है। लेकिन लाखों-करोणों व्यक्तियों के लिए एक क्लिक में अपनी शिकायतों को सही जगह पहुंचाना संभव नहीं है। बहरहाल, सैटेलाइट चैनलों पर शिकायत करने के लिए http://www.nbanewdelhi.com/ फ्लैश किया जा रहा है। ताकि किसी कार्यक्रम में किसी भी तरह की आपत्ति हो तो दर्शक इस वेव साइट पर आॅन लाइन शिकायत कर सकें। लेकिन इस साइट पर जो आॅब्जेक्टिव दिए गए हैं उनमें निवेशवादी मीडिया इंडस्ट्री के हित रक्षण का ध्येय अधिक प्रभावी जान पड़ता है। दूसरी तरफ कानूनी कार्यवाही के लिए न जो जनता के पास पैसे हैं और न ही इतना समय कि वो मनोरंजन के आर्थिक दोहन की गतिविधियों के विरोध में व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर कोई कानूनी हस्तक्षेप करे। खासकर ऐसे में जबकि कमरतोड़ महंगाई और आजीविका के लिए अधिक से अधिक संसाधन जुटाने का वैश्विक संकट दिनों-दिन गहराता जा रहा हो। “सोने की जेब और लोहे के पैर” वाली कहावत प्रासंगिक जान पड़ता, है जो पूंजीपरस्त मीडिया घरानों के पास ही है। लोकतंत्र में सभी को आज़ादी का समान हक है। शायद यही वजह है कि यदि चैनलों को प्रस्तुति के तौर-तरीकों की आज़ादी है तो वहीं दूसरी तरफ दर्शकों को चैनलों पर दिखाए गए किसी कार्यक्रम के खिलाफ शिकायत की आज़ादी भी है। लेकिन कहना होगा कि लोकतांत्रिक आज़ादी की सीमा तय करने में आर्थिक सुधारों पर आधारित निवेश की भूमिका लगातार बढ़ी है। जिसकी वजह से बड़ी और मज़बूत आज़ादी के सामने छोटी और कमज़ोर आज़ादी को दम तोड़ना पड़ रहा है।
जाहिर है मीडिया के नए ताने-बाने और तौर-तरीकों को स्वाभाविक स्वीकृति आर्थिक सुधारों के मीडिया पर पड़ने वाले प्रभावों में सबसे अहम है। ऐसे में तथाकथित मुख्य धारा की मीडिया की भूमिका निवेश के अनुरूप तय होना भी स्वाभाविक है। समाज के किसी ज्वलंत मुद्दे का अर्थपूर्ण होना या महत्वहीन होने में इस स्वाभाविकता की बड़ी भूमिका है। इस स्वाभाविकता के चलते ही न तो ज़मीनी समस्याओं को प्रमुखता मिल पाती है और ज़मीनी स्तर पर काम करने वाली हाशिए की आवाज़ों को यथा सम्मान मिल पाता है।


कैनविज टाइम्स, 27 जून 2012

Monday, May 28, 2012

आर्थिक सुधारों की विवशता है मूल्य वृद्धि

पेट्रोल की कीमतों में की जाने वाली वृद्धि को पेट्रोलियम मंत्री ने अर्थव्यवस्था के दीर्घकालिक हित के लिए उचित फैसला बताया तो वहीं दूसरी तरफ बढ़ी कीमतों का ठीकरा राज्य सरकारों के सर फोड़ते हुए यही भी कहा गया कि यदि राज्य सरकारें करों में कमी करें तो पेट्रोल सस्ता हो सकता है। तीसरी ओर छुटपुट विरोध-प्रदर्शनों को छोड़ दें तो  मूल्य वृद्धि की खबरें प्रसारित होते ही बाइक और कार सवार उपभोक्ताओं को पेट्रोल पम्पों की ओर कूच करते देखा गया ताकि वो अधिक से अधिक ईंधन संरक्षित कर सकें। यह पहली बार नहीं है कि ईंधन में वृद्धि की गयी है। बल्कि पिछले कुछ बरसों में कभी वैश्विक बाजार में प्रति बैरल पेट्रोलियम ईंधन की कीमतों में वृद्धि तो कभी वैश्विक मंदी को संदर्भित करके ईंधन में वृद्धि की जाती रही है। पेट्रोल कीमतों में हालिया वृद्धि के पीछे सबसे बड़ा तर्क यह दिया जा रहा है कि अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए वृद्धि जरूरी थी।

जहां तक भारतीय अर्थव्यवस्था की बात है तो 1991 में इसे राजकोषीय घाटा और मुद्रा स्फीति के संकट से बचाना सबसे बड़ी चुनौती थी। इस निमित्त भूमण्डलीकरण को सबसे अच्छा विकल्प मानकर आर्थिक सुधारों की नीति अपनायी गयी। आर्थिक सुधारों की राह पर पग रखते हुए यह कहा गया था कि इस नीति के बदौलत आने वाले समय में अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होगी। लेकिन पिछले दो दशकों के अनुभव बताते हैं कि अर्थव्यवस्था में कमोबेश उतार-चढ़ाव को छोड़ दिया जाए तो इसके नाकारात्मक परिणाम ही अधिक रहे हैं। यह बात अलग है कि संवृद्धि को ही सम्पूर्ण विकास मानने वाले अर्थशास्त्रियों और विश्लेषकों की नज़र में देश पहले से खुशहाल और समृद्ध हुआ है। लेकिन सामाजिक संदर्भों में देखा जाए तो अमीरी और गरीबी की खाई पहले से कहीं अधिक बढ़ी है। दूसरी तरफ मंहगाई कब एक से दो अंकों में पहुंच जाती है इसका पता आम जनता को नहीं होता। जाहिर है पेट्रोल कीमतों में लगातार वृद्धि को सही ठहराने के लिए एक बार फिर 1991 जैसे ही तर्कों का सहारा लिया जा रहा है कि आने वाले समय में देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। एक आम नागरिक की हैसियत से इस सवाल को आपके बीच रखना चाहता हूं कि वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि से अर्थव्यवस्था को यदि वास्तव में मजबूती मिलती है और समाज के हर तबके तक विकास की धारा पहुंचती है तो कहना नहीं होगा कि पिछले दो दशक में तमाम वस्तुओं की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। लेकिन दुःखद है कि मंहगाई ही अर्थव्यवस्था की मजबूती की शर्त है तो आसमान छूती मंहगाई के इस दौर में भी देश की अर्थव्यवस्था आखिर क्यों संकटों से घिरी हुई है?

गौर तलब है कि राज्य सरकारों को करों में कमी करके मूल्य वृद्धि से राहत दिलाने का तर्क देकर न सिर्फ वृद्धि से ध्यान हटाने की कोशिश हो रही है बल्कि मूल्य वृद्धि के फैसले को वापस लेने के सरोकार की संभावनाओं को भी सिरे से नकारा जा रहा है। पूरी बहस इस बिन्दु पर केन्द्रित है कि यदि राज्य सरकारें चाहें तो पेट्रोलियम ईंधन पर करों में कमी करके पेट्रोल कीमतों को कम कर सकते हैं। ध्यान देना होगा कि एक तरफ केन्द्र सरकार मुक्त बाजार के सिंद्धांतों या यूं कहें कि आर्थिक सुधारों की विवशता के कारण तेल कम्पनियों पर नियंत्रण समाप्त करने की दिशा में अग्रसर है वहीं दूसरी तरफ वृद्धि के फैसले खुद करके राज्य सरकारों को अपने करों में कमी करने का सुझाव भी दे रही है। निश्चित तौर पर पेट्रोलियम उत्पादों पर राज्य द्वारा वैट की दर कम किए जाने की भी जरूरत है। लेकिन यह भी तय होना चाहिए कि इस कमी के बाद पेट्रोल जैसे ईंधन उचित मूल्य पर उपलब्ध होने लगेंगे?

पेट्रोलियम कंपनियों का हाल यह है कि ये नियंत्रणहीनता और मुनाफा चाहती हैं। अर्थशास्त्रीय शब्दावली में कहा जाए तो हानि की स्थिति में कोई भी व्यापारिक प्रतिष्ठान अधिक दिनों तक सेवा नहीं दे सकता है। लेकिन मुक्त बाजार के सिद्धांतों के अनुरूप लिया जाने वाला हर फैसला मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति को न सिर्फ बढ़ावा दे रहा है बल्कि आम जनता तक संसाधनों की पहुंच में रूकावट पैदा कर रहा है। इस बात को इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि जब-जब पेट्रोल या डीजल जैसे ईंधनों में वृद्धि होती है इसका प्रभाव यातायात किराया पर भी पड़ता है। विशेषकर गांव से कस्बों और कस्बों को शहरों से जोड़ने वाले यातायात पर। अनुमानतः 20 किमी की यात्रा के लिए एक आम व्यक्ति को कम से कम 20 रूपए का भुगतान करना पड़ता है। वो भी वैसे स्थानों पर जहां नियमित रूप से यातायात संसाधन उपलब्ध हैं।

कुछ बातें मीडिया की भी हो जाए। मीडिया को पेट्रोल पम्पों पर कार सवारों और बाइक सवारों की भीड़ आसानी से नजर आ जाती है। लेकिन बसों और रेलगाडि़यों की भीड़ जो हर दिन हर बस और रेलगाड़ी में जानवरों की मानिन्द सफर करती है, उस भीड़ की ओर कैमरा घुमाना और प्रसारण दिक्कत तलब काम होता है। कहना नहीं है कि ईंधन की कीमतों में वृद्धि यातायात संसाधनों की सिमित सुलभता जैसी स्थिति में यातायात संकट को अधिक गहराने वाला फैसला है। ऐसे में यदि कोई गरीब यदि समय रहते इलाज के लिए अस्पताल न पहुंच पाने के कारण दम तोड़ दे तो हैरानी की बात नहीं। कोई आम व्यक्ति अपने किसी प्रिय संबंधी या शुभचिंतक का कुशलक्षेम पूछने दस-बीस किमी की यात्रा न कर पाए तो भी हैरान होने की ज़रूरत नहीं है। क्योंकि अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए इनकी भावनाओं की अवहेलना और त्याग आवश्यक है। पेट्रोल पम्पों पर भीड़ लगाकर टंकी फुल करवाने वालों का क्या! वो तो क्षणिक राहत प्राप्त करने के अभ्यस्त हो चुके हैं। विरोध-प्रदर्शन तो बस राजनीतिक क्षमता प्रदर्शन तक सिमित होकर रह गया है। वरना संसद में बैठ प्रतिनिधियों से आंख चुराकर किसी भी सरकार के लिए जनविरोधी फैसले लेना आसान काम नहीं है।

कैनविज टाइम्स, 29 मई, 2012

Monday, May 7, 2012

निजी विद्यालयों में सीट आरक्षण के मायने

उच्चतम न्यायालय ने एक फैसले मेें निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 को सही ठहराते हुए सहायता प्राप्त और गैर-सहायता प्राप्त निजी स्कूलों के साथ-साथ सहायता प्राप्त अल्पसंखयक विद्यालयों में भी दाखिले में समाज के कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीट आरक्षित करने संबंधी प्रावधान को उचित बताया है। ज्ञात हो कि निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के कुछ प्रावधानों पर बहस होती रही है। इनमें अल्पसंख्यक विद्यालयों को इस कानून के दायरे में लाना और निजी विद्यालयों में अधिनियम को प्रभावी ढ़ंग से लागू कराना आदि प्रमुख मुद्दे रहे हैं। शिक्षा का अधिकार अधिनियम और सुप्रीम कोर्ट के हालया फैसले के आलोक में यह देखना होगा कि निजी विद्यालयों में सीट आरक्षण के जरिए समाज के कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों का किस प्रकार और किस हद तक भला हो पाता है?
सीट आरक्षण के प्रावधान को यदि राष्ट्रीय संदर्भ देखा जाए तो सातवें अखिल भारतीय शिक्षा सर्वेक्षण के अनुसार प्राथमिक स्तर पर देश के महज 11.24 प्रतिशत निजी विद्यालय ही इस दायरे में आते है। जिनमें 3.62 प्रतिशत सहायता प्राप्त एवं 7.62 प्रतिशत गैर-सहायता प्राप्त निजी विद्यालय हैं। जबकि 88.73 प्रतिशत प्राथमिक विद्यालय सरकार या स्थानीय निकायों द्वारा संचालित किए जाते हैं। ऐसे में सीट आरक्षण के मामले पर संदेह लाज़मी है। कहीं ऐसा तो नहीं कि इस बहाने निजी विद्यालयों की साख को मजबूत करने की कोशिश की जा रही है, ताकि मध्यम वर्ग की आकांक्षाओं की पूर्ति हो सके। यानि एक पन दो काज। 88.73 प्रतिशत विद्यालयों में शिक्षा के संसाधनों को बेहतर बनाने और उनके सुचारू संचालन के बजाए 11.24 प्रतिशत निजी विद्यालयों पर ध्यान केन्द्रित करना कहीं न कहीं सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की जिम्मेदारियों से सरकार के विमुख होने का संकेतक है।
बहरहाल निजी स्कूलों के आस्तित्व और मौजूदा दौर की शिक्षण व्यवस्था में उनकी भूमिका को नकारा भी नहीं जा सकता है। खासकर केरल जैसे राज्यों में जहां 58.50 प्रतिशत सहायता प्राप्त तथा 2.07 गैर-सहायता प्राप्त निजी विद्यालय हैं। इस राज्य में सरकारी और स्थानीय निकायों द्वारा संचालित विद्यालय क्रमशः 38.04 और 1.37 प्रतिशत है। केरल दक्षिण भारतीय राज्य है और वहां साक्षरता की दर भी सर्वाधिक है। वहां के संदर्भों के साथ इस विषय पर अलग से बात की जा सकती है। फिलहाल बात करते हैं उत्तर प्रदेश की, जहां सहायता प्राप्त निजी विद्यालयों की संख्या 2.33 प्रतिशत और गैर-सहायता प्राप्त निजी विद्यालयों की संख्या 20.62 प्रतिशत है। ज़ाहिर है देश के सबसे बड़े राज्य में प्राथमिक शिक्षा में निजी विद्यालयों की संख्या और भूमिका दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। शायद यही वजह है राज्य के निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीट आरक्षण का मामला महत्वपूर्ण है।
जब संख्या और भूमिका महत्वपूर्ण है तो फिर यह भी समझने की जरूरत है कि निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत आरक्षित सीटों पर प्रवेश पाने वाले बच्चों की कमजोरी और वंचना को परिभाषित कैसे किया जाएगा। यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि निजी स्कूलों की फीस में काफी विविधता है। प्रदेश में पचास रूपए से लेकर ढ़ाई तीन हजार प्रति माह वाले स्कूल आस्तित्व में हैं। तय करना होगा कि 50 रूपए फीस का भुगतान करने वाले परिवारों के लिए सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर एवं वंचित होने के क्या मायने हैं और पचास-सौ से लेकर ढ़ाई-तीन हजार रूपए भुगतान करने वाले परिवारों के लिए सामाजिक वंचना क्या होती है? यदि सैनिकों के बच्चों की शिक्षा पर केन्द्र सरकार द्वारा की जाने वाली मासिक राशि के भुगतान की बात करें तो यह राशि प्रति बच्चा लगभग 1000 रूपए है। यदि इसे माॅडल बनाया जाए तो फिर इसमें संशय नहीं कि 1000 से अधिक राशि के फीस वाले निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत कमजोर और वंचित परिवारों के बच्चों का स्वतः बहिष्करण कोई नहीं रोक सकता। शिक्षा का अधिकार कानून में उल्लेख है कि सरकार द्वारा निर्धारित राशि अथवा स्कूल की फीस जो भी कम हो उतनी राशि वापस की जाएगी। इस युक्ति को बी.पी.एल. से जोड़ कर भी देखा जा सकता है। क्योंकि सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े परिवारों को चिन्हित करने के लिए संभावित मानक के तौर पर या तो बी.पी.एल. परिवारों को पात्रता दी जाय या पात्रता के लिए आय की सीमा निर्धारित की जाए। चूंकि बी.पी.एल. कार्ड को लेकर पहले ही धोखाधड़ी की ढ़ेरों प्रकरण प्रकाश में आ चुके हैं। कई मामले तो ऐसे भी हैं जिनमें अपात्र परिवारों को बी.पी.एल. कार्ड जारी किए गए हैं। अनाज, तेल और 30000 हजार रूपए के मुफ्त इलाज के लिए जो लोग निर्धनों और वंचितों का हक मारने से जरा भी नहीं हिचकते, संभव है ऐसे लोग नामी विद्यालयों में कमजोर और वंचित का रूप धारण कर अपने अपने बच्चों का दाखिला कराने की हिमाक़त करें। याद रहे कि जब नब्बे के दशक में मंडल के तहत ओ.बी.सी. आरक्षण लागू हुआ था तो हमारे जागरूक होते समाज में ऐसे प्रकरण सामने आए थे, जहां देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों और सरकारी नौकरियों में फर्जी प्रमाण पत्र के माध्यम से बहुतेरे लोगों ने आरक्षण का लाभ प्राप्त किया था।
शिक्षा विकास की कुंजी है। मौजूदा प्रतिस्पर्धी माहौल में गुणवत्तापरक शिक्षा दिलाना हर माता-पिता का सपना है। होना भी चाहिए। लेकिन जिस तेजी से शिक्षा का व्यवसायीकरण हुआ है, उससे जागरूक-चेतित लोगों की निर्भरता निजी विद्यालयों पर बढ़ी है। दुःख की बात है कि जागरूक और चेतित लोगों में कम ही ऐसे हैं जिनकी मानसिकता में परिमाणात्मक बदलाव आया है। यहां तो सारा खेल नम्बर वन का बना दिया गया है। शिक्षा में सीखो-सीखो के बजाय मुनाफा-मुनाफा का खेल खेला जा रहा है। मुनाफा के खेल ने शिक्षण व्यवस्था में वर्गीय चरित्र को ही विकसित किया है। इसी वजह से इस बात को बल मिलता है कि कोई निजी विद्यालय जो वर्गीय चरित्र के सिद्धांतों पर स्थापित और विकसित हुआ है, वो आसानी से समाज के कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों को व्यवहार रूप में अपनाना नहीं चाहेगा। मौजूदा हालात को देखते हुए जरूरी है कि निजी विद्यालय प्रबंधन की संवेदना को जगाया जाए। तभी शिक्षा का अधिकार कानून का प्रभावी क्रियान्वयन संभव हो सकेगा और 25 प्रतिशत सीट आरक्षित करने संबंधी प्रावधान के साकारात्मक परिणाम भी आ सकेंगे।
22 अप्रैल 2012, कैनविज टाइम्स लखनऊ

मन के विज्ञान से हताहत होती बेटियां


पिछले माह बंगलोर की आफरीन के साथ जो कुछ हुआ उससे एक बार फिर साफ हो गया है कि अग्नि 5 तक का सफर तय कर चुका हमारा देश सामाजिक जीवन में लैंगिक भेदभाव को समाप्त करने की दिशा में अभी बहुत पीछे है। कहने को शिक्षा और साक्षरता निरन्तर बढ़ रही है। फिर भी बच्चियों, बेटियों और महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। तीन माह की आफरीन की मृत्यु ऐसी ही भेदभाव जनित घटनाओं की एक कड़ी है। ऐसी घटनाओं का विरोध, निन्दा और लिंगभेद से जुड़े कारकों पर विद्वता पूर्वक बहस भी होती है। लेकिन सबकुछ के बाद आए दिन होने वाली घटनाएं कहीं न कहीं सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में लिंगभेद के खिलाफ होने वाली कोशिशों की नाकामी की ओर इशारा करते हैं। यही वजह है कि लिंगभेद को जन्म देने वाले कारकों पर बार-बार ध्यान जाता है। बेटियों के प्रति मौजूदा दौर में बढ़ती हिंसात्मक घटनाओं के मद्दे नज़र ज़रूरी हो जाता है कि लिंगभेद के कारणों पर नए सिरे से गौर किया जाए, कि आखिर किन परिस्थितियों में मानव मन में लिंगभेद की इच्छाएं आकार लेती हैं और देखते-देखते किसी आफरीन या फलक को मौत के दहाने पर पहुंचा देती हैं।

इतिहास का अवलोकन किया जाए तो प्राचीन काल में अपाला, घोषा और लोपा जैसी विदुषी महिलाओं का उल्लेख आता है। सल्तनत काल में रजिया सुल्ताना और फिर मुगल काल में नूरजहां, अरजुमंद बानो बेगम जैसी महिलाओं ने राजनीति और साहित्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भक्ति आंदोलन के दौरान साध्वी महिलाएं भी हुयीं। 19वीं-20वीं सदी से होते हुए अब 21वीं सदी में सामाजिक जीवन में महिलाओं की भूमिका में एक बार फिर बदलाव देखा जा सकता है। यह सिलसिला महिला सशक्तिकरण से भी जुड़ता है। लेकिन फलक और आफरीन के केस से स्पष्ट है कि बेटियों के खिलाफ समाज का रवैय्या अभी भी सख्त है। बदलाव सिर्फ स्वरूप में हुआ है। पुराने ज़माने में बच्चियों को जिंदा दफनाने के उदाहरण मिलते हैं तो मौजूदा वैज्ञानिक दौर में वैज्ञानिक तकनीक का प्रयोग कर बच्चियों को गर्भ में मारने की घटनाएं हो रही हैं। कहना नहीं है कि जहां गुरबत का साया होता है वहां बच्चियों को लावारिश छोड़ने या फिर क्रूरता पूर्वक पिटाई या अन्य तरह की पाबन्दियां सामान्य बातें होती हैं। फलक और आफरीन दर असल समाज के उन परिवारों से थीं जो धार्मिक और आर्थिक रूप से भ्रूण परिक्षण नहीं करवा सकते थे। यह बात परिकल्पनात्मक ज़रूर है लेकिन सत्य से दूर नहीं है। यदि ये बच्चियां किसी रईस परिवार की किसी महिला की कोख में रही होतीं या उमर फारूक खुद कोई रईस होता तो शायद उसकी पुत्र प्राप्ति की इच्छा के चलते आफरीन जैसी बच्ची की भ्रूण में ही हत्या की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। जैसा कि अन्य बहुत से मामलों में हो रहा है।

बहरहाल बात करते हैं उन कारणों की जिनके चलते बेटियों का जीवन असुरक्षित है। कुछ लोग अल्ट्रासाउण्ड सोनाग्राफी मशीनों को तो कुछ लोग व्यक्ति विशेष को जिम्मेदार मानते हैं। यदि आफरीन के केस की बात करें तो उसकी मौत की असल वजह उसके पिता उमर फाररूक की पुत्र प्राप्ति की चाह थी। पहली नज़र में उसके पिता उमर फारूक को गुनहगार माना जाना अपनी जगह सर्वथा उचित है। उसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही और सजा भी उचित है।ऐसी सजा, जो समाज के शेष लोगों के लिए न भूलने वाली नज़ीर बन जाए। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती क्योंकि यह मामला लिंगभेद का भी है और सिर्फ एक उमर फारूक को जेल भेजने भर से लिंगभेद की समस्या का स्थाई समाधान नहीं होने वाला। क्योंकि उमर फारूक जैसे व्यक्तियों को गुनहगार बनाने वाले कारक कहीं न कहीं किसी स्रोत से पैदा होते हैं और समय-समय पर उमर फारूक जैसे व्यक्तियों के मन का विज्ञान बनाते हैं। इसलिए इस पक्ष पर ध्यान दिए बगैर ऐसे मामलों में किसी अन्तिम निष्कर्ष पर पहुंचना तार्किक नहीं है। विशेषकर ऐसे में जब पुत्र प्राप्ति के लिए प्रेरित करने वाले कारक अदृश्य और अप्रत्यक्ष हों और जिन्हें कानूनन सबूत के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता हो। दरअसल उमर फारूक जैसे व्यक्ति भी तो इसी समाज के पैदावार हैं। स्त्रीवादी व्याख्या के अनुसार पुरूष सत्ता के केन्द्र से ही लिंगभेद का प्रत्यक्ष और परोक्ष संचालन होता है। फिर भी हमें देखना होगा कि इस सत्ता के केन्द्र को पोषण कहां से प्राप्त होता है? इसलिए कानूनी कार्यवाही के साथ-साथ सामाजिक कार्यवाही भी ज़रूरी हो जाता है। मेरा मतलब समाजिक कार्यवाही के नाम पर खाप पंचायत जैसी किसी संस्था या संगठन से नहीं है। बल्कि व्यापक सामाजिक संदर्भों में उन परिस्थितियों के गहन अध्ययन से है जिनके चलते कभी गर्भ में ही बच्चियों का गला घोंट दिया जाता है तो कभी तीन माह की बच्चियों की हत्या होती है या फिर तीन साल की बच्चियों का बलात्कार और फिर हत्या होती है।

असुरक्षा और खौफ हमारे सामाजिक संरचना के खास तत्व हैं। बेटियों को शुरू से ही सार्वजनिक स्थलों और क्रियाकलापों से अलग रखने के पीछे सबसे बड़ा कारण असुरक्षा और खौफ का वातावरण ही है। यह कारण पारिवारिक से अधिक सामाजिक इसलिए है क्योंकि जो लड़की परिवार में एक ही छत के नीचेे सुरक्षित रहती है, घर से बाहर निकलते ही पग-पग पर उसे असुरक्षा का सामना करना पड़ता है। इसी तरह परिवार में जिन लड़कों का घर की महिलाओं के प्रति व्यवहार अच्छा होता है, वो घर से बाहर निकलते ही अपने सामाजिक दायित्वों से मुक्त हो जाते हैं। इसके पीछे एक बड़ी वजह है समाज का व्यक्ति केन्द्रीत सोच है। मौजूदा दौर में विकास के जो माॅडल स्थापित हुए हैं उसमें व्यक्ति, परिवार और समाज की कल्पना “मैं” तक सिमट कर रह गयी है। ऐसे में सामाजिक स्तर पर संवेदनाओं का टूटना-बिखरना स्वाभाविक है। ऐसे में कोई भी गंभीर घटना सिर्फ भुक्तभोगी परिवार के लिए ही दुःख का कारण बनता है। शेष सामाजिक प्राणियों को न तो कोई हमदर्दी होती है और न ही कोई संवेदना। गौरतलब है कि व्यक्तिवादी सोच को बढ़ाने में नई आर्थिक सुधार और इससे जनित उपभोक्तावादी संस्कृति की अहम भूमिका रही है।

ज़ाहिर है संवेदनाएं टूट रही हैं, असुरक्षा बढ़ रही है। शायद इसकी वजह भी पुरूष सत्ता के केन्द्र में ही है। वरना कैसे संभव है कि जो व्यक्ति अपने घर में उचित व्यवहार करता है, वही व्यक्ति घर से बाहर निकलते ही बेलगाम कैसे हो जाता है? व्यक्ति का सामाजिक ताने-बाने में बेलगााम होना ही पुरूष सत्ता को मजबूत करता है। जहां से अन्य व्यक्ति भय और भविष्य की असुरक्षा प्राप्त करते हैं। असुरक्षा की बलवती होने वाली यह भावना ही पुत्र प्राप्ति की चाह को बढ़ाता है। ऐसी स्थिति में खानदान का चिराग, बुढ़ापे का सहारा, परिवार का रक्षक आदि पुरातन मान्यताएं और मजबूत होती हैं। फिर कोई अनपढ़-गंवार हो या पढ़ा-लिखा संभ्रांत दोनों ही बेटियों को दोयम दर्जे की सन्तान मानने की गलती करते हैं। यह मानना ही माता-पिता के मन में बेटियों के प्रति दोहरे व्यवहार का मनोविज्ञान तैयार करता है। जिसके परिणाम भू्रण हत्या से लेकर बलात्कार जैसी घटनाओं के रूप में सामने आता है।

उक्त संदर्भ में उचित यही है कि असुरक्षा को कम करने के लिए सुरक्षा के उपबंध करने के बजाए असुरक्षा को जन्म देने वाले सामाजिक कारकों पर चोट किया जाए। यह किसी एक का दायित्व नहीं है। इस कार्य को करने में व्यक्ति-व्यक्ति की अपनी भूमिका है। सुविधाभोग के नाम पर यदि व्यक्ति इस भूमिका से और अधिक विमुख होगा तो इसका खमियाजा भी उसे भुगतना होगा। खासकर ऐसे समय में जबकि उत्तर प्रदेश सहित देश के अन्य कई राज्यों में बाल लिंगानुपात में गिरावट दर्ज की गयी हो और संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून अपने भारत दौरे के अवसर पर मुम्बई में बाल लिंगानुपात और शिशु मृत्युदर पर चिंता व्यक्त कर रहे हों, तो ज़रूरी हो जाता है कि मौजूदा दौर की सामाजिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक परिस्थितियों में लिंगभेद को समाप्त करने के लिए जनमानस की संवेदनाओं को जगाया जाए। वरना उपभोक्तावाद की राह पर तीव्र गति से आगे बढ़ते समाज के पास पछताने के लिए कुछ भी नहीं बचेगा।

७ मई २०१२, कैनविज़ टाईम्स, लखनऊ

Friday, April 13, 2012

समाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण और गरीबी के सुलगते सवाल


पिछले कुछ महीनों से गरीबी रेखा के निर्धारण के मानकों को लेकर मीडिया, राजनीति और अर्थ जगत में काफी चर्चा हो रही है। कोई गरीबी को प्रति व्यक्ति प्रतिदिन कैलोरी ऊर्जा की प्राप्ति तो कोेई प्रति व्यक्ति प्रतिदिन आय और कोई उपभोग के नए आंकणों के मद्दे नज़र मानक निर्धारित किए जाने का पक्षधर है। गौर तलब है कि योजना आयोग ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लिए गरीबी निर्धारण के जिन मानकों को हरी झण्डी दी है उनमें बदलाव की कोई गुंजाइश पिछले वर्ष अगस्त में ही समाप्त हो चुकी थी। इस बाबत अगस्त 2011 में ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने कहा था कि “प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, बी.पी.एल. की सूची में शामिल करने और इस सूची से बाहर करने संबंधी मानक को मंत्रीमण्डल द्वारा अनुमोदित किया जा चुका है, अब इसमें कुछ नहीं हो सकता।” मानकों में बदलाव की उम्मीद इसलिए भी नहीं है क्योंकि देश के 31 राज्यों में सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण का कार्य पहले से ही प्रगति में है। फिर भी गरीबी निर्धारण के मानकों को लेकर बहस जारी है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि सरकार अगामी कुछ दिनों में सर्वेक्षण का कार्य सफलता पूर्वक संपन्न कर लेगी। लेकिन इस बात का भरोसा कैसे हो कि राज्य और देश के अभाव ग्रस्त सभी लोग सर्वेक्षण के बाद तैयार होने वाली गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों की सूची में शामिल हो सकेंगे। अभी तक जो मानक तय किए गए हैं उसमें स्वतः समावेश और बहिष्करण के सिद्धांत को अपनाया गया है। जैसे भूमि, भूमि का माप, किसान क्रेडिट कार्ड, ऋण की राशि, फ्रीज, लैण्ड लाइन फोन और बाइक आदि वस्तुओं की उपलब्धता को जिस तरह आधार बनाया गया है उससे अधिकतर ज़रूरतमंदों और निर्धनों के स्वतः ही गरीबी रेखा के नीचे की सूची से बाहर होने की संभावना प्रबल है। इसके अलावा मानकों में वंचित होने के सात संकेत भी रेखांकित किए गए हैं। जैसे मकान, मकान का स्वरूप (कच्चा/पक्का), परिवार में 16 से 59 वर्ष की आयु के किसी सदस्य का न होना तथा ऐसे परिवार जिनमें 25 वर्ष से अधिक आयु का कोई साक्षर व्यक्ति न हो आदि। इन संकेतकों से आभाष होता है कि 16 से 59 वर्ष आयु के लोग गरीब नहीं हो सकते। इसी तरह 25 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्ति वंचित नहीं हो सकते। यदि मौजूदा सार्वजनिक प्रणाली के काम-काज तथा शिक्षा और रोजगार की स्थिति पर नज़र डालें तो वास्तविकता छुपाए नहीं छुपती कि ऐसे परिवारों की कमी नहीं है जिनमें 16 से 59 वर्ष आयु के सदस्य मौजूद हैं। ऐसे परिवार की संख्या भी काफी है जिनमें 25 वर्ष से अधिक आयु के लोग साक्षर हैं। लेकिन ऐसे परिवारों के साथ गरीबी का संबध भी पुराना है। यदि साक्षरता की बात करें तो 2011 की जनगणना के अनुसार साक्षरता की दर 74.01 प्रतिशत है जो 2001 में 64.83 प्रतिशत दर्ज की गयी थी। तो क्या मान लिया जाए कि देश की 74 प्रतिशत लोग गरीब नहीं हैं! ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार योजनाबद्ध तरीके से गरीबों की एक ऐसी सूची तैयार करने की इच्छुक है जिसमें पात्र परिवारों की संख्या पहले से ही निश्चित हो। शायद यही वजह है कि एन.सी. सक्सेना समिति ने अपनी रिपोर्ट में अपनी राय देते हुए लिखा है कि “बी.पी.एल. सूची में लक्ष्य निर्धारण जैसी किसी युक्ति को अपनाने से बेहतर है कि संधाधनों के सार्वभौमिक वितरण की बात सुनिश्चित की जाए।”

ज़ाहिर है एक तरफ सरकार के समक्ष कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की चुनौती है तो वहीं दूसरी तरफ गरीबी को एक निश्चित अवधि सीमा में एक निश्चित स्तर तक कम करके आंकने का लक्ष्य है। कहना पड़ रहा है कि चुनौतियों का सामना करने के बजाय गरीबी के मानक लक्ष्य प्राप्ति से अधिक प्रेरित हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो विभिन्न प्रदेशों के लिए बी.पी.एल. कार्ड धारकों की संख्या पूर्व निर्धारित नहीं होती। यदि खुद के निजी अनुभव की बात करूं तो उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है जो वास्तव में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत अनाज और तेल जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। लेकिन जब भी ऐसे लोग स्थानीय स्तर पर ग्राम सभाओं, ब्लाक अथवा तहसील में संबधित ओहदेदारों से बी.पी.एल. कार्ड बनवाने के लिए अर्जी देने के बाबत जानकारी चाहते हंै, तो उन्हें निराश होना पड़ता है। सरकारी कार्यालयों में पहले तो उन्हें फरवरी माह के बाद आने को कहा गया और फिर चुनाव के बाद की तिथि बतायी गयी। लेकिन मार्च महीना गुजर जाने के बाद भी इस दिशा में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई है। अनुमान लगाया जा सकता है कि जब तक सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण नहीं हो जाता तब तक न तो गरीबों की नयी सूची तैयार हो पाएगी और न ही नए कार्ड बनाए जा सकेंगे।

निश्चित तौर पर अगामी कुछ-एक महीनों में सर्वे का कार्य पूरा कर लिया जाएगा। लेकिन यह सवाल फिर भी अनुत्तरित रहेगा कि इस सर्वे के आधार पर तैयार होने वाली बी.पी.एल. सूची में ग़रीब और वंचित किस हद तक शामिल हो सकेंगे? क्योंकि सामाजिक-आर्थिक सर्वे उन्हीं मानकों के अनुरूप किया जा रहा है जिनपर काफी सवाल उठाए जा रहे हैं। ऐसे में गरीबों की सूची तो तैयार कर ली जाएगी लेकिन लक्षित सूची में शामिल न हो पाने वाले गरीबों को राहत नहीं पहुंचेगा। यह बात समझ से परे है कि इतने बड़े देश में गरीबी निर्धारण के व्यावहारिक और सर्वमान्य मानक क्यों नहीं अपनाए गए? सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण के बाद भी गरीबी के सुलगते सवालों के जवाब की दरकार बनी रहेगी। विशेषकर एक ऐसे देश में जहां के प्रधानमंत्री खुद अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अर्थशास्त्री हैं और जिस देश के एक होनहार को अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।