Monday, October 19, 2015

ताकि समावेशी विकास का मार्ग प्रशस्त हो सके

यूँ तो मऊ पिछले 20 बरसों से आना-जाना है। लेकिन आज पहली बार तालीमी बेदारी के हवाले से रघुनाथ पुरा जाना हुआ। रास्ते में हाफिज़ नियाज़ साहब ने बताया कि रघुनाथ पुरा को आबाद हुए कोई बीस बरस हुए हैं। रघुनाथ पुरा की गलियों को देखकर आज बनारस की गलियों की तंगी की याद भी ताज़ा हो गयी। हालांकि रघुनाथ पुरा की गलियां बनारस की गलियों से थोड़ी चैड़ी ज़रूर हैं लेकिन लम्बाई और हर दस-बीस कदम पर मोड़ बनारस की बुनकर बस्तियों की भूलभुलैया जैसी ही हैं। रघुनाथ पुरा की गलियों में बसने वाले बुनकरों की जि़न्दगी कमोबेश वैसी ही हैं, जैसी कि बनारस की बुनकर बस्तियों या लोहता के धन्नीपुर नयी बस्ती की। इसलिए इन गलियों को बुनकर बस्ती के नाम से भी मनसूब किया जा सकता है। जहां जि़न्दगी ताना-बाना की उलझनों में कुछ इस तरह उलझी हुई है कि सुलझने का नाम ही नहीं लेती। कारोबार के उतार-चढ़ाव ने कईयों को चाय और पान की दुकानों पर पहुंचा दिया है और बहुतों को चाय-पान की दुकान से आजीविका चलाने का सपना दिखाया है। बहुत से घरों के नौजवानों को भीवण्डी, अहमदाबाद, सूरत और हैदराबाद के साथ-साथ सऊदी जाने के लिए मजबूर किया है। बुनकरों की गलियों में पसरा सन्नाटा इस बात की गवाही देता है कि बच्चे, बड़े, बूढ़े और महिलाएं सभी अपने घरों में ताना-बाना में उलझी अपनी जि़न्दगानी की उलझनों को सुलझाने में मसरूफ हैं।
ज़फरूल जैसे नौजवानों से मुलाक़ात एक बार फिर से हाशिए की जि़न्दगी जी रहे गरीब-वंचित बुनकरों के रोज़मर्रा जि़न्दगी पर अज़-सरे-नौ ग़ौर व फिक्र के लिए आमादा करता है। ज़फरूल साहब मऊ के उन कारोबारियों में हैं, जो कारोबार के साथ-साथ अपने भाई-बहनों ही नहीं बल्कि अपने पड़ोसियों और समाज के तमाम ज़रूरतमन्दों के लिए कुछ करने का जज़्बा रखते हैं। उनके परिवार में तालीम की शमा रौशन हो चुकी है और वो इस रोशनी को अपने मोआशरे के और घरों तक पहुंचाना चाहते हैं। खु़द ज़फरूल साहब की एक बहन एम.बी.बी.एस. और दो भाई बी.टेक. की पढ़ाई कर रहे हैं।
ज़फरूल साहब से मऊ के मौजूदा हालात पर गुफ्तगू हुई। उन्होंने गरीबों, पिछड़ों और खासकर मऊ के बुनकरों की ज़मीनी सच्चाई से रूबरू कराया। बताया कि उनके शहर में कई बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें वक्त रहते सही गाइडेन्स न मिल पाने की वजह से चाय की दुकानों पर काम करके अपने परिवार की आजीविका चलाना पड़ रहा है। अल्पसंख्यकों के कल्याण से संबंधित योजनाओं की पहुंच न तो इन बच्चों तक हो पायी है और न ही ऐसे बच्चे इस तरह के कल्याणकारी योजनाओं तक पहुच पाते हैं।
बातचीत से यह अंदाज़ा होता है कि अगर हुकूमत के नीति निर्धारण में मऊ के अवाम की बुनियादी ज़रूरतों का सही आकलन शामिल कर लिया जाए तो किसी हद तक बुनकरों के पेशे और उनके बच्चों की तालीम और रोजगार की समस्या दूर की जा सकती है। इस बात पर भी चर्चा हुई कि तालीमी बेदारी जैसी मुहिम के तहत हर जिले में एक कम्यूनिटी रिसोर्स सेन्टर स्थापित किया जाए और तालीम से बेखबर लोगों की ज़मीनी हक़ीक़त जानने और उन्हें जागरूक करने के लिए राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर शोध केन्द्र की स्थापना की जाए। रिसोर्स सेन्टर का काम कम्यूनिटी के बच्चों को उनके तालीम में हर संभव कोशिश करना है। जबकि तरफ शोध केन्द्र के माध्यम से कम्यूनिटी स्तर पर शोध करके हाशिए पर खड़े लोगों की बुनियादी ज़रूरतों का आंकलन किया जाएगा और शोध की रिपोर्ट इस दिशा में समझ रखने वाले व काम करने वाले तमाम व्यक्तियों, समूहों और संगठनों के साथ साझा करने के साथ-साथ राज्य और केन्द्र सरकार के पास इस उम्मीद के साथ भेजी जाए कि समुदाय और इसकी शैक्षिक, सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक ज़रूरतों के मुताबिक नीतियां बनायी जाएं। ताकि समावेशी विकास का मार्ग प्रशस्त हो सके।

Thursday, June 26, 2014

खरा उतरने का समय

दुनिया भर में बनारस की अलग पहचान रही है। यहां की धार्मिक संस्कृति और साड़ियों की कारीगरी हमेशा से देश और दुनिया के लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते रहे हैं। लेकिन मंदिरों, गलियों और बुनकरों की इस नगरी को करीब से देखने और समझने करने का अवसर कम ही लोगों को नसीब होता है। कई बार ऐसा भी होता है कि करीब के लोग, यहां तक कि बनारस में ही रहते हुए बहुत से लोग सुबह-ए-बनारस और परंपरागत साड़ियों पर की जाने वाली बुनकरों की कारीगरी को देखने, समझने और महसूस करने से महरूम रह जाते हैं। ऐसे समय में यदि चुनावी नफ़ा-नुक़सान से अलग बनारस को नए प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र के तौर पर देखा जाए तो यहां के लोगों में बेहतरी की नयी उम्मीदें ज़रूर नज़र आती हैं।

नारस के लोग जिन समस्याओं से दो-चार रहे हैं, उनमें बिजली आपूर्ति सर्व प्रमुख है। खासकर जब मई-जून में पारा चढ़ता है और बिजली की आपूर्ति प्रभावित होती है, तो बिजली की समस्या हर जु़बान की कहानी बन जाती है। ऐसे में यदि शासन की ओर से 24 घंटे बिजली आपूर्ति के बाबत कोई पहल की जा रही है तो उम्मीद की नयी किरण का रौशन होना स्वाभाविक है। काबिले ज़िक्र है प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने कि 2 जून को बिजली के लिए रोते-बिलखते शहर बनारस में 24 घंटे बिजली की आपूर्ति का आदेश जारी किया। बेशक इसे मोदी इफेक्ट के रूप में देखा जाना चाहिए। क्योंकि बनारस अब प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र बन चुका है। फिर भी धन्नीपुर के निसार अंसारी को जैसे लागों को लगता है कि 24 घंटे बिजली की आपूर्ति जैसी कोई भी घोषणा तब तक बेमानी हैं, जब तक कि खंभों और तारों की स्थिति ठीक नहीं हो जाती है। दालमंडी में इलेक्ट्राॅनिक्स के दुकानदार फहीम भाई की बातों पर यक़ीन करें तो 24 घंटे अबाध बिजली की आपूर्ति कम से कम आज की तारीख में मुमकिन नहीं है। कारण बताते हुए फहीम भाई बताते हैं कि जर्जर हो चुके बिजली के तारों और ट्रांसफार्मर के सहारे इस काम को अंजाम तक नहीं पहुंचाया जा सकता। यदि ऐसी कोशिश होती भी है तो किसी तरह लोड उठा रहे ट्रांसफार्मर अपनी क्षमता से अधिक लोड नहीं झेल सकते। नतीजा यह होगा कि तारों के टूटने और ट्रांसफार्मर के जलने की घटनाएं बढ़ेंगी। बनारस जैसे तंग और घने शहर में इतनी बड़ी संख्या में ट्रांसफार्मर बदलना या मरम्मत करवाना बिजली विभाग के लिए मुश्किल काम होगा। ज़ाहिर है 24 घंटे बिजली की आपूर्ति तब तक मुमकिन नहीं, जब तक खंभों पर उलझन की तरह उलझे हुए तार बदले नहीं जाते।

ब बनारस की पहचान कबीर और ताना-बाना से कम, बल्कि गंगा और मोदी से अधिक होने लगी है। फहीम भाई इलेक्ट्राॅनिक्स की दुकान वाले, लक्ष्मन व मो॰ इस्माइल जैसे रिक्शा चालकों के अलावा इश्तियाक़ अंसारी जैसे कारीगरों को कभी कबीर के बारे में पढ़ने-सुनने का अवसर नहीं मिला, लेकिन हालिया चुनाव से पहले की मोदी वाली लहर और सुनामी को इन जैसों ने खूब महसूस किया। अब तो हवा का रूख भी इधर का ही हो चुका है। मोदी जी शपथ ग्रहण कर चुके हैं और गंगा मइया को दुरूस्त रखने, इसे पर्यटन और यातायात माध्यम के रूप में विकसित करने और इसके पानी से बिजली बनाने आदि के लिए मंत्रीस्तरीय कवायद भी शुरू हो चुकी है। ऐसे में अगर चुनाव के दौरान मोदी विरोधी रहे बहुत से बनारसियों का अकीदा चुनाव बाद मोदी मय होने लगा है, जो इसमें चैंकने की बात नहीं है। इश्तियाक अंसारी जैसे नौजवानों पर नए प्रधानमंत्री के कामकाज की शैली का असर ज़रूर देखा जा सकता है। उनके मुताबिक यदि बिजली की आपूर्ति 24 घंटे होने लगे तो यहां के बुनकर महिला-पुरूष और बच्चों को लगातार कई-कई रात जागकर साड़ियों का ताना-बाना ठीक करने में अपनी नींदे नहीं गंवानी पड़ेंगी। औसत काम दिन में ही पूरा हो जाया करेगा। यह बात क़ाबिले ज़िक्र है कि बनारस के बुनकरों को रातों में लगातार जागकर साड़ी का ताना-बाना ठीक करना होता है, ताकि उनकी ज़िन्दगी का ताना-बाना ठीक रहे। यही वजह है कि कठिन परिस्थितियों में ज़िन्दगी गुज़र-बसर करने वाले बुनकर अपनी स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी ज़रूरतों को नज़र अंदाज़ करके दूसरों के तन के लिए खूबसूरत लिबास तैयार करते हैं। ऐसी कठिन परिस्थिति में बिजली की अनियमित आपूर्ति से बुनकर परिवारों की स्वास्थ्य और शिक्षा के साथ-साथ उनकी आजीविका का परंपरागत विकल्प भी बुरी तरह प्रभावित होता है।

बुनकर बस्तियों का हाल यह है कि जैसे ही बिजली आती है, ये बस्तियां गुलज़ार हो उठती हैं, जैसे ज़िन्दगी पटरी पर दौड़ने लगती है। दूसरी ओर बिजली कटते ही इन मुहल्लों में मातमी सन्नाटा छा जाता है। पेशे से अध्यापिका नासरीन बताती हैं कि तंग गलियों से प्रतिदिन होकर गुजरना, काॅलेज पहुंचना छात्र जीवन में हर दिन नयी चुनौती हुआ करती थी। जब चुनौतियों का सामना करने का हौसला किया तो ज़िन्दगी में नए रंगों और उमंगों के दिन आए। बेशक नासरीन की ज़िन्दगी में अच्छे दिनों की शुरूआत करीब दस बरस पहले हो चुकी थी। लेकिन जो नहीं बदला, वो तंग गलियों में प्रतिदिन कई मन कूड़ों के ढ़ेर की मौजूदगी। हालांकि सफाई कर्मियों को गाहे-बगाहे गलियों की नालियों को साफ करते देखा जा सकता है लेकिन नासरीन जैसी महिलाओं को यह नाकाफी लगता है। कहती हैं कि अगर गंगा मइया की सफाई और शुद्धिकरण के साथ-साथ प्रधानमंत्री जी की नज़र हमारी गलियों पर भी पड़ती तो बनारस की सुंदरता को चार चांद लग जाती। नासरीन को मालूम है कि गलियां स्थानीय निकायों का विषय है। इसीलिए वो इन निकायों में भी मोदी इफेक्ट देखना चाहती हैं। ताकि नदी और जल प्रबंधन की तरह गलियों के लिए कोई ठोस और प्रभावी गार्बेज मैनेजमेन्ट का उपाय ढ़ूंढ़ा जा सके।

हना नहीं होगा कि बुनकरों की ज़िन्दगी न सिर्फ काम के बोझ तले दबी हुई है बल्कि ध्वनि और वायु प्रदूषण ने इनके स्वास्थ्य को बुरी तरह नुकसान पहंुचाया है। बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं से इनकी वंचना की कहानी किसी से छिपी नहीं है। समय पर उचित इलाज की सुविधा न मिल पाने की वजह से बहुत से बुनकरों को तो बेवक्त ही मौत का शिकार होना पड़ता है। दुःख की बात तो यह है कि दस्तकार फोटा पहचान पत्र और बुनकर स्वास्थ्य बीमा योजना जैसी सुविधा भी इनकी ज़िन्दगी में कोई खास बदलाव नहीं ला सके हैं।

नारस जितना बड़ा शहर है, यहां की गलियां उतनी ही तंग हैं। गर्मी और हवा के गरमा-गरम थपेड़ों को झेलते-झेलते शाम के सात बज चुके होते हैं। बीएचयू से कैण्ट के लिए आॅटो में सवार हुआ तो सारथी के रूप में ज्ञानचन्द्र सोनकर से मुलाक़ात हुई। दुर्गाकुण्ड पर उन्होंने जिस वृद्ध व्यक्ति को आॅटो से ड्राप किया, उससे किराए के पैसे नहीं लिए। पूछने पर ज्ञानचन्द्र ने बताया कि वो बूढ़े व्यक्तियों और पढ़ने वाले बच्चों से किराए के पैसे नहीं लेते। क्षण भर के लिए ऐसा लगा कि समाजशास्त्र और सोशल वर्क में बड़ी-बड़ी डिग्रियां लेने के बाद भी जिन मानवीय गुणों और नागरिक जिम्मेदारियों का बोध नयी पीढ़ी के बच्चों को नहीं हो पा रहा है, वह बोध मूल्य के रूप में ज्ञानचन्द्र जैसे आॅटो चालकों के अन्दर कूट-कूट कर भरा है। बहरहाल, ज्ञानचन्द्र की थकी हुई आंखें उनकी अधूरी रातों की पूरी कहानी बयान कर रही होती हैं। उनके घर तक बिजली की पहुंच ज़रूर है, लेकिन बिजली उनके घर पहुंचती रात में एक बजे बाद है। दिन भर आॅटो चलाने के बाद जब घर पहुंचते हैं, तो ज्ञानचन्द्र को रात एक बजे तक बिजली का इंतेजार करना पड़ता है। लेकिन ज्ञानचन्द्र जैसे बनारस के आॅटो चालक इस बात से बेख़बर हैं कि बिजली का होना उनके स्वास्थ्य और आजीविका के लिए क्या मायने रखती है।

नारस में ऐसे आॅटो चालकों की संख्या कम नहीं जो ज्ञानचन्द्र सोनकर की तरह पिछले बीस बरसों या इससे भी अधिक समय से आॅटो चलाकर अपने परिवार की आजीविका चला रहे हैं। लेकिन अब तक उनके पास अपना एक अदद आॅटो नहीं हो पाया है। ज्ञानचन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री चुने जाने पर अच्छा महसूस कर रहे हैं। लेकिन इनके पास इस सवाल का जवाब नहीं कि बीस साल के अथक परिश्रम के बाद भी इनके पास अपना खुद का आॅटो क्यों नहीं है? यह कहना बेमानी नहीं कि ज्ञानचन्द्र जैसे बनारस के आॅटो चालकों के पास जब तक अपना आॅटो नहीं हो जाता, लक्षमन और मु॰ इस्माइल जैसे रिक्शा चालकों को मुनासिब मेहनताना नहीं मिलने लगता, फहीम भाई जैसे इलेक्ट्राॅनिक्स के दुकानदारों और बुनकर बस्तियों तक नियमित रूप से बिजली नहीं पहुंचने लगती, तब तक इनके जीवन में अच्छे दिनों की शुरूआत हो ही नहीं सकती है।

बेशक गलियों की तंगी को दूर करना नामुमकिन है। लेकिन गंगा सफाई और घाटों की मरम्मत के सापेक्ष बनारस की गलियों के लिए विशेष सफाई प्रबंधन की योजना तो बनायी ही जा सकती है। मोदी के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद बनारस में कामकाज की गति देखकर यहां के लागों में नयी अपेक्षाएं जन्मी हैं। अवाम के जमात में वो भी शामिल हैं जो पहले से “अबकी बार/मोदी सरकार” की रट लगा रहे थे और वो लोग भी हैं जो शपथ ग्रहण के बाद मोदी इफेक्ट से अछूते नहीं रहे हैं। जिन्हें मालूम है कि मोदी संघ के समर्पित सिपाही हैं और राजनाथ सिंह के शब्दों में नयी सरकार सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के एजेण्डे के इर्द-गिर्द काम करेगी। ऐसे लागों में वरूणा नदी के दोनों तरफ विकास की एक समान तस्वीर देखने की अपेक्षा, बजरडीहा की गलियों की दुर्दशा ठीक करने की अपेक्षा, लोहता और धन्नीपुर जैसी ग्रामीण बस्तियों के ऊपर हाई टेंशन तारों के ख़तरों से जनता को महफूज़ रखने की अपेक्षा जगी है। बावजूद इसके कि इन लोगों को यह भी पता है कि मोदी के दामन पर 2002 के गुजरात नरसंहारों के खूनी दाग़ हैं। बावजूद इसके इनका अक़ीदा है कि न्याय, अन्याय से और पुरस्कार, दण्ड से बेहतर होता है। जाम और भीड़ से जूझते शहर बनारस के लोगों की उम्मीदों पर मोदी को खरा उतरने का यह अच्छा समय है।

जनसत्ता, 22 जून, 2014
http://epaper.jansatta.com/292406/Jansatta.com/Jansatta-Hindi-22062014#page/15/1

किशोरावस्था की चुनौतियां और हम

बाल्यावस्था से किशोरावस्था की ओर बढ़ते बच्चों के समक्ष न सिर्फ संख्यात्मक और परिमाणात्मक शैक्षिक चुनौतियां होती हैं बल्कि उन्हें शारीरिक, संवेगात्मक, सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक बदलावों के दौर से गुज़रना होता है। अभिभावक या अध्यापक/अध्यापिका की भूमिका में हम कई बार तानाशाह की भूमिका निभाने लगते हैं। कुछ ऐसा करने की कोशिशें आम होती हैं कि कहीं बच्चा बिगड़ न जाए, गलत रास्ते पर न चला जाए आदि-आदि। इसलिए सुबह नींद खुलते ही हम अपने शब्दों का चाबुक बाल मनोविज्ञान की पीठ पर चलाने लगते हैं। यह प्रक्रिया तब तक जारी रहती है, जब तक कि बच्चा थक हार कर सो न जाए।

अगर देखा जाए तो कई मामलों में हमारा समाज बदला है, मूल्य और परंपराओं में बदलाव परिलक्षित हुए हैं। नयी शिक्षा नीति अपनाते-अपनाते हमने स्कूल के पाठ्यक्रम से लेकर स्कूल भूवन, ड्रेस और फीस आदि को नए प्रकार के शैक्षिक बदलाव का मानक बनाया है। यह भी हुआ है कि शारीरिक दण्ड को लेकर हमारा समाज मानसिक स्तर पर बदलाव के दौर से गुजरा है। बेटियों को पढ़ाना पहले सपना हुआ करता था, लेकिन अब ज़माने को बदलता हुआ देखा जा सकता है। अब हमारी बेटियां जिन पगडंडियों पर पैदल भी नहीं चल पाती थी, अब उन्हीं पगडंडियों पर साइकिल की घंटियां ट्रिनट्रिनाते अल सुबह मीलों दूर स्कूल-काॅलेज और ट्यूशन पढ़ने जाती हैं। इतना सारा बदलाव हुआ, लेकिन न जाने ऐसा क्या है कि हमारा समाज और इसका मिजाज़ किशोरावस्था के बच्चों के स्वाभाविक विकास को बार-बार नियंत्रित और संचालित करना चाहता है?

यह बात काबिले गौर है कि किशोर होते बच्चे अपने समय की छोटी-बड़ी पीढ़ियों में कई मायनों में अधिक मुश्किल दौर में होते हैं। फिर स्कूल हो या घर हर जगह वो निगाहों की धूरी हुआ करते हैं। दर असल इस अवस्था में इन्हें जिन संवेगों से होकर गुजरना पड़ता है उसमें बड़ी ऊर्जा होती है। आयु संबंधी हारमोनल सेक्रेशन बार-बार खुली फिज़ा की खुली हवा में घुलमिल जाने की कोशिश करती है। इस वजह से कई बार हमारे बच्चे वो सब कर गुजरते हैं, जिसकी उम्मीद हमें नहीं होती। हमें आश्चर्य इसलिए भी होता है, क्योंकि हम उनके साथ संरक्षक दोस्त के बजाए सांस्कृतिक पुुलिसिया का सा बरताव करते हैं। स्कूल के संदर्भ में कक्षा पांच के बाद यानि 10-12 वर्ष की आयु से बच्चों में किशोरावस्था के लक्षण उभरने लगते हैं तथा जिसके 19वें बरस तक जारी रहने की संभावना होती है। यह वह अवस्था होती है जब बच्चों में शारीरिक और मनोवैज्ञानिक बदलाव बिजली की गति से होते हैं। इन बदलावों को विकास की संज्ञा देना उचित प्रतीत होता है। विकास के इस दौर से लड़के और लड़कियों दोनों को ही गुजरना होता है। यह जीवन का वह हिस्सा होता है जब बच्चों में किसी भी कार्य या बात के लिए आत्मविश्वास की भावना निरन्तर बढ़ती जाती है। लेकिन ध्यान रखना होता है कि बच्चों का आत्मविश्वास नितान्त ही असंगठित और बिखरा हुआ होता है। नए-नए प्रयोग करना यानि अपने मन की जिज्ञासाओं और आस-पास के वातावरण की घटनाओं को रहस्य मानकर उनसे परदा हटाने की कोशिशें उसके व्यक्तित्व विकास का स्वाभाविक हिस्सा होती हैं। लेकिन उसके मानसिक संवेगों में अस्थिरता उसका बराबर पीछा करती रहती है। ऐसे बच्चे घर और गांव-मुहल्ले से लेकर स्कूल-काॅलेज तक हर जगह अपनी श्रेष्ठता के झण्डे बुलन्द करना चाहते हैं। इस उम्र में बच्चों में सुनने के बजाय कहने की प्रवृत्ति अधिक होती है। देखने और समझने के बजाए दिखाने और समझाने की प्रवृत्ति होती है। कई बार यह प्रवृत्ति उन्हें स्थान और समय की सीमा से बाहर ले जाती है। इन्हें बोध नहीं होता कि किसी बात को किसी से कहने या साझा करने का उचित समय कब है और कब नहीं है। इसी तरह किशोरावस्था में बच्चों को समय का भी ध्यान नहीं रहता है। वो किस भी समय अपने इच्छित बात को मनवाने या काम को पूरा करवाने की ज़िद कर बैठते हैं। हालांकि अक्सर माता-पिता या अभिभावक ऐसी परिस्थितियों में डांटना और पिटाई एक मात्र समाधान मानते हैं। लेकिन ऐसे माता-पिता या अभिभावक को यह समझना होगा कि उपर्युक्त उल्लिखित बदलावों के साथ इन्हें खु़द को भी बदलने की आवश्यकता है।

हम अपने बच्चों में बदलाव तो चाहते हैं, खासकर तब जबकि हर बच्चे का मन और शरीर दोनों ही बदलाव के संक्रमण काल में होता है। एक सामान्य बच्चे के समक्ष जो चुनौतियां होती हैं, उन्हें अभिभावक समझने से कोशिश नहीं करते हैं। दर असल हम अच्छे मूल्यों की स्थापना और विकास से जुड़ी हुई अपनी हार्दिक इच्छा/सपना बच्चों के मन-मस्तिष्क पर थोपते रहते हैं। इस थोपने में बच्चों के अंदर लोकतांत्रिक मूल्यों के विकास की संभावनाएं समाप्त होने लगती हैं और दूसरी तरफ बच्चे संशय का शिकार हाने लगते है। वो भावनात्मक संवेगों की ऐसी सवारी गाड़ी पर सवार होते हैं, जहां नए-नए प्रयोग, कठिन परिस्थितियों में दुष्कर कार्यों को करने की चुनौती, छोटी-छोटी बात पर वाद-विवाद और सबसे महत्वपूर्ण लैंगिक आकर्षण का होना सामान्य बात होती है। लेकिन इन सबमें जो मूल्य होते हैं, उन मूल्यों में न तो स्थायित्व होता है और न ही अनुभव की भट्टी में पका हुआ सौन्दर्यबोध।

कोई भी बच्चा अपने माता-पिता का प्रिय बच्चा होता है। उसमें कुछ खूबियां जन्मजात ज़रूर होती हैं लेकिन ज़्यादातर का विकास हमारे परिवेश में होता है। किसी भी बच्चे का परिवेश मुख्य रूप से घर, स्कूल और समाज से बनता है। इसलिए इन तीन स्थानों पर जो भी सामाजिक ईकाइयां आस्तित्व में होती हैं, उनका उचित ढ़ंग से कार्य करना बच्चों के हित में होता है। ऐसा ज़रूरी भी है, क्योंकि किशोरावस्था में बच्चों के मन को समझना और फिर उसके मनोबल व उत्साह को बढ़ना न सिर्फ उसके कैरियर के लिए अच्छा होता है बल्कि समाज निर्माण व देश के विकास के लिए भी ज़रूरी है।

इन्क़िलाबी नज़र
शनिवार, 14 जून, 2014

Wednesday, June 25, 2014

अच्छे दिनों की शुरूआत और चुनौतियां

मोदी बतौर प्रधानमंत्री भारतीय अवाम के एजेण्डा पर किस सहजता से काम कर पाते हैं? खासकर सामाजिक न्याय और धर्म निरपेक्षता के संवैधानिक संकल्पों को आगे बढ़ाने में उनकी पहलकदमी क्या होगी? इस सवाल पर इसलिए भी गौर करने की ज़रूरत है, क्योंकि मोदी का संबंध राजनीति के जिस घराने से है, उस घर में समाज के विभिन्न वर्गों एवं समुदायों से लेकर स्त्रियों तक के लिए मनुवादी विचारों से प्रेरित आचार संहिता लागू करने में विश्वास रहा है।


रेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने और कैबिनेट के गठन के बाद हर तरफ अच्छे दिन आने की बातें आम हैं। वाकई “अबकी बार/मोदी सरकार” और “अच्छे दिन आने वाले हैं” की मुहिम सफल हुई है। अबकी बार यह भी हुआ है कि पिछले कई संसदीय चुनावों के बाद ऐसा जनादेश आया है जिसमें एक गठबंधन को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ है। दूसरी तरफ कांग्रेस को भाजपा के 285 के मुकाबिले महज 48 सीट पर ही संतोष करना पड़ा है। यदि बंगाल और तमिलनाडु जैसे कुछ राज्यों को छोड़ दें तो क्षेत्रीय दलों विशेषकर वो जिनका यू.पी., बिहार और झारखण्ड की राजनीति में पिछले दो दशकों से खास असर रहा है, को भी हाशिए पर पहुंचना पड़ा है। देखना यह है कि चुनाव प्रचार के दौरान जिस तरह से मोदी ने सक्रिय रहकर पूरे माहौल को अपने पक्ष में किया और जिस तरह मोदी लहर और सुनामी के रूप में उभरे या उभारे गए हैं, वह मोदी बतौर प्रधानमंत्री भारतीय अवाम के एजेण्डा पर किस सहजता से काम कर पाते हैं? खासकर सामाजिक न्याय और धर्म निरपेक्षता के संवैधानिक संकल्पों को आगे बढ़ाने में उनकी पहलकदमी क्या होगी? इस सवाल पर इसलिए भी गौर करने की ज़रूरत है, क्योंकि मोदी का संबंध राजनीति के जिस घराने से है, उस घर में समाज के विभिन्न वर्गों एवं समुदायों से लेकर स्त्रियों तक के लिए मनुवादी विचारों से प्रेरित आचार संहिता लागू करने में विश्वास रहा है।
गौर तलब है कि मतगणना वाले दिन एनडीए को पूर्ण बहुमत की तरफ बढ़ते देख राजनाथ सिंह ने प्रेस वार्ता के दौरान कहा कि इस बार के चुनाव में जाति और धर्म के बंधन टूट गए हैं। उन्होंनेे “जस्टिस फाॅर आॅल और अपीजमेन्ट फाॅर नाॅन” की बात की। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी पार्टी “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” के एजेण्डे पर खड़ी हुई थी और सरकार बनने के बाद इसी के इर्द-गिर्द काम करेगी। बीजेपी के पार्टी अध्यक्ष द्वारा संघ परिवार के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रतिबद्धता को दोहराना स्वाभाविक है। लेकिन यह विचार का विषय है कि एक समय में दो अलग-अलग मत या बातें एक साथ कैसे आगे बढ़ सकती हैं? गृहमंत्री का कार्यभार संभाल चुके राजनाथ सिंह का चुनाव नतीजों के दिन वाला बयान कुछ ऐसा है।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और जस्टिस फाॅर आॅल दोनों बातें एक साथ इसलिए भी मुमकिन नहीं है क्योंकि जब हम सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करते हैं तो समान नागरिक संहिता जैसा संवेदनशील मुद्दा स्वतः सामने आ जाता है। अगर देश और संविधान की बात करें तो भारत जैसे देश की सामाजिक, सामुदायिक और सांस्कृतिक विविधता को समाप्त करके समान नागरिक संहिता को थोपना न्यायोचित नहीं। यानि अन्यायपरक ढ़ंग से ही ऐसी किसी संहिता को लागू किया जा सकना मुमकिन है। ऐसे में पार्टी अध्यक्ष श्री राजनाथ सिंह की बातें कम से कम उन लोगों को गुमराह करने वाली हैं जिनका संबंध समाज के पिछड़े और वंचित तबके से रहा है, खासकर वो समुदाय जो ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से मुख्य धारा के विकास से दूर रहे हैं और जिन्हें सामाजिक न्याय की सबसे अधिक ज़रूरत रही है। समान नागरिक संहिता का मामला ऐसा है कि यदि किसी व्यक्ति को पैन्ट-शर्ट पसन्द है तो उसे कुर्ता-पाजामा पहनने के लिए मजबूर होना पड़े। ज़ाहिर है ऐसी कोई भी नीति देश की सामाजिक व सामुदायिक विविधता को अक्षुण्य बनाए रखने में बाधक होगी। वैसे भी नयी सरकार के लिए समान नागरिक संहिता जैसा कोई कदम उठाना आसान काम नहीं होगा। 

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद दरअसल संघ परिवार का एजेण्डा रहा है। 90 के दशक में जब बीजेपी का पहली बार देश व्यापी स्तर पर उभार हुआ था, उस वक्त भी यह एजेण्डा उनके साथ था। यह एजेण्डा बीजेपी ने उस समय भी अपने साथ रखा जब श्री अटल बिहारी बाजपेयी प्रधानमंत्री बने। लेकिन इस एजेण्डा पर अमल कर पाना बाजपेयी जी की सरकार के लिए भी नामुमकिन ही रहा। अब जब बीजेपी खुद 282 सीटों के साथ बहुमत के लिए ज़रूरी 272 का लक्ष्य हासिल कर चुकी है तो भी संसद के दूसरे सदन यानि राज्य सभा और विभिन्न राज्यों में प्रतिनिधित्व को देखकर ऐसा नहीं लगता कि बीजेपी संघ परिवार के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद या हिन्दुत्वादी एजेण्डे को मूर्त रूप दे पाने में सफल हो पाएगी। बेशक संविधान के नीति निदेशक तत्व वाले अध्याय में समान नागरिक संहिता की बात कही गयी है। लेकिन यह भी कहा गया है कि राज्य अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा भी करेगा। फिर सरकार बदलते ही भारत-पाक, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और अनुच्छेद 370 जैसे मुद्दों पर माहौल में गरमी पैदा करने का मकसद क्या है? दर असल इस ऐजेण्डा के दो मायने हैं। एक यह कि इसे हिन्दू समुदाय के समक्ष ऐसी रूमानी रात की तरह पेश किया जाता रहा है जिसकी कोई सुबह ही नहीं है। दूसरी तरफ इस ऐजेण्डा के सहारे विभिन्न समुदायों के अंदर डर और खौफ की भावना भरते रहना एक लम्बी रणनीति का हिस्सा रहा है। ताकि यह भावना धीरे-धीरे हर किसी को यह कहने के लिए मानसिक तौर पर तैयार कर ले कि हां रेगिस्तान में वो जो दूर दिख रहा है वह पानी है। फिर यह समझना मुश्किल नहीं है कि ऐसे ही भ्रम का नाम ही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है। जो सिर्फ एक के लिए नहीं बल्कि दोनों समुदायों के सामाजिक, आर्थिक और बौद्धिक विकास को प्रभावित कर रहा है। यहां तक कि अवाम का एजेण्डा कहीं पीछे छूटता नज़र आ रहा है।

ज़ाहिर है उक्त परिस्थितियों में न्याय कर पाने के संवैधातिक रास्ते तो आगे भी खुले रहेंगे। लेकिन सास्कृतिक राष्ट्रवाद के एजेण्डा को आगे बढ़ाने का मतलब संविधान की भावना को ठेस पहुंचाने जैसा होगा। ऐसे में दूसरी तरफ अगर मोदी जी इस मोर्चे पर काम न कर पाएं तो यह संघ को असंतुष्ट करने जैसा होगा। ठीक उसी तरह जैसे बाजपेयी जी के साथ हुआ था। फिर भी कहना होगा कि समय ने मोदी जी के हाथ में एक बड़ा अवसर सौंपा है। यदि वो चाहें तो न्याय की दिशा में पहलकदमी करते हुए न सिर्फ आम जनता तक अपनी पहुंच मजबूत बना सकते हैं बल्कि ऐसा करने से अवाम के एजेण्डा से ध्यान भटकाने के इल्ज़ाम से भी बरी रहेंगे।

इन्क़िलाबी नज़र
वृहस्पतिवार, 5 जून, 2014

Thursday, December 19, 2013

आहत लोगों तक राहत की क़वायद

"दंगा पीडि़तों के लिए राज्य सरकार की ओर से उठाए जाने वाले कदम क़ाबिले तारीफ़ हैं। विशेषकर मृतक आश्रितों को अविलम्ब नौकरी और बेघर होने वालों का एकमुश्त आर्थिक सहायता। लेकिन दंगों के इल्ज़ाम की पीड़ा झेल रही सपा सरकार के ये काम बेमानी प्रतीत होते हैं। शाकिर भाई जैसे लोग बताते हैं कि जिन लोगों को मुआवजा मिला उन्हें जिला प्रशासन की तरफ से यह निदेश भी मिला है कि वो बेघरों की तरह न रहें। लेहाज़ा मुआवजा प्राप्त करने वाले बेघरों को अपना टेन्टनुमा घर राहत शिविरों से हटाकर किसी स्थानीय व्यक्ति के घर में ले जाना पड़ा है।"

पिछले कुछ दिनों से उत्तर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में शान्ति और सौहार्द्रय स्थापना की कवायद ज़ोरों पर
है। विशेषकर बुद्धिजीवी, सामाजसेवी और नागरिक संगठन फिल्म शो, नुक्कड़ नाटक, धरना-जुलूस से लेकर बौद्धिक परिचार्चाओं के आयोजन में व्यस्त हैं। इन तैयारियों के पीछे संदर्भ पिछले लगभग बीस माह में प्रदेश भर में होने वाली सांप्रदायिक हिंसा और दंगा है। ज़ाहिर है ऐसे संदर्भ में सभी समाज सेवियों, संस्थाओं और नागरिक संगठनों के साथ-साथ सरकारी मोहकमों आदि का मक़सद एक ही हो सकता है,, शान्ति और सौहार्द्रय के लिए लोगों को संवेदित और संगठित करना। ऐसे कार्यक्रमों और आयोजनों का महत्व तब और अधिक बढ़ जाता है जब 6 दिसम्बर की तिथि नज़दीक हो। ज्ञात हो कि पिछले इक्कीस बरसों से यह तिथि हर साल समकालीन इतिहास की एक बड़ी घटना के ज़ख़्मों को ताज़ा करती रही है। हालांकि आधुनिक भारत के इतिहास में 6 दिसम्बर बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर के महापरिनिर्वाण दिवस की तिथि भी है। लेकिन हर साल यह तिथि बाबरी मस्जिद और राम जन्म भूमि विवाद से जुड़ी घटनाओं के चलते चर्चा-परिचर्चा का केन्द्र बिन्दु होती है। इस तिथि को अयोध्या और फैज़ाबाद से लेकर राजधानी दिल्ली तक एक से बढ़कर एक कार्यक्रमों का आयोजन और इन आयोजनों में धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में जनमत बनाने की अपील का होना इस बात का संकेतक है कि अभी भी धर्मनिरपेक्षता और पंथनिरपेक्षता के संवैधानिक लक्ष्य 66 वर्ष के लम्बे लोकतांत्रिक अनुभव के बाद भी अधूरे हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो गुजरात, असम और उत्तर प्रदेश आदि राज्य एक के बाद एक सांप्रदायिक दंगों के प्रयोगशाला नहीं बनते। यही वजह है कि सांप्रदायिकता का सवाल रोजी-रोटी और आजीविका के सवालों पर भारी पड़ने लगता है। परिणाम स्वरूप व्यक्ति का धार्मिक पहचान उसके नागरिक पहचान पर प्रमुखता प्राप्त कर लेता है।

ज्ञात हो कि मुज़फ़्फ़रनगर और शामली के विभिन्न गांवों में होने वाले दंगा की वजह से पिछले दिनों हज़ारों लोगों को अपना घर छोड़कर राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी थी। जो ग्रामीण बेघर हुए हैं, वो मूलतः मज़दूर हैं जो जाट समुदाय की खेतों पर काम करके या ईंट भट्टों पर काम करके अपने परिवार की आजीविका चलाते थे। बहुत से परिवारों में फेरी करके आजीविका अर्जित करने वाले व्यक्ति तो पंजाब, कश्मीर, हिमांचल, राजस्थान से लेकर दक्षिण भारत के केरल तक जाया करते थे। लेकिन जबसे दंगा हुआ है तबसे ये लोग राहत शिविरों में रह रहे हैं। दंगा पीडि़तों के लिए राज्य सरकार की ओर से उठाए जाने वाले कदम क़ाबिले तारीफ़ हैं। विशेषकर मृतक आश्रितों को अविलम्ब नौकरी और बेघर होने वालों का एकमुश्त आर्थिक सहायता। लेकिन दंगों के इल्ज़ाम की पीड़ा झेल रही सपा सरकार के ये काम बेमानी प्रतीत होते हैं। शाकिर भाई जैसे लोग बताते हैं कि जिन लोगों को मुआवजा मिला उन्हें जिला प्रशासन की तरफ से यह निदेश भी मिला है कि वो बेघरों की तरह न रहें। लेहाज़ा मुआवजा प्राप्त करने वाले बेघरों को अपना टेन्टनुमा घर राहत शिविरों से हटाकर किसी स्थानीय व्यक्ति के घर में ले जाना पड़ा है। लेकिन हारून भाई उन लोगों में हैं जिनके
परिवार का नाम 1800 लाभार्थियों की लिस्ट में दर्ज होने से रह गया है। ज्ञात हो 27 अक्टूबर को प्रदेश सरकार ने मुआवजा की घोषणा की थी। जिनमें कुल 1800 लाभार्थियों को चिन्हित करके 5-5 लाख प्रति परिवार का मुआवजा दिया जाना तय किया गया था। हारून भाई जैसे तमाम लोग हैं जो आम तौर पर दूसरे राज्यों में जाकर कपड़ों की फेरी करके अपने परिवार की आजीविका चलाते हैं। लेकिन जबसे दंगा हुआ है, तबसे वो राहत शिविरों में अपने-अपने परिवारों के साथ सरकारी मदद की बांट जोह रहे हैं। ऐसे में सवाल लाज़मी है कि हारून जैसे हजारों परिवारों की मदद किस प्रकार संभव हो सकेगी?

हरहाल, जिन लोगों को मुआवजा मिल चुका है, उनके लिए सबसे बड़ा संकट यह है कि इतने कम समय में वो कैसे और कहां ज़मीन लें। बिल्डरों के प्रचार-प्रसार और दंगा पीडि़तों की बातों का संज्ञान लिया जाए तो मुआवजे की घोषणा के बाद मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में ज़मीन की क़ीमतों में लगभग दोगुने से तीगुने की वृद्धि हुई है। शाहपुर में ही शमशान स्थल के ठीक बगल में जो प्लाॅटिंग पहले हज़ार-बारह सौ रूपए प्रति गज के हिसाब से की गयी थी, राज्य सरकार द्वारा मुआवजा की घोषणा के बाद 3100 रूपए प्रति गज से भी अधिक हो गयी। ऐसे में मुआवजा प्राप्त करने वाले परिवारों पर चैतरफा दबाव बना हुआ है कि आखिर वो करें तो क्या करें? एक तरफ सरकारी अमला मुआवजा के बदले कैम्प वाली जगह से हटने के लिए प्रेरित कर रहा है तो वहीं दूसरी तरफ अचानक से ज़मीन की बढ़ी हुई कीमत ने इन्हें सोचने पर मजबूर किया है कि यदि वो मुआवजे में प्राप्त पैसे का नियोजन ज़मीन ख़रीदने में कर देंगे,
तो ख़रीदी गयी ज़मीन पर मकान बनाने के लिए पैसों का इन्तेज़ाम कहां से होगा। इससे इतर पीडि़त लाभार्थी जिस मनोवैज्ञानिक उहापोह की स्थिति में हैं, उससे इस बात की भी संभावना है कि मुआवजा की रक़म इधर-उधर के कामों में खर्च न हो जाए। अगर ऐसा हुआ तो ऐसे पीडि़त परिवारों के ज़ख़्मों पर मरहम लगाना और भी दुभर हो जाएगा। शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका जैसे मानव विकास के तीन प्रमुख सूचकांकों पर दंगा पीडि़त अगामी कई दशकों तक लगातार लुढ़कते जाएंगे। ठीक उसी तरह जैसे आज़ादी के बाद अब तक लुढ़कते रहे हैं। जिसका उल्लेख सच्चर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में विस्तार पूर्वक किया है।

से में राज्य सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। हालांकि 5-5 लाख की एकमुश्त आर्थिक सहायता तत्काल राहत प्रदान करने वाला कदम प्रतीत होता है। लेकिन इस तरह की लक्षित आर्थिक सहायता में स्थायित्व के पुट का न होना चिन्ता की बात है। अच्छा होता कि सरकार की ओर से विभिन्न गांवों से पलायन करके राहत शिविरों में रहने वाले लोगों के नुकसान की भरपायी करते हुए ऐसे पीडि़तों की आजीविका सुनिश्चित करने के लिए इन्हें कृषि योग्य भूमि आवंटित की जाती। इसके साथ-साथ दंगे में शामिल दोषियों की गिरफ़्तारी और फाॅस्ट टैªक अदालतों की व्यवस्था करके सजा भी ज़रूरी है। इसके समानान्तर दोनों समुदायों के बीच बातचीत शुरू कराना भी राज्य सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारियों में शामिल होना चाहिए। तभी दंगा पीडि़तों के ज़ख्मों पर सही अर्थों में मरहम लगाया जा सकेगा और तभी जाकर मुज़फ़्फ़रनगर अपने पुराने रंग में लौट सकेगा। उस रंग में, जिसमें मुज़फ्फ़रनगर को मुहब्बतनगर के नाम से भी जाना-पुकारा जाता है।

कैनविज टाइम्स, 6 दिसम्बर 2013

Wednesday, October 23, 2013

लाल सलाम कॉमरेड...!



"आज चारबाग में लालबाग का मंजर जनांदोलनों के जीवित होने का एहसास जगा रहे थे। कहना होगा कि पिछले बीस साल से जारी आर्थिक सुधारों जनित कारपोरेट की लूट और सामाजिक जीवन में बाज़ार के बढ़ते प्रभुत्व के बाद भी इस देश में अभी जनांदोलनों की अपार संभावनाएं छिपी हुई हैं। क्योंकि रात भर रेलगाड़ी में जागने के बाद सुबह के समय में बिना शौच गए और बिना नाश्ता किए हज़ारों की संख्या में सुबह-सुबह रैली के लिए कतारबद्ध होना कोई मामूली काम नहीं है।"



बनारस स्टेशन रात के पौने बारह तक काॅमरेडों  के नारों से गुलज़ार रहा। ख़ास करके प्लेटफार्म नं॰ 9 जहां से बरेली एक्सप्रेस रवाना होती है। आज की बरेली एक्सप्रेस का नज़ारा ही अलग था। पी.जी. काॅलेज में एम.ए. की पढ़ाई कर रहे अरविंद मौर्या गाजीपुर और वाराणसी के विभिन्न भागों से आए हुए महिलाओं और पुरूषों के अलग-अलग समूहों को बार-बार दिशा निदेश दे रहे होते हैं। राम प्यारे जी के बारे में पूछने पर संदेह की दृष्टि से देखा, लेकिन परिचय के बाद गले लग गए। जब बरेली छूटी तो माहौल एक बार फिर देखने लायक हो गया। देश और समाज के विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी संस्थानों से जुड़े लखनऊ और बरेली तक के यात्रियों का सोने का अंदाज़ बता रहा था कि या तो वो पहली बार रेल में बैठने वाली संवेदनहीनता को कस के पकड़े हुए थे या फिर उन्हें पब्लिक प्ससेज पर बैठने और सोने के बाबत आदतों और मूल्यों की जानकारी नहीं थी। तभी तो एक के बाद एक, नीचे-ऊपर किसी भी सीट पर बैठने की काॅमरेडों की कोशिशें बेकार साबित हो रही थीं। लगभग 1000 की संख्या में होने के बाद भी काॅमरेडों की संख्या इतनी नहीं थी कि बिहार जाने वाली किसी रेलगाड़ी से बरेली एक्सप्रेस की तुलना की जाए। फिर भी सीट रिजर्व कराकर यात्रा कर रहे यात्रियों के लिए “लाल सलाम” वालों की यह यात्रा परेशानी का सबब तो थी ही। ऐसी परिस्थितियों में, खास करके पब्लिक डोमेन में तालमेल बनाकर रहना अच्छा संकेतक माना जाता है। और हो भी क्यों नहीं, आठ-दस घंटे के लिए सीट रिजर्व करा लेने से रेल का इंजन और बोगियां यात्रियों की थोड़े ही हो जाती हैं। लेकिन कौन समझाए, रात के उन मुसाफिरों को जो रात भर के रिजर्वेशन में एक इंच भी छोड़ना नहीं चाहते थे। बस यूं समझिए कि ऐसों को समझाना बहुत दुशवार होता है। खास करके तब जब ऐसों को समझ जाना चाहिए कि पब्लिक डोमेन में पब्लिक के साथ कैसे रहना चाहिए।

कल से आज तक ग़ालिब का यह शेर बार-बार याद आया कि “बस कि दुशवार है हर काम का आसां होना/आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसान होना।” बहरहाल, रैली में भाग लेने जा रहे महिला-पुरूष दोनों एक के बाद एक यात्रियों से थोड़ी जगह छोड़ने की नाकाम गुज़ारिश करते और आगे बढ़ जाते। सीट तो मेरे पास भी थी लेकिन हम तो एक से दो हो गए थे। कुछ यात्रियों को बात समझ में आ भी गयी। चाहे खुशी-खुशी या फिर दुःखी-दुःखी, उन्होंने अपने-अपने बर्थ पर थोड़ी-थोड़ी जगह दे दी। इतनी जगह कि तशरीफ रखने भर का एहसास हो। और इस एहसास में किसी तरह रात गुज़र जाए। रात भर काॅमरेडों के साथ हम भी सोते-जागते रहे। अलसुबह ताजपुर मांझा की कुछ काॅमरेड महिलाओं की आवाज़ देश और दुनिया की नही ंतो कम से कम ताजपुर मांझा जैसे गांव की सदियों पुरानी कहानियों की सच्चाई बयान कर रही थी। मैं ध्यान से उनकी बातें सुन रहा था। वो जितना कह-सुन रही थीं, मेरे अन्दर उससे कहीं अधिक सुनने की जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी। मन में यह विचार भी आ रहा था कि बरेली एक्सप्रेस आज लेट हो, तो हो जाए। लेकिन घटिया ट्रेनों की सूची में अगली कतार में शामिल और एक्सप्रेस बन जाने के कई सालों के बाद भी पैसेन्जर कहलाने का दंश झेल रही बरेली एक्सप्रेस आज भी 7 बजे तक लखनऊ जंक्शन पहुंच गयी। लखनऊ पहुंचा तो ऐसा लगा कि हम चारबाग नहीं बल्कि लालबाग रेलवे स्टेशन पहुंच गए हैं। इसकी दो वजह थी। एक तो चार बाग रेलवे स्टेशन पहले से लाल रंग में रंगा हुआ उस पर से लाल झंडों के साथ लाल सलाम-लाल सलाम के नारों की गूंज। स्टेशन के सामने एक पण्डाल में कुछ लोग माइक की मदद से भीड़ को दिशा-निदेश दे रहे थे। थोड़ा और बाहर निकला तो कुछ और काॅमरेडों का सामना हुआ जो बरेली, चंदौली और सोनभद्र आदि स्थानों से आए हुए थे। मन हो रहा था कि रूकूं, थोड़ी देर और रूक जाऊं। लेकिन समय हर बार की तरह इस बार भी हाथ पकड़कर आॅटो की ओर ले गया और मैं एक बार फिर ढ़ांक के तीन पांत उसी गोमती नगर में जिसके बारे में कहा जाता हैं कि प्रदेश नीतियां यहीं से बनती हैं और यहीं से यह प्रदेश शासित और संचालित होता है। इस कहने के पीछे भी कई वजह है, जिस पर फिर कभी चर्चा होगी। फिलहाल आज चारबाग में लालबाग का मंजर जनांदोलनों के जीवित होने का एहसास जगा रहे थे। कहना होगा कि पिछले बीस साल से जारी आर्थिक सुधारों जनित कारपोरेट की लूट और सामाजिक जीवन में बाज़ार के बढ़ते प्रभुत्व के बाद भी इस देश में अभी जनांदोलनों की अपार संभावनाएं छिपी हुई हैं। क्योंकि रात भर रेलगाड़ी में जागने के बाद सुबह के समय में बिना शौच गए और बिना नाश्ता किए हज़ारों की संख्या में सुबह-सुबह रैली के लिए कतारबद्ध होना कोई मामूली काम नहीं है। इस मामूली काम में शामिल महिलाओं और पुरूषों को मैं भी लाल सलाम करता हूं। कुसूम और साथियों की बातें निश्चित तौर पर न सिर्फ हमारी संवेदना को झिंझोड़ती हैं बल्कि ऐसी परिस्थितियों और इनमें छिपी जीवन की चुनौतियों का एक पक्ष सामने लाती हैं। मेरे लिए इनका यह मामूली काम बेशक यादगार रहेगा, ढे़र सारी यात्राओं में से कुछ यादगार यात्राओं और इस दौरान सहेजे गए अनुभवों की तरह। कहने को तो कुसूम और मंजू ने बहुत कुछ कहा, गालियां भी दीं। वो गालियां जो पुरूषों द्वारा रचा गया और जिनका स्वरूप स्त्री विरोधी है। मैं तो हतप्रभ रह गया कि इन महिलाओं को आखिर हुआ क्या है? लेकिन महिला जीवन की त्रासदियों को देखते हुए कहना होगा कि इस होने में ही इनके जीवित रहने की गुंजाइशें छिपी हैं। इस होने ने ही शायद सुषुम जैसियों को अपने जीवन के कुछ कटु अनुभवों को सामूहिक रूप से अभिव्यक्त करने का साहस दे दिया है।

बातचीत के दौरान अपनी वंचना की दास्तान सुनाते हुए इन महिलाओं ने बाबू साहेबों जि़क्र बार-बार किया। ग्राम प्रधानी पर उनका कब्ज़ा नहीं रहा। फिर भी इन महिलाओं को लगता है कि जब पहली बार 2 लाख की रकम भी वोटरों का मन नहीं बदल सकी। तो धोबी जाति का पपेट प्रधान बनाया गया। पुकारी की मानें तो “धाबिए जीतल ह... लेकिन रूनझुन जइसे कहेलन, ओइसे चले लन। रूनझुन के बाबत पूछने पर पुकारी बताती हैं कि “पहिले क परधान रहलन ह। अब त मथारे क हो गइल बा। हमन क ना जनली हं जा कि बाढ़ क पइसा आइल बा। त कुल नाम कटवा देहलन हं। अब बताव कि गरीब भूखन मरत बा त ओकर नाम कटा गइल। अउर तू परधान बाड़ त तोहरा घरे पांच बोड़ा गेंहूं पहुंच गइल।” पुकारी की हां में हां मिलाते हुए सुषुम ने बताया कि सेकट की घड़ी में उन्हें दो-दो मुट्ठी लाई ही नसीब हुआ। वो भी किसी को मिला और किसी को नहीं मिला। होते-होते यह बात राशन के वितरण तक पहुंच गयी। बेशक पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम हमेशा से सवालों के घेरे में रहा है। पात्र और अपात्र की सीमाएं तय करने से लेकर सब्सिडी वाले गल्ले और तेल के वितरण में काला बाज़ारी भी होती रही है। लेकिन अब सुषुम जैसी महिलाएं कम से कम इस बात को कहने में सक्षम नज़र आती हैं कि “दू-दू अजूरी लाई से इन्सान का पेट भला कैसे भर सकता है?” पुकारी जैसी महिलाओं को अच्छी तरह पता है कि हफ्ता दिन के लिए ही सही सरकार की ओर से गरीबों के लिए कुछ तो मदद है। सवालिया अंदाज़ में कहती हैं कि “सरकार भेजत बा गरीबन के बांटे खातिर कि तोहरे के घरे रखे के?” राशन के सवाल को आगे बढ़ाते हुए मैंने राशन न मिलने की वजह जाननी चाही तो संजू देवी ने जो कहा वह वाकई प्रीविलेज्ड क्लास को अपनी पढ़ाई, समझदारी और कुशलता के बारे में नए सिरे से सोचने पर मजबूर करती है। कहती हैं “हमहन क का जानी जां। तू पढ़ल बाड़... तू मालिक बाड़... तू चल्हांक बाड़...! त का जानके तू नइख देत।” कहना होगा कि जमींदारी प्रथा के अवसान के बाद, जब भद्र जन पढ़ लिख गए तो इस दृष्टि से इनको एक बार फिर ऐतिहासिक बढ़त मिल गयी। और वो जो वंचित थे... शोषित थे और जिन्हें ऐसे अवसर नहीं मिल पाए बावजूद इसके कि संविधान में समानता और न्याय का वादा किया गया था, एक बार फिर ऐतिहासिक रूप से पिछड़ गए। ऐसे हालात में अगर संजू जैसी महिलाएं अगर संविधान द्वारा स्थापित लोकतांत्रिक संस्थाओं की असफलता के लिए भद्रजनों को जिम्मेदार ठहराती हैं तो इसमें चौंकने की बात नहीं है। संजू की बातें सामाजिक गतिशीलता पर गम्भीर सवाल है। क्योंकि अपवर्ड सोशल मोबिलिटी होगी तभी गरीबों और वंचितों को मुख्य धारा में शामिल होने का अवसर मिल सकेगा। लेकिन यहां तो सारा मामला चुनाव और वोट तक सिमटता जा रहा है।

ट्रेन अपनी रफ्तार से आगे बढ़ी जा रही थी। मल्हौर कब पीछे छूट गया, पता ही नहीं चला। लेकिन अभी भी हम सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर अटके हुए थे। जब गेंहू और चावल की बात चली तो यह भी पता चला कि वंचना के शिकार चमटोल वासियों को आधुनिक होते भारत में आज भी कर्ज पर खेत की भूमि लेनी पड़ती है। विचारणीय है कि जो समुदाय मेहनतकश रहा है, भूखे पेट रहकर काम करना न सिर्फ कर गुलामी के दौर में बल्कि आज़ाद भारत में भी जिस समुदाय का मशगला रहा है, उस समुदाय के लागों को दो फसल के लिए 12000 से 14000 रूपए तक में खेती की एक बीघा ज़मीन लेनी पड़ती है। फसल हुआ तो और नहीं हुआ तो बारह से चैदह हज़ार की इस रकम की अदायगी ज़मींदार को करनी होती है। अन्यथा हम-आप गांव जाकर आंखों देखा बयान कर सकते हैं। क्योंकि मुख्य धारा की मीडिया के पास इन सच्चाइयों रूबरू होने का वक्त नहीं है। सुषुम जैसी विधवा की बात करें तो वो इस स्थिति में भी नहीं हैं कि किसी ज़मींदार से उधार की खेत ले सकें। अपनी बेबसी बयान करते हुए कहती हैं कि “बाबू साहब क टहल कर त समझिहन कि 50 रूपिया क काम कइले बाडि़न... लेकिन 20-30 रूपिया देके कहेलन कि जो भाग।” जब मैंने टहल के बारे पूछा तो सुषुम ने अपनी बातों को विस्तार देते हुए कहा कि “अरे भइया का बताईं। गरीब बानी जा। हमार मरद ना ह। मुं गइल... छोट-छोट लइकन के छोड़ के। केहू कहेला त बरतन माज के खाइलीं जा... झाड़ू लगा लेहिलीजां... कउनो सहारा नइखे त का कइलजा? चार ठो बाल-बच्चा बा, त कइसे जिहन। पिंशिन बनावे के कहल जाई त कहिहन कि राति के अइहे। त के आपन इज़्ज़त गंवावे जाई राति के। जे राति के जाई ओकर पिंशिन बनवा दिहन, लाल कार्ड बनवा दिहन।” मैं सुषुम की बातों को गम्भीरता से सुन रहा होता हूं। यक़ीन नहीं होता है कि ज़मींदारी टूटने और भूमि सुधार लागू तथा केन्द्र और राज्य सरकार की ढे़रों योजनाओं के बरसों से क्रियान्वयन के बाद भी वंचितों के साथ अभाव और अत्याचार क्या वाकई अभी भी है। स्पष्टता के लिए मैंने एक बार फिर ज़ोर देकर आस-पास बैठी महिलाओं से पूछा। उन्होंने मुझसे भी ज्यादा ज़ोर देकर कहा कि “हां अभी भी ऐसा होता है।” कुछ देर के लिए मुझे लगा कि मैत्रेयी पुष्पा जैसी किसी लेखिका के किसी उपन्यास की कई महिला पात्र मेरे आस-पास बैठी अपने संघर्ष की कहानियां बयान कर रही हों।

सुषुम, संजू, हंसा और पुकारी सब की सब अपने आस-पास की सच्चाइयों से हर दिन रूबरू होती हैं लेकिन यह बात उनकी समझ से परे है कि उन जैसों के साथ ही ऐसा क्यों होता है? वो यह भी नहीं जानतीं कि उनकी गरीबी का राज़ क्या है? इन्हें यह भी पता नहीं कि इन जैसों को लिंग, जाति, धर्म और क्षेत्र का दंश क्यों सहना पड़ता है? सब कुछ के बाद इन्हें उम्मीद है कि आज नहीं तो कल “यू॰पी॰ बचाओ... लोकतंत्र बचाओ” नामक 21 अक्टूबर को लखनऊ में आयोजित यह रैली उनके जीवन में नए सौगात लाएगी। लोग अचानक से खड़े हुए तो लगा कि गाड़ी रूकी हुई है। खिड़की से बाहर भीड़ और भीड़ के पीछे रेलवे स्टेशन सा मंजर। बात आगे जारी रहने का कोई मौका नहीं। बातचीत के चलते जो बचे रह गए थे, वो भी खड़े होकर बाहर निकलने की कोशिश में लग गए। जो रात में अपनी बर्थ पर दो इंच एडजस्ट करने को तैयार नहीं थे वो गंतव्य तक पहंुचने के बाद अब दो मिनट ट्रेन के अन्दर रूकने को तैयार नहीं थे। बहरहाल, मैं मोती चचा और राम प्यारे भाई को ढूंढंता हुआ बाहर निकला। इससे पहले कि सुषुम, संजू, पुकारी, और हंसा देवी को मैं धन्यवाद कहता वो रैली में आए लोगों के साथ घुल-मिल चुकी थीं। सोचता हूं कि कभी इनके गांव जाना हुआ तो इनसे ज़रूर मिलूंगा। इनके गांव जाना इसलिए भी मुमकिन है कि मेरी बड़ी बहन की ससुराल इत्तेफ़ाक़ से इन्हीं के गांव में है।

यह आलेख दिनांक 20 अक्टूबर 2013 को बनारस से लखनऊ की यात्रा के संस्मरण पर आधारित है.
इस आलेख में सभी व्यक्तियों के नाम काल्पनिक हैं.

Wednesday, May 15, 2013

समीक्षा - महिलाओं के अधिकार और मुस्लिम समाज

रीब डेढ़ साल पहले एक्शनएड, लखनऊ और सेन्टर फार हारमोनी एण्ड पीस, वाराणसी के सौजन्य से डा॰ असग़र अली इंजीनियर की किताब Rights of Women and Muslim Society के हिन्दी अनुवाद “महिलाओं के अधिकार और मुस्लिम समाज को पढ़ने का अवसर मिला था। इस दौरान मैंने हिन्दी अनुवाद का संपादन भी किया और एक संक्षिप्त समीक्षा भी लिखी जो प्रकाशित नहीं हो सकी थी। हिन्दी-उर्दू मीडिया/सोशल मीडिया के दोस्त चाहें तो यह समीक्षा अपने यहां प्रकाशित कर सकते हैं।

मौजूदा दौर में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों पर जो लेखक, बुद्धिजीवी, समाज विज्ञानी और पत्रकार अपनी लेखनी के माध्यम से समाज में जागरूकता और चेतना फैलाने का काम कर रहे हैं उनमें एक महत्वपूर्ण नाम डा॰ असग़र अली इंजीनियर का है। डा॰ इंजीनियर सेन्टर फार स्टडी आफ सोसाइटी एण्ड सेक्युलरिज्म के माध्यम से अपने विचार समाज तक पहुंचाते रहे हैं। अब तक डा॰ इंजीनियर द्वारा लिखी और संपादित 65 से अधिक किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। किताबों की इस कड़ी में Rights of Women and Muslim Society (महिलाओं के अधिकार और मुस्लिम समाज) इस दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है कि यह किताब हमें ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के बारे में न सिर्फ जानकारी देती है बल्कि जागरूक और सचेत भी करती है। इस पुस्तक में डा॰ इंजीनियर ने मुस्लिम समाज के परिप्रेक्ष्य में महिलाओं के अधिकारों पर विस्तार से प्रकाश डाला है। इस पुस्तक में इस्लाम के अविर्भाव से पहले और बाद के अरबी समाज में महिलाओं की स्थिति का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करने के साथ-साथ कुरान की आयतों को संदर्भित करके महिलाओं के अधिकारों के बारे जानकारी दी गयी है। इस किताब के माध्यम से इस्लाम और मुसलमान के फर्क को भी स्पष्ट करने की कोशिश की गयी है। यह बताने की कोशिश की गयी है कि किन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक कारणों के चलते मुस्लिम महिलाओं के बारे तरह-तरह के धारणाएं स्थापित हुईं और उन्हें सामाजिक वैधता प्रदान की गयी।
डा॰ इंजीनियर का मानना है कि इस्लामिक देश महिला-पुरूष समानता के प्रति रूढि़वादी हैं। लैंगिक न्याय सुनिश्चित करने में इस्लामी दुनिया काफी पीछे है। उनके अनुसार कुरान में महिलाओं को पुरूषों के बराबर अधिकार का उल्लेख है, लेकिन उलेमा वर्ग के फतवों के कारण लैंगिक न्याय सुनिश्चित नहीं हो पा रहा है। डा॰ इंजीनियर ने इस किताब के माध्यम से बताने की कोशिश की है कि महिलाओं के प्रति मुस्लिम समाज का भेदभाव परक व्यवहार के लिए कुरान नहीं बल्कि शरीयत/हदीस (इस्लामी कानून) के रूप में इसकी अलग-अलग व्याख्याएं जिम्मेदार हैं। हिजाब (परदा), श्रृंगार, बीबी को मारना-पीटना, महिलाओं को अर्धसाक्षी मानना, उत्तराधिकार में उनका हिस्सा, शादी, तलाक और हलाला आदि मुस्लिम महिलाओं से संबंधित निजी कानूनों पर यह किताब एक तार्किक बहस प्रस्तुत करता है।
विभिन्न मुद्दों पर विचार संप्रेषण में लेखक ने उदारवादी नज़रया अपनाया है। लेखक ने विवादित मुद्दों से खुद को अलग रखते हुए कुरान में उल्लिखित महिला अधिकारों की ओर ध्यान दिलाने की कोशिश की है। लेखक ने शादी और तलाक जैसे मामलों में कुरान की व्याख्या में सामंती और पुरूष सत्तात्मक सोच को प्रभावी कारण माना है। उनके अनुसार अहदिसों के ज़रिए महिला अधिकारों को कर्तव्य आधारित कर दिया गया है। इसी संदर्भ में डा॰ इंजीनियर अशरफ थानवी (बहिश्ति जे़वर के लेखक/संपादक) के विचारों का विरोध करते भी दिखते हैं।
किताब के अन्तिम भाग में लेखक ने समकालीन मुस्लिम दुनिया में महिलाओं की शैक्षिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। किताब के इस अध्याय में मिश्र व अन्य मुस्लिम देशों में पश्चिमी साम्राज्यवादी ताकतों के हस्तक्षेप और महिला सशक्तीकरण की राह में उदारवादी मुस्लिम नेतृत्व की बात की गयी है। किताब के इस हिस्से में मुस्लिम दुनिया में महिलाओं के शैक्षिक व आर्थिक पिछड़ापन के साथ रूढ़ीवादी मौलवियों और सामंती जमींदारों के बीच गठबंधन को जिम्मेदार बताया गया है। समकालीन वैश्विक चुनौतियों के संदर्भ में सऊदी अरब, खाड़ी और अफगानिस्तान में महिलाओं की दयनीय स्थिति के कारणों में अमेरिकी प्रभुत्व और मुल्ला वर्ग की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया गया है। इस क्रम में लेखक ने मोरक्को और ट्यूनिशिया को उन देशों की श्रेणी में रखा है जहां किसी हद तक महिलाओं को मौलिक अधिकार की प्राप्ति हुई है। लेकिन कुवैत में महिला अधिकारों की बहाली का मुख्य कारण इराक के विरूद्ध संघर्ष में एकजुटता कायम करना बताया है। दुनिया के विभिन्न मुस्लिम देशों में हो रहे बदलावों के बीच लेखक आशा व्यक्त करते हैं कि महिलाएं आवाज़ उठा रही हैं और उनके हालात बदल रहे हैं।
हरहाल, यह किताब पूर्व इस्लामी समाज-संस्कृति और इस्लाम के अविर्भाव के बाद की सामाजिक-सांस्कृतिक उतार-चढ़ाव के अध्ययन की अपील करता है। लेखक का मंतव्य है कि इस किताब से कुरान की व्याख्याओं पर सही राय कायम करके महिला अधिकारों और बराबरी की मूल भावना को समझा जाए। ताकि मुस्लिम महिलाओं के बारे में पहले से स्थापित मिथक, पूर्वाग्रह और दुराग्रह को समाप्त किया जा सके। लेखक धर्मनिरपेक्ष कानूनों के प्रवर्तन को दीर्घकालीक कार्य बताते हुए बीच का रास्ता अपनाते हुए शरीयत कानूनों को संहिताबद्ध करने की बात पर बल देते हैं, ताकि शादी, तलाक, उत्तराधिकार, तलाक के मामले में बच्चों की अभिरक्षा, विवाह की स्थिरता व तलाक के बाद भरण-पोषण को विधिक रूप प्रदान किया जा सके।
शा है यह किताब आने वाले समय में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों पर होने वाली बहस को नई दिशा प्रदान करेगा।