Friday, March 27, 2020

आपात परिस्थितियों में कैसे करें मूल्यांकन?

शिक्षक को यह बात हमेशा याद रखना चाहिए कि उन्हें न तो बच्चों के ज्ञान की परीक्षा लेनी होती है और न ही अपनी योग्यता का प्रमाण देना होता है। सीखना-सिखाना दो ध्रुवीय प्रक्रिया है जिसके केन्द्र में बच्चा होता है। हमें उस बच्चे के लिए निरन्तर अवसर सृजित करने की ओर अग्रसर रहना होता है न कि पास-फेल की प्रक्रियों को सम्पन्न कराने तक सीमित रहना होता है।


जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में हमें प्रतिस्पर्धा, प्रतियोगिता और परीक्षा जैसे शब्दों से दो-चार होना पड़ता है। ये शब्द हमें पास-फेल के रूप रूप में बहुत कुछ दे जाते हैं। किसी का जीवन पटरी पर सरपट दौड़ने लगता है तो किसी की ज़िन्दगी पटरी से उतर जाती है। फिर भी मनुष्य निर्मित व्यवस्था में हर व्यक्ति के जीवन में प्रतिस्पर्धा, प्रतियोगिता और परीक्षा की घड़ियां आती हैं। इस समय पूरी दुनिया में कोविड-19 नामक संक्रामक बीमारी ने आपात परिस्थितियां पैदा कर दी है। चीन, इटली और फ्रांस में संक्रमण की अनिंत्रित मामलों का संज्ञान लेते हुए भारत में केन्द्र और राज्य सरकारों को आपात कदम उठाने पड़े। यदि उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहां सरकार ने 13 मार्च को ही इसे महामारी घोषित करते हुए 14 मार्च से 22 मार्च तक कक्षा 1 से 8 तक के स्कूलों को बंद करने का आदेश जारी किया था। संक्रमण की भयावहता और स्वास्थ्य सुरक्षा को दृष्टिगत हुए यह समय 2 अप्रैल तक बढ़ाया दिया गया। इस बीच कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों को बिना परीक्षा ही अगली कक्षा में प्रोन्नति प्रदान करने का भी आदेश जारी किया। इसके पीछे कोविड-19 के संक्रमण से बच्चों को बचाना ही प्रमुख उद्देश्य रहा है।

उक्त परिस्थिति में दो बाते चिन्ता का विषय बनी हुई हैं। पहली यह कि वित्तीय वर्ष की ही तरह शैक्षिक सत्र का समय भी 1 मार्च से 31 मार्च तक होता है। लिहाजा 31 मार्च तक स्कूलों को परीक्षाएं आयोजित कर मूल्यांकन कार्य करके बच्चों को प्रगति पत्र वितरित करना होता है। इसके बाद ही कोई बच्चा अगली कक्षा में प्रान्नति के लिए अर्ह् होता है। लेकिन महामारी की आपात परिस्थितियों में छुट्टियां लगातार बढ़ानी पड़ीं हैं। पहले से चल रही परीक्षाओं को रोकना पड़ा। जिन स्कूलों में परीक्षाएं शुरू नहीं हुई थीं, उन्हें पहले टाला गया और अन्ततः निरस्त कर दिया गया। इस क्रम में 22 मार्च को जनता कफ्र्यू भी लगाना पड़ा। माननीय प्रधानमंत्री को देशवासियों से घरों में सुरक्षित बने रहने की अपील करनी पड़ी। यहां तक कि 25 अप्रैल से पूरे देश को लाॅकडाउन कर दिया। अपील किया गया कि सिर्फ आपात आवश्यकता के लिए ही बाहर निकलें। घर के अंदर बने रहने का हर संभव प्रयास करें। फिर भी बहुत से लोग घर के बाहर मुक्त रूप से निरूद्देश्य घूमने से परहेज नहीं कर रहे हैं। जिसकी चिन्ता माननीय प्रधानमंत्री जी ने ट्वीटर और 24 अप्रैल को शाम 8 बजे के अपने संबोधन में व्यक्त की। उन्होंने हाथ जोड़कर विनती की कि यदि अगले 21 दिनों तक हम अपने-अपने घरों में रह लें, तो कोविड-21 के भयावह दुष्परिणामों से लोगों को बचाया जा सकता है। इस लेख के माध्यम से मैं भी अपील करता हूं कि हममें से हर व्यक्ति नैतिक रूप से कोविड-19 के संक्रमण को फैलने से रोकने संबंधी सुझावों का अक्षरशः पालन सुनिश्चित करे। इस अपील के साथ मैं उन लोगों की समस्या पर ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं, जो माता-पिता और शिक्षक के तौर पर अपने बच्चों की परीक्षा और मूल्यांकन को लेकर चिन्तित हैं। यह चिन्ता स्वाभाविक भी है कि क्या बिना परीक्षा किसी बच्चे को अगली कक्षा में प्रोन्नत करना उचित है? ऐसे माता-पिता और शिक्षकों की चिन्ता अपनी जगह उचित है लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि महामारी  की परिस्थितियां असाधारण होती है। खासकर तब जब कोविड-19 जैसी संक्रामक महामारी को डाॅक्टरों, दवाइयों और उपलब्ध स्वास्थ्य सुविधाओं के दम पर टाला नहीं जा सकता है। कोविड-19 ऐसी ही बीमारी है, जो महामारी का रूप धारण कर चुकी है। ऐसे में परीक्षा और मूल्यांकन से अधिक आवश्यक यह हो जाता है कि जिसके लिए परीक्षा का आयोजन किया जाता है और जिसका मूल्यांकन करना होता है, उसके स्वास्थ्य सुरक्षा के उपाय सोचे जाएं और समय रहते उचित कदम उठाएं जाएं। स्कूलों और अन्य सार्वजनिक महत्व के स्थानों पर बच्चों को जाने से रोकना ऐसा ही कदम है। इस पर सवाल उठाना बेमानी है।

निश्चित तौर पर उन लोगों के सामने अपने बच्चों के मूल्यांकन और परीक्षा परिणामों की समस्या होगी, जो बच्चों के लिए औपचारिक परिवेश निर्माण में सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं। महामारी की परिस्थिति में सरकार द्वारा बिना परीक्षा बच्चों को उत्तीर्ण करने के निर्णय ने शिक्षकों के समक्ष यह चुनौती पैदा कर दी है कि वो अमूक छात्र/छात्रा को उत्तीर्ण करने की कवायद के हिस्से में क्या-क्या करें। कहना होगा कि इसका समाधान सतत मूल्यांकन प्रणाली में छुपा है। सतत मूल्यांकन क्या है, इसे कैसे समझा जा सकता है और इसे एक अंक पत्र पर कैसे अभिव्यक्त किया जा सकता है आदि के प्रशिक्षण से शायद की कोई शिक्षक वंचित होंगे। क्योंकि किसी भी शिक्षक को प्रशिक्षण के दौरान मूल्यांकन के विभिन्न पक्षों के बारे में भली-भांति सीखने का अवसर मिलता है। इसलिए परेशान होने या किसी आदेश का इंतेजार करने से बेहतर है कि शिक्षण कार्य में शामिल शिक्षक अपने विद्यार्थियों को सिखाई हुई बातों यानि विषयवार विभिन्न बिन्दुओं का मनन करें कि कब कौन सा टाॅपिक बच्चों को पढ़ाया था? किन बच्चों ने टाॅपिक के बारे में अवधाराणरात्मक समझ विकसित करने में कितनी गंभीरता का परिचय दिया था? शिक्षक स्कूल में बच्चों को पढ़ाते समय के क्षणों को याद करें। बच्चों के चेहरे उनकी आंखों के सामने आएंगे। बच्चों का व्यवहार, आचरण और शिष्टाचार स्पष्ट याद आने लगेगा। विषय विशेष में अलग-अलग बच्चों का लिखित और मौखिक प्रदर्शन भी याद आएगा। बच्चों के नाम क्रम से लिखकर प्रत्येक नाम पर विचार करें। निश्चित तौर पर एक पूरे शैक्षिक सत्र ही नहीं बल्कि पिछले कई वर्षों से बच्चों के साथ सीखने-सिखाने के ढ़ेर सारे क्षणों की याद ताज़ा हो उठेगी। फिर यह भी याद आएगा कि अमूक छात्र/छात्रा का विषय विशेष में क्या स्थिति रही है। इस तरह से मूल्यांकन का कार्य सम्पन्न किया जा सकता है।

आज देश और दुनिया के समक्ष जीवन बचाने का जो संकट पैदा हुआ है, उसमें सतत मूल्यांकन की प्रणाली को व्यावहारिक तौर पर अपना कर मूल्यांकन की समस्या का समाधान किया जा सकता है। यदि इसके विस्तार में जाएं तो यह मानना होगा कि अर्द्ध-वार्षिक और वार्षिक लिखित परीक्षा की स्थापित परिपाटी के प्रतिकूल मूल्यांकन की इस प्रणाली को व्यापक स्तर पर कम से कम कक्षा 8 तक के शिक्षण कार्य में अपनाना जा सकता है। लेकिन यह तभी संभव है जब हर शिक्षक पक्षपात, भेदभाव, वैयक्ति द्वेष और घृणा आदि भावों से स्वयं को दूर रखने के लिए स्वयं से ही वचनवद्ध हो।

बहुत सारे शिक्षकों के लिए सतत मूल्यांकन का कार्य बोझिल हो सकता है। यह तभी होता है जब हम किन्हीं अपरिहार्य कारणों से अपने विषय और बिंदु पर केन्द्रित नहीं होते। यह समझना ज़रूरी है कि सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में विषय बिन्दु पर केन्द्रित होने और केन्द्रित न होने के क्या मायने हैं। सीखने-सिखाने की गतिविधियां दो ध्रुवों के बीच बच्चों को केन्द्र में रखकर किया जाता है। बच्चा जिस केन्द्र में होता है उसके एक ध्रुव पर माता-पिता और अभिभावक होते हैं। वहीं दूसरे ध्रुव पर स्कूल और वहां शिक्षण कार्य में शामिल अध्यापक/अध्यापिका होते हैं। दोनों के काम बंटे हुए होने के बाद भी दोनों को केन्द्र में स्थित बच्चे के लिए अपनी दिनचर्या तय करनी होती है और समर्पित भाव से प्रयास करना पड़ता है। क्योंकि केन्द्र में स्थित बच्चा ठीक अवस्था में होगा तो घर-परिवार, देश और समाज को स्थायित्व मिलेगा। 

केन्द्र में स्थित बच्चे की कल्पना में भविष्य के एक सभ्य नागरिक, समाज सेवी, राजनीति कर्मी, डाॅक्टर, इंजीनीयर, वकील, प्रोफेशनल, किसान और मज़दूर आदि सभी शामिल होते हैं। ये सारे पहचान एक दूसरे के पूरक होते हैं। इनमें परस्पर सहजीविता की कल्पना निहीत होती है। यदि ऐसा नहीं होता तो केन्द्र में स्थित बच्चे के लिए माता-पिता और शिक्षकों को प्रयास ही नहीं करना पड़ता। बच्चे को न तो स्कूल के औपचारिक परिवेश में अच्छे मूल्यों और गुणात्मक सीख की आवश्यकता होती और न ही घर और समाज के अनौपचारिक परिवेश में माता-पिता को अपने बच्चों को परंपरा और संस्कार सिखाने की जिम्मेदारी निभानी पड़ती। मानव जीवन के इस सच को परीक्षा और मूल्यांकन की स्थापित प्रणाली से जोड़कर देखें तो अंदाज़ा होता है कि माता-पिता व्यक्तिगत और अनौपचारिक तौर पर अपने बच्चों का सतत मूल्यांकन करते रहते हैं। यही वजह है कि वो हर दिन, हर क्षण अपने बच्चों के समक्ष जीवन के उत्तम आचार, विचार और व्यवहार के साथ-साथ श्रेष्ठ अनुशासन, आचरण और शिष्टाचार आदि के आदर्श प्रस्तुत करते रहते हैं। ताकि बच्चे के व्यक्तित्व में ये बातें मूल्य के रूप में स्थापित और विकसित हो सकें।

अब बात करते हैं दूसरे ध्रुव की जहां शिक्षक होते हैं। शिक्षक केन्द्र में स्थित बच्चे के लिए औपचारिक प्रयास करते हैं। स्कूल के औपचारिक परिवेश में बच्चे को अनुशासन और शिष्टाचार के साथ-साथ निर्धारित पाठ्यक्रम को समयबद्ध तरीके से पढ़ाना-सिखाना शिक्षक का दायित्व होता है। शिक्षक के ऊपर यह जिम्मेदारी होती है कि वो बच्चों में विभिन्न विषयों से संबंधित विभिन्न बिन्दुओं की समझ बनाने में उसी समर्पण भाव का परिचय दे जैसा कि घर के अनौपचारिक परिवेश में माता-पिता और अभिभावक संस्कार की सीख देते समय दिखाते हैं। स्कूली शिक्षा में ऐसा करना ही शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए सुखद समझा जाता है। यदि मौजूदा दौर में स्कूली शिक्षा की बात करें तो लगभग सभी स्कूल और शिक्षक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए समर्पित नज़र आते हैं। मूल्यांकन की सतत प्रक्रिया को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से अलग करके नहीं देखा जा सकता है। उक्त बातों का ध्यान करके कोई भी शिक्षक अपने विद्यार्थियों की प्रगति रिपोर्ट तैयार कर सकता है।

यदि किसी शिक्षक के समक्ष फिर भी संशय की स्थिति हो कि ऐसी स्थिति में क्या करें जब उन्हें दो-तीन घण्टे की परीक्षा की प्रचलित परिपाटी के बिना ही बच्चों को पास करना है, तो उसे यह समझ लेना चाहिए कि अब तक वो जिन बच्चों का मूल्यांकन परीक्षा की स्थापित परिपाटी से करते रहे हैं, अब उन्हीं बच्चों के सामने अपना मूल्यांकन प्रस्तुत करना है। जो शिक्षक पूरे शैक्षिक सत्र भर केन्द्र में स्थित बच्चे के लिए समर्पित भाव से प्रयास करते हैं, उनके लिए किसी बच्चे का मूल्यांकन कोई बड़ी बात नहीं होती। यह भी सत्य है कि जब कोई शिक्षक विद्यार्थियों का मूल्यांकन करता है, तो इस प्रक्रिया में उस शिक्षक का खु़द का मूल्यांकन भी स्वतः होता रहता है। इसलिए ज़रूरी है कि चैतन्य होकर शिक्षा शास्त्र के सिद्धांतों को दृष्टिगत रखते हुए शिक्षक बिना औपचारिक परीक्षा के विद्यार्थियों का शैक्षिक मूल्यांकन कर प्रगति पत्र तैयार करें। इस काम को बिना किसी असहजता से किया जा सकता है। क्योंकि शिक्षक को अपने विद्यार्थियों के साथ स्कूल के औपचारिक परिवेश में एक या एक से अधिक शैक्षिक सत्र व्यतीत करने का अवसर मिलता है। शिक्षक को यह बात हमेशा याद रखना चाहिए कि उन्हें न तो बच्चों के ज्ञान की परीक्षा लेनी होती है और न ही अपनी योग्यता का प्रमाण देना होता है। सीखना-सिखाना दो धु्रवीय प्रक्रिया है जिसके केन्द्र में बच्चा होता है। हमें उस बच्चे के लिए निरन्तर अवसर सृजित करने की ओर अग्रसर रहना होता है न कि पास-फेल की प्रक्रियों को सम्पन्न कराने तक सीमित रहना होता है।

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hashiyekasamvad@gmail.com
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Tuesday, June 18, 2019

बच्चे, तकनीक और किताबें

"इस समय के बच्चों की तुलना उन पंक्षियों से करना बेमानी नहीं है, जो चारों ओर से शिकारी के जाल में फंसे हुए हों और जिनके समक्ष उड़ान भरने की चुनौती हो।"
दिन के लगभग ढाई बजे हैं। सुरेश माली के दरवाजे़ पर कुछ बच्चे मतदान संबंधी चर्चा कर रहे होते हैं। सुरेश माली के बड़े बेटे रमेश के चेहरे पर प्रसन्नता की लकीरें किसी खुशी का इज़हार कर रही थीं। उसने बताया “चाचा आज पहली बार वोट किया है।” पता चला कि सुरेश माली का बड़ा बेटा 23 साल का हो चुका है, और इस उम्र में उसने पहली बार वोट किया। वो बहुत उत्साहित होता है। उसने इसी साल पटना में रहकर एसी एण्ड रेफ्रीजरेशन में आई. टी. आई. की पढ़ाई की है। 23 मई को गाजियाबाद स्थित भारत इलेक्ट्राॅनिक्स लिमिटेड में अप्रैन्टिस के लिए इंटरविव है। अभी हम बात कर रहे होते हैं कि उसके घर के अन्दर, जो उसके माता-पिता की फूल-माला की दुकान भी है, से उसके भाई संजय की आवाज़ आती है कि “मैं जब 18 साल का हो जाउंगा तो ................... सरकार बनाउंगा।” निश्चित तौर पर अगले चुनाव यानि पांच साल के बाद संजय 18 की उम्र पूरी कर मतदाता की भूमिका में होगा। लेकिन मैं देर रात तक उसकी कही बात से बेचैन रहा। शायद इस बेचैनी का कारण मेरा लेखक और चिंतक होना और इससे बढ़कर अपने आस-पास के माहौल से संवेदित होना है। मैं सोचता रहा कि जिस उम्र में संजय जैसे बच्चों को अपने बड़े भाई रमेश की तरह पढ़ाई की बातें सोचनी चाहिए और उनकी अभिव्यक्तियों में कापी-कलम और किताब की बातें होनी चाहिएं, उस समय में ऐसे बच्चे सरकार बनाने के विचार से उद्वेलित हैं। रात के करीब 10 बजे होंगे, रमेश से फेसबुक लाइब पर बात करते हुए मैंने उससे इस बाबत भी बात की कि बहुत से बच्चे ऐसे हैं जिनका प्राइम टाइम यानि उनका जो पढ़ाई का समय है, उस समय में वो पढ़ाई से इतर अन्य गतिविधियों में लिप्त रहते हैं। रमेश ने बताया कि “हां... आजकल बच्चे एन्ड्रायड फोन के आदी हैं। रात के 4 बजे तक गेम खेलते हैं। यह ठीक नहीं है।” रमेश जिसने आज पहली बार वोट दिया था से मैंने कहा कि आप मोबाइल और तकनीक के क्षेत्र में प्रगति और आम लोगों तक इसकी पहुंच को रिजेक्ट कर रहे हैं। रमेश बिना किसी लाग लपेट के कहते हैं कि पढ़ाई की उम्र वाले बच्चों के लिए नयी तकनीक, मोबाइल फोन और एप्लीकेशन नुकसान पहुंचा रहा है। मैंने कहा कि तकनीक और मोबाइल को विकास का प्रतीमान बताया जा रहा है और आप इस आइडिया को रिजेक्ट कर रहे हैं। रमेश एक बार में कहते हैं कि यदि पढ़ने वाले बच्चों की पूरी रात मोबाइल गेम में कटेगी तो उनका दिन निश्चित तौर पर खराब होगा। रमेश से बातचीत के बाद उसे पहली बार मतदान में हिस्सा लेने के लिए बधाई देता हूं और उसके उज्जल भविष्य के लिए उसे शुभकामना देने के बाद अपने घोंसले में लौट आता हूं।

रमेश से बातचीत के बाद यह अंदाज़ा भी होता है कि बच्चों का एक-एक मिनट वास्तव में न सिर्फ उनके और उनके परिवार के लिए महत्वपूर्ण है बल्कि समाज और देश के लिए भी महत्वपूर्ण है। वो लोग जो तकनीकी क्रान्ति और इस क्रान्ति जनित यंत्रों के अबाध प्रसार में विकास की रूपरेखा देखते हैं, उन्हें उम्र की विविधता का ध्यान रखने की ज़रूरत है। नीतिगत स्तर पर इस युक्ति को अपनाने की ज़रूरत है कि कौन सी तकनीक और तकनीकी यंत्र बच्चे, बड़े, बूढ़े और महिलाओं के लिए उपयुक्त हैं। तकनीक का प्रसार आयु आधारित विविधता, पारिवारिक और सामाजिक विविधता को कैसे प्रभावित करता है, इस पर यथा संभव ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है। 

ऐसा इसलिए भी कहना पड़ रहा है कि प्रायः ऐसा देखा जा रहा है कि जिन बच्चों के पास नयी तकनीक युक्त एन्ड्रायड फोन हैं, वो बच्चे ऐसे फोन के दुरूपयोग और दुष्परिणामों से सावधान नहीं है। सतीश जो मेरे पड़ोस के जयपाल भइया का लड़का है इस समय 12वीं का छात्र है। 17वीं लोक सभा के चुनाव नतीजों के आने से ठीक दो दिन पहले 21 मई की दोपहर जब मैं नवापुरा स्थित डाॅ॰ सिद्दीकी की क्लिनिक में त्रिवेणी जायसवाल से बात कर रहा होता हूं, उसी समय गाज़ीपुर के तारिक भाई का फोन आता है। मैं फोन रिसिव करता, इससे पहले ही डिस्कनेक्ट हो जाता है। ठीक इसी समय सतीश के फेसबुक फ्रेण्ड रिक्वेस्ट पर नज़र पड़ती है। सतीश के फेसबुक फ्रेन्ड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट करते समय उसके फेसबुक वाल पर एक पोस्ट देखा। नमो अगेन के साथ कविता कुछ पंिक्तयां “गद्दार नहीं खु़द्दार चाहिए!!/कमजार नहीं दमदार चाहिये!!/तुम्हें मुबारक हो वंशवादी शहज़ादे/हमें हमारा चैकीदार चाहिये!!” लिखी हुई थीं। त्रिवेनी जायसवाल से बच्चों की पढ़ाई और उनके करियर पर बात के दौरान सतीश के इस पोस्ट पर भी देर तक बातें हुईं।
इत्तेफाक से उस पोस्ट पर भी नज़र पड़ी, जिसमें 12वीं की परीक्षा पास करने वाले अख़्तर ने अपने फेसबुक वाल पर लिखा था कि “......पी. वालों ........एम. गायब करवा के भी कुछ नहीं उखाड़ पाओगे। डेडिकेटेड टू भक्त लोग।” दो किशोरों की ऐसी अभिव्यक्तियां किसी भी संवेदनशील व्यक्ति की बेचनी का सबब हो सकती हैं। यह अंदाजा भी होता है कि मौजूदा दौर में किशोरावास्था के बच्चों के परिवेश से किस तरह काॅपी-कलम और किताब इत्यादि गायब हैं या गायब कर दी गयी हैं। माथे पर बल पड़ना स्वाभाविक है। क्योंकि ऐसा कैसे संभव हुआ कि शारीरिक, सामाजिक और बौद्धिक आवश्यकताओं की पूर्ति की संभावनाएं क्षीण पड़ गयी हैं। सवाल लाज़मी है कि क्या 17-18 वर्ष के दो किशोरों की ऐसी अभिव्यक्तियां उनकी अवस्था के अनुरूप उचित हैं? यदि शिक्षा मनोविज्ञान की शब्दावली में कहें तो बच्चों को आत्म अभिव्यक्ति के लिए अवसर ज़रूरी है। लोकतंत्र की पाठशाला में भी “अभिव्यक्ति की आज़ादी” एक महत्वपूर्ण बिन्दु है। लेकिन सवाल यह है कि जिन बच्चों को अपनी कक्षा के विषय और टाॅपिक्स को समझने में समय लगाना चाहिए और जिन बच्चों में आत्म अभिव्यक्ति के माध्यम से सर्जनात्मक क्षमताओं का विकास होना चाहिए, वो बच्चे सरकार बनाने और सरकार बचाने में समय लगा रहे हैं। बल्कि यह कहना अधिक प्रासंगिक है कि शैक्षिक अभिव्यक्तियों के बजाय राजनीतिक अभिव्यक्तियों में अपना समय गवां रहे हैं। उन्हें यह भी पता है कि उनकी ऐसी अभिव्यक्तियां उनकी कक्षा और किसी विषय से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित नहीं है। और न ही ऐसी अभिव्यक्तियों पर उन्हें ग्रेड या माक्र्स मिलने हैं। इन बातों का आशय यह नहीं है कि जो किशोर बच्चे किसी प्रभाव से ऐसा सोच रहे हैं, उन्हें अभिव्यक्ति के अवसर से रोका जाए। लेकिन ऐसे बच्चों की पारिवारिक और सामाजिक पृष्ठभूमि देखकर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति, जो नयी पीढ़ी के बेहतरी के सपने देखता है, इसके लिए कोशिशें करता है, की पीड़ा और बेचैनी का बढ़ जाना स्वाभाविक है। सतीश और अख़्तर का उदाहरण आइना दिखाने के लिए काफी है कि किशोरों की ऐसी अभिव्यक्तियां कदाचित उचित नहीं हैं।
सतीश और अख़्तर जैसे बच्चे अपने परिवारों की उम्मीदें हैं। इन्हीं पर निर्भर है कि वो पढ़-लिख कर अपने परिवारों को विषम परिस्थितियों से उबारेंगे। अक्सर समाचारों में पढ़ने-सुनने को मिलता है कि किसी पान बेचने वाले, चाय बेचने वाले या रिक्शा/टेम्पो चलाने वाले का बेटा/बटी आई.ए.एस. बन गया। इन बच्चों को इन्हीं कड़ियों का हिस्सा बनना होगा। यह सच है कि अभिव्यक्ति बच्चों की क्षमताओं का परिचायक है। लेकिन उचित समय पर उचित मार्गदर्शन के अभाव में बच्चों का शैक्षिक के बजाय अन्य प्रकार की अभिव्यक्तियों के लिए प्रेरित होना उनके और समाज दोनों के लिए हानिप्रद है। समय और स्थान के अनुरूप होने वाली अभिव्यक्तियां श्रेयस्कर और फलदायी होती हैं। इसलिए किशोरावस्था के बच्चों को शैक्षिक और सह-शैक्षिक अभिव्यक्तियों के लिए पे्ररित करना ज़रूरी है। वरना अपरिपक्वता और अतिउत्साह मन और शरीर को दिशाहीन बना देता है। ऐसे में बच्चे सामाजीकरण की उस प्रक्रिया से भी अलग-थलग रह जाते हैं, जिसमें उन्हें आयु, वर्ग और लिंग आधारित विविधता का ज्ञान होता है, परिपक्वता आती है और सच-झूठ, अच्छे-बुरे की समझ विकसित होती है। समझ का विकसित होना बेहद ज़रूरी है। क्योंकि समझ और सूझबूझ से ही व्यक्ति में “सुंदर” की बेहतरीन कल्पना को समझने और उसे साकार करने की क्षमता विकसित होती है। 

बेशक तकनीक और यंत्रों ने मानव जीवन में आसानियां पैदा की हैं। लेकिन मौजूदा दौर में जिस तरह का रोबोटिक डेवलपमेन्ट हो रहा है, उसके नकारात्मक प्रभावों से “बच्चा” नामक बायोलाॅजिकल जीव सुरक्षित नहीं है। रोबोटिक डेवलपमेन्ट और तकनीक आधारित गतिविधियां बाज़ार की ज़रूरत भी है। वो बाज़ार जहां व्यक्ति नागरिक नहीं उपभोक्ता है और जहां बच्चा छात्र/छात्रा नहीं बल्कि आदर्श उपभोक्ता है। बाज़ार की यह ज़रूरत बाल उपभोक्ताओं के मन के तारों में चिन्गारियां पैदा कर रही हैं और उन्हें रोबोट की तरह व्यवहार करना सिखा रही हैं। ऐसा रोबोट जो एक रिमोट से संचालित होता है। विचित्र बात है कि बाज़ार विविध रूपों और माध्यमों से बच्चों से संबंध बनाए हुए है। बच्चों के मन बहलाने वाले टाॅफी-चाॅकलेट, बिस्कुट और अन्य पोषक पदार्थों से लेकर उनकी शिक्षण सामग्री जैसे पेन्सिल, रबर, काॅपी-कलम और किताब आदि पर जी.एस.टी. लागू है। ऐसे बाज़ारमय परस्थितियों में तकनीक की मार अलग है। इन्हीं परिस्थितियों में “देश का भविष्य पल रहा है।” इस समय के बच्चों की तुलना उन पंक्षियों से करना बेमानी नहीं है, जो चारों ओर से शिकारी के जाल में फंसे हुए हों और जिनके समक्ष उड़ान भरने की चुनौती हो। 

यह समझने की ज़रूरत है और हमारे-आप जैसे लोगों का नैतिक दायित्व भी है कि हम बाज़ार की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए बच्चों विशेषकर किशोरावस्था के बच्चों को अपने ही मां-बाप और परिवार में विद्रोही बन जाने की परिस्थितियां पैदा करने वाले कामों में सहयोगी न बनें। कहा जाता है कि बच्चे देश का भविष्य हैं। तो मैं कहना चाहता हूं कि बच्चों को मोबाइल के लिए प्रेरित करके, उन्हें बायोलाॅजिकल से रोबोटिक न बनाया जाए। देश के भविष्य से खिलवाड़ करना किसी भी तरह उचित नहीं है। अच्छा होता कि बच्चों को किताबों से दोस्ती के लिए प्रेरित किया जाए। क्योंकि एक बेहतर कल का रास्ता किताबों की दुनिया से होकर निकलता है।

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नोट- वास्तविक घटना पर आधारित। सभी पात्रों के नाम बदल दिए गए हैं।

Wednesday, May 22, 2019

कौन जीत रहा है...! कौन हार रहा है...!

वकील साहब के साथ एक खास बात है, जिसका ऐतराफ करना वो नहीं भूलते। वो जहां भी बैठते हैं, उन्हें नींद
आने लगती है। मुन्सफी मुहम्मदाबाद हो या तहसील मुहम्मदाबाद या फिर सदर रोड स्थित डाॅ॰ फतह मुहम्मद की क्लिनिक, हर जगह बैठते ही वो नींद की आगोश में चले जाते हैं। यद्यपि देश-दुनिया की चर्चाओं में वो स्वयं अपनी बात कहते समय ठीक रहते हैं। लेकिन जैसे ही उनकी बात समाप्त होती है, उनकी आंखें बन्द होने लगती हैं। उनके आस-पास होने वाली चर्चाएं जारी रहती हैं। लेकिन वो चर्चाओं से बेख़बर होते हैं। जब आंख खुलती है, तो बताना नहीं भूलते कि उन्हें बैठते ही सोने और सपने देखने की आदत है। आज 17वीं लोकसभा सामान्य निर्वाचन-2019 के लिए मतदान हो रहा है। दोपहर के 2 बजकर 20 मिनट हुए हैं। आज वकील साहब बैठे नहीं हैं, बल्कि क्लिनिक दक्षिण दिशा की दीवार से लगी तख़्त पर लेटे हुए हैं। लेटने का मौका उन्हें इसलिए मिला कि आज वो दोपहर के समय आए और शाम की चर्चा में शामिल होने वाले सदस्य मौजूद नहीं होते हैं। मैं और अब्बा क्लिनिक में पहुंचते हैं। वकील साहब को आवाज़ देते हैं। वकील साहब हिलते-डुलते हैं। हमें लगता है कि वो नींद से बेदार हो रहे हैं। मैंने उन्हें इस मुद्रा में कभी लेटे हुए नहीं देखा था। सर पर हरे रंग का गमछा कुछ इस तरह लगा रखा था जैसे वो अभी धूप से बचने की कोशिश कर रहे हैं। अंदाज़ा हुआ कि वो धूप में चलकर आए हैं। क्लिनिक में किसी को न पाकर लेट कर आराम कर रहे हैं। उनकी आंख खुलती है, वो उठकर बैठने की कोशिश करते हैं। मैं उन्हें लेटे रहने का आग्रह करता हूं।
उनकी अनुमति लेकर अपनी मोबाइल से इस मुद्रा में उनकी एक फोटो खींचता हूं। अब्बा मज़ाक करते हैं, “फोटो कहीं सोशल मीडिया में शेयर नहीं करना, वरना लोग पुछार के लिए आने लगेंगे।” वकील साहब मुस्कराते हुए उठकर बैठ जाते हैं। कहते हैं सपना देख रहा था। “कौन जीत रहा है...! कौन हार रहा है...!”, अब्बा चुटकी लेते हैं। वकील साहब की मुस्कराहट हंसी में बदल जाती है। हम सब हंसने लगते हैं। हा... हा... हा... हा... की आवाज़ फिज़ा में घुल जाती है।

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Thursday, January 10, 2019

आरक्षण की मूल भावना को समझना होगा

......बुनियादी स्तर पर आरक्षण के मूल मंतव्य को समझना होगा। अधिक शिक्षित और सम्मानित लोगों की जिम्मेदारी भी अधिक होती है। एक बेहतर और प्रगतिशील समाज के निर्माण में ऐसे लोगों की भूमिका भी अधिक होती है। ऐसे लोगों को इस सच्चाई से रूबरू होना होगा कि देश से प्रतिभा पलायन का कारण आरक्षण नहीं है। बी.पी.ओ. के माध्यम से भारत की युवा प्रतिभाओं का खून चूसने का काम आरक्षण की व्यवस्था नहीं कर रही है और न ही युवा भारतीयों के सपनों को काल सेन्टरों के केबिनों तक सीमित करने का काम ही आरक्षण कर रहा है। वास्तविकता यह है कि ........
Published in Shilpkar Times, New Delhi, Issue: 16-31 July 2011


विविधता और विभिन्नता प्रधान हमारे देश में सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना अभी भी व्यवस्थापिका और न्यायपालिका की प्रमुख चुनौतियों में से एक है। राजधानी के तीन प्रमुख विश्वविद्यालयों में इन दिनों सामाजिक न्याय की मुहिम चल रही है। जामिया में माइनारिटी स्टेटस और मुस्लिम रिजर्वेशन, डी॰यू॰ और जे॰एन॰यू॰ में प्रवेश और नियुक्ति में ओ॰बी॰सी॰ आरक्षण का ध्यान न रखा जाना बहस का मुद्दा बना हुआ है। जाहिर है बुनियादी सवाल संवैधानिक उपबंधों के उल्लंघन का है। लेकिन आरक्षण का जिक्र होते ही जाति आधारित भेदभाव और मेरिट-डिमेरिट जैसे मुद्दे बहस के केन्द्र में आ जाते हैं। आरक्षण के पक्ष और विपक्ष में तर्कों के तीर चलने लगते हैं। बाजारपरस्त एज आफ ग्लोबल कम्पटीशन के हिमायती भी इस बहस में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। कहते नहीं थकते कि प्रतिस्पर्धा का आधार योग्यता, मेरिट और दक्षता है न कि जाति। लेकिन बुद्धिजीवियों का एक खेमा यह कहता है कि सवाल दक्षता, योग्यता और मेरिट का नहीं बल्कि अवसर का है। सन् 2005-06 में जब यूपीए सरकार ने निजी क्षेत्र में अनुसूचित जाति/जनजाति आरक्षण का शगूफा छोड़ा था तब भी और इससे पहले जब मण्डल आयोग की सिफारिशें लागू हुईं थीं तब भी छात्रों का एक बड़ा हिस्सा विरोध में आंदोलित हो उठा था। जामिया का मामला माइनारिटी स्टेटस से जुड़ा है। इसलिए इस पर अलग से बात की जाएगी। फिलहाल बात करते हैं आरक्षण की नीति, आरक्षण की राजनीति और आरक्षण की मूल भावना की।
मामला पब्लिक सेक्टर का हो या प्राइवेट सेक्टर का पहले तो विरोधी के तेवर विरोध तक सीमित थे लेकिन जे॰एन॰यू॰ और डी॰यू॰ के मामलों में यह तेवर कानून की और संवैधानिक उपबंधों में निहित सामाजिक मर्यादा की भावना के उल्लंघन और मर्माहत करने का है। कम से कम प्रगतिशील विचारों के पोषक लोगों और संस्थाओं से तो यह अपेक्षा की ही जानी चाहिए कि अवसरों से वंचित लोगों को मुख्य धारा में शामिल करने के मुहिम का हिस्सा बनें न कि छद्म प्रगतिशील आदर्शों के व्याख्याता। बात उन लोगों की भी जो यह समझते हैं कि रिजर्वेशन के कारण उनका हक मारा जा रहा है। दरअसल रिजर्वेशन की मूल भावना सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन है। ये बात अलग है कि ‘द पाॅलिसी आॅफ रिजर्वेशन’ ‘द पाॅलिटिक्स आॅफ रिजर्वेशन’ में बदल गयी। जबकि शैक्षिक-सामाजिक पिछड़ेपन का सवाल पीछे छूटता गया। लेकिन यह सब अचानक नहीं हुआ है। इस होने में भी काफी वक्त लगा है। अच्छी बात यह है कि तमाम विकृतियों और दिशाहीनता के बाद भी सामाजिक न्याय के लिए लोग पहले से कहीं अधिक संख्या में आवाज उठा रहे हैं। भीड़तंत्र में ही सही लोकतंात्रिक आवाजें उठाई जा रही हैं। ये बात अलग है कि कारपोरेट मीडिया के लिए कौन से सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विषय पाॅपुलर न्यूज स्टोरी हैं या नहीं। यही वजह है कि फारबिसगंज की हालया फायरिंग पर मीडिया कवरेज में देर हो जाती है।
शिक्षा हेतु बुनियादी सुविधाओं को हर व्यक्ति तक पहुंचाया जाना चाहिए। सर्व शिक्षा अभियान के तहत वजीफा, ड्रेस, किताबें और मध्यान्ह भोजन को इस तरह की सुविधा में शामिल किया जा सकता है। लेकिन उस सामाजिक बुराई को कैसे समाप्त किया जाए जिसके कारण मिड डे मिल बनाने वाली दलित और पिछड़ी जाति की महिलाओं द्वारा बनाए गए खाना को अबोध बालकों ने खाने से इंकार कर दिया हो। क्या यह इनक्रेडिबल इंडिया के लिए मुंह चिढ़ाने जैसी घटना नहीं है।
मुद्दा सामाजिक सम्मान का है। जो लोग बार-बार प्रतिभा की दुहाई देकर आरक्षण का विरोध करते हैं, जिनमें खुद पिछड़ों की भी अच्छी-खासी तादाद है, को जानकारी होनी चाहिए कि 90 के दशक में जब ओ॰बी॰सी॰ आरक्षण लागू हुआ था, उस समय विरोध करने वालों में एक समूह ऐसा भी था जिसने विरोध भी किया और फर्जी प्रमाण पत्र बनवाकर कहीं एडमिशन में लाभ उठाया तो कहीं नौकरियों में। ये बात अलग है कि सबूत नहीं है और न ही स्ट्रींग आपरेशन की कोई फुटेज। आम धारणा है कि हर व्यक्ति में प्रतिभा एक समान नहीं होती है। यह ईश्वर प्रदत्त गुण है जो कुछ विशेष लोगों में होता है और इसीलिए आरक्षण या किसी भी पाॅजीटिव डिस्क्रिमीनेशन जैसे उपाय से प्रतिभा का अनादर या इसे हतोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए। यह एक स्थापित तर्क है जिससे किसी भी व्यक्ति की सहमति स्वाभाविक है। लेकिन साइंस और टेक्नोलाजी के मौजूदा दौर में जब व्यक्ति हर चीज की परत दर परत जांच-पड़ताल करने के बाद किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुंच रहा है, तो लेहाजा प्रतिभा से संबंधित संस्थागत धारणा की पड़ताल भी होनी चाहिए। इस क्रम में जब हम इतिहास का अवलोकन करते हैं तो यही पाते हैं कि समाजिक स्तरीकरण के लिहाज से भारत में जो विषंगतियां व्याप्त हैं वो ईश्वर प्रदत्त नहीं बल्कि सामजिक विकास के क्रम में एक ऐतिहासिक घटना से अनुप्राणित हैं। जब प्राचीन काल में लोहे के प्रयोग से समाज के एक तबके का वर्चस्व अन्य तबकों पर स्थापित हो गया तब इस तबके के लोग हर उस काम काम को अंजाम देने लगे जिससे सामाजिक असमानता की खाई बढ़ती गयी। इस तबके को समय-समय पर पुरोहित वर्ग वैधता का प्रमाण पत्र देकर सदा ही इनके और अपने हितों का पोषण करता रहा। इस तरह इन दोनों वर्गों की मिली भगत ने वर्ण व्यवस्था को जन-जन के मन में, व्यवहार में, संस्कार में, यहां तक कि उनकी आत्मा में कुछ इस तरह स्थापित किया कि दलित-पिछड़ा तबका सामाजिक रूप से भद्र जनों की सेवा को ईश्वरीय आज्ञा और अपना धर्म समझता रहा। इन सच्चाइयों को अगर और करीब से महसूस करना है तो वैदिक और गुप्त कालीन ऐतिहासिक ग्रंथों को पढ़ना होगा। कालीदास के एक ग्रंथ में तो भाषा के अनुसार सामाजिक स्तरीकरण का उल्लेख हुआ है। जहां संभ्रांत लोग संस्कृत और नीचे के लोग अपभ्रंश बोलते हैं।
बहरहाल तुर्कों और मुगलों के शासन काल में भारत में इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए नई संभावनाएं बनीं। इस्लाम ने यहां भी अपने मूल तत्व ‘‘एकता ओर समानता’’ का बिगुल फूंका। प्रभाव स्वरूप बड़े पैमाने पर दबे कुचले और पिछड़े लोगों ने भेदभावमूलक ब्राम्हणवादी व्यवस्था को त्यागकर इस्लाम स्वीकार कर लिया। ज्ञात हो कि छठीं शताब्दी ई॰पू॰ महात्मा बुद्ध और महावीर जैन ने भी समतामूलक समाज के निर्माण और विकास के लिए अथक प्रयास किए थे। बहरहाल, तुर्कों और मुगलों के दौर में सामाजिक सम्मान की आस में जिन पिछड़ों ने धर्म परिवर्तन किया उन्हें धार्मिक समानता तो मिली, लेकिन इतिहास और वर्तमान दोनों ही गवाह हैं कि वो लोग आज भी सामाजिक समानता और सम्मान से कोसों दूर हैं।
गौरतलब है कि आजादी के बाद राष्ट्रपति के अध्यादेश द्वारा अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए आरक्षण का संवैधानिक उपबंध किया गया। लेकिन संविधान का अनुच्छेद 341 में संशोधन न होना धर्म आधारित भेदभाव को मूक सहमति देने जैसा है। अनुच्छेद 341 के अनुसार कोई भी दलित वर्ग का व्यक्ति यदि धर्म परिवर्तन करके मुस्लिम या ईसाई बन जाता है तो वह आरक्षण का लाभ नहीं प्राप्त कर सकता। मुमकिन है संविधान निर्माताओं ने इस्लाम के ‘‘समानता और एकता’’ की मूल भावना को मद्देनजर रखते हुए अनुच्छेद 341 के उपबंध को स्वीकृती दी हो। लेकिन आजादी के 63 साल बाद भी यह नहीं माना जा सकता कि जिन लोगों ने हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध या जैन धर्म अपना लिया हो उनकी सामाजिक सिथति या उनके प्रति उच्च जातियों के लोगों का सामाजिक व्यवहार जैसे का तैसा है। जिसके आधार पर ये लोग आज भी आरक्षण के अधिकारी हैं। दूसरी तरफ यह भी विश्वास से परे है कि जो लोग इस्लाम या ईसाई धर्म अपना लिए हों उन्हें अचानक ही सामाजिक समानता का दर्जा मिल गया हो और उन्हें आरक्षण के योग्य नहीं समझा जाए।
जाहिर है प्रतिभा एक तरह का मैन मेड स्थापित संस्थागत धारणा है। कोई भी प्रगतिशील समाज मानव निर्मित सामाजिक भेदभाव पर आधारित परंपरा, सिद्धांत, व्यवहार और मूल्य को अधिक समय तक बर्दाश्त नहीं कर सकता है। जहां तक प्रतिभा की दुहाई देने वालों की बात है तो उनको बुनियादी स्तर पर आरक्षण के मूल मंतव्य को समझना होगा। अधिक शिक्षित और सम्मानित लोगों की जिम्मेदारी भी अधिक होती है। एक बेहतर और प्रगतिशील समाज के निर्माण में ऐसे लोगों की भूमिका भी अधिक होती है। ऐसे लोगों को इस सच्चाई से रूबरू होना होगा कि देश से प्रतिभा पलायन का कारण आरक्षण नहीं है। बी.पी.ओ. के माध्यम से भारत की युवा प्रतिभाओं का खून चूसने का काम आरक्षण की व्यवस्था नहीं कर रही है और न ही युवा भारतीयों के सपनों को काल सेन्टरों के केबिनों तक सीमित करने का काम ही आरक्षण कर रहा है। वास्तविकता यह है कि नई आर्थिक व्यवस्था ने पिछले लगभग बीस बरसों में हमारे देश में विकास के पहिए को उस दिशा में घुमा दिया है जहां जीवन का अर्थ बनावटीपन के सिवा कुछ नहीं। नई आर्थिक नीति ने हमारे रगों में उपभोक्तावादी चरित्र और सुविधाभोगी मानसिकता का संचार किया है।
आज हममें से हर कोई नई माॅडल की गाड़ी, फ्रीज, मोबाइल और बर्गर, पिज्जा व कोला का भोग करना चाहता है। हम अपनी आवश्यकताओं और प्राथमिकताओं को अपनी क्षमता के अनुरूप तय नहीं कर रहे हैं बल्कि मल्टीनेशनल्स तय कर रही हैं। ऐसे में पूंजी आधारित सामाजिक असमानता का ग्राफ दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है। फलस्वरूप एक तरफ प्रतिभा पलायन और उनके शोषण की प्रवृत्ति नित नए तेवरों में बढ़ रही है तो दूसरी तरफ निजीकरण की बयार से सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए बचा खुचा अवसर भी समाप्त होता जा रहा है। यही वजह है कि 2005-06 में आरक्षण की सियासत करने वालों ने निजी क्षेत्र की नौकरियों और उच्च शिक्षा में आरक्षण का शगूफा छोड़ा था। सवाल यह है कि पहले से उपलब्ध आरक्षण की व्यवस्था को हम सही रूप में लागू नहीं करा पा रहे हैं तो इस क्षेत्र में नई व्यवस्था को कहां तक लागू किया जा सकेगा।

Saturday, September 8, 2018

बदलते दौर में शिक्षक दिवस ‘समारोह’ के मायने


डा॰ सर्वपल्ली राधा कृष्णन की जन्म तिथि शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। हमारे बीच कई ऐसे लोग हैं जिन्होंने इस तिथि को एक आदर्श शिक्षक के गुण-दोषों को उजागर करने और आदर्श शिक्षक बनने-बनाने की दिशा में एक लैण्ड मार्क के तौर पर अपनाया है। लेकिन पिछले कुछ बरसों में स्कूलों में शिक्षक दिवस मनाने का जो अंदाज़ देखा गया है, वह आदर्श शिक्षक/शिक्षिका के प्रतिमानों की झलक धूमिल कर देने वाली रही है। एक तरफ देश के प्रधानमंत्री देश के बहुसंख्यक छात्र/छात्राओं तक सीधी अपनी बात पहंुचाने की कोशिश कर रहे होते हैं, वहीं दूसरी तरफ बहुत से स्कूलों में पैसा, पार्टी, केक, पेय पदार्थ और उपहारों के लेन-देन ने शिक्षक दिवस समारोह का बदला हुआ अंदाज़ दिखाया है। इस लेख के माध्यम से यह जानने की कोशिश की जा रही है कि सीखने और सिखाने की प्रक्रिया में छात्र/छात्राओं और शिक्षक/शिक्षिकाओं के बीच शिक्षक दिवस मनाए जाने के क्या मायने हैं?

पिछले कुछ बरसों में शिक्षा के क्षेत्र में ढे़रों बदलाव आए हैं। प्राथमिक शिक्षा के व्यावसायिक केन्द्रों यानी निजी स्कूलों और तकनीकी प्रशिक्षण केन्द्रों में विशेषकर आए दिन बच्चों को भांति-भांति के प्रोजेक्ट बनाते और प्रस्तुत करते देखा जा सकता है। शिक्षक दिवस भी एक अवसर है, जिसके उपलक्ष्य में छोटे-छोटे बच्चों को पार्टियों की तैयारी करते देखा जा रहा है। खासकर छोटे-छोटे बच्चों को बड़ी-बड़ी पार्टियों की तर्ज पर अपनी कक्षाओं में केक और कैन्डिल का इंतेज़ाम करते देखा जा सकता है। इस वर्ष पांच सितंबर को मैं खु़द ऐसे अनुभव से होकर गुज़रा, जहां बच्चों के मन में अपने गुरूजनों के लिए अपार उत्साह था। 5 सितंबर को बच्चों में जो उत्साह मैंने देखी, शायद हमारे बचपन के समय में वैसा उत्साह नहीं होता था। यह उत्साह बार-बार मुझे इस दिशा में विचार के लिए प्रेरित कर रहा था शिक्षक दिवस का उत्साह कई मायनों में कृत्रिम है।
कक्षाओं का बच्चों द्वारा सजाया जाना, ब्लैक बोर्ड पर चाॅक से और बाकी दीवारों पर रंग-बिरंगे कागजों की मदद से हैप्पी टीचर्स डे का अंकन नए दौर के अनुरूप अध्यापक और अध्यापिकाओं के लिए संदेश था कि बच्चे उन्हें अपना आदर्श मानते हैं। चाहे वह अध्यापक/अध्यापिका अपने आचार, विचार और व्यवहार में कैसा भी हो। बच्चों की तरफ से होने वाली इस पहल की सबसे सुन्दर बात यह लगी कि उनके मन में अपने अध्यापकों के लिए सम्मान भाव व्यक्त करने में किसी भी तरह का लिंग, जाति, धर्म या क्षेत्र जैसी कोई मान्यता नहीं थी। फिर भी यह देखने में आया कि बच्चों की नज़र में वही अध्यापक/अध्यापिका खास रहे, जो अधिक समय तक उनके साथ रहते हैं। इसमें कम क्षमता वाले क्लास टीचर भी शामिल हैं और वो अध्यापक भी जो अपने विषय संबंधी बच्चों की कमज़ोरियों को दूर करने में बच्चों के सहयोगी की भूमिका में होते हैं।

बहरहाल, शिक्षक दिवस के अवसर पर बहुत से बच्चों को केक, कैन्डिल और गुब्बारों की व्यवस्था करते देखना उत्साहजनक और मन को भाने वाला था। लेकिन सबकुछ के बाद भी कम से कम मेरे लिए यह चिंता का विषय भी था। एक तरफ प्रधानमंत्री बच्चों से सीधे बात कर रहे थे, दूसरी ओर मैं अपनी चिंता को अपने मित्रों के साथ साझा कर रहा था। निश्चित तौर पर मैंने वैचारिक तौर पर खुद को अलग-थलग पाया। इसलिए कि अधिकतर मित्रों की राय यही थी कि बच्चों द्वारा कक्षा में केक और कैन्डिल पाटी करने में कोई बुराई नहीं है। फिर भी कहना पड़ रहा है कि शिक्षा के विमर्श में यह बात शामिल किया जाना चाहिए कि जिन बच्चों के माता-पिता के समक्ष पब्लिक और काॅनवेन्ट स्कूलों की मंहगी शिक्षण व्यवस्था को अपनाए जाने की विवशता है, उन अभिभावकों पर अलग से शिक्षक दिवस जैसे अवसरों पर केक, कैन्डिल और गुब्बारें के साथ उपहार प्रदान करने की परंपरा का थोपा जाना कहां तक उचित है? ऐसी परंपरा को आत्मसात करके और इसे बढ़ावा देकर हमारे शिक्षक/शिक्षिका आदर्श शिक्षक/शिक्षिका का कोई कीर्तिमान कैसे बना सकते हैं?

गौर तलब है कि स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, गांधी दिवस, महिला दिवस, विज्ञान दिवस, मज़दूर दिवस की तरह ही शिक्षक दिवस को एक ऐसे अवसर के रूप में देखे जाने की ज़रूरत है, जब हम उन आदर्शों, मूल्यों, परंपराओं और संस्कारों की याद ताज़ा करते हैं, जिनके बलबूते एक बेहतर समाज की स्थापना और विकास का दमखम पेश किया जाता है। कम से कम भारतीय संविधान में कही गयी बराबरी, न्याय और आज़ादी का मतलब भी यही है कि हम समाज को उस दिशा में ले जाने की कोशिशों में अपना सहयोग दें, जिससे अच्छाई की परिभाषा और परिपाटी मज़बूत होती है। लेकिन अफसोस इस बात का है कि हमारे बच्चों के अंदर शिक्षक दिवस को लेकर जो उत्साह है उसमें पार्टी और उपहार प्रधान तत्व बनते जा रहे हैं। ये वो तत्व हैं जिनका लगाम बाजार के हाथ में है। उदाहरण के तौर पर हम केक, कैन्डिल और पेय पदार्थों की ही बात करें तो बाल्यावस्था में ही बच्चों को यह बोध होना बाज़ार की ही देन है कि ऐसी वस्तुओं के उपभोग के बिना अध्यापकों/अध्यापिकाओं के प्रति उनका सम्मान अधूरा है। एक तर्क यह भी है कि सभी बच्चे थोड़े ऐसा करते हैं। लेकिन ऐसे तर्क संविधान के समतामूलक सिद्धांतों और व्यावहारिक आदर्शों के विपरीत असमानता का बोध कराने वाले हैं। इसे समझने के लिए किसी कक्षा का उदाहरण लिया जा सकता है। एक कक्षा में अलग-अलग जाति, धर्म, क्षेत्र, समाज, समुदाय और आर्थिक पृष्ठभूमि के परिवारों के बच्चे होते हैं। स्कूल की एक छत इन सभी के लिए समान होती है, एक ब्लैक बोर्ड और चाॅक के टुकड़े की उपियोगिता सभी बच्चों के लिए बराबर होती है। ऐसे में जब कुछ बच्चे अपने घरों से केक, कैन्डिल या पेन या अन्य उपहार लाते हैं और कक्षा में अपने प्रिय अध्यापकों/अध्यापिकाओं को देते हैं तो यह स्थिति उन छात्रों/छात्राओं के लिए अत्यधिक कठिन होती है। एक तरफ पूरा कक्षा उनकी आर्थिक कमज़ोरी या परेशानी से अवगत होता है तो दूसरी तरफ कक्षा में उपहारों के लेन-देन वाला वातावरण ऐसे पृष्ठभूमि के बच्चों का मनोबल तोड़ने वाला और उन्हें सीखने की प्रक्रिया में उनके उत्साह को कम करने वाला होता है। ऐसे बच्चों के मन में कुंठा की भावना का विकसित होना सामान्य बात होती है। फिर सवाल यह है कि ऐसा उत्साह बच्चों के किस काम का जो एक छत के नीचे बैठने वाले आधे से अधिक बच्चों को सीखने की उस प्रक्रिया से अलग-थलग कर दे, जहां से उसके व्यक्तित्व विकास की रूपरेखा तय होती है।

कुछ बातें उन शिक्षकों/शिक्षिकाओं और बच्चों की जो उपहार परंपरा में ही सम्मान प्राप्त करने और आशीर्वाद देने के आदी होते जा रहे हैं। समारोह का आयोजन करना और वो भी कक्षा के विभिन्न छात्र-छात्राओं के साथ मिलकर करना निश्चित तौर पर नयी पीढ़ी के बच्चों की क्रियाशीलता और रचनात्मकता को दर्शाने वाला है। लेकिन हमारे बच्चे जिन संस्कारों के वाहक बनाए जा रहे हैं, वह चिंता का विषय है। जिन उपहारों के दम पर हमारे बच्चे अपने अध्यापकों/अध्यापिकाओं के प्रति सम्मान प्रदर्शित करना चाहते हैं, उन्हें यह बताने की ज़रूरत है कि कोई भी सम्मान केक, कैन्डिल, पेय पदार्थ और पेन जैसे उपहारों से नहीं होता बल्कि आचरण और व्यवहार के श्रेष्ठ प्रदर्शन से होता है। यही बात अध्यापकों और अध्यापिकाओं के बारे में कही जा सकती है कि उनका आचरण बच्चों के लिए हमेशा से रोल माॅडल रहा है। हमने भी अपने बचपने में अपने अध्यापक/अध्यापिकाओं की नकल की है। उन मूल्यों को अपनाया है जो हमारे लिए श्रेयस्कर रहे हैं। लेकिन हमें इसके लिए कभी गुरू दक्षिणा के तौर पर न तो कभी पार्टी का आयोजन करना पड़ा और न ही कभी कलम या कोई अन्य उपहार देना पड़ा। मौजूदा दौर में गली-कूचों में खुलने वाले हर उस स्कूल में ऐसी परंपरा को उगते-पनपते देखा जा सकता है, जिसका रिमोट बाज़ार के हाथ में है। दुःख की बात यह है जिन अध्यापकों/अध्यापिकाओं के कंधे पर नयी पीढ़ी को संवैधानिक आदर्शों के अनुरूप शिक्षा के मूल उद्देश्यों को प्राप्त करने की जिम्मेदारी सौंपी गयी है, वो बच्चों से प्राप्त उपहारों में ही एक शिक्षक होने का सम्मान ढ़ूंढ़ते फिर रहे हैं। शिक्षक दिवस की ऐसी कल्पना रखने वाले शिक्षकों और शिक्षिकाओं के लिए यदि शिक्षक दिवस का नाम उपहार दिवस या केक या पार्टी दिवस रख दिया जाता तो बेहतर होता।
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Published in Inquilabi Nazar, Lucknow, 12 September 2014

Wednesday, September 27, 2017

बुनियादी शिक्षा में सुरक्षा के सरोकार: व्यक्ति, समाज और सरकार


शिक्षक दिवस के ठीक दो दिन बाद 8 सितम्बर 2017 अन्तर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस की सुबह हरियाणा के गुरूग्राम स्थित एक प्रतिष्ठित निजी स्कूल में कक्षा दो में पढ़ने वाले एक बच्चे की हत्या हुई। खबरों में यौन अपराध को हत्या का कारण बताया गया। आरोपी बस कन्डक्टर को गिरफ्तार कर लिया गया। अभिभावकों ने बड़ी संख्या में स्कूल के सामने विरोध-प्रदर्शन और तोड़फोड़ करके अपने गुस्से का इजहार किया। स्कूल की प्रिन्सिपल को सस्पेन्ड कर दिया गया और मांग करने वालों ने स्कूल को अविलम्ब बन्द करने की मांग की। विरोध-प्रदर्शन कर रहे अभिभावकों को यह कहते हुए भी सुना गया कि “स्कूल वाले फीस अधिक लेते हैं और बस वालों से उनकी सेटिंग है।” इन सबके बीच शासन प्रशासन अपना काम तो कर ही रहा है। जो सबसे महत्वपूर्ण है, वो यह कि जांच करके एक रिपोर्ट प्रस्तुत करना। जांच में घटना का विवरण, कारण और अन्य जानकारियां हो सकती हैं। फिर भी मुझ जैसे लेखक को महसूस होता है कि इस घटना के प्रकाश में सिर्फ निजी स्कूलों की ही नहीं बल्कि शासन-प्रशासन की भूमिका के साथ-साथ व्यक्ति और समाज की महत्वाकांक्षा की जांच भी हानी चाहिए। क्योंकि इस घटना ने एक तरफ जहां हमें हमारी शिक्षण व्यस्था के दोष से अवगत कराया है, वहीं दूसरी तरफ इस घटना ने शिक्षण व्यवस्था के प्रति व्यक्ति और समाज के दृष्टिकोण और दायित्व को भी उजागर किया है कि आखिर हमारा समाज अपने बच्चों की शिक्षा के लिए किस प्रकार का शिक्षण व्यवस्था तैयार कर रहा है? सवाल यह भी है कि क्या हमारा समाज निजी महत्वाकांक्षाओं वाली व्यवस्था के अधीन खुद को समर्पित कर चुका है या सामूहिक प्रतिनिधित्व वाली लोकतांत्रिक संस्थाओं में नयी संभावनाओं के बीज भी बोना चाहता है।

कोई भी स्कूल अपने समाज की सीमाओं से परे नहीं हो सकता है। इस आलोक में प्रथम दृष्टिया कहा जा सकता है कि स्कूल प्रबन्धन की लापरवाही के कारण ही बच्चे की जान गयी होगी। स्कूल प्रबन्धन और बाल शिक्षा के सिद्धान्तों के अनुरूप स्कूल प्रबन्धन को इस जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता कि वो बच्चे के पारिवारिक पृष्ठभूमि से लेकर उसके समाज और स्कूल के आस-पास के वातावरण आदि का संज्ञान ले और तत्संबन्धी विवरण रखे। ऐसा करने से किसी भी स्कूल प्रबन्धन के पास इस तरह की घटना को टालने की संभावना अधिक होती है। अगर बाल शिक्षा में गाइडेन्स की भाषा में कहा जाए तो स्कूल प्रबन्धन द्वारा इकट्ठा की गयी इस तरह की जानकारी चेक बॉक्स का काम करती है। चूंकि हरियाणा के गुरूग्राम के जिस स्कूल में बच्चे की हत्या की घटना घटी है, वो स्कूल नामी-गिरामी है, इसलिए ऐसे स्कूलों के प्रबन्ध कर्ताओं से ऐसी लापरवाही की उम्मीद नहीं की जा सकती है। वैसे भी निजी स्कूल वाले या कोई भी निजी प्रतिष्ठान अपने स्टॉफ से कम समय और कम पारिश्रमिक में अधिक काम लेने के लिए बदनाम रहे हैं। सरकार भी इस मंतव्य से सहमत है। दिलचस्प यह भी है कि जबसे निजीकरण की बयार चली है तब से कामकाज के इस तरीके को कारपोरेट के साथ-साथ सरकारें भी बढ़ावा दे रही हैं। बहरहाल, ऐसा प्रतीत होता है कि बस चालक स्कूल का स्टॉफ नहीं था और उसकी किसी अध्यापक या अध्यापिका की भांति टीचिंग-लर्निंग का हिस्सा मानकर ट्रेनिंग नहीं की गयी हो। ज्ञात हो सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में बच्चों को माता-पिता और अध्यापक-अध्यापिका के केन्द्र में रखकर शैक्षिक क्रिया-कलाप सम्पन्न होता है। ज़रूरी है कि स्कूल बस (चालक और खलासी के साथ) को संचालित करने वाले व्यक्ति/संस्था को भी माता-पिता और अध्यापक-अध्यापिका की तरह एक छोर पर रखा जाए। सरकारों को इस बिन्दु पर शोधपरक समझदारी विकसित कर इस दिशा में कानून भी बनाने की जरूरत है। ताकि स्कूल जाते हुए बच्चों के परिवेश में जो भी चीजें, व्यक्ति या बातें हों, उन्हें उनकी शिक्षा को प्रभावित करने वाले साकारात्मक अथवा नाकारात्मक कारक के रूप में मान्यता मिल सके। जब ऐसी मान्यता मिल जाएगी तो बस चालक हो या खलासी या सड़क और बाजार, हर व्यक्ति के अन्दर और हर एक स्थान पर बच्चों को एक ऑब्जेक्ट के रूप में देखने का नजरया विकसित होगा। एक ऐसा ऑब्जेक्ट जिसके बारे में कहा जाता है कि बच्चे देश के भविष्य हैं। न जाने कितने गीत और कविताएं इन पर लिखे और गाए गए है। उदाहरण के तौर पर “इनमें मेरे आने वाले जमाने की तस्वीर है.....“, “बच्चे मन के सच्चे.....”, “आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं.....”, “मुझे दुश्मन के बच्चों को पढ़ाना है.....” वगैरह-वगैरह। ऐसे आदर्श सामाजिक परिस्थिति में कोई भी बच्चा “सेक्सुअल एब्यूज“ यानि यौन शोषण या वायलेन्स (हिंसा) का शिकार नहीं होगा।

जाहिर है हम स्कूल से जुड़े विभिन्न व्यक्तियों, कर्मचारियों और संस्थाओं को सीखने-सिखाने के विषय पर निरंतर संवेदीकरण करते रहें तो मुमकिन है कि बच्चों को विभिन्न कारणों से हिंसा का शिकार बनने से बचाया जा सकता है। लेकिन हमें यह भी देखना होगा कि आजादी के बाद से अब तक हमने शिक्षा के क्षेत्र में जो प्रयोग किए गए हैं, उनका प्रभाव क्या पड़ा? खासकर 1991 में जब आर्थिक सुधारों से अनुप्राणित निजीकरण की शुरूआत हुई। निस्संदेह आर्थिक सुधारों ने बुनियादी शिक्षा को निजीकरण के रास्ते पर आगे बढ़ाया है। इसे प्रगति के रूप भी देखा जा सकता है और बुनियादी शिक्षा के पतन के तौर पर भी परिभाषित किया जा सकता है। प्रगति इसलिए क्योंकि बुनियादी शिक्षा में नित नए प्रयोग हुए और माण्टेसरी एवं किण्डरगार्टेन की शिक्षण प्रणाली का विस्तार हुआ। लेकिन दूसरी तरफ इन नए प्रयोगों की आड़ में सरकारों ने बुनियादी शिक्षा में पूंजी की भूमिका को प्रमुखता से स्थापित किया। पूंजी की भूमिका को बढ़ाने का सवाल शिक्षा के बाजारीकरण के सवाल से जुड़ा हुआ है। यह सवाल हमें इस दिशा में विचार करने का अवसर देता है कि एक के बाद एक हमारी सरकारें बुनियादी शिक्षा के तंत्र पर समाज के विविध समुदायों की निर्भरता को कम करने संबंधी नीतियां बनाती रही हैं। शिक्षा का निजीकरण (बाजारीकरण) सरकार के कामकाज के इसी रवैये की अभिव्यक्ति है। कहा जा सकता है कि निजीकरण की नीती में आत्मनिर्भरता का पुट है। यह नीती गुणवत्ता और सेवा की प्रतिबद्धता से ओत-प्रोत है। लेहाजा देश भर में निजी स्कूलों का बड़ा नेटवर्क देखा जा सकता है। जिनके होर्डिंग्स पर क्वालिटी एजूकेशन के एक से एक वादे लिखे रहते हैं। इनके पाठ्यक्रम में महंगी किताबें होती हैं, महंगे अध्यापक/अध्यापिका हो सकते हैं, पूंजी प्रायोजित संभ्रान्त संस्कृति का प्रदर्शन हो सकता है, लेकिन समाजिक सरोकारों का मूल्य, परंपरा और संस्कार के रूप में सर्वथा अभाव रहता है। ऐसी स्थिति पूंजी प्रायोजित शिक्षण संस्थाओं और मानवीय संवेदनाओं के बीच की खाई को बढ़ाने वाली होती है। ऐसे में अमानवीय कुमनोवृत्तियों को समय रहते चिन्हित करना संभव नहीं होता। यदि हरियाणा वाली घटना की बात करें तो इस संभावना से इंकार मुश्किल है कि पूंजी की प्रधानता ने ही स्कूल प्रबन्धन को बस चालक के मन की बात को पढ़ने से वंचित रखा। यह घटना हमें यह सीख भी देती है कि किसी भी स्कूल में वाहन चालक के लिए न्यूनतम शैक्षिक और सामाजिक अर्ह्ता का निर्धारण वक्त की जरूरत है। जिस तरह से रेल के परिचालन के लिए ड्राइवरों के स्वास्थ्य की जांच वगैरह का नियम है, उसी तरह से स्कूल वाहनों के परिचालकों का समय-समय पर सामान्य स्वास्थ्य और मनोवैज्ञानिक परीक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए।

अक्सर ऐसी खबरें भी आती हैं कि ड्राइवर की गलती या लापरवाही से स्कूली वाहन पलट गया, बच्चे घायल हो गए या मर गए। ऐसे मामलों में अभिभावकों का गुस्सा भी देखने में आता है। तोड़फोड़ से लेकर आगजनी सबकुछ पलभर में कर देते हैं। गौरतलब है कि जो अभिभावक अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए नामी-गिरामी स्कूलों में भेजता है। वही अभिभावक अपने बच्चे के साथ कुछ अप्रिय होने पर हिंसक और क्रूर क्यों हो जाता है? यही रवैया निजी नर्सिंग होम या निजी अस्पतालों या निजी प्रैक्टिशनरों के साथ देखा गया है। जब तक गुणवत्ता और सेवा मिलता रहता है, तब तक तो अभिभावक स्कूलों की ओर और तीमारदार अस्पताल की ओर नजर नहीं करते। लेकिन जैसे ही कुछ उन्नीस-बीस होता है, अभिभावक और तीमारदार अपनी नागरिक जिम्मेदारियों को भूलकर हिंसक हो उठते हैं। शायद इसलिए कि अभिभावक और तीमारदार के रूप में हमारी महत्वाकांक्षा उस शिखर पर पहुंच चुकी है, जहां से हमें अपनी वैयक्तिक इच्छाओं के अलावा किसी और के दुःख-दर्द की पीड़ा महसूस नहीं होती है। शायद इन्हीं कारणों और परिस्थितियों के चलते हम अपने बच्चों के लिए पूंजी प्रायोजित स्कूलों को चुनते हैं। जहां मैं, मेरा का बोध ज्यादा होता है और सामाजिक संवेदना का अभाव होता है। दूसरी बात यह कि यदि पूंजी प्रायोजित स्कूल या अस्पताल फीस अधिक ले रहे हैं और उन्हें बच्चों और मरीजों की चिन्ता नहीं है तो हम अपने बच्चों का दाखिला सरकारी स्कूलों में क्यों नहीं कराते? या सरकार पर दबाव क्यों नहीं बनाते कि शिक्षा की पूरी जिम्मेदारी सरकार खुद उठाए।

कुछ लोग यह सुझाव दे रहे हैं कि विद्यालयों में सीसीटीवी कैमरे अनिवार्य कर देने चाहिएं। एडवोकेट जैनेश कश्यप का विचार है कि स्कूल में सीसीटीवी कैमरों को संचालित करने के लिए अलग से एक ऑपरेटर की नियुक्ति करनी चाहिए, जो नित्य प्रतिदिन इसे देखा और जांचा करे। दिनेश चन्द्र राय इण्टर कॉलेज मुहम्मदाबाद में अंग्रेजी के प्रवक्ता रहे हैं। उनकी जिज्ञासा “यह व्यवस्था कौन करेगा?“ का जवाब देते हुए एडवोकेट जैनेश कश्यप अपने फेसबुक वाल पर लिखते हैं कि “यह व्यवस्था विद्यालय प्रशासन को करनी चाहिए। उनके ऊपर अभिभावकों व जिला प्रशासन का दबाव होना चाहिए।”  एडवोकेट जैनेश कश्यप और दिनेश चन्द्र राय की बातों से जाहिर होता है कि अगर स्कूल प्रबन्धन सीसीटीवी कैमरा का बन्दोबस्त करले और इसके लिए एक ऑपरेटर रख ले तो बच्चों के साथ होने वाली आपराधिक घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सकती है। तकनीक के इस्तेमाल से हमारे जीवन में आसानिया पैदा हुई हैं। चूंकि बात एक यौन अपराध के आइने में एक बच्चे की नृशंस हत्या के संदर्भ में हो रही है, तो हमें देखना पड़ रहा है कि तकनीक ने मानव मन को उसकी नैसर्गिक दोष युक्त सोच से मुक्त करने में क्या भूमिका निभाया? इस सवाल पर गौर करने से ऐसा प्रतीत होता है कि हम तकनीक के क्षेत्र में, तकनीक के इस्तेमाल से कामयाबी की तमाम सीढ़ियां चढ़ने के बाद भी मानव मन में साकारात्मक सामाजिक सोच युक्त संवेगों की प्रबल धारा प्रवाहित करने में असफल रहे हैं। इस आलोक में यह सवाल लाजमी है कि किसी स्कूल या प्रतिष्ठान में स्थापित सीसीटीवी कैमरा जैसे किसी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण या यंत्र को ऑपरेट करने वाले की अर्ह्ता (सामाजिक और मनोवैज्ञानिक) की जांच कौन करेगा? ऐसे ऑपरेटरों के लिए न्यूनतम योग्यता का निर्धारण कौन करेगा और इनके लिए जो भी पाठ्यक्रम बनाया जाएगा, उसकी पढ़ाई की फीस कितनी होगी? किन संस्थानों को ऐसी शार्ट टर्म या लान्ग टर्म कोर्स कराने के लिए भारत या प्रदेश सरकारों की ओर से अधिसूचित किया जाएगा? इन सवालों के बीच इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि स्कूलों में कैमरा नहीं होना चाहिए। बिल्कुल होना चाहिए, लेकिन क्या यह उचित होगा कि हम अपने ही समाज के लोगों के साथ अविश्वास के संबंधों को मजबूत करें। क्या ऐसा करना लिंग आधारित विविधता और निजता को बनाए रखने की दृष्टि से उचित होगा? क्योंकि किसी भी बुराई के पीछे बहुत से कारक होते हैं। इनमें सबसे प्रमुख हमारा समाज और समाज में रहने वाले विभिन्न सामाजिक समूहों की सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक, सास्कृतिक परिस्थितियां और गतिविधियां शामिल होती हैं। उदाहरण स्वरूप कई बार माता-पिता हैरान होते हैं कि उनका बच्चा गाली कहां से सीखता है। जब कि न तो उनके स्कूल में गालियां सिखाने की कोई क्लास होती है और न ही घर का कोई सदस्य गाली देता या देती है। यह भी सत्य और तथ्य है कि ज्यादातर गालियां महिला केन्द्रित होती हैं। यानि हम अपने बच्चों से कुछ अच्छा करने की उम्मीद एक ऐसे सामाजिक परिवेश में करते हैं, जहां मर्दानापन यानि पितृसत्तात्मक सोच से अनुप्राणित गालियां और अन्य गतिविधियां होती हैं। जिसका सीधा संबंध शक्ति के दो ध्रुवों से होता है। जो धु्रव अपने आप में मजबूत होता है, वो कमजोर के साथ अन्याय, भेदभाव, अपमान, अनादर, हिंसा और क्रूरता जैसे व्यवहार करता है। अनुभव बताता है कि बच्चे अपने सामाजिक परिवेश में ही गालियां सीखते हैं। जैसे मुहल्ले में खेलकूद के समय, घर से बाहर कहीं आते-जाते समय। गालियां देता कौन है? हमारे-आप जैसे लोग ही गालियां देते हैं। दूसरी तरफ बलवान का बल कहीं न कहीं उसके सामाजिक ढ़ांचे के स्वरूप और उसकी परंपरागत प्रवृत्तियों से अक्षुण्य रहता है। इस उदाहरण का संदर्भ इसलिए भी देना पड़ा है कि हम अकेले कुछ तय नहीं कर सकते हैं। विशेषकर ऐसे समाज में जहां पितृसत्ता और अलोकतांत्रिक मूल्य अभी बहुत मजबूत है। इसीलिए ऐसा मुमकिन है कि जो सीसीटीवी कैमरा स्कूल के कर्मचारियों की निगरानी करने के मकसद से लगा हो, क्या पता उसका उपयोग ऑपरेटर अपने कुंठित भावनाओं को तृप्त करने के लिए करने लगे। इस घटना में ड्राइवर को एक ऐसे ही ऑपरेटर के तौर पर देखा जाए तो अंदाजा होता है कि सीसीटीवी सुरक्षा के साथ-साथ अपने नाकारात्मक प्रभावों में ऐसी हिंसक घटनाओं को जन्म दे सकता है। इसलिए जरूरी है कि पहले हम और हमारा समाज संवेदनशील बने। शिक्षा का दृष्टिकोण विकसित करे। किसी भी सामाजिक-शैक्षिक कार्य में अपनी सहभागिता सुनिश्चित करे। वैसे भी स्कूल-कॉलेज को चन्द कैमरों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है। बल्कि इसके लिए संवेदनशील, समझदार और जिम्मेदार स्कूल प्रबन्धन के साथ-साथ परिपक्व और प्रशिक्षित मानव मन की जरूरत होती है। तब जाकर कहीं बचपन को संवारने और निखाने की साधना पूरी होती है।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया में प्रवक्ता मेरी एक मित्र कंचन जो इस समय यूरोप के बूडापेस्ट में हैं, इस घटना को कर्मचारियों और अन्य स्टॉफ के लिए अलग से टॉयलेट होने और न होने से जोड़कर देखती हैं। वो अपने फेसबुक वाल पर लिखती हैं कि “आम तौर पर जैसे रेजिडेंशियल कॉलोनी में काम करने के लिए आने वाली घरेलू नौकरानियों के लिए कॉलोनी में कोई टॉयलेट नहीं होते और वे किसी घर में चुपके से चली जाती हैं या सभ्य लोगों की रिहाईश के किसी किनारे निपट लेती हैं। ऐसे ही स्कूल में बस ड्राइवर, कंडक्टर, कर्मचारियों के लिए भी बच्चों से अलग कोई अलग टॉयलेट की व्यवस्था नहीं करने की मानसिकता खतरे पैदा करते हैं।... कितना शर्मनाक है लगता है कि हम अपने बच्चों को इन्सानों से डरना सिखाते हैं!!” 

इस संदर्भ में बताना जरूरी मालूम होता है कि जब मैं कहानियों पर शोध प्रबन्ध लिख रहा था, उस समय इकबाल मजीद की कहानी “पेशाब घर आगे है!” पढ़ी थी। कहानी में एक व्यक्ति को पेशाब के दबाव से होकर गुजरना पड़ता है। शहर की भीड़ में सबकुछ है, लेकिन न तो टॉयलेट है और न ही पेशाब के दबाव से उत्पन्न पीड़ा झेल रहे व्यक्ति को किसी दुकानदार की अनुमति है कि उसके दुकान के साइड में या पीछे पेशाब किया जा सके। इकबाल मजीद के कहानी “पेशाब घर आगे है!” का संदर्भ बहुत वृहद हो सकता है। यहां मित्र कंचन और संवेदनशील लेखिका ने इस दिशा में कुछ ऐसा लिखा, जिसको नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। क्योंकि हमारा समाज भी कहीं न कहीं ऐसे दबाव में है, जिससे मुक्ति के लिए कोई रास्ता देना नहीं चाहता। हमें अपने स्वार्थ की पूर्ति करने की लालसा है लेकिन कोई जन सुविधाओं के बारे में गंभीर नहीं है। जो लोग गंभीर हैं, उन्हें भी पूंजी आधारित निवेश और मुनाफा की फिक्र ज्यादा है। फलस्वरूप कमजोर पहचान वालों पर चैतरफा खतरा बढ़ा है। ऐसे में कंचन की टिप्पणी “कितना शर्मनाक है, लगता है कि हम अपने बच्चों को इन्सानों से डरना सिखाते हैं!!” बुनियादी शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वालों की सोई हुई संवेदना को कुरेदने वाली है। इनमें स्कूल प्रबन्धन से लेकर, स्कूल के टीचिंग स्टॉफ, नॉन टीचिंग स्टाफ, किताब बेचने वाले और अभिभावक के रूप में किताब खरीदने वाले सभी शामिल हैं।

वास्तव में पेशाब और शौच शहरों और गांवों दोनों ही जगहों पर एक बड़ी समस्या है। गांव में जहां लोग खुले में शौच करने के अभ्यस्त हैं, उन्हें विभिन्न स्वास्थ्य, संस्कार और स्वच्छता जैसे कारणों के चलते घर के अन्दर शौच करने का अभियान चलाया जा रहा है। फिर भी शाम ढ़लते ही गांव से लगे सड़कों और पगडंडियों के किनारे महिलाओं-पुरूषों की बड़ी संख्या में मौजूदगी चिन्ता का विषय है। उसमें भी कुछ स्वयं सेवक टॉर्च दिखाकर कैमरा से फोटो खींच लें या फिर किसी की बहन-बेटी के साथ अभद्र व्यवहार करें, तो हम-आप जैसे लोग कुछ करने में असमर्थ होते हैं। क्योंकि यहां भी डर और खौफ निजता के सवाल पर भारी पड़ता है। यह तो आउटडोर का मामला है। यदि “क्राइम इन इण्डिया” का संदर्भ लें तो ज्यादातर आपराधिक घटनाएं इनडोर यानि घर-मकान के अंदर होती हैं। ऐसी घटनाओं को अंजाम भी वही लोग देते हैं, जिनका संबंध बहुत करीब का होता या फिर जो परिचित और विश्वासी होते हैं। जाहिर है हम और हमारे समाज की सांसे तकनीक के सहारे नहीं चल सकती हैं। तकनीक का इस्तेमाल पीड़ित को राहत पहुंचाने के लिए करना ठीक है। तकनीक का इस्तेमाल किसी आम इंसान विशेषकर महिला, बच्चा, गरीब, पिछड़ा, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक वगैरह कमजोर पहचान वाले व्यक्तियों को हिंसा और यातना देने के लिए करना ठीक नहीं है। तकनीक के इस्तेमाल की पहली शर्त पूंजी है। पूंजी मजबूत लोगों के पास है या मजबूत लोगों का पूंजी पर नियंत्रण है। ऐसे में अगर सीसीटीवी कैमरे जैसे यंत्रों से स्कूल और समाज के संभ्रान्त वर्ग को ही सुरक्षा प्रदान किया जा सकता है। एक और मित्र महेन्द्र सिंह के फेसबुक वाल के माध्यम से गाजियाबाद स्थिति इन्दिरापुरम के एक स्कूल प्रबन्धन की बच्चों की सुरक्षा संबंधी चिन्ता का संज्ञान हुआ है। महेन्द्र सिंह जी ने अपने वाल पर स्कूल द्वारा भेजी गयी चिट्ठी पर लगाया है और स्कूल प्रबन्धन के संवेदनशील होने की बात कही है। 

जाहिर है इस पूरे प्रकरण में बच्चों की सुरक्षा ही चिन्ता का विषय है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि गुरूग्राम का मामला एक स्कूल का मामला नहीं, बल्कि पूरे देश का मामला है। इस संदर्भ में सभी राज्य सरकारों को नोटिस भी जारी की गयी है। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम सराहनीय है। लेकिन गौर करने का विषय यह है कि क्या सुप्रीम कोर्ट के बयान और राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर देने भर से बच्चों के साथ होने वाली आपराधिक घटनाओं पर लगाम लगाया जा सकता है? मौजूदा दौर में जिस तरह से सरकारों ने शिक्षा के क्षेत्र में पूंजी निवेश को बढ़ावा दिया है, उससे शिक्षा के न सिर्फ दो मॉडल, निजी और सरकारी दिखाई देते हैं, बल्कि विकास का निजी मॉडल देश के बहुसंख्यक परिवारों के बच्चों के लिए निराशा पैदा करने वाला रहा है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट और सरकारों को इस दिशा में भी विचार करने की आवश्यकता है कि हमारे तंत्र में ऐसा क्या है कि निजी मॉडल में कुछ होता है तो उसकी गूंज सत्ता के गलियारों से लेकर सुप्रीम कोर्ट हर जगह सुनाई देती है। वहीं दूसरी तरफ किसी पांच साल की बेटी का बलात्कार होने पर भी सत्ता के पुराधाओं और सुप्रीम कोर्ट के कान पर जूं तक नहीं रेंगती है। ऐसा प्रतीत होता है कि हमारी सरकारों और संविधान द्वारा स्थापित लोकतांत्रिक संस्थाएं जैसे स्कूल-कॉलेज और अस्पताल आदि को पतन के रास्ते पर जानबूझ कर ढ़केला जा रहा है। यदि ऐसा नहीं होता तो सरकार शिक्षा पर बजट बढ़ाने और सरकारी स्कूलों के प्रसार की दिशा में काम करती, न कि अपने ही देश के बच्चों को पूंजीपतियों के रहमों करम पर छाड़ने के लिए सरकारी स्कूलों को हतोत्साहित करने वाले कानून बनाती। यदि वास्तव में सरकार और सुप्रीम कोर्ट को लगता है कि जो बच्चे यौन हिंसा या बलात्कार जैसे किसी घटना का शिकार बन रहे हैं तो कार्यपालिका और न्यापालिका को शिक्षा शास्त्र के सिद्धान्तों को मद्दे नजर रखते हुए शिक्षा और समाज को एक समन्वित इकाई के तौर पर मान्यता देना चाहिए। जिसमें इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया जाना चाहिए कि हर बच्चा देश के लिए महत्वपूर्ण है और बच्चों की शिक्षा सिर्फ मां-बाप और अध्यापक-अध्यापिका की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि उस समाज की भी जवाबदेही है जहां बच्चा आने-जाने, खेलने-कूदने जैसे विविध गतिविधियां करता है। जिन अभिभावकों को अपने बच्चों के साथ हिंसात्मक आपराधिक घटनाओं की पीड़ा झेलनी पड़ रही है, उन्हें निजी स्कूलों के खिलाफ सरकारी सरकारी स्कूलों की बेहतरी के लिए आवाज उठानी चाहिए। ऐसे लोगों की आवाज में समाज के शिक्षित और जागरूक लोगों की आवाज भी मिलनी चाहिए। समाज के बेस्ट प्रैक्टिसेज को प्रचारित और प्रसारित करना समाज में आगे बढ़ चुके लोगों का नैतिक और सामाजिक दायित्व होना चाहिए। यदि “कॉरपोरेट सोशल रिस्पान्सिबिलिटी” मुमकिन है तो यह भी मुमकिन है कि “पीपल्स एजूकेशनल रिस्पॉन्सिबिलिटी” जैसी किसी युक्ति को लागू किया जाए। तब जाकर समाज में शिक्षा की दृष्टि पैदा होगी और बच्चों का बचपन सही मायनों में संवारा जा सकेगा। वरना टेक्नोक्रेसी का उफान और कमजार हो रहे लोकतांत्रिक मूल्य न सिर्फ बुनियादी शिक्षा के लिए खतरे पैदा करने वाले हैं, बल्कि मानव मन की विकृतियों को दिनों दिन बढ़ाने वाले हैं, जो संविधान में उल्लिखित लोकतांत्रिक आदर्शों के अनुरूप समाज के दीर्घकालिक हित में नहीं है।

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Thursday, June 15, 2017

दोहरी शिक्षा व्यवस्था और आहत अभिभावक


निजी विद्यालयों द्वारा मनमाना फीस लेना अभिभावकों पर भारी पड़ रहा है। पिछले लगभग एक दशक में देश के विभिन्न क्षेत्रों विशेषकर यू.पी., बिहार और दिल्ली जैसे राज्यों में बढ़ती फीस के खिलाफ अभिभावकों में अच्छा-खासा रोष देखा गया है। खास बात यह है कि यह रोष किसी मौसमी बीमारी की तरह प्रवेश के समय ही देखा गया है। जिस तरह से गर्मी शुरू होते ही पारा चढ़ने लगता है, उसी तरह मार्च का महीना करीब आते ही फीस वृद्धि की खबरें अखबारों की सुर्खियां बनने लगती हैं। फीस वृद्धि से संबन्धित खबरों में निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावकों की पीड़ा इस तरह से बयान होती है जैसे नयी बीमारी के बाद कोई व्यक्ति खून उगल रहा हो। कहना नहीं है कि निजी विद्यालयों में फीस के साथ-साथ किताबों और समय-समय पर भुगतान की जाने वाली अन्य शुल्क का बोझ भी अभिभावकों की जेब पर भारी पड़ रहा है। यही कारण है कि निजी विद्यालयों में अपने बच्चों का भविष्य संवारने का सपना सजोने वाले मां-बाप नयी व्यवस्था के चरित्र से कराह रहे हैं। गौर तलब है कि निजी स्कूलों में फीस वुद्धि के मुद्दे का समय-समय पर सरकारों ने भी संज्ञान लिया है और अपनी तरफ से उचित कदम उठाने का आश्वासन दिया है। निजी विद्यालयों में फीस की अधिक दर संज्ञान लिया जाना और तत्संबंधी उपचार पर विचार करना अच्छी पहल है। लेकिन कुछ सवाल हैं, जिन पर विचार ज़रूरी है। पहला यह कि जो लोग फीस वृद्धि से त्रस्त हैं वे समाज के किस वर्ग से संबंध रखते हैं? दूसरा यह कि क्या वास्तव में फीस वृद्धि स्कूल जाने वाले बच्चों की बहुसंख्यक आबादी और अभिभावकों का मुद्दा है? तीसरा यह कि यदि फीस वृद्धि बहुसंख्यक बाल आबादी और ऐसे बच्चों के माँ-बाप के लिए मुद्दा है तो ऐसे अभिभावक मनमानी फीस वसूलने वाले निजी स्कूलों का परित्याग कर अपने बच्चों को परिषदीय या निकाय द्वारा संचालित स्कूलों में दाखिला क्यों नहीं कराते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि फीस वृद्धि का मामला चन्द लोगों का मामला हो और इसे आम जनता की समस्या बनाकर पेश किया जा रहा हो। कहीं ऐसा तो नहीं कि यह समस्या उस वर्ग विशेष का है, जो नौकरी पेशा है, या व्यापारी है, या शिक्षा के प्रति किसी हद तक जागरूक है। दो टूक शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि यह समस्या उस वर्ग की है, जो उपभोक्तावाद को बढ़ाने में पूंजीपतियों के साथ खड़ा है लेकिन नागरिक अधिकारों का उल्लंघन होने पर पूंजीवाद का वैचारिक और
सैद्धांतिक विरोध नहीं करता। बल्कि अपने हित को सबके हित से जोड़कर फीस वृद्धि जैसी समस्या को सामूहिक समस्या के रूप में व्याख्यायित करता है। जबकि स्कूल शिक्षा के बारे में कम से कम उत्तर प्रदेश के संदर्भ में
एन.सी.ई.आर.टी. के आठवें अखिल भारतीय शैक्षिक सर्वेक्षण के अनुसार सरकारी, निकाय द्वारा संचालित,
सहायता प्राप्त निजी और गैर सहायता प्राप्त निजी प्राथमि स्कूलों का अनुपात क्रमशः 76, 4, 2, 18 प्रतिशत है। अर्थात उत्तर प्रदेश में सरकारी प्राथमिक और निजी प्राथमिक स्कूलों का अनुपात 80 और 20 प्रतिशत है।

ये आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में अभी भी बाल आबादी का बड़ा हिस्सा प्राथमिक शिक्षा के लिए सरकारी विद्यालयों पर निर्भर है। पिछले दो दशकों में ये भी हुआ है कि मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग के साथ-साथ गरीब और अभावग्रस्त जीवन व्यतीत करने वाले लोगों का एक बड़ा हिस्सा सरकारी स्कूलों से विमुख हुआ है। फिर भी सरकारी स्कूलों का आस्तित्व गरीब, पिछड़े, दलित, महिला और पसमांदा समाज के लोगों के लिए डूबते को तिनके का सहारा से कम नहीं। बावजूद इसके इस आलेख के माध्यम से सरकारी स्कूलों से विमुखता की वास्तविकता को जानने की कोशिश की जा रही है। क्योंकि सरकारी स्कूलों से मोह भंग होने के पक्ष में जो सबसे बड़ी दलील दी जाती है वो ‘गुणवत्ता’ है। ज़रूरी है कि गुणवत्ता को भी समझा जाए। क्योंकि “गुणवत्ता“ का संबंध फीस वृद्धि से है। बल्कि यह कहा जाना चाहिए कि “गुणवत्ता“ नव उदारवादी आर्थिक सुधारों के पिटारे से निकला ऐसा जिन्न है, जो जीवन के हर क्षेत्र में हमारा पीछा कर रहा है। देश की अर्थ व्यवस्था में ढ़ांचागत बदलाव को परिलक्षित करने वाले इस जिन्न से बुनियादी शिक्षा का ढ़ांचा भी अछूता नहीं रहा है। इसे अंग्रेजी में “क्वालिटी“ कहते हैं। इसके साथ “सर्विस“ का होना भी लाजमी है। आर्थिक सुधारों से अनुप्राणीत हर काम में इन दो तत्वों का होना अपरिहार्य है। लिहाजा शिक्षा के क्षेत्र में भी इन दो तत्वों की तलाश शुरू हुई। आर्थिक सुधारों को प्रचारित और प्रसारित करने में तीसरा तत्व “प्रतिस्पर्धा“ का रहा है। शायद बुनियादी शिक्षा के क्षेत्र में इन तीन मिथकों को स्थापित करना जरूरी था और इसीलिए क्वालिटी, सर्विस और कम्पटीटीवनेस को बढ़ावा देने वाले स्कूलों की नई प्रथा शुरू हुई। इन्हें पब्लिक और काॅनवेन्ट स्कूलों की परिपाटी के रूप में भी देखा जा सकता है। जब ये स्कूल अपने शुरूआती दौर में थे उस समय अखबारों की सुर्खियों में “गली-गली कुकुरमुत्ता की तरह ..... पब्लिक स्कूल” खबर प्रकाशित होती थी। दो-ढ़ाई दशक गुजरने के बाद अब अखबारों की सुर्खियों में “निजी स्कूलों की मनमानी से ........ अभिभावक परेशान“ या “अभिभावकों ने किया प्रदर्शन....“ आदि खबरें प्रकाशित होती हैं। इसे एक शिफ्ट के रूप में देखे जाने की जरूरत है। पिछले लगभग पच्चीस वर्षाें में समाचार की सुर्खियों में इस तरह के बदलाव से अंदाजा होता है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था एक बड़े बदलाव से गुजर चुकी है। बदलाव की हज़ारों अनकही कहानियां हैं। कुछ एक का संदर्भ लेने पर चित्र और स्पष्ट हो जाता है कि जो सरकारी स्कूल बुनियादी शिक्षा की रीढ़ की हड्डी हुआ करते थे, आज वही स्कूल खिचड़ी, वजीफा और किताबों, शिक्षा मित्रों की बहाली, शिक्षकों का स्थानान्तरण, छुट्टियां वगैरह से पहचाने जा रहे हैं।
 संदर्भ के तौर पर बाबूजी के बारे लिखना ज़रूरी हो जाता है। “हमारे पड़ोस के विजय बाबूजी अपने ज़माने के ग्रेजुएट की योग्यता रखते हुए ही भारतीय रेल को न भूलने वाली सेवाएं दीं। बाबूजी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन रिटायरमेन्ट के बाद उन्होंने जिन बच्चों को अपने बरामदे में बैठाकर अंग्रजी पढ़ाई वो बच्चे उन्हें आज भी याद करते हैं। बाबूजी से अंग्रेजी पढ़ने वाले बच्चों को तो मालूम भी नहीं है कि बाबूजी की शैक्षिक योग्यता क्या थी? या बाबूजी किस सर्विस में थे? या तमाम उम्र रेलगाड़ी में हिचकोले खाने वाले बाबूजी को अंग्रेजी ग्रामर से कब दिलचस्पी हुई, उन्होंने कैसे पढ़ाई की वगैरह-वगैरह...। ऐसे ही व्यक्तित्व के मालिक थे स्व॰ श्री जगदीश चन्द्र श्रीवास्तव। जिन्होंने नायब तहसीलदार पद से रिटायर होने के बाद मेरे जैसे बहुतों को उर्दू और फारसी की सीख दी। कहते थे कि अपने जीवन में 40000 बच्चों को पढ़ाया है। गौर करने का मोकाम है कि सर्विस पीरियड में पहले के लोग चाहे किसी भी विभाग में हों, सीखने-सिखाने के संदर्भ में पढ़ाई के लिए तत्पर रहते थे। दादा जी, जिनका असल नाम हमीद खाँ था। सदर रोड स्थित डाॅ॰ फतह मुहम्मद के क्लिनिक में हर सुबह-व-शाम बैठकी करने वालों में एक नाम तौकीर अहमद खाँ वकील का है, जिनकी उम्र 84 वर्ष हो चुकी है। तौकीर अहमद खाँ दादा जी को अपना बहनोई समझते हैं। उन्होंने बताया कि दादा जी का परिवार तातारी पठानों से ताल्लुक रखता है। दादा जी के बारे कहा जाता है कि वो अंग्रेज़ों के ज़माने के दारोगा थे। उन्होंने जितने दिन नौकरी की, उससे कहीं अधिक दिनों तक पेन्शन उठाई। गुलाम हिन्दुस्तान में दारोगा रहे दादा जी की क्वालीफिकेशन तौकीर अहमद खाँ वकील के मुताबिक 10वीं पास की थी, लेकिन उर्दू शेर की उनकी समझ और परख ने उन्हें गे्रजुएशन के छात्र/छात्राओं का उस्ताद ज़रूर बना दिया। उस पर तुर्रा ये कि वो फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते थे। उनके मुंह से अंग्रेजी सुनकर ऐसा मालूम होता था कि हमारे बीच कोई अंग्रेज आ बैठा है।“ तौकीर अहमद खाँ वकील की बातों पर यकीन करें तो अंग्रेजी की ही बदौलत दादा जी को पहली बार हवलदार की नौकरी मिली थी। लेकिन अब जबकि हम आधुनिकता की बिसात पर कई कदम आगे निकल आए हैं तो “क्वालिटी, सर्विस और प्रतिस्पर्धा“ की चुनौतियों से प्रतिदिन जूझना पड़ रहा है। बाबूजी और दादाजी के जमाने की शिक्षण पद्धति अब बीते दिनों की बातें मालूम होती हैं। बुनियादी शिक्षा का परिदृश्य कुछ ऐसा है कि कदम-कदम पर पैसे की मांग बढ़ी है। बात फीस की ही नहीं है। काॅपी-किताब और डेªस से लेकर आए दिन विभिन्न प्रकार के प्रोजेक्ट और अन्य गतिविधियों के नाम पर खर्च होने वाले पैसे की भी है। पहले एक किताब से एक के बाद एक कई बच्चे पढ़ाई कर लिया करते थे। लेकिन अब प्रतिवर्ष किताबों का बदल जाना अभिभावकों की जेब पर भारी पड़ रहा है। डेªस का भी मामला कुछ ऐसा ही है। लेकिन यह खर्च 20 प्रतिशत स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावकों के लिए ही समस्या है। बाकी बच्चे तो आज भी परिषदीय या नगर निकाय द्वारा संचालित प्राथमिक विद्यालयों पर निर्भर हैं। ज़ाहिर है बुनियादी शिक्षा में सरकार की भूमिका को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता है। यदि सरकार चाहे तो सरकारी स्कूलों का कवरेज बढ़ाने के लिए उपाय कर सकती है। जैसे प्राथमिक स्तर पर किताबों की कोई एक नीति बनाना। सभी विद्यालयों को इस बात के लिए प्रोत्सहित करना की सरकारी किताबें ही पढ़ाएं। कहीं भी गैर सरकारी किताबें पढ़ाए जाने पर उचित अनुशासनात्मक कार्यवाही करना आदि। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि किताबों की प्रिन्टिंग की जिम्मेदारी सरकार खुद ले और समय पर किताबों की छपाई और स्कूलों तक किताबों को पहुंचाना सुनिश्चित करे। चूंकि हम लोकतंत्र में रह सकते हैं और शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका को सुनिश्चित करना किसी भी कल्याणकारी राज्य में सरकार का दायित्व समझा जाता है। लेहाज सरकार से किताबों की अपेक्षा रखने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए। जिन लोगों को सरकारी किताबों के पृष्ठ गन्दे, पुराने और घटिया किस्म के लगते हैं, वो लोग निश्चित तौर पर संभ्रान्त कहे जाने चाहिए। ये वही लोग हैं जो अपने बच्चों की प्राथमिक शिक्षा के लिए निजी की व्यवस्था चाहते हैं। जिसके लिए कोई भी मूल्य जैसे डोनेशन और फीस की अधिक रकम आदि अदा करने के लिए तैयार रहते हैं। लेकिन फीस वृद्धि की समस्या का समाधान सरकार से चाहते हैं। ऐसे लोग अपने बच्चों को बेशक क्वालिटी, सर्विस और प्रतिस्पर्धा के नाम पर निजी स्कूलों में पढाते हैं। ये लोग अपने बच्चों को बी.एड., इंजीनियरिंग, मेडिकल और किसी अन्य डिसिप्लीन/विषय में स्नातक व परास्नातक स्तर की पढ़ाई के लिए सरकारी काॅलेजों/संस्थानों को प्राथमिकता सूची में ऊपर रखते हैं लेकिन सरकारी प्राइमरी स्कूलों में नहीं पढ़ाने चाहते हैं? सवाल लाज़मी है कि ऐसा क्यों है? यदि अपवाद स्वरूप निम्न मध्यम वर्ग, एवं मजदूर, किसान, गरीब दलित, पिछड़ और पसमांदा परिवारों के चन्द बच्चों को छोड़ दिया जाए तो फीस की बड़ी रकम या फीस वृद्धि वाकई संभ्रान्त वर्ग की समस्या है, जिसे बार-बार सामूहिक समस्या के तौर पर पेश किया जाता है।
सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि सरकारी स्कूलों में अपने मूल मंतव्य से हट गए हैं। कम से कम मेरे लिए यह सवाल परेशानी का सबब ज़रूर है कि जिन परिषदीय और निकाय द्वारा संचालित स्कूलों को खिचड़ी और घटिया डेªस के लिए बदनामी का दंश सहना पड़ता है, वहां शत-प्रतिशत शिक्षित और प्रशिक्षित अध्यापक/अध्यापिका हैं। बावजूद इसके व्यवस्थागत दोष के चलते सरकारी विद्यालय योजनाओं के क्रियान्वयन का प्रयोगशाला बने हुए हैं। ऐसे में निजी विद्यालय गुणवत्तापरक शिक्षण व्यवस्था के चैम्पियन बने हुए हैं। मौजूदा हालात ऐसे हैं कि निजी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना जुनून बनता जा रहा है। यह भी देखा जा रहा है कि क्वालिटी और सर्विस के नाम पर मध्यम वर्ग के साथ-साथ शिक्षा के प्रति नवजागरूक निम्न मध्यम एवं निम्न वर्ग का भी एक बड़ा हिस्सा अपना सबकुछ लुटाने को आतुर है। चूंकि हम लोकतांत्रिक गणराज्य के नागरिक हैं और हम लोग नागरिकता के अधिकार के साथ-साथ अपने कर्तव्य से बंधे हैं। इस आलोक में किसी निजी स्कूल या उसके कामकाज के तौर-तरीकों का विरोध यहां मकसद नहीं है। लोकतंत्र इस बात की आज़ादी देता है कि लोग अपने पसंद के शिक्षण संस्था चला सकते हैं, अपने बच्चों का अपने पसंद की शिक्षा दे सकते हैं। लेकिन लोकतंत्र में पूंजी नियोजित निजी स्कूलों की श्रृंखला को मजबूत करना सर्वथा अनुचित है। क्योंकि शिक्षा का निजिकरण और बाजारीकरण समाज के अभिवंचित तबकों के लिए वंचना की नयी शुरूआत कर सकती है। दिलचस्प है कि गरीबों को प्राथमिक शिक्षा की वंचना से बचाने के लिए 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के अन्तर्गत निजी स्कूल में 25 प्रतिशत गरीब बच्चों का दाखिला सुनिश्चित करने का उपबंध किया गया है। ऐसा सुनने में आया है कि कई निजी स्कूल अपने यहां दाखिला देने में आनाकानी कर रहे हैं। बहरहाल, अगर बड़े स्कूलों में दाखिला मिल भी जाए तो इन 25 प्रतिशत गरीब बच्चों के लिए संभ्रांत संस्कृति को वहन करने का खर्च उठा पाना मुश्किल होगा। ऐसे में गरीब बच्चों का मनोबल टूटेगा और उनकी स्थिति न इधर की न उधर की रहेगी। क्यों न संभ्रांतों के लिए ही सरकारी प्राथमिक स्कूलों में सीट सुरक्षित कर दिया जाए। एक बार कोर्ट ने ऐसा निदेश दिया भी था कि सरकारी अधिकारी अपने बच्चों का सरकारी स्कूलों में पढ़ाएं। लेकिन लोकतंत्र पसंद और नापसंद करने की आज़ादी देता है। लिहाजा इस आइडिया को छोड़कर ही बात की जानी उचित है। पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पड़ोस में शिक्षा प्राप्त करने की अवधारणा को लागू करने संबंधी एक शासनादेश जारी किया गया। जिसके अनुसार यदि सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में किसी कक्षा में 30 बच्चों की संख्या पूरी हो जाती है तो इसके बाद के बच्चों का दाखिला नजदीक स्थित निजी स्कूल में कराया जाए। इस तरह के उपाय करके सरकारें अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हुआ मान लेती हैं। ऐसे कानूनी प्रावधान और शासन के आदेश से ज़ाहिर है कि सरकारें शिक्षा के निजीकरण, व्यावसायीकरण और बाजारीकरण के सवाल पर खामोश हैं? सरकार की खामोशी बताती है कि शिक्षा उनके एजेण्डे में प्राथमिकता सूची में बहुत नीचे है। शायद यही वजह है कि सरकारें फीस वृद्धि पर बयान जारी करके वाह-वाही तो बटोरती हंै, लेकिन फीस को नियंत्रित करने या शिक्षा पर बजट बढ़ाने का निर्णय नहीं करती हैं।
कहना पड़ रहा है कि सरकारी और निजी स्कूल प्रबंधन की बहस में प्राथमिक शिक्षण व्यवस्था दुर्दशा का शिकार हुआ है। क्योंकि सरकारी विद्यालयों से पढ़े पिछली पीढ़ी के व्यक्ति ही आज की तारीख में देश के उच्च पदों पर आसीन हैं। ऐसे अधिकारी और राजनेताओं की संख्या कम नहीं है जिन्होंने प्राथमिक शिक्षा सरकारी स्कूलों में प्राप्त किया है। फिर अचानक से सरकारी स्कूल स्तरहीन कैसे हो गए? दर असल यह सब अचानक नहीं हुआ। इसके पीछे दो दशक का समय लगा है। वो समय जिसका एक-एक लम्हा अधिशेष मुनाफा, शार्टकट और उपभोक्तावादी सोच को आगे बढ़ाने में खर्च किया जाता रहा है। इस सोच को पोषण देने और पल्लवित करने में खुद सरकार का योगदान भी रहा है। सर्व शिक्षा अभियान का दम भरने वाली सरकार के पास उपलब्धि के नाम पर नामांकन और नए विद्यालयों की संख्या में वृद्धि के अलावा कुछ और नहीं है। सरकारी स्कूलों से विमुख होते लोगों के कदम को रोकने के उपाय नहीं हैं। हो भी कैसे, सरकार की अपनी जिम्मेदारियों में शिक्षण संस्थाएं महज कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन का प्रयोगशाला बनकर रह गए हैं। गुणवत्ता की बात होती है, तो माॅडल स्कूलों और सीबीएसई बोर्ड की तर्ज पर पढ़ाई की बातें अखबारों की सुर्खियां अवश्य बनती हैं। लेकिन शिक्षकों की कमी पर ध्यान नहीं जाता है। तदर्थ शिक्षकों को स्थायी करना और नयी नियुक्तियां भी समानान्तर जारी रहती हैं, लेकिन विद्यालयों की आवश्यकताओं का सही आंकलन या तो किया नहीं जाता है, या फिर किया भी जाता है, तो समय रहते विद्यालयों की ज़रूरतों को पूरा करना शिक्षा महकमे के कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए टेढ़ी खीर होती है। 
फीस वृद्धि पर बहस जारी है। लेकिन सरकार के कंधे पर प्राथमिक शिक्षा खुद बड़ी बोझ बन गयी है। कहना पड़ रहा है कि सरकार ने बुनियादी शिक्षा को कानूनन मौलिक अधिकार बना तो दिया लेकिन शिक्षा पर खर्च होने वाले बजट के सवाल पर सरकार का मौन प्राथमिक शिक्षा के निजीकरण को बढ़ाने वाला है। एक वजह यह भी है कि इन दिनों गांव-कस्बे के लोग मतवाले की तरह प्राइवेट स्कूलों की ओर भाग रहे हैं। बल्कि भगाए जा रहे हैं। सरकार द्वारा अपना गुडविल न बनाकर निजी स्कूलों के कामकाज के तरीकों को अपनाना सरकारी स्कूलों को किसी हद तक खिचड़ी वाले स्कूलों की छवि से बचा तो सकते हैं। लेकिन शिक्षा के निजीकरण के सवाल पर सरकार की चुप्पी निजी स्कूलों में आम लोगों का भरोसा बढ़ाने वाली है। इनमें बड़ी संख्या में वो लोग भी हैं, जो पेशे से मज़दूर है, किसान हैं और मामूली दुकानों के मालिक हैं, जिनकी आजीविका किसी प्रकार चल जाती है। ये वो लोग हैं, जिनके घर का छप्पर हर बारिश में रिसने लगता है।
बहरहाल, इस स्थिति से उबरना भी ज़रूरी है। इसके लिए कई स्तरों पर कोशिश की जाने की ज़रूरत है। पहला यह कि सरकार को शिक्षा पर बजट बढ़ाना होगा। बजट बढ़ने का सीधा अर्थ है कि शिक्षक-छात्र अनुपात ठीक होगा और विद्यालयों का आन्तरिक वातावरण सुधरेगा। बात भवन की हो, पुस्तकों की हो, शिक्षा का स्तर एक बार फिर से सुधर सकता है। और जिन निजी विद्यालयों से प्रतिस्पर्धा करना है उन विद्यालयों की शिक्षण स्तर को बनाए रखा जा सकेगा। आखिर केन्द्रीय विद्यालय, सैनिक विद्यालय, नवोदय विद्यालयों की श्रृंखला सरकार ही तो संचालित करती है। फिर सरकारी स्कूल क्यों नहीं?
इस कार्य में जो बड़ी बाधा है वो है जनमानस का। जो जनमानस निजी विद्यालयों की फीस की बड़ी रकम में कुछ रियायत पर मान जाता है उसको अपना नजरिया बदलना होगा। वो चाहे तो सरकारी विद्यालयों में गठित होने वाले विद्यालय प्रबंधन समिति का हिस्सा बनकर शिक्षण के स्तर में सुधार की संभावनाएं बना सकता है। शार्ट कट और महंगे स्कूलों के रथ पर सवार होकर लक्ष्य तक पहुंचने का सपना छोड़ना होगा। क्योंकि बच्चों को बुनियादी शिक्षा चाहिए, न कि बाज़ार की उपभोक्तावादी संस्कृति। बच्चों को नम्बर एक पे देखने की हसरत त्यागनी होगी। सबसे महंगे स्कूल में पढ़ाने की ख्वाहिश भी छोड़नी होगी। यदि ऐसा होता है तो निश्चित ही शोषक चरित्र वाले निजी विद्यालयों से निजात मिलेगी। और निःशुल्क बच्चों को गुणवत्तापरक शिक्षा मिल सकेगी। बच्चा सरकारी स्कूल में पढ़े या निजी स्कूल में समाज में स्टेटस मेन्टेन करना अभिभावक के लिए कोई चुनौती नहीं होगी।
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