Monday, April 13, 2020

मुश्किल वक्त के इन साथियों को भी सलाम

ये वो लोग हैं, जो दूसरों के लिए अपने घरों से बाहर रहते हैं। हमारे-आपके बीच आते-जाते रहते हैं। लेकिन हमेशा से अदृश्य रहे हैं। ये लोग मज़दूर हैं, मजबूर हैं और शिक्षा से दूर हैं। ये वो लोग हैं जो अपनी सेवाएं उपलब्ध कराने की एवज में फोटो नहीं खिंचाते। इन लोगों के लिए भी आभार, धन्यवाद और सैल्यूट तो बनता ही है।

इन दिनों पूरा देश कोविड-19 के संक्रमण के फैलाव को रोकने के लिए लाॅकडाउन की आपात स्थिति में है। संक्रमण लगातार बढ़ रहा है। हज़ारों लोग कोरैंटीन और आइसोलेसन में हैं। बहुत से लोग ऐसे हैं, जो संक्रमित नहीं हैं। लेकिन ज़रा सी चूक इन्हें संक्रमण का शिकार बना सकती है। इनमें गरीब, मज़दूर, किसान हैं। बड़ी तादाद उन सुविधा प्रदाताओं की है, जिनका ठेला हर रोज़ हमारे घरों की दहलीज पर आ खड़ा होता है। कभी ‘सब्जी वाला, कभी साग वाला, कभी आलू, प्याज और टमाटर वाला बनकर। इनमें फल विक्रेता होते हैं। जो हमारे-आप के लिए कभी अमरूद ले आते हैं, कभी तो केला, सेव और सन्तरा। हम इन्हें चाट वाले, चाय वाले, चाउमिन वाले, चनाचूर वाले, फुल्की वाले, भुजा वाले और सोन पापड़ी वाले के रूप में भी देखते हैं। ये वही लोग हैं जो अपनी सेवाएं हम तक हर रोज़ पहुंचाते हैं। इन्हें पैदल, गली-गली घूमना पड़ता है। ताकि दो जून की रोटी का जुगाड़ हो सके। सामान्य दिनों में चिलचिलाती धूप में खीरा, तरबूज़ और कुल्फी की ठण्डक का एहसास इन्हीं लोगों की बदौलत कर पाते हैं। गर्मी के दिनों में जब लू से बचने के लिए लोग अपने-अपने घरों में पंखे, कूलर और एसी कमरों में होते हैं, तो ये लोग सड़कांे और गलियों की ख़ाक छानते रहते हैं। बीमार पड़ने पर दस-बीस रूपए की स्वास्थ्य सुविधाओं से काम चलाना पड़ता है। दो-चार दिन काम बंद हो जाए तो इनके सामने भूखे रहने की भी परिस्थितियां पैदा हो जाती हैं। इस समय पूरा देश लाॅकडाउन की आपात परिस्थिति में है। रोज़ कमाने-खाने वाले इन अस्थाई ठेले वालों के लिए यह परिस्थिति किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। सोशल और फिजिकल दूरी बनाए रखना, बार-बार हाथ धुलना, फेस मास्क का इस्तेमाल इनके लिए सहज काम नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि संक्रमण का डर इन्हें नहीं है। लेकिन रोज कमाने-खाने की दिक्कतें ऐसी हैं कि यह डर कोई मायने नहीं रखता। हालात ऐसे हैं कि इन्हें घर-घर सब्जी, दूध, गैस सिलेण्डर और अन्य आवश्यक वस्तुएं पहुंचाने का बीड़ा उठाना पड़ रहा है। ठेले वालों और मज़दूरों के अर्थोपार्जन की प्रक्रिया रूक गयी है। चूंकि सब्जी और फल ज़रूरी वस्तुओं में शुमार है। इसका फायदा हर ग़रीब उठाना चाहता है। ताकि वो अपना परिवार चला सके। यही वजह है कि कोई चाट-पकौड़े वाला सब्जी बेच रहा है, तो किसी मज़दूर फल बेच जीवन चलाना पड़ रहा है। निस्संदेह इनकी आजीविका की आवश्यकताएं हैं। लेकिन इनके सेवा को कम करके नहीं देखा जा सकता है। क्योंकि ये वो लोग हैं जो महामारी की आपात परिस्थिति में साहस करके हम तक आलू, प्याज, लहसुन, अदरक, धनिया, पोदिना, नींबू और साग आदि पहुंचा रहे हैं। ताकि हमारे मुंह का ज़ायका न बिगड़ने पाए और हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बीमारी से लड़ने लायक बनी रहे। अनिल मेरे बचपन का दोस्त है। उसका छोटा भाई पप्पू चाट-पकौड़ा बेचकर घर चलाता है। इन दिनों जब हम और आप अपने-अपने घरों में हैं। पप्पू चेहरे पर मुस्कान लिए सब्जियां बेच रहा है। क्योंकि पप्पू के लिए आजीविका का संकट कोरोना से भी बड़ा है। फरीद मियां उन सब्जी विक्रेताओं में हैं, जिन्होंने हवा के खिलाफ जाकर सब्जी बेचने का बीड़ा उठाया है। इस काम में वो अकेले नहीं हैं। बच्चे को भी काम में हाथ बंटाना पड़ता है।

उन महिलाओं और बच्चियों का जिक्र भी ज़रूरी है, जो आपात परिस्थिति में घण्टे-दो घण्टे के लिए ही सही, सड़क किनारे सब्जी बेचते देखी जा रही हैं। फैयाज़ भाई बढ़ई का काम करते हैं। इन दिनों काम बंद है। एक पत्नी और तीन बच्चों का परिवार बड़ा नहीं है। लेकिन संकट के बादलों से पार पाना इनके लिए भी बड़ी चुनौती है। फैयाज़ भाई इस चुनौती का सामना साग-सब्जी जैसी आवश्यक वस्तुओं को घर-घर पहुंचाकर कर रहे हैं। अशरफ भाई पंचर बनाते हैं, लेकिन दुकान बंद है और इन दिनों ठेले पर सब्ज़ियां बेच जिन्दगी गुजर-बसर कर रहे हैं। राम नरायन कुशवाहा अहिरौली से पैदल ठेले पर सब्जी लेकर मुहम्मदाबाद आते हैं। कोविड-19 से डरे हुए हैं। लाॅकडाउन में पुलिसिया डण्डा भी खाया। लेकिन पेट का सवाल इनके लिए बहुत बड़ा सवाल है। मुंह पर देसी मास्क बांधे मुस्कराते हुए कहते हैं “कि पेटवा क का करल जा।”

निज़ामुद्दीन पहले पावरलूम कारीगर थे। भीवण्डी रहते थे। जिस घर की जिम्मेदारी निभाने के लिए भीवण्डी गए थे, उसी घर की जिम्मेदारियों ने जल्द ही उन्हें घर बुला लिया। उन्हें भिवण्डी छोड़े लगभग सात बरस हो चुके हैं। मेहनत मज़दूरी करके दिहाड़ी से अपना परिवार चलाते हैं। निर्माण कार्य रूका हुआ है। अपने परिवार का पेट पालने के लिए आजकल निज़ामुद्ीन मुहल्ले के लोगों और बाज़ार के बीच कड़ी के तौर पर काम कर रहे हैं। वो हर सुबह दो घण्टे तक अपने घर से बाहर रहकर मुहल्ले के लोगों का सामान-लाने, ले जाने का काम कर रहे हैं। बदले में जो कुछ मिलता है, उससे गुजारा कर रहे हैं। निज़ामुद्दीन सन्निर्माण श्रमिक में हैं लेकिन श्रम विभाग में उनका पंजीयन नहीं है। पंजीयन के लिए दो वर्ष पहले मैंने खु़द उन्हें प्रेरित किया था। उनका फार्म भी भरवा दिया था। लेकिन शिक्षा और जागरूकता न होने के कारण निज़ामुद्दीन जैसे मज़दूर अपनी पहचान से वंचित हैं। इसलिए ऐसे मज़दूर सरकार की ओर से दी जाने वाली 1000 रूपए की सहायता राशि से भी वंचित हैं। कोविड-19 के कारण लाॅकडाउन की इस परिस्थिति में गैस सिलेण्डर पहुंचाने वाले मेहनतकश मज़दूरों की सेवाएं भी काबि़ले तारीफ़ है। यदि ये सिलेण्डर घर-घर न पहुंचाएं तो बहुत से घरों में समय पर चूल्हा जलना मुश्किल हो जाएगा। सुबह-सवेरे दूध वाले दूध न दें तो दूध पीते बच्चों को भूखा रहना पड़ेगा।

दर असल ये वो साहसी लोग हैं, जो अपने परिवार की आजीविका के लिए सड़कों पर हैं। खासकर तब जब बाकी लोग संक्रमण से सुरक्षित रहने के लिए अपने-अपने घरों में हैं। रोज कमाने-खाने वाले ये लोग पहले से शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए हैं। लेकिन आज की कठिन परिस्थिति में इनकी सेवाएं किसी डाॅक्टर, नर्स, पुलिस-प्रशासन और सामाजिक कार्यकर्ता से कम नहीं है। ये वो लोग हैं, जो दूसरों के लिए अपने घरों से बाहर रहते हैं। हमारे-आपके बीच आते-जाते रहते हैं। लेकिन हमेशा से अदृश्य रहे हैं। ये लोग मज़दूर हैं, मजबूर हैं और शिक्षा से दूर हैं। ये वो लोग हैं जो अपनी सेवाएं उपलब्ध कराने की एवज में फोटो नहीं खिंचाते। इन लोगों के लिए भी आभार, धन्यवाद और सैल्यूट तो बनता ही है।

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Saturday, April 4, 2020

कोविड-19 का उत्पादन, मांग और आपूर्ति पर प्रभाव


ह समय गंभीर है। इस समय को संवाद, संवेदना, धैर्य और अनुशासन से ही जिया और जीता जा सकता है। यह तो अर्थशास्त्री ही बता सकते हैं कि मंदी की ओर जाती अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर आने में कितना समय लगेगा। इसलिए आर्थिक धैर्य से काम लेना हर व्यक्ति के लिए इस समय की बड़ी ज़रूरत है। जैसे वस्तुओं के इस्तेमाल में अनुशासन बरतना। भोजन नष्ट न करना। यह आत्मसात करना कि हमारे ही जैसे हज़ारों गरीब बच्चे, बड़े, बूढ़े और महिलाएं अपनी कम भोजन कर रहे हैं या फिर भूखे रह रहे हैं। हमारी संवेदना ही हमें कोविड-19 और इससे पैदा हुई आर्थिक संकट से उबरने में मदद करेगी। लेकिन आर्थिक मोर्चे पर सरकार को अभिनव प्रयास करने होंगे।


दुनिया के सैंकड़ों देश इन दिनों कोविड-19 के संक्रमण का सामना कर रहे हैं। चीन, अमेरिका, इटली, फ्रांस, स्पेन और जर्मनी आदि देशों में इस महामारी के कारण हज़ारों लोगों को जान गंवानी पड़ी है। कई देशों को जीवन और मृत्यु के बीच लाॅकडाउन की सीमा रेखा खींचनी पड़ी है। भारत भी इस संक्रमण के साए में है। ये अलग बात है कि यहां पर संक्रमण अमेरिका और यूरोपीय देशों की तरह नहीं फैला है। लेकिन संक्रमित मरीज़ों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। सरकार के बार-बार अपील करने और प्रशासन की सक्रियता का असर दिख भी रहा है। कुछ संवेदनहीन और लापरवाह लोगों को छोड़कर बाकी सभी लोग घरों में हैं। दुनियाभर के डाॅक्टर, नर्स प्रशासनिक और सामाजिक सेवा से जुड़े व्यक्ति युद्ध स्तर पर काम कर रहे हैं। सब्जी वाले, किराना स्टोर वाले, दूध वाले और रसोई ईंधन वाले भी अपनी जान जोखि़म में डाल कर दूसरे के घरों तक आवश्यक वस्तुएं पहुंचा रहे हैं। एक तरह से पूरी मानवता परीक्षा के कठिन दौर से गुज़र रही है। देखना यह है कि इस परीक्षा में सफलता कब प्राप्त होती है। चीन की बात करें, तो वहां पर संक्रमण कम होने की ख़बरें हैं। लेकिन दुनिया के शेष देशों से कोई सुखद समाचार नहीं आ रहा है। विशेषज्ञों की राय है कि अमेरिका और यूरोपीय देशों को अपनी लापरवाही का खामियाज़ा चुकाना पड़ रहा है। ऐसी आशंकाएं भी व्यक्त की जा रही हैं कि भारत जैसे देश को भी लापरवाही की कीमत चुकानी पड़ सकती है। बहरहाल, हर संकट समाधान ले कर आता है। हालांकि कोविड-19 लाइलाज है। फिर भी सोशल डिस्टैन्सिंग, बार-बार हाथ धुलना, मास्क लगाना, चेहरे पर बार-बार हाथ न ले जाना, मुंह में, नांक में हाथ न डालना आदि सुरक्षा उपायों में ही फिलहाल इस संकट का समाधान छुपा है। कम से कम कोविड-19 संक्रमण की दवा की खोज होने तक या इस संक्रमण के स्वतः समाप्त होने तक इन उपायों को अपनाए रखना होगा।

हामारी के समय में जब घरों में बंद रहना पड़ता है, तो जीवन बहुत मुश्किल और नीरस हो जाता है। लेकिन मानव सभ्यता के इतिहास में शायद ही कोई संकट ऐसा आया हो जब एक दूसरे की मदद के लिए लोग आगे न आए हों। यहां तक कि जन सेवा में लोगों की जान भी चली जाती है। कोविड-19 संक्रमण से लोगों की जान बचाने की कवायद में लगे सैंकड़ों डाॅक्टरों की मौत हो चुकी है। संकट का समय मनुष्य के मानव स्वाभाव की परीक्षा का भी समय होता है। इन दिनों भारत के विभिन्न राज्यों में बहुत से लोग यथा स्थिति में रहने को विवश हैं। सरकारों के साथ-साथ सामाजिक संस्थाएं गरीबों, भूखों और बेसहारा लोगों की मदद कर रहे हैं। यह ज़रूरी भी है। क्योंकि हर गरीब कहीं न कहीं उत्पादन की प्रक्रिया में एक किसान, मज़दूर और सेवा प्रदाता के रूप सकल घरेलू उत्पाद में अपना योगदान देता है। लेकिन इनके जीवन में स्थायित्व नहीं होता है। जो लोग आर्थिक रूप से समृद्ध हैं, वो हर परिस्थिति का सामना कर लेते हैं। लेकिन रोज कमाने-खाने वाले गरीब किसानों और मज़दूरों के लिए कोई भी आपात स्थिति कठिनाइयों भरी होती है। बहुत से घरों में चूल्हे नहीं जल पाते हैं। इन्हें कई-कई वक्त भूखे रहना पड़ता है।

न मज़दूरों का ज़िक्र ज़रूरी है, जो घर से दूर दिल्ली, मुम्बई, भिवन्डी, कोलकता, हैदराबाद, सूरत, अहमदाबाद, लुधियाना, रूद्रपुर, मेरठ, मुज़फ्फरनगर, गाज़ियाबाद, आगरा, पानीपत, फरीदाबाद, गुड़गांव, आदि शहरों में रहते हैं। मज़दूरों का अपने घर-परिवार और गांव-कस्बे से दूर बड़े-बड़े शहरों में स्थित बड़े-बड़े कल-कारखानों में काम करना दो बातें उजागर करता है। पहला यह कि मज़दूर अपने परिवार से दूर रह कर जो आजीविका अर्जित करता है, वही आजीविका गांव-कस्बे में रहकर अर्जित करना संभव नहीं होता है। क्योंकि गांव की अर्थव्यवस्था औद्योगिक नगरों से छोटी और कमज़ोर होती है।

ज़ाहिर है मज़दूरों की आर्थिक आवश्यकताएं पलायन का मुख्य कारणों में है। जिसका ज़िक्र अक्सर होता रहता है। मज़दूरों के पलायन का दूसरा पहलू यह है कि मज़दूर सिर्फ अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बड़े शहरों की ओर पलायन नहीं करते हैं। दर असल उनकी स्थिति उत्पादन की प्रक्रिया में मूल ईकाई की तरह होती है। बात खेती-किसानी की हो, उद्योग-धंधों की हो या कल-कारखानों की। हर जगह मज़दूर श्रम का योगदान करते हैं। जिसके बदले में उन्हें पारिश्रमिक मिलता है। कुछ काम हैं, जिसके बंद होने से नियोक्ता और उपभोक्ता पर तत्काल कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ता है। लेकिन मज़दूर का हित तुरंत प्रभावित होता है। बहुत से काम ऐसे हैं, जिसमें नियोजित मज़दूर यदि काम बन्द कर दें, तो उत्पादन, मांग और पूर्ति में असंतुलन जल्द ही ज़ाहिर होने लगते हैं। किसान के उदाहरण से उत्पादन, मांग और पूर्ति के आपसी संबंध को समझा जा सकता है। यदि किसी कारणवश किसान अन्न उत्पादन की प्रक्रिया से अलग हो जाएं, तो दुनिया के समक्ष खाद्यान्न संकट पैदा हो सकता है। इसी तरह यदि कल-कारखानों में मज़दूर काम करना बंद कर दें, तो उपभोक्ताओं के समक्ष आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित हो सकती है। वस्तुओं की मांग और आपूर्ति में संतुलन उत्पादन की प्रक्रिया के सुचारू रूप से गतिमान रहने पर बना रहता है। उत्पादन की प्रक्रिया इसमें शामिल व्यक्तियों पर निर्भर करता है।

चूंकि इस समय देश 21 दिनों के लाॅकडाउन की आपात परिस्थिति से गुज़र रहा है। इसलिए यह विचार करना ज़रूरी है कि इस दौरान खाद्यान्न और अन्य मूलभूत ज़रूरी वस्तुओं के उत्पादन, मांग और आपूर्ति की क्या स्थिति है। किसी भी आपात परिस्थिति में उपलब्ध संसाधनों का सही नियोजन सुनिश्चित करना शासन-प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती होती है। जैसा कि इस समय देखा जा सकता है। सरकार ने खाद्य पदार्थों का गैर ज़रूरी भण्डारण न करने का निर्देश दिया है। सरकारी सस्ते गल्ले के वितरण केन्द्रों (राशन की दुकानों) पर पात्र गृहस्ती के कार्ड धारकों को समय से खाद्यान्न वितरण सुनिश्चित करने के लिए भी विशेष निर्देश जारी किए गए हैं। रसोई ईंधन (एलपीजी) की होम डिलिवरी पहले से कहीं बेहतर नज़र आ रही है। शासन-प्रशासन जिस प्रतिबद्धता से लाूकडाउन में जन सुविधाओं को सुचारू बनाए रखने की कोशिशों को अंजाम दे रही है, आपात परिस्थिति में गरीबों के लिए बड़ी राहत है। यह तभी तक संभव है, जब तक सरकार के पास इन वस्तुओं का पर्याप्त भण्डार उपलब्ध रहेगा। बात करते हैं उन लोगों की जो मध्य या उच्च वर्ग में आते हैं। इन लोगों के पास अपनी क्रय शक्ति है। जिसके अनुसार इस वर्ग के लोग ज़रूरी खाद्य पदार्थ खरीद सकते हैं। लेकिन यदि लाॅकडाउन को आगे बढ़ाना पड़ा तो इस वर्ग के लोगों के पास मज़बूत क्रय शक्ति होने के बाद भी इनके खाद्याान्न से वंचित रहने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। क्योंकि आपूर्ति बाधित होने का मतलब है कोई वस्तु एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं पहुंचना। यद्यपि जरूरी सेवाओं की पहुंच को सुगम बनाने के प्रयास युद्ध स्तर पर चल रहे हैं। फिर भी भविष्य आने वाले समय में यह चिन्ता का एक बड़ा विषय होगा। इस पर विचार करने की आवश्यकता है। ऐसा इसलिए भी संभव है, क्योंकि आपात परिस्थिति में उत्पादन की कई बड़ी इकाइयों में उत्पादन ठप्प पड़ गया है।

हालांकि किसानों के समक्ष वो समस्या नहीं है, जो खाद्य सामग्री के विनिर्माण उद्योग के समक्ष है। साग-सब्जी की आपूर्ति सुचारू रूप से चल रही है और आगे भी जारी रहेगी। लेकिन जो द्वितीयक उत्पाद हैं। जिसे हम पैक्ड आइटम हैं के रूप में बाज़ार से खरीदते हैं, उनका उत्पादन और आपूर्ति अवश्य बाधित होगी। इससे भी बड़ी चुनौती होगी आम जन की सोच से लड़ना। जब भी आपात परिस्थितियां पैदा होती हैं, अधिशेष भण्डारण एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आती है। इसकी वजह से आपूर्ति प्रभावित होती है और कीमतें भी आसमान छूने लगती हैं। पिछले कुछ वर्षाें प्याज और टमाटर का अनुभव कुछ ऐसा ही रहा है। मनुष्य के सोच और स्वभाव में सिर्फ भण्डारण ही नहीं है बल्कि विषम परिस्थितियों में ‘मेरा भला, तो जग भला’ की प्रवृत्ति है। यह प्रवृत्ति दो रूपों में अभिव्यक्त होती है। एक तरफ विक्रेता अधिक लाभ कमाने के लिए आवश्यक वस्तुओं का भण्डारण करता है। तो दूसरी ओर उपभोक्ताओं में मज़बूत क्रय शक्ति वाले लोग एक ही बार में पूरा बाज़ार खरीद लेने के लिए लालायित रहते हैं। यदि लोगों तक मांग और आपूर्ति की सही जानकारी नहीं पहुंचती है, तो लाॅकडाउन के बाद इस तरह की परिस्थिति पैदा हो सकती हैं। यह काम इसलिए भी कठिन प्रतीत होता है क्योंकि अभी बहुत से लोग ऐसे हैं, जो माननीय प्रधानमंत्री जी के हाथ जोड़कर विनय करने पर भी घर में रहने का संयम और अनुशासन नहीं दिखा रहे हैं। ये वही लोग हैं जो एक कड़ी तोड़ कर पूरा माला बिखेर देते हैं। यदि समय रहते स्थानीय स्तर पर मांग और आपूर्ति की वस्तु स्थिति का पता लगा लिया जाए, तो आने वाले समय में व्यक्ति और बाज़ार की क्रियाओं में किसी हंगामी परिस्थिति के पैदा होने से बचा जा सकता है।

ह समय गंभीर है। इस समय को संवाद, संवेदना, धैर्य और अनुशासन से ही जिया और जीता जा सकता है। यह तो अर्थशास्त्री ही बता सकते हैं कि मंदी की ओर जाती अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर आने में कितना समय लगेगा। इसलिए आर्थिक धैर्य से काम लेना हर व्यक्ति के लिए इस समय की बड़ी ज़रूरत है। जैसे वस्तुओं के इस्तेमाल में अनुशासन बरतना। भोजन नष्ट न करना। यह आत्मसात करना कि हमारे ही जैसे हज़ारों गरीब बच्चे, बड़े, बूढ़े और महिलाएं अपनी कम भोजन कर रहे हैं या फिर भूखे रह रहे हैं। हमारी संवेदना ही हमें कोविड-19 और इससे पैदा हुई आर्थिक संकट से उबरने में मदद करेगी। लेकिन आर्थिक मोर्चे पर सरकार को अभिनव प्रयास करने होंगे।
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Monday, March 30, 2020

डर का मनोविज्ञान और कोविड-19


अच्छा तो यह है कि हम डरे हुए लोग वर्तमान स्थिति के साथ बेहतर सामंजस्य बनाने की कोशिश करें। गीत, कविता, किस्से-कहांनियां सुनें और सुनाएं। हंसे और हंसाएं। जीवन अमूल्य है। घर से बाहर जाकर या घर में रहकर बीमार होना विकल्प नहीं है। अपनी ऊर्जा साकारात्मक सोच के साथ रचनात्मक कार्यों में लगाना ही उचित है। सुख और दुःख जीवन के दो पहलू हैं। मानव सभ्यता ने विकास का लम्बा सफर इसी धूप-छांव में तय किया है।



र, भय, ख़ौफ़ का भाव मानव ही नहीं अपितु जानवरों में भी होता है। मनुष्य के दो भाव जन्मना होते हैं। एक भाव सुखद होता है तो दूसरा दुःखद होता है। डर का भाव दुःखद होता है। जिसमें मनुष्य को किसी तरह की हानि पहुंचने की संभावना होती है। ऐसी संभावना निजी और सामजिक जीवन की परिस्थितियों में उतार-चढ़ाव से बनती है। कहा जा सकता है कि मानवीय भावना के विकास में मनुष्य का परिवेश और परिस्थितियों का महत्वपूर्ण योगदान होता है। मनुष्य अपने परिवेश और परिस्थिति में रहकर ही भावनात्मक परिपक्वता प्राप्त करता है। चूंकि विकास की प्रक्रिया निरन्तर जारी रहती है। इसलिए समय और परिस्थितियां बदलती हैं तो मनुष्य की भावनाओं में भी बदलाव परिलक्षित होता है। उदाहरण के लिए कोई बच्चा कमरे में अकेले होता है तो उसे डर का अनुभव होता है। किसी बच्चे को अकेले घर से बाहर जाने डर लगता है। कोई बच्चा समूह में खेलने से डरता है। डर के बहुत से कारण गिनाए जा सकते हैं। लेकिन बाल विकास की विभिन्न अवस्थाओं में भावनात्क संतुलन और सामंजस्य के लिए माता-पिता, शिक्षक और एक समय के बाद बच्चा खुद भी प्रयास करते हैं। यही कारण है कि जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, उसके मन में डर का भाव कम होता जाता है। यदि बच्चे अपने घर और समाज के परिवेश से अलग रहते हैं, तो ऐसे बच्चों के भावनात्मक विकास में संतुलन का अभाव होता है। इसके कारण ऐसे बच्चे वयस्क होने के बाद भी डरते रहते हैं। लेकिन कुछ बच्चे परिस्थितियों के कारण बिल्कुल नहीं डरते हैं। बांसफोर समुदाय के बच्चों को चाकू और गंडासे से बांस काटने में डर नहीं लगता है। किसान के बच्चों को खेत में नंगे पांव जाने में डर नहीं लगता है। किसी महिला या हलवाई को चूल्हे पर रखे तेल के गरम कड़ाहे से जलने का डर नहीं होता है। ऐसा परिस्थितियों के कारण ही संभव हो पाता है।

स समय पूरी दुनिया के लोग डरे हुए हैं। कोविड-19 के संक्रमण के फैलाव के परिणामों की कल्पना ही डर का बड़ा कारण है। लोग घरों में रहने के लिए विवश हैं। परिस्थितियां कुछ ऐसी बन पड़ी हैं कि जन सामान्य ‘घर में रहना, सोशल डिस्टैन्सिंग और हाथ धुलते रहना’ आदि उपायों से जीवन और मौत के बीच विभाजक रेखा खींच रहा है। लेकिन इन्हीं परिस्थितियों में बहुत से ऐसे लोग हैं, जो हेल्थ सर्विसेज, पुलिस प्रशासन और सामाजिक संस्थाओं से प्रतिबद्ध होकर न सिर्फ मरीजों बल्कि असामान्य परिस्थितियों में पलायन कर रहे मज़दूरों, गरीबों और भूखों की मदद कर रहे हैं। 

लेक्ट्राॅनिक, प्रिन्ट और सोशल मीडिया में कोविड-19 से संक्रमण की ख़बरें किसी मैच के स्कोर बोर्ड की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है। टीवी और मोबाइल तकिया-बिछौना का हिस्सा बन चुका है। मैसेज आते ही फारवर्ड का बटन दब जाना आम बात है। हर कोई दूर होकर भी अपने प्रिय जनों को अद्यतन सूचनाओं से अपडेट रखने के प्रयास में है। कहना होगा कि बच्चा, जवान और बूढ़े लगभग सभी कोविड-19 की चिन्ताओं के साथ सो और जाग रहे हैं। इनकी दिनचर्या में इस संक्रमण के भय ने मजबूत स्थान बना लिया है। दर असल देश और दुनिया की परिस्थितियां कुछ ऐसी हैं कि हर किसी को डर के अनुभव से होकर गुज़रना पड़ रहा है। कोविड-19 का डर भयावह इसलिए भी है, क्योंकि इससे बचने के लिए अभी तक कोई वैक्सीन तैयार करने में सफलता नहीं प्राप्त हो सकी है।

ज मनुष्य घर में रहने वाली परिस्थितियों में फंसा हुआ है। डर का भाव कई बार मनुष्य के लिए लाभप्रद सिद्ध होता है। क्योंकि डर का भाव संयम और अनुशासन बनाने में सहायक होता है। जिसकी आवश्यकता इस कठिन परिस्थिति में सबसे अधिक है। फिर भी लोगों की भीड़ गैर-ज़रूरी तौर पर विभिन्न घरों के बाहर और मुहल्लों में बाल पंचायत, किशोर पंचायत और युवा पंचायत के रूप में देखी जा रही है। पुलिस प्रशासन शासनादेश के अन्तर्गत इन्हें माइक से बार-बार निदेश दे रही है, लेकिन इन पंचायतों में शामिल व्यक्तियों को डर का एहसास नहीं है। क्योंकि उनके व्यक्तित्व के भावनात्मक विकास में डर के भाव का संतुलित विकास नहीं हुआ है। वहीं बहुत से व्यक्ति ऐसे हैं जो सिर्फ डरे हुए नहीं हैं बल्कि उनके अन्दर डर का एक मनोविज्ञान तैयार हो चुका है। ऐसे व्यक्ति घर के बाथरूम और छत पर जाने में भी डर रहे हैं। डर का यह मनोविज्ञान भी ठीक नहीं कहा जा सकता है। जिसके लिए टीवी के डरावने स्कोर बोर्ड वाले समाचार और सोशल मीडिया में शोधहीन और अप्रमाणित स्रोतों से भेजे जाने वाले मेसेज जिम्मेदार हैं।

क्त प्रसंग व्यक्ति, परिवार और समाज में व्याप्त भय के विभिन्न रूपों को प्रदर्शित करता है।  संकट की इस घड़ी में संयम और अनुशासन का व्यवहार ही उचित है। डर का भाव मनुष्य के व्यक्तित्व का स्थाई तत्व है। यह जीवन से मुत्यु तक बना रहता है। लेकिन विकास की विभिन्न अवस्थाओं में विभिन्न परिस्थियों में मनुष्य के भाव नए अनुभवों से होकर गुज़रते हैं। निश्चित तौर पर आज देश और दुनिया के तमाम लोग डरे हुए हैं। लेकिन “भयभीत न होना और अत्यधिक भयभीत होना” दोनों ही भावों से हमें दूर रहने की आवश्यकता है। अति निडरता में सावधानी हटने पर संक्रमण का खतरा है, तो वहीं दूसरी तरफ अत्यधिक भयभीत होना व्यक्ति के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं होता है। अच्छा तो यह है कि हम डरे हुए लोग वर्तमान स्थिति के साथ बेहतर सामंजस्य बनाने की कोशिश करें। गीत, कविता, किस्से-कहांनियां सुनें और सुनाएं। हंसे और हंसाएं। जीवन अमूल्य है। घर से बाहर जाकर या घर में रहकर बीमार होना विकल्प नहीं है। अपनी ऊर्जा साकारात्मक सोच के साथ रचनात्मक कार्यों में लगाना ही उचित है। सुख और दुःख जीवन के दो पहलू हैं। मानव सभ्यता ने विकास का लम्बा सफर इसी धूप-छांव में तय किया है।
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Friday, March 27, 2020

परीक्षा की स्थापित परिपाटी और मूल्यांकन का महत्व

पूर्णांक-प्राप्तांक तो कभी ग्रेडिंग और कभी दोनों का समावेश मौजूदा दौर की मूल्यांकन प्रणाली का हिस्सा है। प्रचलित परिपाटी के अनुरूप ही एन्ड सेम एक्जाम या अर्ध-वार्षिक और वार्षिक परीक्षाओं के आयोजन के बाद बच्चों को अगली कक्षा में प्रवेश दिया जाता है। यदि औपचारिक शिक्षा की बात करें तो बच्चों को अगले कक्षा में प्रवेश से पहले परीक्षा का आयोजन अवश्य होना चाहिए। लेकिन आपदा और महामारी की आपात परिस्थितियों में वैकल्पिक मूल्यांकन का तरीका अपनाने से इंकार नहीं किया जा सकता है।


सीखना ऐसी क्रिया है जो जीवन पर्यन्त चलती है। जन्म से ही बच्चा हर पल कुछ न कुछ सीखता रहता है। व्यक्ति, परिवार, समाज, स्कूल, स्थान और वस्तु आदि किसी बच्चे के जीवन में एक नए अध्याय की तरह होते हैं। बच्चे के परिवेश में मौजूद हर छोटी बड़ी चीज और घटनाएं उसके अनुभव संसार को समृद्ध बनाती हैं। बाल विकास की विभिन्न अवस्थाओं में मूल्यांकन एक महत्वपूर्ण सोपान होता है। मूल्यांकन से हमें किसी व्यक्ति की विभिन्न क्षमता विकास का पता चलता है। मूल्यांकन कार्य को सफलता पूर्वक संपन्न करने के लिए परीक्षा का आयोजन किया जाता है। मूल्यांकन से किसी व्यक्ति, समाज, संस्था अथवा वस्तु आदि की उपयोगिता और महत्व का अंदाज़ा होता है।  मूल्यांकन की कई विधियां प्रचलन में हैं। मूल्यांकन करते समय कई बातें ध्यान रखनी होती हैं। जैसे, मूल्यांकन किसका होना है? व्यक्ति का, समाज का, संस्था का या किसी वस्तु का। यदि किसी बच्चे का मूल्यांकन होना है तो यह जानना आवश्यक होता है कि बच्चे की आयु कितनी है? बच्चा किस कक्षा का विद्यार्थी है? यह भी ध्यान रखना होता है कि बच्चे का शैक्षिक मूल्यांकन करना है या उसकी शिक्षा में सहायक पक्षों का मूल्यांकन करना है या फिर इन दोनों का। मूल्यांकन में शिक्षा शास्त्र की स्थापित परिपाटी के अन्तर्गत मानकों की अनदेखी होने पर परिणाम संतोषजनक नहीं आते हैं। इस आलेख के माध्यम से मूल्यांकन के उन अनछुए पहलुओं को समझने की कोशिश करेंगे है, जो हमारे आस-पास के वातावरण में मौजूद होते हैं, लेकिन उन पर आम तौर पर हमारा ध्यान नहीं जाता है। इसे औपचारिक और अनौपचारिक दो भागों में वर्गीकृत करके समझा जा सकता है।
 
पचारिक और अनौपचारिक का भेद स्कूल और घर के संदर्भ में समझा जा सकता है। स्कूल का परिवेश नितान्त औपचारिक होता है। स्कूल में हर काम के लिए समय निश्चित और निर्धारित होता है। दूसरी तरफ बच्चे के घर का परिवेश होता है, जो अनौपचारिक होता है और जिसमें उसके माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्य शामिल होते हैं। घर पर जागने-सोने, ब्रश करने, नहाने, बे्रक फाॅस्ट, लन्च और डिनर आदि कार्यों का समय लगभग निश्चित होता है। अलग-अलग परिवारों में बच्चों के स्व-अध्ययन का समय भी निश्चित हो सकता है। लेकिन सीखने-सिखाने की स्कूल जैसी प्रक्रिया के लिए घर पर समय निश्चित और निर्धारित नहीं होता है। बच्चे को यह नहीं पता होता है कि उसे कब किसी व्यक्ति को नमस्ते-सलाम का संस्कार सीखना है और न ही यह पता होता है कि उसे कब उठना-बैठना, भोजन करना और पानी पीना आदि संस्कार सीखना है। घर पर सीखने की प्रक्रिया निरन्तर जारी रहती है। लगभग हर घर में बड़ें सदस्य बच्चों पर अपनी दृष्टि लगातार बनाए रखते हैं। जिसे हम ध्यान रखना कहते हैं। घर के बड़े सदस्य बच्चों को बार-बार छोटी-छोटी सीख देते रहते हैं। बच्चे अपने घर के बड़े सदस्यों को जिन कार्यों को, जिस तरह से करते हुए देखते हैं, उनका अनुसरण करने की कोशिश करते हैं। इस तरह से घर पर सीखने की प्रक्रिया अनवरत चलती रहती है। इसका स्वरूप अनौपचारिक होता है। घर और समाज में किसी बच्चे का मूल्यांकन भी नितान्त अनौपचारिक होता है। घर पर सीखना और क्षमता विकास का अवसर स्कूल की अपेक्षा अधिक होता है। क्योंकि बच्चा अधिक समय घर और समाज में व्यतीत करता है।

ज़ाहिर है सीखने-सिखाने की गतिविधियां अपने औपचारिक और अनौपचारिक दोनों ही रूपों में अनवरत जारी रहती हैं। जिसका सतत मूल्यांकन भी होता रहता है। मूल्यांकन इसलिए कि रूचि, तत्परता, और क्षमता विकास का आंकलन किया जा सके। यह आंकलन ही हमें रास्ता दिखाता है कि किसी बच्चे की कौन सी क्षमता संतोष जनक ढंग से विकसित हुई है और किस पक्ष के क्षमता विकास हेतु कार्य करना है। स्कूल में इसके लिए टेस्ट और परीक्षाओं का आयोजन किया जाता है। जबकि घर पर कोई औपचारिक टेस्ट या परीक्षा का आयोजन नहीं होता है। घर पर बच्चे को दी जाने वाली सीख प्रायोगिक यानि प्रैक्टिकल होती है। इसमें कुछ परिणाम तुरंत आते हैं तो कुछ दीर्घकाल में प्रकट होते हैं। परिणाम में सुधार के लिए माता-पिता अपने बच्चे को एक ही कार्य को अच्छी तरह करने की सीख बार-बार देते हैं। लेकिन कभी टेस्ट और परीक्षा नहीं लेते हैं। बिना टेस्ट और परीक्षा के ही अपने बच्चों की क्षमताओं का आंकलन कर लेते हैं।

ब सवाल यह है कि जब घर और स्कूल, दोनों ही स्थानों पर बच्चे की रूचि, तत्परता और क्षमता विकास के बारे माता-पिता और शिक्षक भली-भांति परिचित होते हैं तो फिर उन्हें शैक्षिक मूल्यांकन की आवश्यकता क्यों पड़ती है? कोई ऐसी परिपाटी क्यों नहीं है, जिसमें बिना मूल्यांकन बिना लिखित टेस्ट और परीक्षा के हो।

मूल्यांकन को लेकर जो बातें आम हैं वो पास-फेल तक सीमित हैं। जबकि सच यह है कि मूल्यांकन एक निरंतर चलते वाली प्रक्रिया है। जिसे हम शिक्षण व्यवस्था के अंतर्गत जारी अंक पत्र या रिपोर्ट कार्ड की सीमा तक समझते हैं। जब हम अपने आस-पास मौजूद बहुत से व्यक्तियों और संस्थाओं के बारे में गंभीरता से विचार करते हैं, तो हमें अंदाज़ा होता है कि बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्होंने किसी कार्य विशेष में कभी स्कूल की पढ़ाई नहीं की लेकिन वो जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अपने कौशल और निपुणता का परिचय दे रहे हैं। मुरादाबाद के पीतल उद्योग या बनारस के लूम उद्योग में काम करने वाले व्यक्तियों का उदारण देखा जा सकता है। इन उद्योगों में बड़े पैमाने पर बच्चे और महिलाएं भी शामिल हैं। इससे भी महत्वपूर्ण उदाहरण किसानों का है, जो जिनके पास एग्रीकल्चर साइंस में कोई औपचारिक डिग्री या डिप्लोमा नहीं होती है। लेकिन खेती के देशज और परंपरागत तौर-तरीकों से अन्न उपजाकर देश और दुनिया की खाद्यान्न आपूर्ति में बड़ा योगदान करते हैं। यदि वो काम बन्द कर दें तो पीतल के बरतनों और बनारसी साड़ियों की चमक फीकी पड़ जाए और मनुष्य के सामने पेट भरने का संकट उत्पन्न हो जाए।

क्त के संदर्भ में ही मूल्यांकन की औपचारिकता को जानने और समझने की ज़रूरत है। यह समझ किसी परिस्थिति विशेष जैसे बाढ़, सूखा, भूकम्प, आंधी-तूफान, ठण्ड और महामारी आदि असाधारण परिस्थितियों में औपचारिक मूल्यांकन की समस्या का समाधान निकाल सकती है। हम जानते हैं कि हमारे यहां मूल्यांकन की कई परिपाटी प्रचलन में हैं। समय-समय पर इनमें बदलाव भी होता है। पूर्णांक-प्राप्तांक तो कभी ग्रेडिंग और कभी दोनों का समावेश मौजूदा दौर की मूल्यांकन प्रणाली का हिस्सा है। प्रचलित परिपाटी के अनुरूप ही एन्ड सेम एक्जाम या अर्ध-वार्षिक और वार्षिक परीक्षाओं के आयोजन के बाद बच्चों को अगली कक्षा में प्रवेश दिया जाता है। यदि औपचारिक शिक्षा की बात करें तो बच्चों को अगले कक्षा में प्रवेश से पहले परीक्षा का आयोजन अवश्य होना चाहिए। लेकिन आपदा और महामारी की आपात परिस्थितियों में वैकल्पिक मूल्यांकन का तरीका अपनाने से इंकार नहीं किया जा सकता है। 

मूल्यांकन का मौजूदा संदर्भः

म इस बात से मुंह नहीं मोड़ सकते कि इस समय देश और दुनिया एक ऐसी स्थिति में फंसे हुए हैं जहां किसी भी व्यक्ति को औपचारिक और अनौपचारिक दोनों ऐतबार से किसी भी सार्वजनिक स्थान पर इकट्ठा नहीं होने दिया जा सकता है। संक्रमण से सुरक्षित रहने के लिए जब सोशल डिस्टैन्सिंग, समय-समय पर हाथ धुलना, मास्क का इस्तेमाल करना आदि सावधानियां ही कारगर उपाय हों, तब तो और भी सचेत रहने की जरूरत होती है। ऐसी स्थिति में बच्चा पूरी तरह घर और समाज के अनौपचारिक परिवेश में होता है। उनका औपचारिक तौर पर लिखित परीक्षा लेकर शैक्षिक मूल्यांकन वास्तव में अव्यावहारिक होगा। क्योंकि बच्चों की स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित करना परीक्षा और मूल्यांकन से अधिक आवश्यक है। यदि स्वास्थ्य और जीवन सुरक्षित रहेगा तो पढ़ने-पढ़ाने, लिखित टेस्ट और परीक्षा आधारित मूल्यांकन के अनेकों अवसर आएंगें। उत्तर प्रदेश सरकार के कक्षा एक से आठ तक के बच्चों को बिना मूल्यांकन अगली कक्षा में प्रोन्नति के आदेश को इसी पृष्ठभूमि में देखने की ज़रूरत है। जनता कफ्र्यू और लाॅकडाउन का निर्णय भी स्वास्थ्य सुरक्षा की इसी गंभीरता को उजागर करते हैं।

मेडिकल साइन्स में अब तक के रिसर्च से पता चलता है कि कोविड-19 एक ऐसी बीमारी है, जिसके इलाज की दवा अभी तक नहीं बनी है। चीन, इटली और फ्रांस आदि देशों में हुई जन-धन की क्षति को देखते हुए भारत जैसे देश में इस बीमारी के फैलने की कल्पना भयावह और विचलित कर देने वाली है। यद्यपि इस बीमारी के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए भारत सरकार ने समय रहते पहल किया है। माननीय प्रधानमंत्री जी ने हाथ जोड़कर विनम्र निवेदन किया कि सभी लोग अपने-अपने घरों में रहे। फिर भी बहुत से व्यक्ति ऐसे हैं, जो संकट की इस घड़ी में अनुशासनहीनता का प्रदर्शन कर रहे हैं। ऐसे लोगों को समझना होगा कि किसी एक कड़ी के टूटने से मोतियों का पूरा माला बिखर जाता है। बेहतर है कि हम स्वास्थ्य को अपने दैनिक और सामाजिक जीवन में उच्च प्राथमिकता दें। फिलहाल मेडिकल साइन्सेज के विशेषज्ञों द्वारा बताई गयी सावधानियों का पालन करके ही सुरक्षित रहा जा सकता है। इस आलेख के माध्यम से मैं भी आप सभी से विनम्र निवेदन करता हूं कि अपने परिवेश में झांकते रहिए। यदि कोई बाहर है, तो उसे घर के अंदर रहने का संदेश प्रेषित करें। यदि कोई दूसरे प्रदेश या उन स्थानों से घर लौटा है तो उन्हें आवश्यक तौर पर घर के अंदर रहने के लिए कहिए। कहीं ऐसा न हो की एक की लापरवाही का परिणाम हज़ारों मासूम लोगों को भुगतना पड़े। हमें याद रखना चाहिए कि हमें मनुष्य निर्मित व्यवस्था में प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करना है। प्रकृति मनुष्यों की तरह निष्ठुर नहीं है। सूर्य, वायु, प्रकाश और जल देने में प्रकृति किसी मनुष्य के साथ भेदभाव नहीं करती है। लाॅकडाउन की परिस्थितियों को इसी व्यापक अर्थों में समझने और “हेल्प अस टू हेल्प यू“ की भावना के तहत घर के अंदर रहने के अनुशासन का पालन करना है। यदि जीवन सुरक्षित रहेगा तो प्रकृति की धूप-छांव में मनुष्य निर्मित सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था में हर बात के लिए अनेकों अवसर मिलेंगे। बच्चों के मूल्यांकन के ही नहीं बल्कि जीवन में नाना प्रकार के उत्सव और विनोद के क्षणों को साझा करने के अवसरों की संभावना बनी रहेगी।
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आपात परिस्थितियों में कैसे करें मूल्यांकन?

शिक्षक को यह बात हमेशा याद रखना चाहिए कि उन्हें न तो बच्चों के ज्ञान की परीक्षा लेनी होती है और न ही अपनी योग्यता का प्रमाण देना होता है। सीखना-सिखाना दो ध्रुवीय प्रक्रिया है जिसके केन्द्र में बच्चा होता है। हमें उस बच्चे के लिए निरन्तर अवसर सृजित करने की ओर अग्रसर रहना होता है न कि पास-फेल की प्रक्रियों को सम्पन्न कराने तक सीमित रहना होता है।


जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में हमें प्रतिस्पर्धा, प्रतियोगिता और परीक्षा जैसे शब्दों से दो-चार होना पड़ता है। ये शब्द हमें पास-फेल के रूप रूप में बहुत कुछ दे जाते हैं। किसी का जीवन पटरी पर सरपट दौड़ने लगता है तो किसी की ज़िन्दगी पटरी से उतर जाती है। फिर भी मनुष्य निर्मित व्यवस्था में हर व्यक्ति के जीवन में प्रतिस्पर्धा, प्रतियोगिता और परीक्षा की घड़ियां आती हैं। इस समय पूरी दुनिया में कोविड-19 नामक संक्रामक बीमारी ने आपात परिस्थितियां पैदा कर दी है। चीन, इटली और फ्रांस में संक्रमण की अनिंत्रित मामलों का संज्ञान लेते हुए भारत में केन्द्र और राज्य सरकारों को आपात कदम उठाने पड़े। यदि उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहां सरकार ने 13 मार्च को ही इसे महामारी घोषित करते हुए 14 मार्च से 22 मार्च तक कक्षा 1 से 8 तक के स्कूलों को बंद करने का आदेश जारी किया था। संक्रमण की भयावहता और स्वास्थ्य सुरक्षा को दृष्टिगत हुए यह समय 2 अप्रैल तक बढ़ाया दिया गया। इस बीच कक्षा 1 से 8 तक के बच्चों को बिना परीक्षा ही अगली कक्षा में प्रोन्नति प्रदान करने का भी आदेश जारी किया। इसके पीछे कोविड-19 के संक्रमण से बच्चों को बचाना ही प्रमुख उद्देश्य रहा है।

क्त परिस्थिति में दो बाते चिन्ता का विषय बनी हुई हैं। पहली यह कि वित्तीय वर्ष की ही तरह शैक्षिक सत्र का समय भी 1 मार्च से 31 मार्च तक होता है। लिहाजा 31 मार्च तक स्कूलों को परीक्षाएं आयोजित कर मूल्यांकन कार्य करके बच्चों को प्रगति पत्र वितरित करना होता है। इसके बाद ही कोई बच्चा अगली कक्षा में प्रान्नति के लिए अर्ह् होता है। लेकिन महामारी की आपात परिस्थितियों में छुट्टियां लगातार बढ़ानी पड़ीं हैं। पहले से चल रही परीक्षाओं को रोकना पड़ा। जिन स्कूलों में परीक्षाएं शुरू नहीं हुई थीं, उन्हें पहले टाला गया और अन्ततः निरस्त कर दिया गया। इस क्रम में 22 मार्च को जनता कफ्र्यू भी लगाना पड़ा। माननीय प्रधानमंत्री को देशवासियों से घरों में सुरक्षित बने रहने की अपील करनी पड़ी। यहां तक कि 25 अप्रैल से पूरे देश को लाॅकडाउन कर दिया। अपील किया गया कि सिर्फ आपात आवश्यकता के लिए ही बाहर निकलें। घर के अंदर बने रहने का हर संभव प्रयास करें। फिर भी बहुत से लोग घर के बाहर मुक्त रूप से निरूद्देश्य घूमने से परहेज नहीं कर रहे हैं। जिसकी चिन्ता माननीय प्रधानमंत्री जी ने ट्वीटर और 24 अप्रैल को शाम 8 बजे के अपने संबोधन में व्यक्त की। उन्होंने हाथ जोड़कर विनती की कि यदि अगले 21 दिनों तक हम अपने-अपने घरों में रह लें, तो कोविड-21 के भयावह दुष्परिणामों से लोगों को बचाया जा सकता है। इस लेख के माध्यम से मैं भी अपील करता हूं कि हममें से हर व्यक्ति नैतिक रूप से कोविड-19 के संक्रमण को फैलने से रोकने संबंधी सुझावों का अक्षरशः पालन सुनिश्चित करे। इस अपील के साथ मैं उन लोगों की समस्या पर ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं, जो माता-पिता और शिक्षक के तौर पर अपने बच्चों की परीक्षा और मूल्यांकन को लेकर चिन्तित हैं। यह चिन्ता स्वाभाविक भी है कि क्या बिना परीक्षा किसी बच्चे को अगली कक्षा में प्रोन्नत करना उचित है? ऐसे माता-पिता और शिक्षकों की चिन्ता अपनी जगह उचित है लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि महामारी  की परिस्थितियां असाधारण होती है। खासकर तब जब कोविड-19 जैसी संक्रामक महामारी को डाॅक्टरों, दवाइयों और उपलब्ध स्वास्थ्य सुविधाओं के दम पर टाला नहीं जा सकता है। कोविड-19 ऐसी ही बीमारी है, जो महामारी का रूप धारण कर चुकी है। ऐसे में परीक्षा और मूल्यांकन से अधिक आवश्यक यह हो जाता है कि जिसके लिए परीक्षा का आयोजन किया जाता है और जिसका मूल्यांकन करना होता है, उसके स्वास्थ्य सुरक्षा के उपाय सोचे जाएं और समय रहते उचित कदम उठाएं जाएं। स्कूलों और अन्य सार्वजनिक महत्व के स्थानों पर बच्चों को जाने से रोकना ऐसा ही कदम है। इस पर सवाल उठाना बेमानी है।

निश्चित तौर पर उन लोगों के सामने अपने बच्चों के मूल्यांकन और परीक्षा परिणामों की समस्या होगी, जो बच्चों के लिए औपचारिक परिवेश निर्माण में सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं। महामारी की परिस्थिति में सरकार द्वारा बिना परीक्षा बच्चों को उत्तीर्ण करने के निर्णय ने शिक्षकों के समक्ष यह चुनौती पैदा कर दी है कि वो अमूक छात्र/छात्रा को उत्तीर्ण करने की कवायद के हिस्से में क्या-क्या करें। कहना होगा कि इसका समाधान सतत मूल्यांकन प्रणाली में छुपा है। सतत मूल्यांकन क्या है, इसे कैसे समझा जा सकता है और इसे एक अंक पत्र पर कैसे अभिव्यक्त किया जा सकता है आदि के प्रशिक्षण से शायद की कोई शिक्षक वंचित होंगे। क्योंकि किसी भी शिक्षक को प्रशिक्षण के दौरान मूल्यांकन के विभिन्न पक्षों के बारे में भली-भांति सीखने का अवसर मिलता है। इसलिए परेशान होने या किसी आदेश का इंतेजार करने से बेहतर है कि शिक्षण कार्य में शामिल शिक्षक अपने विद्यार्थियों को सिखाई हुई बातों यानि विषयवार विभिन्न बिन्दुओं का मनन करें कि कब कौन सा टाॅपिक बच्चों को पढ़ाया था? किन बच्चों ने टाॅपिक के बारे में अवधाराणरात्मक समझ विकसित करने में कितनी गंभीरता का परिचय दिया था? शिक्षक स्कूल में बच्चों को पढ़ाते समय के क्षणों को याद करें। बच्चों के चेहरे उनकी आंखों के सामने आएंगे। बच्चों का व्यवहार, आचरण और शिष्टाचार स्पष्ट याद आने लगेगा। विषय विशेष में अलग-अलग बच्चों का लिखित और मौखिक प्रदर्शन भी याद आएगा। बच्चों के नाम क्रम से लिखकर प्रत्येक नाम पर विचार करें। निश्चित तौर पर एक पूरे शैक्षिक सत्र ही नहीं बल्कि पिछले कई वर्षों से बच्चों के साथ सीखने-सिखाने के ढ़ेर सारे क्षणों की याद ताज़ा हो उठेगी। फिर यह भी याद आएगा कि अमूक छात्र/छात्रा का विषय विशेष में क्या स्थिति रही है। इस तरह से मूल्यांकन का कार्य सम्पन्न किया जा सकता है।

ज देश और दुनिया के समक्ष जीवन बचाने का जो संकट पैदा हुआ है, उसमें सतत मूल्यांकन की प्रणाली को व्यावहारिक तौर पर अपना कर मूल्यांकन की समस्या का समाधान किया जा सकता है। यदि इसके विस्तार में जाएं तो यह मानना होगा कि अर्द्ध-वार्षिक और वार्षिक लिखित परीक्षा की स्थापित परिपाटी के प्रतिकूल मूल्यांकन की इस प्रणाली को व्यापक स्तर पर कम से कम कक्षा 8 तक के शिक्षण कार्य में अपनाना जा सकता है। लेकिन यह तभी संभव है जब हर शिक्षक पक्षपात, भेदभाव, वैयक्ति द्वेष और घृणा आदि भावों से स्वयं को दूर रखने के लिए स्वयं से ही वचनवद्ध हो।

हुत सारे शिक्षकों के लिए सतत मूल्यांकन का कार्य बोझिल हो सकता है। यह तभी होता है जब हम किन्हीं अपरिहार्य कारणों से अपने विषय और बिंदु पर केन्द्रित नहीं होते। यह समझना ज़रूरी है कि सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में विषय बिन्दु पर केन्द्रित होने और केन्द्रित न होने के क्या मायने हैं। सीखने-सिखाने की गतिविधियां दो ध्रुवों के बीच बच्चों को केन्द्र में रखकर किया जाता है। बच्चा जिस केन्द्र में होता है उसके एक ध्रुव पर माता-पिता और अभिभावक होते हैं। वहीं दूसरे ध्रुव पर स्कूल और वहां शिक्षण कार्य में शामिल अध्यापक/अध्यापिका होते हैं। दोनों के काम बंटे हुए होने के बाद भी दोनों को केन्द्र में स्थित बच्चे के लिए अपनी दिनचर्या तय करनी होती है और समर्पित भाव से प्रयास करना पड़ता है। क्योंकि केन्द्र में स्थित बच्चा ठीक अवस्था में होगा तो घर-परिवार, देश और समाज को स्थायित्व मिलेगा। 

केन्द्र में स्थित बच्चे की कल्पना में भविष्य के एक सभ्य नागरिक, समाज सेवी, राजनीति कर्मी, डाॅक्टर, इंजीनीयर, वकील, प्रोफेशनल, किसान और मज़दूर आदि सभी शामिल होते हैं। ये सारे पहचान एक दूसरे के पूरक होते हैं। इनमें परस्पर सहजीविता की कल्पना निहीत होती है। यदि ऐसा नहीं होता तो केन्द्र में स्थित बच्चे के लिए माता-पिता और शिक्षकों को प्रयास ही नहीं करना पड़ता। बच्चे को न तो स्कूल के औपचारिक परिवेश में अच्छे मूल्यों और गुणात्मक सीख की आवश्यकता होती और न ही घर और समाज के अनौपचारिक परिवेश में माता-पिता को अपने बच्चों को परंपरा और संस्कार सिखाने की जिम्मेदारी निभानी पड़ती। मानव जीवन के इस सच को परीक्षा और मूल्यांकन की स्थापित प्रणाली से जोड़कर देखें तो अंदाज़ा होता है कि माता-पिता व्यक्तिगत और अनौपचारिक तौर पर अपने बच्चों का सतत मूल्यांकन करते रहते हैं। यही वजह है कि वो हर दिन, हर क्षण अपने बच्चों के समक्ष जीवन के उत्तम आचार, विचार और व्यवहार के साथ-साथ श्रेष्ठ अनुशासन, आचरण और शिष्टाचार आदि के आदर्श प्रस्तुत करते रहते हैं। ताकि बच्चे के व्यक्तित्व में ये बातें मूल्य के रूप में स्थापित और विकसित हो सकें।

ब बात करते हैं दूसरे ध्रुव की जहां शिक्षक होते हैं। शिक्षक केन्द्र में स्थित बच्चे के लिए औपचारिक प्रयास करते हैं। स्कूल के औपचारिक परिवेश में बच्चे को अनुशासन और शिष्टाचार के साथ-साथ निर्धारित पाठ्यक्रम को समयबद्ध तरीके से पढ़ाना-सिखाना शिक्षक का दायित्व होता है। शिक्षक के ऊपर यह जिम्मेदारी होती है कि वो बच्चों में विभिन्न विषयों से संबंधित विभिन्न बिन्दुओं की समझ बनाने में उसी समर्पण भाव का परिचय दे जैसा कि घर के अनौपचारिक परिवेश में माता-पिता और अभिभावक संस्कार की सीख देते समय दिखाते हैं। स्कूली शिक्षा में ऐसा करना ही शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए सुखद समझा जाता है। यदि मौजूदा दौर में स्कूली शिक्षा की बात करें तो लगभग सभी स्कूल और शिक्षक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए समर्पित नज़र आते हैं। मूल्यांकन की सतत प्रक्रिया को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से अलग करके नहीं देखा जा सकता है। उक्त बातों का ध्यान करके कोई भी शिक्षक अपने विद्यार्थियों की प्रगति रिपोर्ट तैयार कर सकता है।

दि किसी शिक्षक के समक्ष फिर भी संशय की स्थिति हो कि ऐसी स्थिति में क्या करें जब उन्हें दो-तीन घण्टे की परीक्षा की प्रचलित परिपाटी के बिना ही बच्चों को पास करना है, तो उसे यह समझ लेना चाहिए कि अब तक वो जिन बच्चों का मूल्यांकन परीक्षा की स्थापित परिपाटी से करते रहे हैं, अब उन्हीं बच्चों के सामने अपना मूल्यांकन प्रस्तुत करना है। जो शिक्षक पूरे शैक्षिक सत्र भर केन्द्र में स्थित बच्चे के लिए समर्पित भाव से प्रयास करते हैं, उनके लिए किसी बच्चे का मूल्यांकन कोई बड़ी बात नहीं होती। यह भी सत्य है कि जब कोई शिक्षक विद्यार्थियों का मूल्यांकन करता है, तो इस प्रक्रिया में उस शिक्षक का खु़द का मूल्यांकन भी स्वतः होता रहता है। इसलिए ज़रूरी है कि चैतन्य होकर शिक्षा शास्त्र के सिद्धांतों को दृष्टिगत रखते हुए शिक्षक बिना औपचारिक परीक्षा के विद्यार्थियों का शैक्षिक मूल्यांकन कर प्रगति पत्र तैयार करें। इस काम को बिना किसी असहजता से किया जा सकता है। क्योंकि शिक्षक को अपने विद्यार्थियों के साथ स्कूल के औपचारिक परिवेश में एक या एक से अधिक शैक्षिक सत्र व्यतीत करने का अवसर मिलता है। शिक्षक को यह बात हमेशा याद रखना चाहिए कि उन्हें न तो बच्चों के ज्ञान की परीक्षा लेनी होती है और न ही अपनी योग्यता का प्रमाण देना होता है। सीखना-सिखाना दो धु्रवीय प्रक्रिया है जिसके केन्द्र में बच्चा होता है। हमें उस बच्चे के लिए निरन्तर अवसर सृजित करने की ओर अग्रसर रहना होता है न कि पास-फेल की प्रक्रियों को सम्पन्न कराने तक सीमित रहना होता है।

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Tuesday, June 18, 2019

बच्चे, तकनीक और किताबें

"इस समय के बच्चों की तुलना उन पंक्षियों से करना बेमानी नहीं है, जो चारों ओर से शिकारी के जाल में फंसे हुए हों और जिनके समक्ष उड़ान भरने की चुनौती हो।"
दिन के लगभग ढाई बजे हैं। सुरेश माली के दरवाजे़ पर कुछ बच्चे मतदान संबंधी चर्चा कर रहे होते हैं। सुरेश माली के बड़े बेटे रमेश के चेहरे पर प्रसन्नता की लकीरें किसी खुशी का इज़हार कर रही थीं। उसने बताया “चाचा आज पहली बार वोट किया है।” पता चला कि सुरेश माली का बड़ा बेटा 23 साल का हो चुका है, और इस उम्र में उसने पहली बार वोट किया। वो बहुत उत्साहित होता है। उसने इसी साल पटना में रहकर एसी एण्ड रेफ्रीजरेशन में आई. टी. आई. की पढ़ाई की है। 23 मई को गाजियाबाद स्थित भारत इलेक्ट्राॅनिक्स लिमिटेड में अप्रैन्टिस के लिए इंटरविव है। अभी हम बात कर रहे होते हैं कि उसके घर के अन्दर, जो उसके माता-पिता की फूल-माला की दुकान भी है, से उसके भाई संजय की आवाज़ आती है कि “मैं जब 18 साल का हो जाउंगा तो ................... सरकार बनाउंगा।” निश्चित तौर पर अगले चुनाव यानि पांच साल के बाद संजय 18 की उम्र पूरी कर मतदाता की भूमिका में होगा। लेकिन मैं देर रात तक उसकी कही बात से बेचैन रहा। शायद इस बेचैनी का कारण मेरा लेखक और चिंतक होना और इससे बढ़कर अपने आस-पास के माहौल से संवेदित होना है। मैं सोचता रहा कि जिस उम्र में संजय जैसे बच्चों को अपने बड़े भाई रमेश की तरह पढ़ाई की बातें सोचनी चाहिए और उनकी अभिव्यक्तियों में कापी-कलम और किताब की बातें होनी चाहिएं, उस समय में ऐसे बच्चे सरकार बनाने के विचार से उद्वेलित हैं। रात के करीब 10 बजे होंगे, रमेश से फेसबुक लाइब पर बात करते हुए मैंने उससे इस बाबत भी बात की कि बहुत से बच्चे ऐसे हैं जिनका प्राइम टाइम यानि उनका जो पढ़ाई का समय है, उस समय में वो पढ़ाई से इतर अन्य गतिविधियों में लिप्त रहते हैं। रमेश ने बताया कि “हां... आजकल बच्चे एन्ड्रायड फोन के आदी हैं। रात के 4 बजे तक गेम खेलते हैं। यह ठीक नहीं है।” रमेश जिसने आज पहली बार वोट दिया था से मैंने कहा कि आप मोबाइल और तकनीक के क्षेत्र में प्रगति और आम लोगों तक इसकी पहुंच को रिजेक्ट कर रहे हैं। रमेश बिना किसी लाग लपेट के कहते हैं कि पढ़ाई की उम्र वाले बच्चों के लिए नयी तकनीक, मोबाइल फोन और एप्लीकेशन नुकसान पहुंचा रहा है। मैंने कहा कि तकनीक और मोबाइल को विकास का प्रतीमान बताया जा रहा है और आप इस आइडिया को रिजेक्ट कर रहे हैं। रमेश एक बार में कहते हैं कि यदि पढ़ने वाले बच्चों की पूरी रात मोबाइल गेम में कटेगी तो उनका दिन निश्चित तौर पर खराब होगा। रमेश से बातचीत के बाद उसे पहली बार मतदान में हिस्सा लेने के लिए बधाई देता हूं और उसके उज्जल भविष्य के लिए उसे शुभकामना देने के बाद अपने घोंसले में लौट आता हूं।

मेश से बातचीत के बाद यह अंदाज़ा भी होता है कि बच्चों का एक-एक मिनट वास्तव में न सिर्फ उनके और उनके परिवार के लिए महत्वपूर्ण है बल्कि समाज और देश के लिए भी महत्वपूर्ण है। वो लोग जो तकनीकी क्रान्ति और इस क्रान्ति जनित यंत्रों के अबाध प्रसार में विकास की रूपरेखा देखते हैं, उन्हें उम्र की विविधता का ध्यान रखने की ज़रूरत है। नीतिगत स्तर पर इस युक्ति को अपनाने की ज़रूरत है कि कौन सी तकनीक और तकनीकी यंत्र बच्चे, बड़े, बूढ़े और महिलाओं के लिए उपयुक्त हैं। तकनीक का प्रसार आयु आधारित विविधता, पारिवारिक और सामाजिक विविधता को कैसे प्रभावित करता है, इस पर यथा संभव ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है। 

सा इसलिए भी कहना पड़ रहा है कि प्रायः ऐसा देखा जा रहा है कि जिन बच्चों के पास नयी तकनीक युक्त एन्ड्रायड फोन हैं, वो बच्चे ऐसे फोन के दुरूपयोग और दुष्परिणामों से सावधान नहीं है। सतीश जो मेरे पड़ोस के जयपाल भइया का लड़का है इस समय 12वीं का छात्र है। 17वीं लोक सभा के चुनाव नतीजों के आने से ठीक दो दिन पहले 21 मई की दोपहर जब मैं नवापुरा स्थित डाॅ॰ सिद्दीकी की क्लिनिक में त्रिवेणी जायसवाल से बात कर रहा होता हूं, उसी समय गाज़ीपुर के तारिक भाई का फोन आता है। मैं फोन रिसिव करता, इससे पहले ही डिस्कनेक्ट हो जाता है। ठीक इसी समय सतीश के फेसबुक फ्रेण्ड रिक्वेस्ट पर नज़र पड़ती है। सतीश के फेसबुक फ्रेन्ड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट करते समय उसके फेसबुक वाल पर एक पोस्ट देखा। नमो अगेन के साथ कविता कुछ पंिक्तयां “गद्दार नहीं खु़द्दार चाहिए!!/कमजार नहीं दमदार चाहिये!!/तुम्हें मुबारक हो वंशवादी शहज़ादे/हमें हमारा चैकीदार चाहिये!!” लिखी हुई थीं। त्रिवेनी जायसवाल से बच्चों की पढ़ाई और उनके करियर पर बात के दौरान सतीश के इस पोस्ट पर भी देर तक बातें हुईं।
इत्तेफाक से उस पोस्ट पर भी नज़र पड़ी, जिसमें 12वीं की परीक्षा पास करने वाले अख़्तर ने अपने फेसबुक वाल पर लिखा था कि “......पी. वालों ........एम. गायब करवा के भी कुछ नहीं उखाड़ पाओगे। डेडिकेटेड टू भक्त लोग।” दो किशोरों की ऐसी अभिव्यक्तियां किसी भी संवेदनशील व्यक्ति की बेचनी का सबब हो सकती हैं। यह अंदाजा भी होता है कि मौजूदा दौर में किशोरावास्था के बच्चों के परिवेश से किस तरह काॅपी-कलम और किताब इत्यादि गायब हैं या गायब कर दी गयी हैं। माथे पर बल पड़ना स्वाभाविक है। क्योंकि ऐसा कैसे संभव हुआ कि शारीरिक, सामाजिक और बौद्धिक आवश्यकताओं की पूर्ति की संभावनाएं क्षीण पड़ गयी हैं। सवाल लाज़मी है कि क्या 17-18 वर्ष के दो किशोरों की ऐसी अभिव्यक्तियां उनकी अवस्था के अनुरूप उचित हैं? यदि शिक्षा मनोविज्ञान की शब्दावली में कहें तो बच्चों को आत्म अभिव्यक्ति के लिए अवसर ज़रूरी है। लोकतंत्र की पाठशाला में भी “अभिव्यक्ति की आज़ादी” एक महत्वपूर्ण बिन्दु है। लेकिन सवाल यह है कि जिन बच्चों को अपनी कक्षा के विषय और टाॅपिक्स को समझने में समय लगाना चाहिए और जिन बच्चों में आत्म अभिव्यक्ति के माध्यम से सर्जनात्मक क्षमताओं का विकास होना चाहिए, वो बच्चे सरकार बनाने और सरकार बचाने में समय लगा रहे हैं। बल्कि यह कहना अधिक प्रासंगिक है कि शैक्षिक अभिव्यक्तियों के बजाय राजनीतिक अभिव्यक्तियों में अपना समय गवां रहे हैं। उन्हें यह भी पता है कि उनकी ऐसी अभिव्यक्तियां उनकी कक्षा और किसी विषय से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित नहीं है। और न ही ऐसी अभिव्यक्तियों पर उन्हें ग्रेड या माक्र्स मिलने हैं। इन बातों का आशय यह नहीं है कि जो किशोर बच्चे किसी प्रभाव से ऐसा सोच रहे हैं, उन्हें अभिव्यक्ति के अवसर से रोका जाए। लेकिन ऐसे बच्चों की पारिवारिक और सामाजिक पृष्ठभूमि देखकर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति, जो नयी पीढ़ी के बेहतरी के सपने देखता है, इसके लिए कोशिशें करता है, की पीड़ा और बेचैनी का बढ़ जाना स्वाभाविक है। सतीश और अख़्तर का उदाहरण आइना दिखाने के लिए काफी है कि किशोरों की ऐसी अभिव्यक्तियां कदाचित उचित नहीं हैं।
तीश और अख़्तर जैसे बच्चे अपने परिवारों की उम्मीदें हैं। इन्हीं पर निर्भर है कि वो पढ़-लिख कर अपने परिवारों को विषम परिस्थितियों से उबारेंगे। अक्सर समाचारों में पढ़ने-सुनने को मिलता है कि किसी पान बेचने वाले, चाय बेचने वाले या रिक्शा/टेम्पो चलाने वाले का बेटा/बटी आई.ए.एस. बन गया। इन बच्चों को इन्हीं कड़ियों का हिस्सा बनना होगा। यह सच है कि अभिव्यक्ति बच्चों की क्षमताओं का परिचायक है। लेकिन उचित समय पर उचित मार्गदर्शन के अभाव में बच्चों का शैक्षिक के बजाय अन्य प्रकार की अभिव्यक्तियों के लिए प्रेरित होना उनके और समाज दोनों के लिए हानिप्रद है। समय और स्थान के अनुरूप होने वाली अभिव्यक्तियां श्रेयस्कर और फलदायी होती हैं। इसलिए किशोरावस्था के बच्चों को शैक्षिक और सह-शैक्षिक अभिव्यक्तियों के लिए पे्ररित करना ज़रूरी है। वरना अपरिपक्वता और अतिउत्साह मन और शरीर को दिशाहीन बना देता है। ऐसे में बच्चे सामाजीकरण की उस प्रक्रिया से भी अलग-थलग रह जाते हैं, जिसमें उन्हें आयु, वर्ग और लिंग आधारित विविधता का ज्ञान होता है, परिपक्वता आती है और सच-झूठ, अच्छे-बुरे की समझ विकसित होती है। समझ का विकसित होना बेहद ज़रूरी है। क्योंकि समझ और सूझबूझ से ही व्यक्ति में “सुंदर” की बेहतरीन कल्पना को समझने और उसे साकार करने की क्षमता विकसित होती है। 

बेशक तकनीक और यंत्रों ने मानव जीवन में आसानियां पैदा की हैं। लेकिन मौजूदा दौर में जिस तरह का रोबोटिक डेवलपमेन्ट हो रहा है, उसके नकारात्मक प्रभावों से “बच्चा” नामक बायोलाॅजिकल जीव सुरक्षित नहीं है। रोबोटिक डेवलपमेन्ट और तकनीक आधारित गतिविधियां बाज़ार की ज़रूरत भी है। वो बाज़ार जहां व्यक्ति नागरिक नहीं उपभोक्ता है और जहां बच्चा छात्र/छात्रा नहीं बल्कि आदर्श उपभोक्ता है। बाज़ार की यह ज़रूरत बाल उपभोक्ताओं के मन के तारों में चिन्गारियां पैदा कर रही हैं और उन्हें रोबोट की तरह व्यवहार करना सिखा रही हैं। ऐसा रोबोट जो एक रिमोट से संचालित होता है। विचित्र बात है कि बाज़ार विविध रूपों और माध्यमों से बच्चों से संबंध बनाए हुए है। बच्चों के मन बहलाने वाले टाॅफी-चाॅकलेट, बिस्कुट और अन्य पोषक पदार्थों से लेकर उनकी शिक्षण सामग्री जैसे पेन्सिल, रबर, काॅपी-कलम और किताब आदि पर जी.एस.टी. लागू है। ऐसे बाज़ारमय परस्थितियों में तकनीक की मार अलग है। इन्हीं परिस्थितियों में “देश का भविष्य पल रहा है।” इस समय के बच्चों की तुलना उन पंक्षियों से करना बेमानी नहीं है, जो चारों ओर से शिकारी के जाल में फंसे हुए हों और जिनके समक्ष उड़ान भरने की चुनौती हो। 

ह समझने की ज़रूरत है और हमारे-आप जैसे लोगों का नैतिक दायित्व भी है कि हम बाज़ार की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए बच्चों विशेषकर किशोरावस्था के बच्चों को अपने ही मां-बाप और परिवार में विद्रोही बन जाने की परिस्थितियां पैदा करने वाले कामों में सहयोगी न बनें। कहा जाता है कि बच्चे देश का भविष्य हैं। तो मैं कहना चाहता हूं कि बच्चों को मोबाइल के लिए प्रेरित करके, उन्हें बायोलाॅजिकल से रोबोटिक न बनाया जाए। देश के भविष्य से खिलवाड़ करना किसी भी तरह उचित नहीं है। अच्छा होता कि बच्चों को किताबों से दोस्ती के लिए प्रेरित किया जाए। क्योंकि एक बेहतर कल का रास्ता किताबों की दुनिया से होकर निकलता है।

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नोट- वास्तविक घटना पर आधारित। सभी पात्रों के नाम बदल दिए गए हैं।

Wednesday, May 22, 2019

कौन जीत रहा है...! कौन हार रहा है...!

कील साहब के साथ एक खास बात है, जिसका ऐतराफ करना वो नहीं भूलते। वो जहां भी बैठते हैं, उन्हें नींद
आने लगती है। मुन्सफी मुहम्मदाबाद हो या तहसील मुहम्मदाबाद या फिर सदर रोड स्थित डाॅ॰ फतह मुहम्मद की क्लिनिक, हर जगह बैठते ही वो नींद की आगोश में चले जाते हैं। यद्यपि देश-दुनिया की चर्चाओं में वो स्वयं अपनी बात कहते समय ठीक रहते हैं। लेकिन जैसे ही उनकी बात समाप्त होती है, उनकी आंखें बन्द होने लगती हैं। उनके आस-पास होने वाली चर्चाएं जारी रहती हैं। लेकिन वो चर्चाओं से बेख़बर होते हैं। जब आंख खुलती है, तो बताना नहीं भूलते कि उन्हें बैठते ही सोने और सपने देखने की आदत है। आज 17वीं लोकसभा सामान्य निर्वाचन-2019 के लिए मतदान हो रहा है। दोपहर के 2 बजकर 20 मिनट हुए हैं। आज वकील साहब बैठे नहीं हैं, बल्कि क्लिनिक दक्षिण दिशा की दीवार से लगी तख़्त पर लेटे हुए हैं। लेटने का मौका उन्हें इसलिए मिला कि आज वो दोपहर के समय आए और शाम की चर्चा में शामिल होने वाले सदस्य मौजूद नहीं होते हैं। मैं और अब्बा क्लिनिक में पहुंचते हैं। वकील साहब को आवाज़ देते हैं। वकील साहब हिलते-डुलते हैं। हमें लगता है कि वो नींद से बेदार हो रहे हैं। मैंने उन्हें इस मुद्रा में कभी लेटे हुए नहीं देखा था। सर पर हरे रंग का गमछा कुछ इस तरह लगा रखा था जैसे वो अभी धूप से बचने की कोशिश कर रहे हैं। अंदाज़ा हुआ कि वो धूप में चलकर आए हैं। क्लिनिक में किसी को न पाकर लेट कर आराम कर रहे हैं। उनकी आंख खुलती है, वो उठकर बैठने की कोशिश करते हैं। मैं उन्हें लेटे रहने का आग्रह करता हूं।
उनकी अनुमति लेकर अपनी मोबाइल से इस मुद्रा में उनकी एक फोटो खींचता हूं। अब्बा मज़ाक करते हैं, “फोटो कहीं सोशल मीडिया में शेयर नहीं करना, वरना लोग पुछार के लिए आने लगेंगे।” वकील साहब मुस्कराते हुए उठकर बैठ जाते हैं। कहते हैं सपना देख रहा था। “कौन जीत रहा है...! कौन हार रहा है...!”, अब्बा चुटकी लेते हैं। वकील साहब की मुस्कराहट हंसी में बदल जाती है। हम सब हंसने लगते हैं। हा... हा... हा... हा... की आवाज़ फिज़ा में घुल जाती है।

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